छहढाला (45) पाँचवीं ढाल
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत
छहढाला(45)
जो योगनकी चपलाई तातैं है आस्रव भाई;
आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हें निरवेरे ॥९॥
अन्वयार्थ -- (भाई) हे भव्य जीव! ( योगनकी ) योगों की (जो) जो (चपलाई) चंचलता है (तातैं) उससे (आस्रव) आस्रव (ह्वै) होता है, और (आस्रव) वह आस्रव (घनेरे) अत्यन्त (दुखकार) दुःखदायक है, इसलिये (बुधिवन्त) बुद्धिमान (तिन्हें) उसे (निरवेरे) दूर करें।
भावार्थ - विकारी शुभाशुभभावरूप जो अरूपी दशा जीव में होती है वह भावास्रव है; और उस समय नवीन कर्मयोग्य रजकणों का स्वयं स्वतः आना (आत्मा के साथ एक क्षेत्र में आगमन होना) सो द्रव्यास्रव है। उसमें जीव की अशुद्ध पर्यायें निमित्त मात्र हैं।
पुण्य और पाप दोनों आस्रव और बन्ध के भेद हैं।
पुण्य - दया, दान, भक्ति, पूजा, व्रत आदि शुभराग सरागी जीव को होते हैं, वे अरूपी अशुभ भाव हैं, और वह भावपुण्य है। तथा उस समय नवीन कर्मयोग्य रजकणों का स्वयं स्वतः आना (आत्मा के साथ एक क्षेत्र में आगमन होना) सो द्रव्यपुण्य है। उसमें जीव की अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र है।,
पाप - हिंसा, असत्य, चोरी इत्यादि जो अशुभभाव हैं वह भावपाप है; और उस समय कर्मयोग्य रजकणों का आगमन होना सो द्रव्यपाप है। उसमें जीव की अशुद्ध पर्यायें निमित्त हैं।
परमार्थ से वास्तव में पुण्य-पाप, शुभाशुभ आत्मा को अहितकर हैं, तथा वह आत्मा की क्षणिक अशुद्ध अवस्था है। द्रव्य पुण्य-पाप तो परवस्तुु हैं वे कहीं आत्मा का हित अहित नहीं कर सकते। ऐसा यथार्थ निर्णय प्रत्येक ज्ञानी जीव को होता है और इस प्रकार विचार करके सम्यग्दृष्टि जीव स्वद्रव्य के अवलम्बन के बल से जितने अंश में आस्रवभाव को दूर करता है उतने अंश में उसे वीतरागता की वृद्धि होती है। उसे ‘‘आस्रव भावना’’ कहते हैं ॥९॥
८-संवर भावना
जिन पुण्य-पाप नहिं कीना, आतम अनुभव चित दीना।
तिनही विधि आवत रोके, संवर लहि सुख अवलोके ॥१०॥
अन्वयार्थ:- (जिन) जिन्होंने (पुण्य) शुभभाव और (पाप) अशुभभाव (नहिं कीना) नहीं किये, तथा मात्र (आतम) आत्मा के (अनुभव) अनुभव में, शुद्ध उपयोग में (चित) ज्ञान को (दीना) लगाया है (तिनही) उन्होंने ही (आवत) आते हुए (विधि) कर्मों को (रोके) रोका है और (संवर लहि) संवर प्राप्त करके (सुख) सुख का (अवलोके) साक्षात्कार किया है।
भावार्थ:- आस्रव का रोकना सो संवर है। सम्यग्दर्शनादि द्वारा मिथ्यात्वादि आस्रव रुकते हैं। शुभोपयोग तथा अशुभोपयोग दोनों बन्ध के कारण हैं - ऐसा सम्यग्दृष्टि जीव पहले से ही जानता है। यद्यपि साधक को निचली भूमिका में शुद्धता के साथ अल्प शुभाशुभ भाव होते हैं, किन्तु वह दोनों को बन्ध का कारण मानता है, इसलिये सम्यग्दृष्टि जीव स्वद्रव्य के आलम्बन द्वारा जितने अंश में शुद्धता करता है, उतने अंश में उसे संवर होता है, और वह क्रमशः शुद्धता में वृद्धि करके पूर्ण शुद्धता (संवर) प्राप्त करता है। यह “संवर भावना” है ॥१०॥
1 - मन-वचन-काय के योग से कर्म आस्रव का क्या कारण है? (योगों की चंचलता)
2 - कर्मों का आस्रव दुःखदायक है या सुखदायक? (दुःखदायक)
3 - जीव कितने प्रकार से कर्मों का आस्रव करता है? (आठ प्रकार से)
4 - आठ कर्मों के क्या नाम हैं? (ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र, अन्तराय)
5 - आस्रव को कौन-सा जीव रोक सकता है? (ज्ञानी)
6 - कर्मों के आस्रव को रोकना क्या कहलाता है? (संवर)
7 - शुभोपयोग और अशुभोपयोग दोनों किस के कारण है? (कर्मों के आस्रव व बंध का)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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