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Showing posts from March, 2026

भगवान महावीर स्वामी (61)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (61) भारत में भगवान महावीर तीर्थंकर से पूर्व २३वें पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; अहिंसाधर्म की महिमा फैल रही थी। भगवान महावीर ने भी वह बात प्रचारित की कि राग से भिन्न आत्मा के अनुभव द्वारा ही अहिंसाधर्म का पालन हो सकता है; क्योंकि राग स्वयं हिंसा है, इसलिए जो जीव जितना राग में वर्तता है, उतना वह हिंसा में ही वर्त रहा है। जिसमें राग नहीं है, ऐसे ज्ञान की अनुभूति वह परम अहिंसाधर्म है और उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे अहिंसाधर्म के उपदेशक प्रभु महावीर ने विपुलाचल से विहार करके भारतभूमि को पावन किया। जहाँ वे पधारते, वहाँ अहिंसामय शान्त वातावरण हो जाता था। सर्प और नेवले जैसे विरोधी जीव भी एक-दूसरे के मित्र बन जाते थे। सिंह और गाय, शेर और खरगोश... सब भयरहित होकर एक साथ बैठते थे... और वीरवाणी का अमृत-पान करते थे। प्रभु ने अनेकान्त तत्व का स्वरूप समझाया- जीव अतीन्द्रिय चेतनतत्व है, वह जड़ से भिन्न है। चेतन और जड़ प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वधर्म में स्थित हैं। एक ही वस्तु का एकसाथ अपने अनेक धर्मों में तन्मय रूप से रहना ही ‘अनेकान्त’ है। एक ही आत्...

भगवान महावीर स्वामी (60)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (60) अहा, गौतम गणधर भी जिनकी स्तुति करते हों, उन सर्वज्ञ महावीर की महिमा का क्या कहना! हे महावीर देव! आपके गुण इतने अधिक महान हैं कि छद्मस्थ जीव उनकी स्तुति करते हुए थक जाता है, तथापि मैं आपके गुणों के प्रति सच्ची महिमा के कारण आपकी स्तुति करता हूँ। प्रभो! आपके अंतर में उदित हुआ केवलज्ञान सूर्य हानि-वृद्धि से रहित स्थिर है; वह सूर्य की भांति आतप देनेवाला नहीं, किन्तु आतप हरनेवाला है। आपकी वीतरागी सर्वज्ञता की अतुल्य महिमा का चिन्तन हमें राग से भिन्न ज्ञानस्वभावी आत्मा की अनुभूति कराता है... और सम्यक्त्व सहित महान आनन्द प्रकट होता है। प्रभो! आपकी यथार्थ प्रतीत्ति का यह महान फल है। धन्य सर्वज्ञदेव! आपका प्रभाव अद्वितीय है। स्वानुभूति के बिना आपके अचिन्त्य गुण चिन्तन में नहीं आ सकते। जब हम आपके अनन्त गुणों को ज्ञान में लेकर उनका चिन्तन करते हैं, तब हमारा ज्ञान वैसे आत्मगुणों में एकाग्र हो जाता है और विकल्पों से परे परमशान्त चैतन्यरस अनुभव में आता है। यही है आपका परमार्थ स्तवन!... यही है आपका पावन पंथ। जो इन्द्रियों को जीतकर जाने विशेष निजात्मा को। निश्चय...

भगवान महावीर स्वामी (59)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (59) इन्द्रभूति गौतम ज्यों ही मानस्तम्भ के निकट आये और प्रभु का वैभव देखा, त्यों ही उनका मान विगलित हो गया...। उन्होंने महावीर को देखा और देखते ही सर्वज्ञ की तथा जीव के अस्तित्व की प्रतीति हो गई। अहा! ऐसे वैभव में भी प्रभु वीतराग रूप से विराज रहे हैं! कैसी शांत है उनकी दृष्टि! उनकी आत्मा की दिव्यता का क्या कहना! अवश्य ही यह सर्वज्ञ हैं। गौतम को प्रभु के प्रति परम सम्मान का भाव जागृत हुआ और जीव के अस्तित्व सम्बन्धी उनकी सूक्ष्म शंकाएँ दूर हो गईं...। गर्व का स्थान ज्ञान ने लिया। निःशल्य हुए गौतम ने विनयपूर्वक अपने पाँच सौ शिष्यों सहित प्रभु का मार्ग अंगीकार किया और नतमस्तक होकर प्रभु की स्तुति की - मोक्षमार्गस्य नेतारं भेतारं कर्मभूतानाम्।  ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये॥ अहा! कैसा आनंददायी होगा वह दृश्य! वीर प्रभु की दिव्यवाणी खिरती होगी और गौतम गणधर उसे झेलते होंगे। प्रभु की वाणी सुनकर तत्क्षण गौतम-इन्द्रभूति चार ज्ञानधारी श्रुतकेवली हुए और बारह अंगरूप श्रुत की रचना द्वारा परमात्मा की वाणी का प्रसाद पंचमकाल के भव्य जीवों के लिये संग्...