भगवान महावीर स्वामी (59)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (59)

इन्द्रभूति गौतम ज्यों ही मानस्तम्भ के निकट आये और प्रभु का वैभव देखा, त्यों ही उनका मान विगलित हो गया...। उन्होंने महावीर को देखा और देखते ही सर्वज्ञ की तथा जीव के अस्तित्व की प्रतीति हो गई। अहा! ऐसे वैभव में भी प्रभु वीतराग रूप से विराज रहे हैं! कैसी शांत है उनकी दृष्टि! उनकी आत्मा की दिव्यता का क्या कहना! अवश्य ही यह सर्वज्ञ हैं। गौतम को प्रभु के प्रति परम सम्मान का भाव जागृत हुआ और जीव के अस्तित्व सम्बन्धी उनकी सूक्ष्म शंकाएँ दूर हो गईं...। गर्व का स्थान ज्ञान ने लिया। निःशल्य हुए गौतम ने विनयपूर्वक अपने पाँच सौ शिष्यों सहित प्रभु का मार्ग अंगीकार किया और नतमस्तक होकर प्रभु की स्तुति की -

मोक्षमार्गस्य नेतारं भेतारं कर्मभूतानाम्। 

ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये॥

अहा! कैसा आनंददायी होगा वह दृश्य! वीर प्रभु की दिव्यवाणी खिरती होगी और गौतम गणधर उसे झेलते होंगे। प्रभु की वाणी सुनकर तत्क्षण गौतम-इन्द्रभूति चार ज्ञानधारी श्रुतकेवली हुए और बारह अंगरूप श्रुत की रचना द्वारा परमात्मा की वाणी का प्रसाद पंचमकाल के भव्य जीवों के लिये संग्रहित करके रख दिया, जो प्रसाद आज हमें गुरु-परम्परा से प्राप्त हो रहा है।

अहो वीरनाथ! आपका महान उपकार है; आपके गणधरों का तथा वर्तमान पर्यन्त आपकी वाणी द्वारा स्वानुभवपूर्वक मोक्षमार्ग को प्रवाहित रखनेवाले वीतरागी संतों का भी महान उपकार है कि जिन के प्रताप से आज ऐसे दुःषम काल में भी हमें आपका मोक्षमार्ग मिल रहा है। वाह! धन्य वीर का शासन... और धन्य उस शासनधारा को अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित रखने वाले संतों का उपकार!

उनके पश्चात् इन्द्रभूति गौतम के साथ उनके और दो भाई महा विद्वान अग्निभूति, वायुभूति तथा अन्य आठ विद्वान अपने-अपने शिष्यों सहित वहाँ प्रभु के समवसरण में आये और रत्नत्रय धर्म प्राप्त करके प्रभु के गणधर बने। महावीर तीर्थंकर के कुल ११ गणधर थे। समवसरण की अद्भुत दिव्यता के मध्य रहकर भी निर्माह रूप से विराजमान वर्द्धमान सर्वज्ञ सचमुच अलौकिक थे। अहा! कैसी शान्तमुद्रा! कैसी वीतरागता! और कैसा ज्ञानातेज! वह मुद्रा देखते ही जीवों की शंकाएं निर्मूल होकर आत्मा के परमस्वरूप की प्रतीति होती थी। वाह! उन अरिहन्तों की महिमा का क्या कहना, कि जिनका स्वरूप लेने से आत्मा के शुद्धस्वरूप का ज्ञान तथा सम्यग्दर्शन होता है।

इन्द्रभूति का अद्भुत परिवर्तन देखकर इन्द्र को अपार आनन्द हुआ... और उन्होंने ब्राह्मण का रूप छोड़कर अपने असली इन्द्र स्वरूप में गौतम गणधर के चरणों में वन्दन किया।

इन्द्रभूति ने परम गंभीरता से कहा - “इन्द्रराज! अब मैंने जान लिया है कि तुम्हीं ब्राह्मण का वेश धारण करके युक्तिपूर्वक मुझे यहाँ समवसरण में लाये हो... यहाँ आने से मेरा कल्याण हुआ है। मेरी पराजय नहीं, अपितु विजय हुई है और उसमें मुझे तीन रत्न तथा चार ज्ञान प्राप्त हुए हैं। पहले मैं मिथ्यात्व से पराजित था, अब मैंने मिथ्यात्व को पराजित करके अपने अपार निजवैभव को जीत लिया है। प्रभु महावीर अब मात्र तुम्हारे नहीं, मेरे भी गुरु हैं।”

शत-इन्द्र-वंदित त्रिजग-हित निर्मल मधुर उपदेश दे।

निःसीमगुण जो धारते जितभव नमूँ जिनराज को॥

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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