भगवान महावीर स्वामी (60)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (60)
अहा, गौतम गणधर भी जिनकी स्तुति करते हों, उन सर्वज्ञ महावीर की महिमा का क्या कहना! हे महावीर देव! आपके गुण इतने अधिक महान हैं कि छद्मस्थ जीव उनकी स्तुति करते हुए थक जाता है, तथापि मैं आपके गुणों के प्रति सच्ची महिमा के कारण आपकी स्तुति करता हूँ। प्रभो! आपके अंतर में उदित हुआ केवलज्ञान सूर्य हानि-वृद्धि से रहित स्थिर है; वह सूर्य की भांति आतप देनेवाला नहीं, किन्तु आतप हरनेवाला है। आपकी वीतरागी सर्वज्ञता की अतुल्य महिमा का चिन्तन हमें राग से भिन्न ज्ञानस्वभावी आत्मा की अनुभूति कराता है... और सम्यक्त्व सहित महान आनन्द प्रकट होता है। प्रभो! आपकी यथार्थ प्रतीत्ति का यह महान फल है।
धन्य सर्वज्ञदेव! आपका प्रभाव अद्वितीय है। स्वानुभूति के बिना आपके अचिन्त्य गुण चिन्तन में नहीं आ सकते। जब हम आपके अनन्त गुणों को ज्ञान में लेकर उनका चिन्तन करते हैं, तब हमारा ज्ञान वैसे आत्मगुणों में एकाग्र हो जाता है और विकल्पों से परे परमशान्त चैतन्यरस अनुभव में आता है। यही है आपका परमार्थ स्तवन!... यही है आपका पावन पंथ।
जो इन्द्रियों को जीतकर जाने विशेष निजात्मा को।
निश्चय में स्थित साधुजन कहते जितेन्द्रिय उन्हीं को॥
इस प्रकार सर्वज्ञस्वभावी अतीन्द्रिय आत्मा की अनुभूति ही सर्वज्ञ की परमार्थ स्तुति है।
वे सर्वज्ञ महावीर कोई ‘अन्तिम तीर्थंकर’ नहीं थे। जिस प्रकार जगत में मोक्ष प्राप्त करने वाले जीवों का तथा मोक्षमार्ग का कभी अन्त नहीं है, उसी प्रकार एक के बाद एक अनन्त तीर्थंकरों की परम्परा अनन्त काल तक चलती ही रहेगी। इस चौबीसी के प्रथम और अन्तिम (ऋषभदेव एवं महावीर) तीर्थंकरों के बीच तो असंख्य वर्षों का अन्तर था; परन्तु इस चौबीसी के अन्तिम और आनेवाली चौबीसी के प्रथम (महावीर एवं पद्मनाथ) तीर्थंकरों के बीच मात्र 84000 वर्ष का ही अन्तर है। महावीर प्रभु के मोक्षगमन पश्चात् 84000 वर्ष में ही राजा श्रेणिक का आत्मा महापद्म तीर्थंकर होगा। धन्य है यह मोक्षमार्ग!
इधर कौशाम्बी नगरी में कुमारी चन्दन बाला वीर प्रभु के केवलज्ञान की प्रतीक्षा करते हुए वैराग्यमय जीवन बिता रही है। वैशाख शुक्ला दशमी के सायंकाल आकाश में अचानक हजारों-लाखों देव-विमान देखकर उसे आश्चर्य हुआ... वे देव महावीर भगवान का जय जयकार करते हुए जा रहे थे। चन्दना तुरन्त समझ गई कि मेरे महावीर अब परमात्मा बन गये। इस प्रकार चन्दना के हर्षानन्द का पार नहीं है। सारे नगर में आनन्द के बाजे बजवाकर उसने प्रभु के केवलज्ञान का मंगल उत्सव मनाया। पश्चात् बड़ी बहिन मृगावती को साथ लेकर वह राजगृही वीर प्रभु के समवसरण में पहुँची... और उन वीतरागी वीर परमात्मा को देखकर स्तब्ध रह गई।
राजकुमार महावीर ने जो आत्मानुभूति प्राप्त कराई थी, उसका उसे स्मरण हुआ और तुरन्त वैसी अनुभूति में पुनः-पुनः उपयोग लगाकर अन्तर की विशुद्धता को बढ़ाया। प्रभु की स्तुति की, गौतम स्वामी आदि मुनिवरों को वन्दन किया और प्रभु चरणों में आर्यिका के व्रत धारण किये... कोमल केशों का लोच किया। राजवैभव छोड़ दिये और एक श्वेत परिधान में वैराग्य से सुशोभित हो उठी। अभी कुछ दिन पूर्व भी वह सिर मुंडाए बंधन में पड़ी थी... और आज स्वेच्छा से सिर मुंडाकर वह मोक्षमार्ग में प्रयाण कर रही है।
कहाँ वह कारागृह और कहाँ यह समवसरण - धर्मसभा! उन दोनों संयोगों से विभक्त तथा निजगुणों के एकत्व - ऐसे निजस्वरूप का वह अनुभवन करती थी। वीर प्रभु की धर्मसभा में विद्यमान ३६,००० आर्यिकाओं के संघ की वह चन्दनामाता अधिष्ठात्री थी। कहाँ भील द्वारा अपहरण और कहाँ वीर प्रभु की शरण! कहाँ वैश्य के हाथों बाजार में बिकने का प्रसंग और कहाँ ३६,००० आर्यिकाओं में अधिष्ठात्री-पद! वाह रे उदयभाव तेरा खेल! परन्तु धर्मात्मा का चैतन्यभाव अब तेरे विचित्रजाल में नहीं फँसेगा, वह तो सर्व प्रसंगों में तुझसे अलिप्त अपने चैतन्यभाव में ही रहेगा... और मोक्ष को साधेगा।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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