भगवान महावीर स्वामी (57)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (57) उत्तम छाया तथा दिव्यप्रकाश द्वारा जो प्रभु की सेवा कर रहा था, वह अशोक वृक्ष आश्चर्य उत्पन्न करता था कि जड़ के बिना इतना विशाल वृक्ष कैसे बना!... और देखो, यह भी एक आश्चर्य की बात है कि वहाँ जगत में श्रेष्ठ सिंहासन होने पर भी प्रभु उस पर बैठते नहीं हैं; उससे ऊपर अन्तरिक्ष में बैठकर ऐसा प्रगट करते हैं कि यह रत्नसिंहासन कोई चैतन्यपद नहीं है; चैतन्य का पद तो अन्तर में अतिन्द्रिय ज्ञान-आनन्द द्वारा निर्मित है... उस पर प्रभु आरूढ़ हैं। ज्ञानानन्द पद में विराजमान सर्वज्ञ महावीर को देखकर भव्यजीव भी ज्ञानानन्द में लीन हो जाते थे...और प्रभु की दिव्यवाणी का श्रवण करने के लिये अत्यन्त आतुर थे। प्रभु कैसा अद्भुत बोलेंगे! कैसा अचिन्त्य आत्मस्वरूप बतलायेंगे... प्रभु अभी बोलेंगे... प्रातःकाल बोलेंगे... मध्याह्न में बोलेंगे... सायंकाल बोलेंगे... कल तो अवश्य बोलेंगे!...। “बोलो, बोलो न वीतराग, अबोला क्यों हमसे लिया है?” यद्यपि वीरप्रभु अभी बोलते नहीं हैं, परन्तु मौन रहकर, अनिच्छा से गगनविहार करते हैं। विहार करते-करते वे राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। दिवसों पर दि...