Posts

मेरी भावना

Image
मेरी भावना जिसने राग-द्वेष कामादिक, जीते सब जग जान लिया सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया, बुद्ध, वीर जिन, हरि, हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो भक्ति-भाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो। ॥1॥ विषयों की आशा नहीं जिनके, साम्य भाव धन रखते हैं निज-पर के हित साधन में जो निशदिन तत्पर रहते हैं, स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं ऐसे ज्ञानी साधु जगत के दुख-समूह को हरते हैं। ॥2॥  रहे सदा सत्संग उन्हीं का ध्यान उन्हीं का नित्य रहे उन ही जैसी चर्या में यह चित्त सदा अनुरक्त रहे, नहीं सताऊँ किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूं पर-धन-वनिता पर न लुभाऊं, संतोषामृत पिया करूं। ॥3॥ अहंकार का भाव न रखूं, नहीं किसी पर खेद करूं देख दूसरों की बढ़ती को कभी न ईर्ष्या-भाव धरूं, रहे भावना ऐसी मेरी, सरल-सत्य-व्यवहार करूं बने जहां तक इस जीवन में औरों का उपकार करूं। ॥4॥ मैत्रीभाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे दीन-दुखी जीवों पर मेरे उरसे करुणा स्त्रोत बहे, दुर्जन-क्रूर-कुमार्ग रतों पर क्षोभ नहीं मुझको आवे साम्यभाव रखूं मैं उन पर ऐसी परिणति हो जावे। ॥5॥ गुणीजनों को देख हृदय म...

छठवीं ढाल (52)

Image
  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(52) मुनियों के शेष गुण तथा राग-द्वेष का अभाव इक बार दिनमें लें अहार, खड़े अलप निज-पानमें;   कचलोंच करत न डरत परिपह सौं, लगै निज ध्यानमें।  अरि मित्र महल मसान कञ्चन, काँच निन्दन थुति करन;  अर्घावतारन असि-प्रहारनमें सदा समता धरन॥ ६॥ भूशयन , अल्पाहार केश-लुंचन सदा समता अन्वयार्थ -वे वीतराग मुनि ( दिनमें) दिन में, (इकबार ) एक बार (खड़े) खड़े रहकर और (निज-पानमें ) अपने हाथ में रखकर (अल्प) थोड़ा-सा (अहार) आहार (लें) लेते हैं ( कचलौंच ) केशलोंच (करत) करते हैं, (निज ध्यानमें) अपने आत्मा के ध्यान में (लगे) तत्पर होकर (परिषह सौं) बाईस प्रकार के परिषहों से (न डरत) नहीं डरते और (अरि मित्र) शत्रु या मित्र, (महल मसान) महल या श्मशान, (कंचन काँच) सोना या काँच (निन्दन थुति करन) निन्दा या स्तुति करने वाले, (अर्घावतारन) पूजा करने वाले और (असि प्रहारन) तलवार से प्रहार करने वाले - इन सबमें समभाव (राग-द्वेष का अभाव) रखते हैं अर्थात किसी पर राग-द्वेष नहीं करते। प्रश्न - सच्चा परिषह-जय किसे कहते हैं? उत्तर - क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, डाँस...

छठवीं ढाल (51)

Image
  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(51) मुनियोंकी तीन गुप्ति और पाँच इन्द्रियों पर विजय समस्त प्रकार निरोध मन वच काय, आतम ध्यावते; तिन सुखिर मुद्रा देखि मृगगण उपल खाज खुजावते। रस रूप गंध तथा फरस अरु शब्द शुभ अशुभावने; तिनमें न राग विरोध पंचेन्द्रिय-जयन् पद पावने।।४।। अन्वयार्थ:- वीतरागी मुनि (मन वच काय) मन-वचन-काया का (सम्यक् प्रकार) भलीभाँति-बराबर (निरोध) निरोध करके, जब (आतम) अपने आत्मा का (ध्यावते) ध्यान करते हैं, तब (तिन) उन मुनियों की (सुथिर) सुस्थिर-शांत (मुद्रा) मुद्रा (देखि) देखकर, उन्हें (उपल) पत्थर समझकर (मृगगण) हिरन अथवा चौपाये प्राणियों के समूह (खाज) अपनी खाज-खुजली को (खुजावते) खुजाते हैं। जो (शुभ) प्रिय और (असुहावने) अप्रिय  पांच इन्द्रियों सम्बन्धी  (रस) पांच रस, (रूप) पांच वर्ण (गंध) दो गंध, (फरस) आठ प्रकार के स्पर्श (अरु) और (शब्द) शब्द - (तिनमें) उन सबमें ( राग-विरोध ) राग या द्वेष (न) मुनि को नहीं होते,  इसलिये वे मुनि  (पंचेन्द्रिय जयन) पांच इन्द्रियों को जीतने वाला अर्थात् जितेन्द्रिय (पद) पद (पावने) प्राप्त करते हैं । भावार्थः— ...

छठवीं ढाल (50)

Image
  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(50) एषणा, आदान-निक्षेपण और प्रतिष्ठापन समिति छयालीस दोष विना सुकुल, श्रावकतनै घर अशनकोय लैं तप बढ़ावन हेतु, नहिं तन-पोषते तजि रसनको । शुचि ज्ञान संयम उपकरण, लखिकैं गहें लखिकैं धरैंय निर्जन्तु थान विलोकि तन-मल मूत्र श्लेष्म परिहरैं ॥ ३ ॥ अन्वया र्थ - वीतरागी मुनि (सुकुल) उत्तम कुलवाले (श्रावकतनें) श्रावक के घर और (रसनको) छहों रस अथवा एक-दो रसों को (तजि) छोड़कर (तन) शरीर को (नहिं पोषते) पुष्ट न करते हुए - मात्र (तप) तप की (बढ़ावन हेतु) वृद्धि करने के हेतु से आहार के (छयालीस) छियालीस (दोष बिना) दोषों को दूर करके (अशनको) भोजन को (लैं) ग्रहण करते हैं। (शुचि) पवित्रता के (उपकरण) साधन कमण्डलु को, (ज्ञान) ज्ञान के (उपकरण) साधन शास्त्र को, तथा (संयम) संयम के ( उपकरण ) साधन पीछी को (लखिकैं) देखकर (गहैं) ग्रहण करते हैं और (लखिकैं) देखकर (धरैं) रखते हैं और (मूत्र) पेशाब (श्लेष्म) श्लेष्म (तन-मल) शरीर के मैल को (निर्जन्तु) जीवरहित (थान) स्थान (बिलोकि) देखकर (परिहरैं) त्यागते हैं। भावा र्थ - वीतरागी जैन मुनि-साधु उत्तम कुल वाले श्रावक के घर, आह...

छठवीं ढाल (49)

Image
  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(49) परिग्रह त्याग महाव्रत, ईर्या समितिः और भाषा समिति अंतर चतुर्दस भेद बाहिर, संग दसधा तैं टलैं; परंमाद तजि चैकर मही लखि, समिति ईर्या तैं चलैं। जग-सुहितकर सब अहितहर, श्रुति सुखद सब संशय हरैं; भ्रमरोग-हर जिनके वचन मुखचन्द्र तैं अमृत झरैं ।।२।। अन्वयार्थ-- वे वीतरागी दिगम्बर जन मुनि (चतुर्दस भेद) चौदह प्रकार के (अन्तर) अंतरंग तथा (दसधा) दस प्रकार के (बहिर) बहिरंग (संग) परिग्रह से (टलैं) रहित होते हैं। (परमाद) प्रमाद -असावधानी (तजि) छोड़कर (चौकर) चार हाथ (मही) जमीन (लखि) देखकर (ईर्या) ईर्या (समिति तें) समिति से (चलै) चलते हैं, और (जिनके) जिन मुनिराजों के (मुखचन्द्र तैं) मुखरूपी चन्द्र से (जग सुहितकर) जगत का सच्चा हित करनेवला तथा (सब अहितकर) सर्व अहित का नाश करने वाला, (श्रुति सुखद) सुनने में प्रिय लगे ऐसा (सब संशय) समस्त संशयों का (हरैं) नाशक और (भ्रम रोगहर) मिथ्यात्व रूपी रोग को हरने वाला (वचन अमृत) वचनरूपी अमृत (झरैं) झरता है। भावार्थ--वीतरागी मुनि चौदह प्रकार के अन्तरंग और दस प्रकार के बहिरंग परिग्रहों से रहित होते हैं, इसलिये उनको ...

सिद्धों को नमस्कार

Image
  सिद्धों को नमस्कार  ( पारुल जैन, दिल्ली) अष्ट कर्म से रहित हैं जो प्रभु, अष्ट गुणों से सहित हुए। निज घर में जो रहने वाले, निज में ही जो व्यस्त हुए ॥ स्पर्श वर्ण रस गंध रहित जो, अविनाशी अविकारी हैं। किंचित कम वो तनुमात्र से, पूर्व भव अवगाहनी हैं॥ शाश्वत निर्मल अशरीरी जो, अनंत गुण भंडारी हैं। निज आनन्द का पान करें जो, निज में सयंम धारी हैं॥ पर से भिन्न एकत्व विभक्त का, आनन्द निज में धारी हैं। सभी विकारी भावों से हट, निज स्वभाव के धारी हैं॥ मोक्ष मार्ग के नेता भी हैं, हैं वो भी सर्वज्ञ प्रभु । लेकिन हित उपदेश न देते निज में हैं वो लीन प्रभु ॥ ऐसे समता धारी को मैं, विनय भाव से करूँ प्रणाम । उन जैसा बनने की खातिर मैं भी निज में करूँ विराम॥ स्वयं पूर्ण हूँ मैं भी निज में, शाश्वत आनन्द धारी हूँ। कर्म रहित मैं होऊँ प्रभुवर, यही भावना भाती हूँ ॥ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरण...

पांचवीं ढाल का सारांश

Image
  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(48) पांचवीं ढाल का सारांश यह बारह भावनाएँ चारित्रगुण की आंशिक शुद्ध पर्यायें हैं; इसलिये वे सम्यग्दृष्टि जीव को ही हो सकती हैं। सम्यक् प्रकार से यह बारह प्रकार की भावनाएँ भाने से वीतरागता की वृद्धि होती है; उन बारह भावनाओं का चिंतवन मुख्यरूप से तो वीतरागी दिगम्बर जैन मुनिराज को ही होता है तथा गौणरूप से सम्यग्दृष्टि को होता है। जिस प्रकार पवन के ल ग ने से अग्नि भभक उठती है, उसी प्रकार अन्तरंग परिणामों की शुद्धता सहित इन भावनाओं का चिंतवन करने से समताभाव प्रगट होता है और उससे मोक्षसुख प्रगट होता है। स्वोन्मुखतापूर्वक इन भावनाओं से संसार, शरीर और भोगों के प्रति विशेष उपेक्षा होती है और आत्मा के परिणामों की निर्मलता बढ़ती है। अनित्यादि चिंतवन द्वारा शरीरादि को बुरा जानकर, अहित मानकर उनसे उदास होने का नाम अनुप्रेक्षा नहीं है, क्योंकि यह  तो जिस प्रकार पहले किसी को मित्र मानता था तब उसके प्रति राग  था और फिर उसके अवगुण देखकर उसके प्रति उदासीन हो ग या,   समीपकर पहले शरीरादिसे राग था, किन्तु बाद में उनके अनित्यादि अवगुण देखकर उद...

बधाई

Image
बधाई कहाँ सोवे महारानी लल्ला गोदी ले लेरी । गोदी ले लेरी अमृत घूंटी दे लेरी॥ कहाँ..... घर घर नारी मंगल गावें, सुर नर खग सब घूम मचावें । जग में हो रहा हल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ..... १ घड़ी आज से सुख की आई, जल्दी उठकर जिनवर भाई। भरवा अपना पल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ.....२ कहीं रतन सुगन बरसाते कहीं भिखारी भीख में पाते। कंचन कपड़ा गल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ.... ३ जगत ‘सुमत’ शिव मग दर्शावें, गेंद समान कर्म लुढ़कावें।   चार ज्ञान का बल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ..... ४।।   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

तेरे दर को

Image
  तेरे दर को     तेरे दर को छोड़ कर किस दर जाऊँ मैं। </ style="text-align: center;">    सुनता मेरी कौन है, किसे सुनाऊँ मैं॥ जब से नाम भुलाया तेरा, लाखों कष्ट उठाये हैं। न जाने इस जीवन के अन्दर कितने पाप कमाए हैं॥ हूँ शर्मिन्दा आपसे, क्या बतलाऊँ मैं...... मेरे दुष्ट कर्म ही मुझको, तुमसे न मिलने देते हैं। जब मैं चाहूँ दर्शन पाना, रोक तभी वे लेते हैं॥ छींटा दो प्रभु ज्ञान का, शरण में आऊँ मैं...... मोह मिथ्या में रहकर स्वामी, नाम तिहारा भूला था। जिसको समझा था सुख मैंने, दुःख का गाोरख धन्धा था॥ मोह माया को छोड़ कर शरण खड़ा हूँ मैं....... बीत चुकी सो बीत चुकी अब, शरण तिहारी आया हूँ । दर्शन भिक्षा पाने को, दो नयन कटोरे लाया हूँ॥ मन में अपने ज्ञान का दीप जलाऊँ मैं.... सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊँ मैं॥ तेरे दर को..... ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसल...
Image
  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(47) ११-बोधिदुर्लभ भावना अंतिम-ग्रीवक लौं की हद, पायो अनन्त विरियाँ पद; पर सम्यग्ज्ञान न लाघौ, दुर्लभ निजमें मुनि साधौ ।।१३।। अन्वयार्थः- (अंतिम) अंतिम नौवें (ग्रीवकलौंकी हद) ग्रैवेयक तक के (पद) पद (अनन्त विरियाँ) अनन्त बार (पायो) प्राप्त किये, तथापि (सम्यग्ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (न लाघौ) प्राप्त न हुआ; (दुर्लभ) ऐसे दुर्लभ सम्यग्ज्ञान को (मुनि) मुनिराजों ने (निजमें) अपने आत्मा में (साधौ) धारण किया है। भावार्थः- मिथ्यादृष्टि जीव मंद कषाय के कारण अनेक बार ग्रैवेयक तक उत्पन्न होकर अहमिन्द्र पद को प्राप्त हुआ है, परन्तु उसने एक बार भी सम्यग्ज्ञान प्राप्त नहीं किया, क्योंकि सम्यग्ज्ञान प्राप्त करना अपूर्व है। उसे तो स्वोन्मुखता के अनन्त पुरुषार्थ द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है और ऐसा होने पर विपरीत अभिप्राय आदि दोषों का अभाव होता है। सम्यग्दर्शन.ज्ञान आत्मा के आश्रय से ही होते हैं । पुण्य से, शुभराग से, जड़ कर्मादि से नहीं होते। इस जीव ने बाह्य संयोग, चारों गति के लौकिक पद अनन्तबार प्राप्त किये हैं, किन्तु निज आत्मा का यथार्थ स्वरूप स्व...