भगवान महावीर स्वामी (56)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (56) सर्वज्ञ महावीर सर्वज्ञ प्रभु महावीर राग और इन्द्रियों के बिना ही परिपूर्ण सुख और ज्ञानरूप परिणमित हुए। अद्भुत थी वह दशा! इन्द्रियों विद्यमान होने पर भी मानो अविद्यमान हों - इस प्रकार प्रभु ने उनका सम्बन्ध सर्वथा छोड़ दिया। ‘भगवान भले अतीन्द्रिय हुए और हमारा साथ छोड़ दिया, फिर भी हमें प्रभु के साथ रहने में ही लाभ है’ - ऐसा मानकर वे जड़ इन्द्रियाँ अभी प्रभु का साथ नहीं छोड़ती थीं। प्रभु तो इन्द्रियों से निरपेक्ष रहकर स्वयमेव सुखी थे। पराधीन इन्द्रियसुखों से ऊब जा रहे जगत को प्रभु ने बता दिया कि आत्मा इन्द्रिय विषयों के बिना ही स्वाधीनरूप से सुखी है। ‘सुख आत्मा का स्वभाव है, इन्द्रियों का नहीं।’ शुद्धोपयोग के प्रभाव से आत्मा स्वयं परम सुखरूप परिणमता है। इन्द्रियतीत तथा लोकोत्तम ऐसे वे वीर भगवान केवलज्ञान होते ही पृथ्वी से ५००० धनुष ऊपर आकाश में विराजमान हुए। अब, पृथ्वी का अवलम्बन उनको नहीं रहा और अब वे फिर कभी पृथ्वी पर नहीं उतरेंगे। उनका शरीर छायारहित परम औदारिक हो गया; सब को देखनेवाले प्रभु स्वयं भी सर्व दिशाओं से दिखने लगे। प्रभु के केवलज्ञान का महोत...