भगवान महावीर स्वामी (50)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (50) अब सुभद्रा सेठानी भयंकर वैरबुद्धि से चन्दना को अपमानित करने तथा बदला लेने को तत्पर है। एक दिन जब सेठ नगर से बाहर गये हुए थे, तब सेठानी ने चन्दना को एकान्त में बुलाकर उसके सुन्दर केश काटकर सिर मुँडवा दिया। अरे! अत्यन्त रूपवती को कुरूप बना देने का प्रयत्न किया... इतने से उसका क्रोध शांत नहीं हुआ तो चन्दना के हाथ-पाँव में बेड़ी डालकर उसे एक अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया; ऊपर से तरह-तरह के कटु वचन कहे और भोजन भी नहीं दिया। अरे! सिर मुँडवाकर जिसे बेड़ी पहिना दी गई हो, उस सुकुमारी निर्दाेष स्वानुभवी राजकुमारी का उस समय क्या हाल होगा? आँखों से आँसू बह रहे हैं; मन में वीरनाथ प्रभु का स्मरण हो रहा है। उसे विश्वास है कि मेरे महावीर मुझे संकट से उबारने अवश्य आएँगे... जिन महावीर ने मुझे सम्यक्त्व देकर भव बंधन से मुक्त किया है, वे ही प्रभु मुझे दर्शन देकर इन बेड़ियों से भी छुड़ाएँगे। इस प्रकार वीर प्रभु के स्मरण में लीन होकर वह भूख-प्यास को भी भूल जाती थी... क्षणभर तो उसकी आत्मा मुक्तरूप से किसी देहातीत अगम्यभाव में निमग्न हो जाती थी। ऐसी स्थिति में ए...