सिद्धों को नमस्कार
सिद्धों को नमस्कार ( पारुल जैन, दिल्ली) अष्ट कर्म से रहित हैं जो प्रभु, अष्ट गुणों से सहित हुए। निज घर में जो रहने वाले, निज में ही जो व्यस्त हुए ॥ स्पर्श वर्ण रस गंध रहित जो, अविनाशी अविकारी हैं। किंचित कम वो तनुमात्र से, पूर्व भव अवगाहनी हैं॥ शाश्वत निर्मल अशरीरी जो, अनंत गुण भंडारी हैं। निज आनन्द का पान करें जो, निज में सयंम धारी हैं॥ पर से भिन्न एकत्व विभक्त का, आनन्द निज में धारी हैं। सभी विकारी भावों से हट, निज स्वभाव के धारी हैं॥ मोक्ष मार्ग के नेता भी हैं, हैं वो भी सर्वज्ञ प्रभु । लेकिन हित उपदेश न देते निज में हैं वो लीन प्रभु ॥ ऐसे समता धारी को मैं, विनय भाव से करूँ प्रणाम । उन जैसा बनने की खातिर मैं भी निज में करूँ विराम॥ स्वयं पूर्ण हूँ मैं भी निज में, शाश्वत आनन्द धारी हूँ। कर्म रहित मैं होऊँ प्रभुवर, यही भावना भाती हूँ ॥ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरण...