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आरती श्री बाहुबली स्वामी

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  आरती श्री बाहुबली स्वामी श्री बाहुबली की आरती उतारो मिल के,  उतारो मिल के, छवि निहारो मिल के, श्री......... रिषभदेव पितु मात सुनन्दा, भ्रात भरत दोऊ सूरज चंदा, प्रेम की वर्षा दिन रैन करते थे, चारों के चारों मिल के, श्री........ सवा पंच शत धनु की काया, जिसमें जग का तेज समाया, बाहुबली जी की इस मोहनी मूरत पे, तन मन वारो मिल के, श्री....... शस्त्र शास्त्र विद्या परवीणा, दोउ सुत को पितु नृप कर दीना, आदीश्वर बोले मैं वन चला, पुत्रों दोउ राज संभालो मिल के,  तुम्ही संभालो मिल के, श्री...... चक्रवर्ती पर जय जब पाई, कर्म विजय की मन तब आई। नश्वर माया को पाकर भी क्या होगा, ये तनिक विचारो मिल के, श्री........ वृक्ष जान तन चढ़ गई बेलें, सर्पादिक चरणों में खेलें। ध्यान में डूबे हैं, प्रभु ध्यान में डूबे हैं, इन्हें पुकारो मिल के, श्री....... धीर वीर बाहुबली स्वामी, पितु के पूर्व भए शिवगामी। ऐसे त्यागी का, ऐसे महायोगी का, नाम उचारो मिल के, श्री बाहुबली की आरती उतारो मिल के।    ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि ...

जय सन्मति देवा

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जय सन्मति देवा  आरती महावीर स्वामी जय सन्मति देवा, स्वामी जय सन्मति देवा। वीर महा अतिवीर प्रभु जी, वर्द्धमान देवा। जय सन्मति देवा त्रिशला उर अवतार लिया प्रभु, सुरनर हर्षाए। पन्द्रह मास रतन कुण्डलपुर, धनपति बरसाए। जय सन्मति देवा शुक्ल त्रयोदशी चैत्र मास की, आनन्द करतारी। राय सिद्धार्थ घर जन्मोत्सव, ठाठ रचे भारी। जय सन्मति देवा तीस वर्ष तक रहे गृह में, बन कर बह्यचारी। राज त्याग कर भर यौवन में, मुनि दीक्षा धारी। जय सन्मति देवा द्वादश वर्ष किया तप दुद्धर, विधि चकचूर किया। झलके लोकालोक ज्ञान में, सुख भरपूर लिया। जय सन्मति देवा कार्तिक श्याम अमावस के दिन, जाकर मोक्ष बसे।  पर्व दीवाली चला तभी से, घर घर दीप चसे। जय सन्मति देवा वीतराग सर्वज्ञ हितैषी, शिव मग परकाशी। हरि हर बह्मा नाथ तुम्ही हो, जय जय अविनाशी। जय सन्मति देवा दीनदयाला जग प्रतिपाला, सुरनर नाथ जजैं। सुमरत विघ्न टरें इक छिन में, पातक दूर भजैं। जय सन्मति देवा चोर भील चाण्डाल उबारे, भव दुःख हरण तुही। पतित जान ‘शिवराम’ उबारो, है जिन शरण गही। जय सन्मति देवा ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हि...

श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र

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श्री पार्श्वनाथ स्तोत्र नरेन्द्रं फणीन्द्रं सुरेन्द्र अधीशं, शतेन्द्रं सु पूजैं भजैं नाथ शीश, मुनीन्द्र गणेन्द्रं नमो जोड़ि हाथैं, नमो देवदेवं सदा पाश्र्वनाथं। गजेन्द्रं मृगेन्द्रं गह्यो तू छुड़ावै, महा आगतैं नागतैं तू बचावै, महावीर तैं युद्ध में तू जितावै, महा रोग तैं बंध तैं तू छुड़ावै। दुःखी दुःखहर्ता सुखी सुखकर्ता, सदा सेवकों को महानन्द भर्ता, हरे यक्ष राक्षस भूतं पिशाचं, विष्ंा डाकिनी विघ्न के भय अवाचं। दरिद्रीन को द्रव्य के दान दीने, अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने, महा संकटों से निकारे विधाता, सबै सपंदा सर्व को देहि दाता। महाचोर को वज्र को भय निवारे, महापौन के पुंज तै तू उबारै, महाक्रोध की अग्नि को मेघधारा, महालोभ शैलेश को वज्र भारा। महा मोह अंधेर को ज्ञान भानं, महाकर्म कांतार को दौ प्रधानं, किये नाग नागिन अधोलोक स्वामी, हर्यो मान तू दैत्य को हो अकामी। तुही कल्पवृक्षं तुही कामधेनं, तुही दिव्य चिंतामणी नाग एनं, पशु नर्क के दुःख तैं तू छुड़ावैं, महास्वर्ग तै मुक्ति मैं तू बसावै। करे लोह को हेम पाषाण नामी, रटै नाम सो क्यों न हो मोक्षगामी, करै सेव ताकी करैं देव सेवा, सुने वैन सोही लहै ज्ञ...

मांगा है मैंने गुरुवर से

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मांगा है मैंने गुरुवर से   धुन - मिलती है ज़िन्दगी में... मांगा है मैंने गुरुवर से वरदान एक ही,  तेरी कृपा बनी रहे जब तक है ज़िन्दगी। जिस पर गुरु का हाथ हो, वो पार हो गया। आया शरण में आपकी, उद्धार हो गया। जिनकी मर्जी के बिना, पत्ता हिले नहीं। तेरी कृपा...... ऐसे दयालु देव से रिश्ता बनाइए,  मिलता रहेगा आपको जो कुछ भी चाहिए। अनजाना इनसे दुंनिया में, कुछ भी तो है नहीं। तेरी कृपा...... कहते हैं लोग ज़िन्दगी, किस्मत की बात है। किस्मत बनाना ही मगर, गुरुवर के हाथ है। रंग में ऐसे रंग लिया, छोड़े छुटे नहीं। तेरी कृपा...... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

पंच परम परमेष्ठी

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पंच परम परमेष्ठी ऐसे पंच परम परमेष्ठी देखे,  हृदय हर्षित होता है। आनन्द उल्लसित होता है। हो..............,  सम्यक् दर्शन होता है।  दर्श ज्ञान सुख वीर्य स्वरूपी,  गुण अनंत के धारी हैं-2 जग को मुक्ति मार्ग बताते,  निज चैतन्य विहारी हैं-2 मोक्ष मार्ग के नेता देखे, विश्व तत्त्व के ज्ञाता देखे,  हृदय हर्षित होता है। आनन्द उल्लसित होता है।हो.....................,  सम्यक् दर्शन होता है।  द्रव्य भाव नोकर्म रहित जो, सिद्धालय के वासी हैं-2 आतम को प्रतिबिम्बित करते, अजर अमर अविनाशी हैं-2 शाश्वत सुख के भोगी देखे, योग रहित निज योगी देखे, हृदय हर्षित होता है। आनन्द उल्लसित होता है। हो........,  सम्यक् दर्शन होता है।  साधु संघ के अनुशासक जो, धर्म तीर्थ के नायक हैं-2 निज पर के हितकारी गुरुवर, देव धर्म परिचायक हैं-2 गुण छत्तीस सुपालक देखे, मुक्ति मार्ग संचालक देखे,  हृदय हर्षित होता है। आनन्द उल्लसित होता है।हो..............,  सम्यक् दर्शन होता है।  जिनवाणी को हृदयंगम कर, शुद्धात्म रस पीते हैं-2 द्वादशांग के ध...

तुम जैसा मैं भी बन जाऊँ

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  तुम जैसा मैं भी बन जाऊँ तर्ज़ - चाँद सी महबूबा हो मेरी कब...... तुम जैसा मैं भी बन जाऊँ, ऐसा मैंने सोचा है। तुम जैसी समता पा जाऊँ, ऐसा मैंने सोचा है। (1) भव बन में भटक रहा भगवन्, ऐसी जिन मूर्ति पाई है। तेरे दर्शन से निज दर्शन की, सुध अपने आप ही आई है शांति प्रदाता, मंगल दाता, मुश्किल से मैंने खोजा है। तुम जैसी समता...... (2) इतनी प्रतिकूल परिस्थिति में, मुझको वैराग्य न आता है। संसार असार नहीं लगता, मन राग रंग में जाता है।  विषय वासना की जड़ गहरी, काटो नाथ भरोसा है। तुम जैसी समता...... (3) हे जिन धर्म के प्रेमी सुन लो, कह गए कुंद कुंद स्वामी। भव सागर से तिरने में है, कल्याणी माँ श्री जिनवाणी। रूप तुम्हारा सबसे न्यारा, करना सिर्फ भरोसा है। तुम जैसी समता......

सारा पाप पुण्य का खेल

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सारा पाप पुण्य  का खेल  Sung by - Bindu Jain, Delhi (रसिया) अब आगया कलयुग घोर पाप का जोर हुआ भारी । सारा पाप पुन्य का खेल जगत में देखो आंख पसार । देखो आंख पसार करम के वश में है संसार— टेक पुण्य उदय सीता जब आयो , अग्निकुण्ड जल सार बनायो पाप उदय रावण हर ले गया करती हा हा कार— टेक पुण्य उदय इन्द्रादिक देवा , भगवन ऋषभ करें सब सेवा पाप उदय से बारह मास तक मिला नहीं आहार — टेक पुण्य उदय यादव कुल भारी— भोगे भोग अनेक प्रकारा पाप उदय से सारी द्वारिका हो गई जल कर खाक— टेक पाप उदय द्रौपद पटरानी , महल विराट भरा जा पानी चीर बढ़ा पुण्य उदय सभा में जा का वार न पार— टेक मैना सब विद्या पढ़ आई , पाप उदय कुष्टी संग व्याही पुण्य उदय दुख गया बनी है कोटी भट पट नार— टेक जैसी करनी वैसी भरनी , सखी बात यह हृदय धरनी फल पाते है सभी शुभा शुभ कर्मों के अनुसार— टेक जीव करम का कर्ता जानो , आप ही इनका हर्ता मानो इन कर्मों के फल का कोई और नहीं दातार— टेक ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो ...

महिमा णमोकार मंत्र की

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  महिमा णमोकार मंत्र की धुन- है प्रीत जहां की रीत सदा......... नवकार मंत्र ही महामंत्र है, निजपथ का ज्ञान कराता है। नित जपो शुद्ध मन वच तन से, मनवांछित फल का दाता है।। वंदे जिनवरम्-3 होऽऽऽ पहला पद श्री अरिहंताणम्, यह आतम ज्योति जगाता है। यह समवशरण की रचना की, भव्यों को याद दिलाता है।। णमो अरिहंताणम्-3 होऽऽऽ दूजा पद श्री सिद्धाणम् है, यह आतम शक्ति बढ़ाता है। इससे मन होता है निर्मल, अनुभव का ज्ञान कराता है।। णमो श्री सिद्धाणम्-3 होऽऽऽ तीजा पद श्री आयरियाणम्, दीक्षा के भाव जगाता है। दुःख से छुटकारा शीघ्र मिले, जिनमत का ज्ञान बढ़ाता है।। णमो आयरियाणम्-3 होऽऽऽ चैथा पद श्री उवज्झायाणम्, यह जैन धर्म चमकाता है। कर्माश्रव को ढीला करता, यह सम्यक् ज्ञान कराता है।। णमो उवज्झायाणम्-3 होऽऽऽ पंचम पद श्री सव्व साहूणम्, यह जैन तत्त्व सिखलाता है। दिलवाता है यह ऊँचा पद, संकट से शीघ्र बचाता है।। णमो सव्व साहूणम्-3 होऽऽऽ तुम जपो भविक जन महामंत्र ये, अनुपम वैराग्य बढ़ाता है। निज श्रद्धा मन से जपने से, मन को अति शांत बनाता है।। वंदे जिनवरम्-3 होऽऽऽ सम्पूर्ण रोग को शीघ्र हरे, जो मंत्र रुचि  से ध्याता है...

जिनवर का दरबार है-आरती भक्तामर जी की

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 मंगल आरती भक्तामर जी की Sung by & Bindu Jain, Delhi. तर्ज - भव सागर अपार है......... जिनवर का दरबार है, नमन करें शतबार हैं। भक्तामर की देखो कैसी, महिमा अपरम्पार है।।टेक।। मंगल आरती लेकर प्रभु जी, आया तेरे द्वार जी। भक्तामर का पाठ करे जो, होगा बेड़ा पार जी।। यही जगत का सार है, झूठा सब संसार है। भक्तामर की देखो...........।। चौबीसों जिन, पंच परम गुरु, रत्नत्रय उर धार जी। अवधि ऋद्धिधारक ऋषिगण को, भक्ति सहित शिर धार जी।। यही गले का हार है, मानव का शृंगार है। भक्तामर की देखो...........।। इक दिन तेरा यह तन चेतन, मिट्टी में मिल जाएगा। भक्तामर का ध्यान धरे जो, मानतुंग बन जाएगा।। मूल मंत्र आधार है, बीज मंत्र साकार है। भक्तामर की देखो...........।। यह तन तेरा इक दिन चेतन, अग्नि में जल जाएगा। ‘अभयमती’ कहे जप तप करले, नहिं पीछे पछताएगा।। प्रभु की भक्ति अपार है, पावे मुक्ति सार है। भक्तामर की देखो कैसी, महिमा अपरम्पार है।।टेक। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया com...

कर्म की गति

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कर्म की गति कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 चिट्ठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग्य न बाँचे कोय। पल में सुख दे, पल में दुःख दे, ये कर्मन की रीत-2  बीती जाय सारी उमरिया-2,  दिन पर दिन ढल जाये, कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 चार दिनों की है ज़िंदगानी, हर पल बीती जाये, -2 कुछ तो ऐसा कारज कर ले, जीवन सफल हो जाये।  कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 अब तो चेत सयाने नर तन, बार-बार नहीं पाये-2 इस चक्कर में क्यों तू फंसा रे, नेहा प्रभु से लगाये। कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 चिट्ठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग्य न बाँचे कोय। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

लघु शांतिनाथ पूजन विधान

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लघु शांतिनाथ पूजन विधान ( रचनाकार - मुनि श्री सुव्रतसागर जी) सिद्ध शिला वासी हे भगवन्!  तुमको आज बुलाऊं मैं, स्वार्थ के सारे नाते हैं, हे सिरताज भुलाऊं मैं। भक्ति भाव के उर आसन पर, श्रद्धा सहित बिठाऊं मैं, भक्ति भावना पूरी करिए, सुर संगीत रिझाऊं मैं। नाना वाद्य बजाऊं मैं, शांतिनाथ गुण गाऊं मैं, बार बार सिर नवाऊं मैं। ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्र सर्व कर्म  बंधन विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे पंचमचक्रेश्वर! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्र सर्व कर्म  विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे द्वादश कामदेवेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्राय सर्व कर्म  बंधन विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे षोडश तीर्थंकर! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं वापी कूप सरोवर सिंधु का जल, कहां से लाऊं मैं। युगल नयन का नीर हे भगवन्! तव पद पद्म चढ़ाऊं मैं। शांतिनाथ शांति के दाता, सर्व अशांति दूर करो। विघ्न...

छहढाला(41)

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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(41)  सामायिक, प्रोषध, भोगोपभोगपरिमाण और अतिथिसंविभागव्रत धर उर समताभाव, सदा सामायिक करिये, परव चतुष्टयमांहि, पाप तज प्रोषध धरिये; भोग और उपभोग, नियमकरि ममत निवारै, मुनिको भोजन देय फेर, निज करहि अहारै ।। १४ ।। अन्वयार्थ:-  (उर) मन में (समताभाव) निर्विकल्पता अर्थात् शल्य के अभाव को (धर) धारण करके (सदा) हमेशा (सामायिक) सामायिक (करिये) करना, सो सामायिक शिक्षाव्रत है;  (परव चतुष्टयमांहि ) चार पर्व के दिनों में (पाप) पापकार्यों को छोड़कर (प्रोषध) प्रोषधोपवास (धरिये) करना,  सो प्रोषध उपवास शिक्षा-व्रत है;  (भोग) एक बार भोगा जा सके, ऐसी वस्तुओं का तथा (उपभोग) बारम्बार भोगा जा सके, ऐसी वस्तुओं का (नियमकरि) परिमाण करके --मर्यादा रखकर (ममत) मोह (निवारि) छोड़ दे, सो भोग-उपभोगपरिमाणव्रत है;  (मुनिको) वीतरागी मुनि को (भोजन) आहार (देय) देकर (फेर) फिर (निज अहारै) स्वयं भोजन करे, सो अतिथिसंविभागव्रत कहलाता है ।  भावार्थः-- स्वोन्मुखता द्वारा अपने परिणामों को स्थिर करके प्रतिदिन विधिपूर्वक सामायिक करना सो सामायिक शिक्षाव्रत है...

प्रभु भक्ति

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  प्रभु भक्ति (दर्शन करते हुए के भाव)   ( पारुल जैन, दरियागंज, दिल्ली) तेरे चरणों में हे भगवन्! मैं शीश झुकाता हूँ। आशीष मिले तेरा यही भावना भाता हूँ। दर्शन तेरा पाऊँ, दर्शन मैं कर पाऊँ। निज में निज को देखूँ, तुम-सा ही बन जाऊँ॥ प्रभु आत्म-बोध जगे, यही आस ले आया हूँ। तेरा दर्शन कर पाऊँ, यही भावना भाता हूँ॥ तेरे चरणों ... प्रभु वीतरागी मुद्रा, ये शांत छवि तेरी- जिसको लख कर प्रभु जी, मैं शांति पाता हूँ। ये नासा दृष्टि तेरी, प्रभुवर सिखलाती है। देखें जानूँ सब कुछ, निज में रहना चाहूँ॥ तेरे चरणों .... कर पर कर रखे देख, यही भाव समझता हूँ। कर्ता नहीं जब तुम हो, मैं व्यर्थ भटकता हूँ ॥ कर्ता नहीं वह निज पर का, फिर क्यों मैं अटकता हूँ। कर्ता बुद्धि त्यागूं, यही भावना भाता हूँ॥ तेरे चरणों ... तुम तो प्रभु वो दर्पण, जो निज को दिखाते हो मैं दोषों से हूँ भरा, मुझको दिखलाते हो प्रभु दूर करूँ सब दोष, समकित को अपनाऊँ । प्रभु भावना निर्मल हो, यही भावना भाता हूँ ॥ तेरे चरणों ... मैं त्यागूं राग और द्वेष, प्रभु मोह को त्यागूं मैं। समता उर में लाकर, मैं निज को पाता हूँ ॥ समता उर में ...