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तुम रूठे रहो भगवन

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तुम रूठे रहो भगवन   तुम रूठे रहो भगवन, हम तुमको मना लेंगे,  आहों में असर होगा, यहीं बैठे बुला लेंगे। तुम कहते कहाँ बैठूँ, तेरे पास ना आसन है,  मैं कहता आ भी  जाओ, पलकों पे बिठा लेंगे, आहों ___________ । तुम देख लो आ कर के, लगी आग जुदाई की,  ये  अश्रु  प्रेम ढलके, लगी आग बुझा देंगे, आहों ___________ । अपनाते हमें तुम ना, इसकी ना ज़रा चिंता,  हम बात के पक्के हैं, अपना ही बना लेंगे, आहों ___________ । हाथ पकड़ के छोड़ूँ ना, हे वीर कभी तेरा,  अब हम तुमको भगवन, ऐसे ही रिझा लेंगे, आहों ___________ । ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

कोई आज जा रहा है

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  कोई आज जा रहा है कोई आज जा रहा है, कल कोई जाने वाला, नहीं रोगी तन हमारा, परिवार जन हमारा। पागल तू बन रहा है, नहीं है कोई  अनुशासन।  कहता पावन जिनशासन, सोने का है सिंहासन।  यदि आंख खुली न तेरी, फिर  राम ही है रखवाला। ये दुनिया नहीं तुम्हारी, हर चीज प्यारी-२, संसार का ये घेरा, मत पियो ऐसा प्याला। प्रभु नाम है अनूठा, सब रूप रंग झूठा, आराम से जप प्रभु मन में, जिन नाम मंत्र की माला। णमोकार का सुमिरन कर ले, अरिहंत सिद्ध भज ले, कटे कर्म बंध की माला, दुनिया है धर्मशाला। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

अंतर में आनंद आयो

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अंतर में आनंद आयो  अंतर में आनंद आयो, जिनवर के दर्शन पायो,  अंतर्मुख जिन मुद्रा लखकर, आतम दर्शन पायो। - 2 वीतराग छवि सबसे न्यारी, भव्यजनों को आनंदकारी,  दर्शन कर सुख पायो, जिनवर के दर्शन पायो। पुण्य उदय से आज हमारे, दर्शन कर जिनराज तुम्हारे,  सम्यग्दर्शन पायो , जिनवर के दर्शन पायो। मेघ घटा सम जिनवर गरजे, दिव्य  ध्वनि से अमृत बरसे,  भव  आताप नशायो, जिनवर के दर्शन पायो। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

दो ज्ञान इतना गुरुवर

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दो ज्ञान इतना गुरुवर   दो ज्ञान इतना गुरुवर, बनूं तुमसा निर्विकारी, सदा आत्म साधना की रहे भावना हमारी।  सदा क्रोध में जला हूं अभिमान में पला हूं,  छलकर स्वयं छला हूं कर लोभ जग रूला हूं,  लंबी है जिंदगी की यूं दास्तान हमारी  सदा आत्म साधना की------_---।  मन में तुम ही हो  गुरुवर वचनों में भी तुम ही हो,  हर सांस कह रही है जीवन में अब तुम ही हो,  निर्बल हूं बांह थामो, गुरुदेव जी हमारी,  सदा आत्म साधना की--------।  अज्ञानता ने घेरा छाया गहन अंधेरा,  कर्मों ने डाला डेरा व्याकुल है मन ये मेरा, आराध्य देव मेरे, रक्षा करो हमारी,  सदा आत्मा साधना की----------। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

आयो-2 रे......

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आयो-2 रे......  आयो-2 रे हमारो बड़ो भाग, के हम आए प्रभु पूजन को,  पूजन को प्रभु दर्शन को, दर्शन को प्रभु वंदन को। आयो-2 रे....... जिनवर की अंतर्मुख मुद्रा, आतम दर्श कराती है,  मोह महामल प्रक्षालन कर, शुद्ध स्वरूप दिखाती है। भव्य है भक्ति  चैत्यालय की, जग में शोभा भारी है,  मंगल ध्वज ले सुरपति आए, शोभा जिसकी न्यारी है। अनेकान्तमय वस्तु समझ जिन, शासन ध्वज लहरावे है,  स्याद्वाद शैली से प्रभुवर, मुक्ति मार्ग समझावे है । आयो-2 रे...... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

सिद्धार्थ के नंदन

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सिद्धार्थ के नंदन  सिद्धार्थ के नंदन, तुम को शत शत वंदन, हो हमारा, जो-२ आया शरण में है तारा। हम तो आए हैं शरण तिहारी, जग में और नहीं संकटहारी, ना हो कर्म बंधन, मुक्ति पथ पर गमन, हो हमारा।  जो-२ आया शरण में है तारा। कुंडलपुर में थे आप पधारे, त्रिशला माता के सुत प्राण प्यारे, भोग नाही गहे, ब्रह्मचारी रहे संयम धारा।  जो-२ आया शरण में है तारा। भेद ज्ञान था उर में समाया, निज का पुरुषार्थ निज में जगाया, केवलज्ञानी भये, गुण न जाते कहे, इन्द्र हारा।  जो-२ आया शरण में है तारा। जग में हिंसा की होली मची थी, भोली जनता भी उसमें फंसी थी, करुणा फैला तभी, भव्य तारे सभी, दे सहारा।  जो-२ आया शरण में है तारा। सन्मति कर जोड़ नमता चरण में,  वीर ‘पर’ तज लखूं निज को निज में, ब्रह्म निश्चय पले, कर्म बंधन टले, ध्येय सारा।  जो-२ आया शरण में है तारा। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग...

केसरिया केसरिया

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केसरिया केसरिया   Click on  केसरिया, केसरिया  below to watch the video केसरिया, केसरिया केसरिया केसरिया आज हमारो रंग केसरिया,  हम केसरिया तुम केसरिया, इन्द्र इन्द्राणी हैं केसरिया। आज यहाँ पर सब केसरिया ___________ । हमरो झंडा है केसरिया, झंडे का डंडा केसरिया, हमरो कलशा है केसरिया, कलशे का धागा केसरिया। हमरे प्रभु जी हैं केसरिया, हमरे गुरु जी हैं केसरिया, माँ जिनवाणी हैं केसरिया, देव शास्त्र गुरु सब केसरिया। पूजन की थाली केसरिया, थाली के चावल केसरिया, थाली में चंदन केसरिया, पूजन की पुस्तक केसरिया। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

चिदानन्द चिद्रूप आत्मन

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चिदानन्द चिद्रूप आत्मन  चिदानन्द चिद्रूप आत्मन, निज का अनुभव किया करो,  सब संकल्प विकल्प तोड़कर, सुखमय जीवन जिया करो। आशंकाओं के घेरे में शांति की होली जलती है,  होनी तो होकर रहती है टाले कभी न टलती है,  निज स्वभाव के बल से चेतन, अप्रभावित ही रहा करो।  सब संकल्प  ...... आत्मानुभव भी परम रसायन, परमौषधि और परमामृत,  आत्मानुभव से रहित आत्मा, जीवित होने पर भी मृत,  विषय चाह की दमन सुमन को, ज्ञानामृत तुम पिया करो।  सब संकल्प ...... आत्मानुभव होते ही तत्क्षण, सम्यग्दर्शन प्रगट हुआ,  महापाप मिथ्यात नशाता, मुक्ति  मार्ग तो शुरू हुआ,  पर से हो निवृत्त स्वयं में, सहज तृप्त नित रहा करो।  सब संकल्प ...... अन्तरात्मा कहलाते जब, निज सम्मुख दृष्टि होती है,   तब ही बनेगा परमात्म, जब निज में स्थिरता होती है,  बस हो सब विकल्पों से, निज में ज्ञायक यह लखा करो।  सब संकल्प ...... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्...

वंदन अष्टापद धाम की

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वंदन अष्टापद धाम की चलो सभी मिल पूजन कर लें गिरि कैलाश महान की,  प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के, प्रथम मोक्ष स्थान की,  वंदे गिरिवरम् -2 कोटि-2 वर्ष पूर्व जहाँ, ऋषभदेव जी मोक्ष गए,  चक्रवर्ती भरतेश्वर ने वहाँ, रत्न जिनालय बना दिए,  जय-2 बोलो वंदन कर लो, उस अष्टापद धाम की।  प्रथमतीर्थंकर ऋषभदेव के, प्रथम मोक्ष स्थान की,  वंदे गिरिवरम् -2 उस पर्वत का कण-2 पावन, पूज्य सदा के लिए हुआ,  इसीलिए हमने उसका, पूजन का थाल सजाए लिया,  हाथ जोड़ कर नमन करूँ मैं, आदिनाथ भगवान की।  प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के, प्रथम मोक्ष स्थान की,  वंदे गिरिवरम् -2 ।। ओऽम् श्री आदिनाथाय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

रोम-रोम से नेमिकुंवर

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  रोम-रोम से नेमिकुंवर   रोम-रोम से नेमिकुंवर के, उपशम रस की धारा,  राग द्वेष सब तुमने त्यागे, वेश दिगम्बर धारा। -2 ब्याह करन को आए, संग बाराती लाए,  पशुओं को बंधन में देखा, दयासिंधु लहराए,  धिक्-धिक् जग की स्वारथ वृत्ति, कहीं न सुख लखाया, रोम-रोम से नेमिकुंवर के........  राजुल अति अकुलाए, नौ भव की याद दिलाए, नेमि कहे जग में न किसी का, कोई कभी हो पाए,  राग रूप अंगारों द्वारा, जलता है जग सारा। रोम-रोम से नेमिकुंवर के........  नौ भव का सुमिरन कर नेमि, आतम तत्व विचारे,  शाश्वत सुख चैतन्य राज की, महिमा चित्त में धारे,  लहराता वैराग्य सिंधु अब, भाये भावना बारह। रोम-रोम से नेमिकुंवर के........  राजुल के प्रति राग नशा है, मुक्ति वधु को ब्याहे,  नग्न दिगम्बर दीक्षा लेकर, आतम ध्यान लगाते,  भव बंधन का नाश करेंगे, पावे सुख अपारा। रोम-रोम से नेमिकुंवर के........  नेमि कुंवर गिरनारी चले, मुक्ति वधु को ब्याहे, रंग राग से भिन्न निराले, शुद्धात्म को चाहे, भाये भावना बारह, समझे जगत असारा। रोम-रोम से नेमिकुंवर के...........

चौथी ढाल - 37

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत चौथी ढाल (37 ) सम्यग्ज्ञान की महिमा और कारण धन समाज गज बाज, राज तो काज न आवै; ज्ञान आपको रूप भये, फिर अचल रहावै। तास ज्ञानको कारन, स्व-पर विवेक बखानौ; कोटि उपाय बनाय भव्य, ताको उर आनौ ॥ ७ ॥ अन्वयार्थः- (धन) पैसा, (समाज) परिवार, (गज) हाथी, (बाज) घोड़ा, (राज) राज्य (तो) तो (काज) अपने काम में (न आवै) नहीं आते; किन्तु (ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (आपको रूप) आत्मा का स्वरूप - जो (भये) प्राप्त होने के (फिर) पश्चात् (अचल) अचल (रहावै) रहता है। (तास) उस (ज्ञानको) सम्यग्ज्ञान का (कारन) कारण (स्व-पर विवेक) आत्मा और पर वस्तुओं का भेदविज्ञान (बखानौँ) कहा है, (इसलिये) (भव्य) हे भव्य जीवों! (कोटि) करोड़ों (उपाय) उपाय (बनाय) करके (ताको) उस भेदविज्ञान को (उर आनौ) हृदय में धारण करो । भावार्थः-- धन-सम्पत्ति, परिवार, नौकर-चाकर, हाथी, घोड़ा तथा राज्यादि कोई भी पदार्थ आत्मा को सहायक नहीं होते; किन्तु सम्यग्ज्ञान आत्मा का स्वरूप है; वह एक बार प्राप्त होने के पश्चात् अक्षयहो जाता है - कभी नष्ट नहीं होता, अचल एकरूप रहता है। आत्मा और परवस्तुओं का भेदविज्ञान ही उस सम्यग्ज्ञान का...

नहीं चाहिए दिल

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  " नहीं चाहिए दिल " नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का,  सदा न रहा है, सदा न रहेगा, ये ज़माना किसी का। नहीं चाहिए दिल .............. आएगा बुलावा तो जाना पड़ेगा, सर तुमको आखिर झुकाना पड़ेगा,  वहाँ न चला है, वहाँ न चलेगा, ये बहाना किसी का, नहीं चाहिए दिल .............. पहले तो तुम अपने आप को संभालो, हक नहीं तुमको बुराई औरों में निकालो,  बुरा है बुरा जग में, बताना पड़ेगा, नहीं चाहिए दिल .............. दुनिया का गुलशन सजा ही रहेगा, ये तो जहाँ में लगा ही रहेगा,  आना किसी का जग में, जाना किसी का, नहीं चाहिए दिल .............. शौहरत तुम्हारी रह जाएगी ये, दौलत यहाँ पर रह जाएगी ये  नहीं साथ जाता ये, खज़ाना किसी का, नहीं चाहिए दिल .............. ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

जिनवाणी जग मैया

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जिनवाणी जग मैया   जिनवाणी जग मैया, जनम दु:ख मेट दो,  जनम दु:ख मेट दो, मरण दु:ख मेट दो। समवशरण सा महल तुम्हारा, गणधर जैसा भैया,  कुंद-2 से पुत्र तुम्हारे, तीर्थंकर से सैंया , जिनवाणी ___________ । सात तत्व छ द्रव्य बताए, हो उपकारी मैया,  जो भी शरण में आया उसकी, पार लगा दी नैया, जिनवाणी ___________ । संकट मोचन नाम तुम्हारा, तुम हो जग की मैया,  हाथ जोड़कर शीश नवाऊँ, पडूँ तुम्हारे पैंया, जिनवाणी ___________ । ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

मुझे मिले मेरे भगवान

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मुझे मिले मेरे भगवान सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Sung by Bindu Jain,Delhi मुझे मिले मेरे भगवान, मन के मन्दिर में, मुझे मिल गया सच्चा ज्ञान, मन के मन्दिर में। जिसको ढूंढ रही थी जग में, छुपा हुआ वो मेरे मन में, वो तो बैठे घर कर ध्यान, मन के मन्दिर में। मुझे... मन-मन्दिर का द्वार बंद था, दुर्व्यसनों का ताला जड़ा था, कैसे दर्शन हों भगवान, मन के मन्दिर में। मुझे... मन-मन्दिर में धूल जमी थी, माया-मोह की गर्द चढ़ी थी, मैंने आँगन दिया बुहार, मन के मन्दिर में। मुझे... तप के जल से मैल निकाला, अन्तर दीप से किया उजाला तब दर्श हुए भगवान मन के मन्दिर में। मुझे —   तुझ में मुझ में भेद नहीं था, मैं ही जग के भ्रम में पड़ा था,  मैंने पाया जगत निःसार, मन के मन्दिर में। मुझे —  जग को भूल के तुम को ध्याया, अपने अन्दर तुमको पाया,  मुझे मिला आनन्द अपार मन के मन्दिर में। मुझे —  जगत लगे मुझे झूठा सपना, तू मुझको लागे है अपना,  मैं तो करूँ तेरा गुणगान मन के मन्दिर में। मुझे —  मुझ को तुम हरगिज न भुलाना, अंत समय में पास बुलाना,  दो...

छहढाला(35)

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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(35)   सम्यग्ज्ञानके भेद, परोक्ष और देशप्रत्यक्षके लक्षण तास भेद दो हैं, परोक्ष परतछि तिन मांहीं; मति श्रुत दोय परोक्ष, अक्ष मनतैं उपजाहीं । अवधिज्ञान मनपर्जय दो हैं देश-प्रतच्छा; द्रव्य क्षेत्र परिमाण लिये जानें जिय स्वच्छा ॥ ३ ॥ अन्वयार्थः   (तास ) उस सम्यग्ज्ञान के (परोक्ष) परोक्ष और (परतछि) प्रत्यक्ष (दो) दो (भेद हैं) भेद हैं; (तिन मांहीं) उनमें (मति श्रुत) मतिज्ञान और श्रुतज्ञान (दोय) यह दोनों (परोक्ष) परोक्षज्ञान हैं। क्योंकि वे (अक्ष मनतैं) इन्द्रियों तथा मन के निमित्त से (उपजाहीं) उत्पन्न होते हैं। (अवधिज्ञान) अवधिज्ञान और (मनपर्जय) मनःपर्ययज्ञान (दो) यह दोनों ज्ञान (देश-प्रतच्छा) देशप्रत्यक्ष (हैं) हैं; क्योंकि उन ज्ञानों से (जिय) जीव (द्रव्य क्षेत्र परिमाण) द्रव्य और क्षेत्र की मर्यादा (लिये) लेकर (स्वच्छा) स्पष्ट (जानै) जानता है। भावार्थः  इस सम्यग्ज्ञान के दो भेद हैं - (१) प्रत्यक्ष और (२) परोक्ष; उनमें मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ’परोक्षज्ञान’ हैं, क्योंकि ये दोनों ज्ञान इन्द्रियों तथा मन के निमित्त से वस्तु को अस्पष्ट...