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तेरी छत्रच्छाया
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समाधि भक्ति (शब्द शिल्प अनुकम्पा: आचार्य श्री विभव सागर जी महाराज) Sung by -Bindu Jain, Delhi तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे सिर पर हो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो जिनवाणी रसपान करूँ मैं, जिनवर को ध्याऊँ। आर्यजनों की संगति पाऊँ, व्रत संयम चाहूँ। गुणीजनों के सद्गुण गाऊँ, जिनवर यह वर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो परनिन्दा न मुँह से निकले, मधुर वचन बोलूँ। हृदय तराजू पर हितकारी, सम्भाषण तोलूँ आत्म तत्व की रहे भावना, भाव विमल कर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो जिन शासन में प्रीति बढ़ाऊँ, मिथ्यापथ छोड़ूँ। निष्कलंक चैतन्य भावना, जिनमत से जोड़ूँ जन्म-जन्म में जैन धर्म, यह मिले कृपा कर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो मरण समय गुरु पाद-मूल हो, सन्त समूह रहे। जिनालयों में जिनवाणी की, गंगा नित्य बहे भव-भव में संन्यास मरण हो, नाथ हाथ धर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो बाल्यकाल से अब तक मैंने, जो सेवा की हो। देना चाहो प्रभो! आप तो, बस इतना फल दो श्वास-श्वास अन्तिम श्वासों में, णमोकार भर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो विषय कषायों को मैं त्...
प्रभु चरणों में
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प्रभु चरणों में Sung By- Bindu Jain, Delhi. (धुन- बहुत प्यार करते हैं तुमसे सनम) प्रभु के गुणों में, मेरा ध्यान होवे, कि जिससे सदा सबका, कल्याण होवे। प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... हो भाव दया का, सब प्राणियों पर, कोई जीव मुझसे न, हैरान होवे। प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... बनूँ मैं हकीकत, न छोड़ूँ धर्म को, अगर मेरा सिर भी, बलिदान होवे। प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... मुसीबत जो आए, न घबराए ये दिल, मेरी आत्मा ऐसी, बलवान होवे। प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... न दौलत की धुन हो, मेरे दिल समाई, कभी ऊँचे पद का न, अभिमान होवे। प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... बना कर दिखा दूँ, मैं आदर्श जीवन, कुमति से मेरा दूर, प्रस्थान होवे। प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... न दिल में कभी, ईर्ष्या भाव रखूँ, न मुझसे किसी को, नुकसान होवे। प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... मंत्र जुबां पर हो, णमोकार हरदम, सदा उसका मन में मेरे ध्यान होवे, प्रभु चरणों में, मेरा ध्यान होवे..... सहनशीलता मुझमें, ऐसी भरी हो, न दिल संकटों से, परेशान होवे। प्रभु चर...
पुनः दर्शन
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पुनः दर्शन Sung by -Bindu Jain, Delhi पुनः दर्शन, पुनःदर्शन , पुनः दर्शन मिले स्वामी-2 यही है प्रार्थना स्वामी, यही है भावना स्वामी-2 तिहारे दर्श बिन स्वामी, कहाँ हम चैन पाएंगे। प्रभु की याद आएगी, नयन आँसू बहाएंगे।। निकाली नीर से मछली, तड़पती चेतना स्वामी। पुनः दर्शन....... बिना स्वाति की बूँदों के पपीहा प्राण तज देगा। कृपा के मेघ बरसा दो, जिनेश्वर नाम भज लेगा। निहारे चातका तुमको, यही रटना रटें स्वामी। पुनः दर्शन..... विरह की वेदना स्वामी, तुम्हें कैसे सुनाएं हम। लगे हथियार सा कांटा, हमारा आज ये तन मन।। शिशु माता से बिछड़ा जो रुदन करता रहे स्वामी। पुनः दर्शन..... नहीं सुर सम्पदा चाहूँ, नहीं मैं राजपद चाहूँ। हृदय में कामना मेरी, प्रभु तू-सा ही बन जाऊँ।। मिले निरवाण न जब लों, रहो नयनों के पथगामी। पुनः दर्शन.... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन...
सोलह सपने
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माँ ने देखे सोलह सपने सुनोजी… माँ ने देखे सोलह सपने, जाने उनका हो… फल क्या होगा ॥ टेक॥ प्रथम सुगज ऐरावत देखो, मेघ समान सु-गरज घने। दूजा बैल एक शुभ देखा, उन्नत कन्धा शब्द भने।। ऐसे स्वप्न कभी नहीं देखे, अचरज होवे माँ को ।।1।। तीजे सिंह धवल शुभ देखा, कन्धे लाल सुवर्ण बने। सिंहासन थित लक्ष्मी देखी, नाग युगल से न्हवन सने।। ऐसे स्वप्न कभी नहीं देखे, अचरज होवे माँ को ।।2।। पाँचे फूलमाल-द्वय गुञ्जित, भ्रमर भजत गुणनाथ तने। छठ्ठे शशि पूरण तारागण, अमृत झरता जगत तने।। ऐसे स्वप्न कभी नहीं देखे, अचरज होवे माँ को ।।3।। सप्तम सूर्य निशातमहारी, पूर्व दिशा से उदित ठने। अष्टम मीन युगल सर रमते, देखे चञ्चल भाव जने।। ऐसे स्वप्न कभी नहीं देखे, अचरज होवे माँ को ।।4।। स्वर्ण कलश द्वय जल पूरण भर, कमलपत्र से ढकत घने। दसमें हंस रमण करते सर, कमल गन्ध युत लहर तने।। ऐसे स्वप्न कभी नहीं देखे, अचरज होवे माँ को ।।5।। सागर दर्पण-सम निर्मल लख, लसत तरङ्गनि हँसत घने। बारम सिंहासन सुवर्णमय, सिंहपीठ मणिजड़ित बने।। ऐसे स्वप्न कभी नहीं देखे, अचरज होवे माँ को ।।6।। तेरम स्वर्ग विमान रतनमय, भेजत सुर अनुराग घने। चौदम नाग-भव...
जिनवाणी स्तुति
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जिनवाणी स्तुति Sung by- Bindu Jain, Delhi धुन- संसार है इक नदिया, सुख दुःख दो किनारे हैं........ माता तू दया करके, कर्मों से छुड़ा देना। इतनी-सी विनय तुमसे, चरणों में जगह देना।। माता आज मैं भटका हूँ, माया के अंधेरे में। कोई नहीं मेरा है, इस कर्म के रेले में।। -2 कोई नहीं मेरा है, तुम धीर बंधा देना। इतनी-सी विनय......... जीवन के चौराहे पर, मैं सोच रहा कब से। जाऊँ तो किधर जाऊँ, यह पूछ रहा मन से।।-2 पथ भूल गया हूँ मैं, तुम राह दिखा देना। इतनी-सी विनय......... लाखों को उबारा है, मुझको भी उबारो माँ। मंझधार में है नैया, उसको भी तिरा दो माँ।। -2 मंझधार में अटका हूँ, उस पार लगा देना। इतनी-सी विनय......... द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद
चौथी ढाल का भेद-संग्रह
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चौथी ढाल का भेद-संग्रह कालः- निश्चयकाल और व्यवहारकाल; अथवा भूत, भविष्य और वर्तमान। चारित्र:-- मोह-क्षोभरहित आत्मा के शुद्ध परिणाम, भावलिंगी श्रावकपद तथा भावलिंगी मुनिपद। ज्ञान के दोष:- संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय (अनिश्चितता)। दिशा:- पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, वायव्य, नैऋत्य, अग्निकोण, ऊर्ध्व और अधो-यह दस हैं। पर्वचतुष्ट्य:-- प्रत्येक मास की दो अष्टमी तथा दो चतुर्दशी। मुनि:-- समस्त व्यापार से विरक्त, चार प्रकार की आराधना में तल्लीन, निर्ग्रन्थ और निर्मोह-ऐसे सर्व साधु होते हैं। (नियमसार गाथा- १६)। वे निश्चयसम्यग्दर्शन सहित, विरागी होकर, समस्त परिग्रह का त्याग करके, शुद्धो- पयोगरूप मुनिधर्म अंगीकार करके अन्तरंगमें शुद्धोपयोग द्वारा अपने आत्मा का अनुभव करते हैं । परद्रव्य में अहंबुद्धि नहीं करते । ज्ञानादि स्वभाव को ही अपना मानते हैं; परभावों में ममत्व नहीं करते । किसी को इष्ट-अनिष्ट मानकर उसमें राग- द्वेष नहीं करते । हिंसादि अशुभ उपयोग का तो उनके अस्तित्व ही नहीं होता । अनेक बार सातवें गुणस्थान के निर्विकल्प आनन्द में लीन होते हैं । जब छठवें गुणस्थान में आते हैं, तब उन्हें...
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चौथी ढाल का सारांश सम्यग्दर्शन के अभाव में जो ज्ञान होता है, उसे कुज्ञान (मिथ्या-ज्ञान) कहा जाता है। सम्यग्दर्शन होने के पश्चात् वही लक्षण सम्यग्ज्ञान कहलाता है। इस प्रकार यद्यपि यह दोनों सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान साथ ही होते हैं; तथापि उनके लक्षण भिन्न-भिन्न हैं और कारण कार्यभाव का अन्तर है अर्थात् सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान का निमित्तकारण है। स्वयं को और परवस्तुओं को स्वसन्मुखतापूर्वक यथावत जाने, वह सम्यग्ज्ञान कहलाता है; उसकी वृद्धि होने पर अन्त में केवलज्ञान प्राप्त होता है। सम्यग्ज्ञान के अतिरिक्त सुखदायक वस्तु अन्य कोई नहीं है और वही जन्म, जरा तथा मरण का नाश करता है । मिथ्यादृष्टि जीव को सम्यग्ज्ञान के बिना करोड़ों जन्म तक तप तपने से जितने कर्मों का नाश होता है, उतने कर्म सम्यग्ज्ञानी जीव के त्रिगुप्ति से क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं। पूर्वकाल में जो जीव मोक्ष गये हैं, भविष्य में जायेंगे और वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र से जा रहे हैं- वह सब सम्यग्ज्ञान का प्रभाव है। जिस प्रकार मूसलाधार वर्षा बन की भयङ्कर अग्नि को क्षणमात्र में बुझा देती है, उसी प्रकार यह सम्यग्ज्ञान विषय वासन...
छहढाला(33)
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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(33) तीसरी ढाल का लक्षण-संग्रह अनायतनः - कुगुरु, कुदेव, कुधर्म और इन तीनों के सेवक ये छहों अधर्म के स्थानक । अनायतनदोषः - सम्यक्त्व का नाश करने वाले कुदेवादि की प्रशंसा करना । अनुकम्पाः - प्राणी मात्र पर दया का भाव । अरिहन्तः - चार घातिकर्मों से रहित, अनन्तचतुष्टयसहित, वीतराग और केवलज्ञानी परमात्मा । अलोकः - जहाँ आकाश के अतिरिक्त अन्य द्रव्य नहीं है, वह स्थान । अविरतिः- पापों में प्रवृत्ति, अर्थात् १-निर्विकार स्वसंवेदन से विपरीत अव्रत परिणाम, २-छह काय (-पांचों स्थावर तथा एक त्रसकाय) जीवों की हिंसा के त्यागरूप भाव न होना तथा पाँच इन्द्रिय और मन के विषयों में प्रवृत्ति करना, ऐसे बारह प्रकार अविरति है। अविरति सम्यग्दृष्टिः सम्यग्दर्शन सहित, किन्तु व्रतरहित ऐसे चौथे गुणस्थानवर्ती जीव। आस्तिक्यः जीवादि छह द्रव्य, पुण्य और पाप, संवर, निर्जरा, मोक्ष तथा परमात्मा के प्रति विश्वास, सो आस्तिक्य कहलाता है । कषायः जो आत्मा को दुःख दे, गुणों के विकास को रोके तथा परतंत्र करे वह, यानी मिथ्यात्व तथा क्रोध, मान, माया और लोभ, वह कषाय भाव हैं । गुणस...
छहढाला(32)
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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(32) तीसरी ढालका भेद-संग्रह अचेतन द्रव्य :- पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल । चेतन एक, अचेतन पाँचों, रहे सदा गुण-पर्ययवान, केवल पुद्गल रूपवान है, पाँचों शेष अरूपी जान । अन्तरंग परिग्रह :- १ मिथ्यात्व, ४ कषाय, ९ नोकषाय । आस्त्रव :- ५ मिथ्यात्व, १२ अविरति, २५ कषाय, १५ योग । कारण :- उपादान और निमित्त द्रव्यकर्म :- ज्ञानावरणादि आठ नोकर्म :- औदारिक, वैक्रियिक और आहारकादि शरीर परिग्रह :- अन्तरंग और बहिरंग प्रमाद :- ४ विकथा, ४ कषाय, ५ इन्द्रिय, १ निद्रा, १ प्रणय ( स्नेह ) । बहिरंग परिग्रह :- क्षेत्र, मकान, सोना, चाँदी, धन, धान्य, दासी, दास, वस्त्र और बरतन - यह दस हैं। भावकर्मः- मिथ्यात्व, राग, द्वेष, क्रोधादि । मदः- आठ प्रकार के हैंः- जाति, लाभ, कुल, रूप, तप, बल, विद्या, अधिकार; इनको गर्व न कीजिये, ये मद अष्ट प्रकार । मिथ्यात्वः- विपरीत, एकान्त, विनय, संशय और अज्ञान । रसः- खारा, खट्टा, मीठा, कड़वा, चरपरा और कषायला । रूपः- ( रंग ) - काला, पीला, हरा, लाल और सफेद- यह पाँच रूप हैं । स्पर्शः- हलका, भारी, रूखा, चिकना, कड़ा, कोमल, ठण्डा, गर्म- यह आठ स्पर्श...
छहढाला(31)
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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(31) तीसरी ढाल का सारांश आत्मा का कल्याण सुख प्राप्त करने में है। आकुलता का मिट जाना - वह सच्चा सुख है; मोक्ष ही सुखरूप है; इसलिये प्रत्येक आत्मार्थी को मोक्षमार्ग में प्रवृत्ति करना चाहिये। निश्चयसम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र- इन तीनों की एकता सो मोक्षमार्ग है। उसका कथन दो प्रकार से है। निश्चयसम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र तो वास्तव में मोक्षमार्ग है, और व्यवहार-सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र - वह मोक्षमार्ग नहीं है किन्तु वास्तव में बन्धमार्ग है; लेकिन निश्चयमोक्षमार्ग में सहचर होने से उसे व्यवहारमोक्षमार्ग कहा जाता है। आत्मा की परद्रव्यों से भिन्नता का यथार्थ श्रद्धान सो निश्चय -सम्यग्दर्शन है और परद्रव्यों से भिन्नता का यथार्थ ज्ञान सो निश्चय-सम्यग्ज्ञान है। परद्रव्यों का आलम्बन छोड़कर आत्मस्वरूप में लीन होना सो निश्चयसम्यक्चारित्र है तथा सातों तत्त्वों का यथावत् भेदरूप अटल श्रद्धान करना सो व्यवहारसम्यग्दर्शन कहलाता है। यद्यपि सात तत्त्वों के भेद की अटल श्रद्धा शुभराग होने से वह वास्तव में सम्यग्दर्शन नहीं है, किन्तु निचली दशा में (चौ...
छहढाला(30)
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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(30) सम्यग्दर्शन के बिना ज्ञान और चारित्र का मिथ्यापना मोक्षमहलकी प्रथम सीढ़ी, या बिन ज्ञान चरित्रा; सम्यक्ता न लहै, सो दर्शन, धारो भव्य पवित्रा । “दौल” समझ सुन चेत सयाने, काल वृथा मत खोवै; यह नरभव फिर मिलन कठिन है, जो सम्यक् नहिं होवै ॥ १७ ॥ अन्वयार्थः यह सम्यग्दर्शन (मोक्षमहलको) मोक्षरूपी महल की (प्रथम) प्रथम (सीढ़ी) सीढ़ी है; (या बिन) इस सम्यग्दर्शन के बिना (ज्ञान चरित्रा) ज्ञान और चारित्र (सम्यक्ता) सच्चाई (न लहै) प्राप्त नहीं करते; इसलिये (भव्य) हे भव्य जीवों! (सो) ऐसे (पवित्रा) पवित्र (दर्शन) सम्यग्दर्शन को (धारो) धारण करो। (सयाने दौल) हे समझदार दौलतराम! (सुन) सुन, (समझ) समझ और (चेत) सावधान हो, (काल) समय को (वृथा) व्यर्थ (मत खोवै) न गँवा; क्योंकि (जो) यदि (सम्यक्) सम्यग्दर्शन (नहिं होवै) नहीं हुआ, तो (यह) यह (नर भव) मनुष्य पर्याय (फिर) पुनः (मिलन) मिलना, (कठिन है) दुर्लभ है। भावार्थः- यह सम्यग्दर्शन ही मोक्षरूपी महल में पहुँचने की प्रथम सीढ़ी है। इसके बिना ज्ञान और चारित्र सम्यक्त्वपने को प्राप्त नहीं होते अर्थात् जब तक सम्यग्दर्श...
छहढाला(29)
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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(29) सम्यक्त्व की महिमा, सम्यग्दृष्टि के अनुत्पत्ति स्थान तथा सर्वोत्तम सुख और सर्व धर्म का मूल प्रथम नरक बिन षट् भू ज्योतिष वान भवन षंड नारी; थावर विकलत्रय पशुमें नहिं, उपजत सम्यक् चारी । तीनलोक तिहुँकाल माँहि नहिं, दर्शन सो सुखकारी; सकल धर्मको मूल यही, इस बिन करनी दुखकारी ॥ १६ ॥ अन्वयार्थ : (सम्यग्दृष्टि) सम्यग्दृष्टि जीव (प्रथम नरक बिन) पहले नरक के अतिरिक्त (षट् भू) शेष छह नरकों में (ज्योतिष) ज्योतिषी देवों में, (वान) व्यन्तर देवों में, (भवन) भवनवासी देवों में (षंड) नपुंसकों में, (नारी) स्त्रियों में, (थावर) पाँच स्थावरों में, (विकलत्रय) द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय जीवों में तथा (पशुमें) कर्मभूमि के पशुओं में (नहि उपजत) उत्पन्न नहीं होते। (तीनलोक) तीनलोक (तिहुँकाल) तीनकाल में (दर्शन सो) सम्यग्दर्शन के समान (सुखकारी) सुखदायक (नहि) अन्य कुछ नहीं है, (यही) यह सम्यग्दर्शन ही (सकल धरमको) समस्त धर्मों का (मूल) मूल है; (इस बिन) इस सम्यग्दर्शन के बिना (करनी) समस्त क्रियाएँ (दुखकारी) दुःखदायक हैं। भावार्थः...
छहढाला(28)
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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(28) छन्द १४ ( उत्तरार्द्ध ) छह अनायतन तथा तीन मूढ़ता दोष कुगुरु - कुदेव - कुवृष सेवन की नहिं प्रशंस उचरैं है; जिनमुनि जिनश्रुत बिन कुगुरादिक, तिन्हें न नमन करै है ॥ १४ ॥ अन्वयार्थः- सम्यग्दृष्टि जीव (कुगुरु-कुदेव-कुधर्म सेवन की) कुगुरु, कुदेव और कुधर्म सेवन की (प्रशंसे) प्रशंसा (नहिं उबरै है) नहीं करता। (जिन) जिनेन्द्रदेव (मुनि) वीतरागी मुनि और (जिनश्रुत) जिनवाणी (बिन) के अतिरिक्त (जो) (कुगुरादि) कुगुरु, कुदेव, कुधर्म हैं (तिन्हें) उन्हें (नमन) नमस्कार (न करें है) नहीं करता। भावार्थः - कुगुरु, कुदेव, कुधर्म; कुगुरु सेवक, कुदेव सेवक तथा कुधर्म सेवक - यह छह अनायतन (धर्म के अस्थान) दोष कहलाते हैं। उनकी भक्ति, विनय और पूजनादि तो दूर रही, सम्यग्दृष्टि जीव उनकी प्रशंसा भी नहीं करता; क्योंकि उनकी प्रशंसा करने से भी सम्यक्त्व में दोष लगता है। सम्यग्दृष्टि जीव जिनेन्द्रदेव, वीतरागी मुनि और जिनवाणी के अतिरिक्त कुदेव, और कुशास्त्रादि को (भय, आशा, लोभ और स्नेह आदि के कारण भी) नमस्कार नहीं करता, क्योंकि उन्हें नमस्कार करने मात्र से भी सम्यक्त्व द...
छहढाला(27)
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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(27) ( १२-१३ पूर्वार्द्ध) छन्द १३ ( उत्तरांर्द्ध ) मद नामक आठ दोष पिता भूप वा मातुल नृप जो, होय न तौ मद ठानै; मद न रूपकौ मद न ज्ञानकौ, धन बलकौ मद भानै ॥ १३ ॥ छन्द १४ ( पूर्वार्द्ध ) तपकौ मद न मद जु प्रभुताकौ, करै न सो निज जानै; मद धारै तौ यही दोष वसु समकितकौ मल ठानै । अन्वयार्थः- जो जीव (जो ) यदि (पिता) पिता आदि पितृपक्ष के स्वजन (भूप) राजादि (होय) हों (तौ) तो (मद) अभिमान (न ठानै) नहीं करता, यदि (मातुल) मामा आदि मातृपक्ष्के स्वजन (नृप) राजादि (होय) हों तो (मद) अभिमान (न) नहीं करता; (ज्ञानकौ) विद्या का (मद न) अभिमान नहीं करता; (धनकौ) लक्ष्मी का (मद मानै) अभिमान नहीं करता; (बलकौ) शक्ति का (मद मानै) अभिमान नहीं करता; (तपकौ) तप का (मद न) अभिमान नहीं करता; (जु) और (प्रभुताकौ) ऐश्वर्य, बड़प्पन का (मद न करै) अभिमान नहीं करता (सो) वह (निज) अपने आत्मा को (जानै) जानता है। यदि जीव उनका (मद) अभिमान (धारै) रखता है, तो (यही) ऊपर कहे हुए मद (वसु) आठ (दोष) दोष रूप होकर (समकितकौ) सम्यक्त्व को, सम्यक दर्शन को (मल) दूषित (ठानै) करते हैं। भावार...