छठवीं ढाल (54)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(54) स्वरूपाचरणचारित्र (शुद्धोपयोग) का वर्णन जिन परम पैनी सुबुधि छैनी, डारि अन्तर भेदिया; वरणादि अरु रागादितैं निज भावको न्यारा किया । निजमांहि निजके हेतु निजकर, आपको आपै गह्यो; गुण गुणी ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय मँझार कछु भेद न रह्यो ॥ ८ ॥ अन्वयार्थ:— (जिन) जो वीतरागी मुनिराज (परम) अत्यंत (पैनी) तीक्ष्ण (सुबुधि) सम्यग्ज्ञान अर्थात् भेदविज्ञान रूपी (छैनी) छैनी ( डारि ) पटककर ( अन्तर ) अन्तरंग में ( भेदिया ) भेद करके ( निजभावको ) आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ( वरनादि ) वर्ण, रस, गन्ध तथा स्पर्श रूप द्रव्यकर्म से ( अरु ) और ( रागादितैं ) राग- द्वेषादि रूप भावकर्म से ( न्यारा किया ) भिन्न करके ( निजमांहि ) अपने आत्मा में ( निजके हेतु ) अपने लिये ( निजकर ) अपने द्वारा ( आपको ) आत्मा को ( आपैं ) स्वयं अपने से ( गह्यो ) ग्रहण करते हैं तब ( गुण ) गुण, ( गुणी ) गुणी, ( ज्ञाता ) ज्ञाता, (ज्ञेय ) ज्ञान का विषय और ( ज्ञान मँझार ) ज्ञान में- आत्मा में ( कछु भेद न रह्यो ) किंचित्मात्र भेद विकल्प नहीं रहता। भावार्थः - - ज...