मेरी भावना (बा० न्यायमत सिंह जैन )
मेरी भावना (बा० न्यायमत सिंह जैन - रचियता सती कमल श्री नाटक से ली गई) (चाल) मेरे मौला बुलाले मदीने मुझे ॥ स्वामी चरणों का तेरे सहारा मुझे । केवल तेरा ही शरणा गवारा मुझे - टेक तू न रागी है न द्वेषी, है कि अविनाशी है तू । विश्व का ज्ञाता द्रष्टा, जग हितोपदेशी है तू ॥ अपने दर्शन का देना नज़ारा मुझे ।। टेक वीर पारस हर हरि. ब्रह्मा कि बुद्ध अर्हन्त राम । या तुझे स्वाधीन कह दूँ, हैं हजारों तेरे नाम जिन में हर इक है प्यारे से प्यारा मुझे ॥ टेक जिन को विषयों की न आशा, है न दिल में राग है । स्वार्थ माया लोभ क्रोध अभिमान, का भी त्याग है ॥ ऐसे ऋषियों की सेवा है प्यारा मुझे-टेक झूठ चोरी ईर्ष्या हिंसा, से हूँ हर वक्त दूर । शील सन्तोष और ...