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प्रश्न-मंच (7)

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  प्रश्न-मंच (7) प्रश्न 1. - पहले स्वर्ग में कितने अकृत्रिम जिनालय हैं? 13 लाख, 32 लाख, 11 लाख, 07 लाख, उत्तर - 32 लाख प्रश्न 2. - पीड़ा चिन्तन- यह किस ध्यान का भेद है? शुक्ल ध्यान, आर्तध्यान, धर्मध्यान, रौद्रध्यान,  उत्तर - आर्तध्यान प्रश्न 3. - वेद कितने होते हैं? 3, 4, 2, 9, उत्तर - 3 प्रश्न 4. - चक्रवर्ती के कितने भोग होते हैं? 10, 20, 13, 23 उत्तर - 10 प्रश्न 5. - भगवान महावीर के तीर्थंकर काल में कितने अंतःकृत केवली हुए? 60, 10, 30, 80 उत्तर - 10  प्रश्न 6. - तिर्यंचों के कितने भेद हैं? 9, 83, 10, 18 उत्तर - 83 प्रश्न 7. - कर्मों की पाप प्रकृतियाँ कितनी होती हैं? 93, 83, 100, 15 उत्तर - 100 प्रश्न 8. - दिल्ली लाल मंदिर में मूलनायक भगवान कौन से हैं? भगवान महावीर, भगवान आदिनाथ, भगवान चन्द्रप्रभ, भगवान पार्श्वनाथ उत्तर - भगवान पार्श्वनाथ प्रश्न 9. - बच्चे के जन्म का सूतक कितने दिन का लगता है? 08, 10, 12, 05 उत्तर - 10 प्रश्न 10. - तीर्थंकर महावीर स्वामी और तीर्थंकर अजितनाथ कितने वर्ष तक मुनिमुद्रा में रहे थे? 08, 02, 07, 12 उत्तर - 12 प्रश्न 11. - 24 तीर्थंकरों में से क...

प्रश्न-मंच (6)

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  प्रश्न-मंच (6)   प्रश्न 1. - शिक्षाव्रत कितने होते हैं? 9, 3, 4, 6 उत्तर - 4 प्रश्न 2. - शौरीपुर बटेश्वर में कौन-सी नदी निकली है? जमुना नदी, सरस्वती नदी, गंगा नदी, चम्बल नदी, उत्तर - जमुना नदी प्रश्न 3. - ऐसा स्थान जहाँ 10 महापुरुषों का जन्म हुआ हो? बनारस, अयोध्या, शौरीपुर, हस्तिनापुर उत्तर - अयोध्या प्रश्न 4. - आराधना सार ग्रंथ में कितनी गाथा हैं?  113, 125, 68, 135 उत्तर - 113 प्रश्न 5. - पार्श्व पुराण ग्रंथ के लेखक कौन हैं? ब्रह्मदेव जी, रविकीर्ति जी, सकलकीर्ति जी, विपुलमती जी उत्तर - सकलकीर्ति जी  प्रश्न 6. -द्रव्यसंग्रह में कितनी गाथाएं हैं? 120, 108, 68, 58 उत्तर - 58 प्रश्न 7. - इष्टोपदेश ग्रंथ में कितने श्लोक हैं? 48, 101, 51, 90 उत्तर - 51  प्रश्न 8. - विश्वकर्मा किनके पुत्र थे? भगवान शान्तिनाथ जी, भगवान आदिनाथ जी, भरत चक्रवर्ती, भगवान मल्लिनाथ जी उत्तर - भगवान आदिनाथ जी  प्रश्न 9. - वह कौन-सा जीव है, जिसका शरीर सबसे सूक्ष्म होता है? निगोदिया, केंचुआ, खटमल, चींटी उत्तर - निगोदिया प्रश्न 10. - मुनि और श्रावकों के आवश्यक कितने हैं? 6-5, 5-5, 6-6, 5...

प्रश्न-मंच - 5

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  प्रश्न-मंच - 5  प्रश्न 1- विष्णुकुमार मुनि के गृहस्थ के भाई कौन थे? 1. राजा मेघ  2. राजा पद्म  3. राजा वसु  4. राजा नन्द उत्तर - 2. राजा पद्म   प्रश्न 2- विष्णुकुमार मुनि ने बौने बन कर बाली के मंत्री से कितने पग भूमि मांगी थी? 1.05 पग  2. 03 पग  3. 08 पग  4. 12 पग  उत्तर - 2. 03 पग   प्रश्न 3- 700 मुनिराजों का उपसर्ग किसने दूर किया? 1.विष्णुकुमार  2. गजकुमार  3. वज्रकुमार  4. आदिकुमार उत्तर - विष्णुकुमार   प्रश्न 4-  किस मुनिराज के सिर पर जलती सिगड़ी रख कर उपसर्ग किया? 1.पाण्डव  2. गजकुमार  3. गुरुदत्त  4. सुकौशल उत्तर - 2. गजकुमार  प्रश्न 5- बाली मुनिराज कहाँ से मोक्ष पधारे? 1.सम्मेदशिखर  2. पावागढ़  3. कैलाश पर्वत  4. प्रयाग उत्तर - कैलाश पर्वत प्रश्न 6- वर्तमान चौबीसी में से कितने तीर्थंकरों पर उपसर्ग हुआ? 1.04  2. 03  3. 02  4. 01 उत्तर - 03   प्रश्न 7- पूज्यपाद स्वामी के मामा का नाम बताओ। 1.पाणिनी  2. देवनंदी  3. चाणक्य  4. अष्टव...

प्रश्न-मंच - 4

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  प्रश्न-मंच - 4 प्रश्न - अचौर्यवृत्ति किसे कहते हैं? उत्तरः जिस वस्तु को लेने के लिए स्वामी की अनुमति न ली गई हो, और वह जल या मिट्टी के अतिरिक्त हो, उसे न लेना अचौर्यवृत्ति (चोरी) कहलाती है। दूसरे शब्दों में - जो वस्तु गिरी हुई, पड़ी हुई, छोड़ी हुई, भूली हुई हो और उसका स्वामी स्पष्ट न हो, तो भी यदि बिना अनुमति लिए उसे न लिया जाए, तो वह भी अचौर्यवृत्ति कहलाती है। प्रश्न- अचौर्यवृत्ति के कितने अतिचार होते हैं? उत्तरः अचौर्यवृत्ति के पाँच अतिचार होते हैंः 1. स्तेनप्रयोगः चोर को चोरी के लिए प्रेरित करना और उसके उपाय बताना। 2. तदाहृतादानः चोर के द्वारा चुराई गई वस्तु को खरीदना। 3. विरुद्ध राज्यातिक्रम  राज नियमों के विरुद्ध चुराई गई वस्तु का व्यापार करना। 4. हीनाधिक मानोन्मानः बाट, तराजू, मीटर आदि में हेराफेरी करना। 5. प्रतिरूपकव्यवहारः सस्ती वस्तु को कीमती वस्तु में मिलाकर बेचना। प्रश्न- ब्रह्मचर्यवृत्ति किसे कहते हैं? उत्तरः “निज वनिता बिन सकल, नारियों से रहे विराग।“ अपनी विवाहित स्त्री को छोड़कर, समस्त स्त्रियों से विरक्त रहना ब्रह्मचर्यवृत्ति कहलाता है। प्रश्न- ब्रह्मचर्यव्रत के ...

प्रश्न-मंच - 3

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  प्रश्न-मंच - 3 1. प्रश्न - भगवान नेमिनाथ किस राज्य से मोक्ष गए?   A. महाराष्ट्र, B. बिहार, C. गुजरात, D. राजस्थान उत्तर - C. गुजरात 2. प्रश्न - भगवान नेमिनाथ की माता का क्या नाम है?  A. सुलोचना देवी, B. शिवादेवी , C. यशोदा देवी, D.सुमित्रा देवी उत्तर - B.  शिवादेवी 3. प्रश्न - भगवान नेमिनाथ के पिता का क्या नाम है? A. विजय समुद्र, B.  विश्व समुद्र, C. महेन्द्र समुद्र, D. देव समुद्र उत्तर - A. विजय समुद्र 4. प्रश्न - भगवान पार्श्वनाथ के पिता का क्या नाम है?  A. विजय सेन, B. विश्व सेन, C. अश्विन सेन, D. अश्व सेन  उत्तर - D. अश्व सेन  5. प्रश्न - भगवान पार्श्वनाथ की माता का क्या नाम है?  A. सुलोचना देवी, B. वामा देवी, C. यशोदा देवी, D. सुमित्रा देवी उत्तर - B. वामा देवी 6. प्रश्न - भगवान आदिनाथ की माता का क्या नाम है?  A. सुलोचना देवी, B. मरु देवी, यशोदा देवी, D.सुमित्रा देवी उत्तर - B.  मरु देवी 7. प्रश्न - भगवान वासुपूज्य कहाँ से मोक्ष गए?  A. सम्मेद शिखर जी, B. चम्पापुरी, ...

आचार्य वंदना

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  आचार्य वंदना   (प्रवचन से पहले प्राकृत भाषा में की जाने वाली आचार्य/सिद्ध/श्रुत भक्ति का अर्थ - प्रातःकालीन की जाए, तो पौर्वाह्णिक और दोपहर के बाद सायंकालीन की जाए, तो अपराह्णिक कहा जाता है।) सिद्ध भक्ति नमोऽस्तु पौर्वाह्णिक (अपराह्णिक) आचार्य-वंदना-क्रियायां पूर्वाचार्यनुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वंदना-स्तव-समेतं श्री सिद्धभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम्। शब्दार्थ : हे आचार्य देव! (नमोऽस्तु) नमस्कार हो (पौर्वाह्णिक) प्रातःकालीन (अपराह्णिक) सायंकालीन (आचार्य-वंदना-क्रियायां) आचार्य वंदना की क्रिया में (पूर्वाचार्यनुक्रमेण) पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार (सकल-कर्म-क्षयार्थं) सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए (भावपूजा-वंदना- स्तव-समेत) भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित (श्री सिद्धभक्ति-कायोत्सर्गं) श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्ग को (अहम्) मैं (करोम्यहम्) करता हूँ। अर्थ- हे आचार्य देव! नमस्कार हो प्रातःकालीन/ सायंकालीन आचार्य वंदना की क्रिया में पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्...

क्या आप जानते हैं?

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  क्या आप जानते हैं? विहरमान बीस तीर्थंकर और उनकी 20 विशेषतायें - 1️⃣भरत ऐरावत क्षेत्र की तरह महाविदेह क्षेत्र में एक के बाद एक ऐसे चौबीस तीर्थंकरों की व्यवस्था नहीं है। महाविदेह क्षेत्र की पुण्यवानी अनंतानंत और अद्भुत है. वहां सदाकाल बीस तीर्थंकर विचरते रहते हैं, उनके नाम भी हमेशा एक सरीखे ही रहते हैं; इसलिए उन्हें जिनका कभी भी वियोग न हो, ऐसे विहरमान बीस तीर्थंकर भी कहते हैं। 2️⃣ महाविदेह क्षेत्र में कभी भी बीस से कम तीर्थंकर नहीं होते हैं। अतः उन्हें जयवंता जगदीश भी कहते हैं, क्योकि वे सभी साक्षात् परमात्म स्वरुप में विद्यमान रहते हैं। 3️⃣ इस तरह महाविदेह क्षेत्र में तीर्थंकरों का कभी भी अभाव नहीं होता है। 4️⃣ महाविदेह क्षेत्र का समय सदाकाल एक-सा ही रहता है और वहां सदैव चतुर्थ काल के प्रारम्भ काल के समान समय रहता है। 5️⃣ महाविदेह क्षेत्र के मध्य के अतिरिक्त पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण इस तरह चार विभाग करने से पाँचों महाविदेहों में 5×4=20 विभाग हुए। एक विभाग में एक; ऐसे बीस तीर्थंकर सदा विचरते हैं।  6️⃣ ये बीस विहरमान तीर्थंकर सदाकाल से धर्म-दीप को प्रदीप्त कर रहे हैं और क...

‘उत्तम सत्य’ पर आधारित लघु नाटिका

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  ‘उत्तम सत्य’ पर आधारित लघु नाटिका पात्र- एक गेहूँ का व्यापारी,   पत्नी, एक पुत्र - सागर उम्र- 13-14 वर्ष,  एक पुत्री- उपासना 13-14 वर्ष, (दोनों जुड़वां हैं), पुत्र के तीन मित्र,  एक अध्यापक,  एक साहूकार,  उसके दो नौकर, एक पड़ोसिन,  दो व्यापारी कहानी की रूपरेखा गेहूँ का व्यापारी अपने पुत्र को पढ़ा-लिखा कर बैरिस्टर बनाना चाहता है और पुत्री को केवल घर के काम सीखने में लगाए रखता है..... तुमने अपने भाई के लिए नहाने का गर्म पानी भी नहीं रखा, उसके कपड़े भी नहीं निकाले। इसे विद्यालय में जाने में देर हो जाएगी.... आदि आदि पत्नी को भी झिड़कता रहता है कि मेरे बेटे के लिए हलुआ बना दो। देखो! यह कितनी मेहनत करता है। पढ़ाई करना आसान नहीं है। लड़की को हलुआ खाने नहीं देता... तू क्या करेगी हलवा खाकर। मोटी हो जाएगी, तो कोई ब्याह भी नहीं करेगा। जा! कुएँ से पानी भर कर ला। पिता भाई को पढ़ाने बिठाते हैं और उसे 8 का पहाड़ा सिखाते हैं। बोलो... आठ एकम आठ... बेटा दोहराता है। आठ दूनी सोलह... बेटा फिर दोहराता है। आठ तिया चौबीस... बेटा फिर दोहराता है। उसकी बहिन भी पास बैठी सुन रही होती है ...

भगवान महावीर स्वामी (64)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (64) महावीर प्रभु के लिये निर्वाण प्राप्ति अभी पंचमकाल का प्रारम्भ होने में तीन वर्ष आठ मास तथा पन्द्रह दिन का समय शेष था। चौथा काल चल रहा था। प्रभु महावीर का विहार थम गया; वाणी का योग भी मोक्षगमन के दो दिन पूर्व (धन्य त्तेरस से) रुक गया। प्रजाजन समझ गये कि अब प्रभु के मोक्षगमन की तैयारी है। प्रत्येक देश के राजा तथा लाखों प्रजाजन प्रभु के दर्शनार्थ आ पहुँचे। परम वैराग्य का वातावरण छा गया। भले ही वाणी बन्द हो गई थी, तथापि प्रभु की शान्तरस झरती मुद्रा देखकर भी अनेक जीव धर्म का मर्म प्राप्त कर रहे थे। गौतम गणधरादि मुनिवर ध्यान में अधिकाधिक एकाग्र हो रहे थे। प्रभु की उपस्थिति में प्रमाद छोड़कर अनेक जीवों ने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की आराधना प्रारम्भ कर दी।  इस प्रकार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तथा चतुर्दशी के दो दिन तक देवेन्द्रों तथा नरेन्द्रों ने सर्वज्ञ महावीर तीर्थंकर की अन्तिम महापूजा की। मोक्ष-महोत्सव का महान मेला लग रहा था... संसार को भूलकर सब मोक्ष की महिमा में तल्लीन थे। चतुर्दशी की रात्रि हुई, अर्धरात्रि भी बीत गई और... रात्रि के पिछले प्रहर (...

भगवान महावीर स्वामी (63)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (63) इस प्रकार सर्वज्ञ महावीर को देखते ही आत्मशक्ति की प्रतीति करके अनेक जीव परमात्मा बन गये। प्रभु ने दिव्य ध्वनि द्वारा ‘प्रत्येक जीव में परमेश्वरत्व’ की प्रतिष्ठा की। अहा! प्रत्येक आत्मा परमात्म वैभव से परिपूर्ण है और वह स्वाधीन रूप से परमात्मा हो सकता है। - ऐसा गूढ़ रहस्य परमेश्वर के अतिरिक्त कौन बता सकता है? और उसे झेलने वाले कोई साधारण जीव नहीं, अपितु ‘जिनेश्वर के नन्दन’ होते हैं, मोक्षमार्ग के पथिक होते हैं। हे वीर! आपका मार्ग वीरों का मार्ग है; वीतरागता का मार्ग है। वीतरागता में निहित सच्ची वीरता को आपके भक्तों के सिवा और कौन समझेगा? लोग कहते हैं कि आकाश में पुष्प नहीं होते; परन्तु ऐसा कहने वालों ने प्रभु के श्रीविहार को नहीं देखा। आकाशगामी प्रभु जहाँ भी विचरते हैं, वहाँ उनके चरणों के नीचे 225 अद्भुत कमलों की रचना हो जाती है। मानो आकाश में पुष्पवाटिका खिली हो! और प्रभु के प्रताप से भव्यजीवों के चैतन्याकाश में भी रत्नत्रय के पुष्प खिल उठते हैं। एक ओर वीतरागी सर्वज्ञता द्वारा चैतन्य की सर्वोत्तम सुन्दरता, तथा दूसरी ओर परम औदारिककता द्वारा शरीर-पु...

भगवान महावीर स्वामी (62)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (62) अहो, वीरनाथ के समीप चेतना की विशुद्धता के बल से नरक के पाप भी मानो धुल गये हों। इस प्रकार श्रेणिक राजा तो चेतनरस के वेदन में ही तत्पर थे। वीर प्रभु के प्रति परम उपकार के सूचक हर्षाश्रु उनकी आँखों से झर रहे थे। अरे! देखो तो सही, जीव के परिणाम का परिवर्तन! कहाँ एक समय मुनि की विराधना के दुष्परिणाम! और कहाँ इस समय तीर्थंकर प्रकृति के योग्य विशुद्ध परिणाम! कहाँ उस समय का मिथ्यात्व और कहाँ आज का क्षणिक सम्यक्त्व! एक ही जीव के जीवन में कैसे-कैसे परिवर्तन आते हैं!  वाह, जिनशासन! सत् को उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य स्वरूप बतलाने वाला तेरा उपदेश हमें वीतरागता का ही भाव कराता है। नरकगामी भी वही... और किंचित दीर्घदृष्टि से देखें, तो मोक्षगामी भी वही। अहा! जीव के परिणामों की शक्ति तो देखो, चाहे जैसा पापी या विराधक जीव भी सीधा चलने लगे, तो क्षण में धर्मी होकर मोक्ष का साधक बन जाता है। इसका उदाहरण एक वेद-वेदांत में पारंगत इन्द्रभूति-गौतम गणधर और दूसरे बौद्ध धर्म को मानने वाले श्रेणिक राजा- भावी तीर्थंकर। क्षणिक सम्यक्त्व को प्राप्त श्रेणिक राजा ने अंतर में अतीन्द्...

भगवान महावीर स्वामी (61)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (61) भारत में भगवान महावीर तीर्थंकर से पूर्व २३वें पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; अहिंसाधर्म की महिमा फैल रही थी। भगवान महावीर ने भी वह बात प्रचारित की कि राग से भिन्न आत्मा के अनुभव द्वारा ही अहिंसाधर्म का पालन हो सकता है; क्योंकि राग स्वयं हिंसा है, इसलिए जो जीव जितना राग में वर्तता है, उतना वह हिंसा में ही वर्त रहा है। जिसमें राग नहीं है, ऐसे ज्ञान की अनुभूति वह परम अहिंसाधर्म है और उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे अहिंसाधर्म के उपदेशक प्रभु महावीर ने विपुलाचल से विहार करके भारतभूमि को पावन किया। जहाँ वे पधारते, वहाँ अहिंसामय शान्त वातावरण हो जाता था। सर्प और नेवले जैसे विरोधी जीव भी एक-दूसरे के मित्र बन जाते थे। सिंह और गाय, शेर और खरगोश... सब भयरहित होकर एक साथ बैठते थे... और वीरवाणी का अमृत-पान करते थे। प्रभु ने अनेकान्त तत्व का स्वरूप समझाया- जीव अतीन्द्रिय चेतनतत्व है, वह जड़ से भिन्न है। चेतन और जड़ प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वधर्म में स्थित हैं। एक ही वस्तु का एकसाथ अपने अनेक धर्मों में तन्मय रूप से रहना ही ‘अनेकान्त’ है। एक ही आत्...

भगवान महावीर स्वामी (60)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (60) अहा, गौतम गणधर भी जिनकी स्तुति करते हों, उन सर्वज्ञ महावीर की महिमा का क्या कहना! हे महावीर देव! आपके गुण इतने अधिक महान हैं कि छद्मस्थ जीव उनकी स्तुति करते हुए थक जाता है, तथापि मैं आपके गुणों के प्रति सच्ची महिमा के कारण आपकी स्तुति करता हूँ। प्रभो! आपके अंतर में उदित हुआ केवलज्ञान सूर्य हानि-वृद्धि से रहित स्थिर है; वह सूर्य की भांति आतप देनेवाला नहीं, किन्तु आतप हरनेवाला है। आपकी वीतरागी सर्वज्ञता की अतुल्य महिमा का चिन्तन हमें राग से भिन्न ज्ञानस्वभावी आत्मा की अनुभूति कराता है... और सम्यक्त्व सहित महान आनन्द प्रकट होता है। प्रभो! आपकी यथार्थ प्रतीत्ति का यह महान फल है। धन्य सर्वज्ञदेव! आपका प्रभाव अद्वितीय है। स्वानुभूति के बिना आपके अचिन्त्य गुण चिन्तन में नहीं आ सकते। जब हम आपके अनन्त गुणों को ज्ञान में लेकर उनका चिन्तन करते हैं, तब हमारा ज्ञान वैसे आत्मगुणों में एकाग्र हो जाता है और विकल्पों से परे परमशान्त चैतन्यरस अनुभव में आता है। यही है आपका परमार्थ स्तवन!... यही है आपका पावन पंथ। जो इन्द्रियों को जीतकर जाने विशेष निजात्मा को। निश्चय...

भगवान महावीर स्वामी (59)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (59) इन्द्रभूति गौतम ज्यों ही मानस्तम्भ के निकट आये और प्रभु का वैभव देखा, त्यों ही उनका मान विगलित हो गया...। उन्होंने महावीर को देखा और देखते ही सर्वज्ञ की तथा जीव के अस्तित्व की प्रतीति हो गई। अहा! ऐसे वैभव में भी प्रभु वीतराग रूप से विराज रहे हैं! कैसी शांत है उनकी दृष्टि! उनकी आत्मा की दिव्यता का क्या कहना! अवश्य ही यह सर्वज्ञ हैं। गौतम को प्रभु के प्रति परम सम्मान का भाव जागृत हुआ और जीव के अस्तित्व सम्बन्धी उनकी सूक्ष्म शंकाएँ दूर हो गईं...। गर्व का स्थान ज्ञान ने लिया। निःशल्य हुए गौतम ने विनयपूर्वक अपने पाँच सौ शिष्यों सहित प्रभु का मार्ग अंगीकार किया और नतमस्तक होकर प्रभु की स्तुति की - मोक्षमार्गस्य नेतारं भेतारं कर्मभूतानाम्।  ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये॥ अहा! कैसा आनंददायी होगा वह दृश्य! वीर प्रभु की दिव्यवाणी खिरती होगी और गौतम गणधर उसे झेलते होंगे। प्रभु की वाणी सुनकर तत्क्षण गौतम-इन्द्रभूति चार ज्ञानधारी श्रुतकेवली हुए और बारह अंगरूप श्रुत की रचना द्वारा परमात्मा की वाणी का प्रसाद पंचमकाल के भव्य जीवों के लिये संग्...