भगवान महावीर स्वामी (44)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (44) दीक्षा कल्याणक महोत्सव अभेद आत्मानुभूति में लीन उन श्रमण-भगवंत महावीर को वन्दन हो! वैशाली के नागरिक अपने प्रिय राजपुत्र को ऐसी वीतरागदशा में देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुए। वे न तो हर्ष कर सके और न शोक! बस, मानो हर्ष-शोकातीत ऐसी वीतरागता ही करने योग्य है - ऐसा उस कल्याणक प्रसंग का वातावरण था। हर्ष और शोक के बिना भी मोक्ष का महोत्सव मनाया जा सकता है - ऐसा प्रभु का यह दीक्षा कल्याणक महोत्सव घोषित करता था। उन चैतन्यवीर को वीतरागदशा में देखकर धर्मज्ञों के अंतर में चारित्र की लहरें उठती थीं। मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के संध्याकाल स्वयं दीक्षित होकर महावीर मुनिराज षष्ठी के उपवास का तप धारण करके अभ्रमभाव से चैतन्यध्यान में लीन हो गये। अहा, दो रत्न से वृद्धिगत होकर भगवान त्रिरत्नवंत हुए; तीन ज्ञान से चार ज्ञानवंत हुए। अनेक महान लब्धियाँ सेवा करने आ गईं। उनकी अतिन्द्रिय ज्ञानधारा तो केवलज्ञान के साथ केलि करने लगी। केवलज्ञान ने उसी समय अपने ज्येष्ठ पुत्र समान मनःपर्ययज्ञान को भेजकर शीघ्र ही अपने आगमन की पूर्व सूचना दे दी। परन्तु प्रभु का लक्ष्य उस मनःपर्यय की ओर...