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दयालु प्रभु से

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भजन -  दयालु प्रभु से   (चाल—तेरे लाडलों  की दुआ  मांगते है) दयालु प्रभु से दया मांगते हैं हम अपने दुःखों की दवा मांगते हैं। नहीं हम सा कोई अधम और पापी, ना सत कर्म हम ने किये है कदापि किये पाप हम ने है अपराध भारी हम उनकी हृदय से क्षमा मांगते है, ॥टेक॥ प्रभु तेरी भक्ति में मन यह मगन हो निजातम के चिन्तन की हर दम लगन हो, मिले सत समागम करें ज्ञान चर्चा ये वरदान भगवन सदा मांगते है ॥टेक॥ न दुनिया के भोगों की कुछ कामना है नहीं स्वर्ग सुख की हमें चाहना है यही एक आशा है, बन जायें तुम से ना शिवराम पैसा टका मांगते हैं। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

है अगरचे सुख

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भजन- है अगरचे सुख   है अगरचे सुख मुकम्मिल मोक्ष में वैराग में । और कषायों के विषय भोगों के बिल्कुल त्याग में ॥ पर हर इक इन्सान में इतनी भला शक्ति कहां । सारे कर्मों को जो दे चैलेंज आ वैराग में ॥ गृहस्थ नीति पर चलें बस है सुगम रस्ता यही । धीरे धीरे कम करें कर्मों को घर के राग में ॥ त्याग फिर संसार को मुनिपद धरें शिव पद लहें। सारे कर्मों को जलादे ध्यान तप की आग में ॥ आप खुद करके दिखाया था ऋषभ जिनराज ने । किस तरह इन्सां चले इस गृहस्थ में वैराग में ॥ । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

हाय इन भोगों ने

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भजन- हाय इन भोगों ने चाल—घर से यहां कौन खुदा के लिए लाया मुझको । हाय इन भोगों ने क्या रंग दिखाया मुझ को बेखबर जगत के धन्धों में फसाया मुझको ॥टेक॥ मैं तो चेतन हूं निराकार सभी से न्यारा दुष्ट भोगों ने ही कर्मों से बंधाया मुझ को ॥टेक॥ नींद गफलत से मेरी आंख कभी भी न खुली भोग इन्द्री और विषयों ने भुलाया मुझको ॥टेक॥ ज्ञान धन मेरा हरा रूप दिखा कर अपना जून चौरासी में भटका के रुलाया मुझको ॥टेक॥ अब न सेऊंगा कभी भूल कर इन विषयों को 'न्यायमत' जैन धर्म अब तो है पाया मुझको ॥टेक॥   । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

आरती

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आरती तर्ज :— आरती ओं जय जय श्री महावीर, -2 त्रिशला नंदन स्वामी, दिखलाओ भवतीर ॥ (ध्रुव) कुण्डलपुर में तेरा, शुभ दिन जन्म हुआ, स्वामी.... पावापुरी पावास में, तव निर्वाण हुआ — ओं जय......॥१॥ ज्ञान का स्रोत बहाकर, सब की प्यास हरो, स्वामी... छाया घोर अंधेरा, दिव्य प्रकाश करो, ओं जय ......॥२॥ तू जीवन की ज्योति, तू घट घट ज्ञाता, स्वामी.... भाग्य विधाता तू ही, तू ही सुखदाता, ओं जय .........॥३॥ लीन रहे अपने में, ऐसा शुभवर दो, स्वामी... संकट मोचक तू ही, सब संकट हर दो, ओं जय .........॥४॥ हमको दिखा दो शिवपुर, सविनय अर्ज करें, स्वामी... "मुनि कन्हैया" स्थिर मन, तेरा ध्यान धरें — ओं जय...॥५॥ । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

चेतन हूं निराकार

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भजन -  चेतन हूं निराकार (चाल—मामूर हूं शोखी से शरारत से भरी हूँ) चेतन हूं निराकार हर बात का ज्ञाता पर क्या करूं जग बन्ध से फंदे में फंसा हूँ शक्ति है कि कर्मों को मैं इक दम में उड़ा दूँ लाचार हूँ इस मोह की नागिन से डसा हूँ क्या असल है कर्मों की मेरे तेज के आगे इक छिन के छिन में ध्यान की अग्नि से जला दूँ अब आन गही न्यामत जिन शरण तिहारी अरदास यही है कि मैं कर्मों से रिहा हूँ। । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद  

जिया राग भाव

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भजन - जिया राग भाव  (चाल - सोरठ - अधिक सरूप रूप का दिया न जागा मोल) जिया राग भाव दुखदाई, राग को मन से हटाओ जी मन से हटाओ जी, राग को मन से हटाओ जी - टेक है राग निमित संसार करम का मूल बताओ जी जो चाहो हो परमानन्द भाव वैराग बनाओ जी - टेक  यह राग चिकट सम जान भूल इस रस्ते न जावो जी लग जावेगी कर्मों की धूल ज्ञान दामन को बचावो जी - टेक अब पर परिणति को छोड़ ध्यान आपे में जमावो जी न्यामत तजराग अरु द्वेष सदा आतम गुण गावो जी - टेक । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद