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भगवान महावीर स्वामी (61)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (61) भारत में भगवान महावीर तीर्थंकर से पूर्व २३वें पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; अहिंसाधर्म की महिमा फैल रही थी। भगवान महावीर ने भी वह बात प्रचारित की कि राग से भिन्न आत्मा के अनुभव द्वारा ही अहिंसाधर्म का पालन हो सकता है; क्योंकि राग स्वयं हिंसा है, इसलिए जो जीव जितना राग में वर्तता है, उतना वह हिंसा में ही वर्त रहा है। जिसमें राग नहीं है, ऐसे ज्ञान की अनुभूति वह परम अहिंसाधर्म है और उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे अहिंसाधर्म के उपदेशक प्रभु महावीर ने विपुलाचल से विहार करके भारतभूमि को पावन किया। जहाँ वे पधारते, वहाँ अहिंसामय शान्त वातावरण हो जाता था। सर्प और नेवले जैसे विरोधी जीव भी एक-दूसरे के मित्र बन जाते थे। सिंह और गाय, शेर और खरगोश... सब भयरहित होकर एक साथ बैठते थे... और वीरवाणी का अमृत-पान करते थे। प्रभु ने अनेकान्त तत्व का स्वरूप समझाया- जीव अतीन्द्रिय चेतनतत्व है, वह जड़ से भिन्न है। चेतन और जड़ प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वधर्म में स्थित हैं। एक ही वस्तु का एकसाथ अपने अनेक धर्मों में तन्मय रूप से रहना ही ‘अनेकान्त’ है। एक ही आत्...

भगवान महावीर स्वामी (60)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (60) अहा, गौतम गणधर भी जिनकी स्तुति करते हों, उन सर्वज्ञ महावीर की महिमा का क्या कहना! हे महावीर देव! आपके गुण इतने अधिक महान हैं कि छद्मस्थ जीव उनकी स्तुति करते हुए थक जाता है, तथापि मैं आपके गुणों के प्रति सच्ची महिमा के कारण आपकी स्तुति करता हूँ। प्रभो! आपके अंतर में उदित हुआ केवलज्ञान सूर्य हानि-वृद्धि से रहित स्थिर है; वह सूर्य की भांति आतप देनेवाला नहीं, किन्तु आतप हरनेवाला है। आपकी वीतरागी सर्वज्ञता की अतुल्य महिमा का चिन्तन हमें राग से भिन्न ज्ञानस्वभावी आत्मा की अनुभूति कराता है... और सम्यक्त्व सहित महान आनन्द प्रकट होता है। प्रभो! आपकी यथार्थ प्रतीत्ति का यह महान फल है। धन्य सर्वज्ञदेव! आपका प्रभाव अद्वितीय है। स्वानुभूति के बिना आपके अचिन्त्य गुण चिन्तन में नहीं आ सकते। जब हम आपके अनन्त गुणों को ज्ञान में लेकर उनका चिन्तन करते हैं, तब हमारा ज्ञान वैसे आत्मगुणों में एकाग्र हो जाता है और विकल्पों से परे परमशान्त चैतन्यरस अनुभव में आता है। यही है आपका परमार्थ स्तवन!... यही है आपका पावन पंथ। जो इन्द्रियों को जीतकर जाने विशेष निजात्मा को। निश्चय...

भगवान महावीर स्वामी (59)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (59) इन्द्रभूति गौतम ज्यों ही मानस्तम्भ के निकट आये और प्रभु का वैभव देखा, त्यों ही उनका मान विगलित हो गया...। उन्होंने महावीर को देखा और देखते ही सर्वज्ञ की तथा जीव के अस्तित्व की प्रतीति हो गई। अहा! ऐसे वैभव में भी प्रभु वीतराग रूप से विराज रहे हैं! कैसी शांत है उनकी दृष्टि! उनकी आत्मा की दिव्यता का क्या कहना! अवश्य ही यह सर्वज्ञ हैं। गौतम को प्रभु के प्रति परम सम्मान का भाव जागृत हुआ और जीव के अस्तित्व सम्बन्धी उनकी सूक्ष्म शंकाएँ दूर हो गईं...। गर्व का स्थान ज्ञान ने लिया। निःशल्य हुए गौतम ने विनयपूर्वक अपने पाँच सौ शिष्यों सहित प्रभु का मार्ग अंगीकार किया और नतमस्तक होकर प्रभु की स्तुति की - मोक्षमार्गस्य नेतारं भेतारं कर्मभूतानाम्।  ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये॥ अहा! कैसा आनंददायी होगा वह दृश्य! वीर प्रभु की दिव्यवाणी खिरती होगी और गौतम गणधर उसे झेलते होंगे। प्रभु की वाणी सुनकर तत्क्षण गौतम-इन्द्रभूति चार ज्ञानधारी श्रुतकेवली हुए और बारह अंगरूप श्रुत की रचना द्वारा परमात्मा की वाणी का प्रसाद पंचमकाल के भव्य जीवों के लिये संग्...

भगवान महावीर स्वामी (58)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (58) इन्द्रभूति-गौतम के अतिरिक्त उनके दो भाई अग्निभूति और वायुभूति तथा शुचिदत्त, सुधर्म, मांडव्य, मौर्यपुत्र, अकम्पन, अचल, मेदार्य एवं प्रभास, - ऐसे कुल 11 गणधर महावीर प्रभु के थे। अब, वे गौतमस्वामी वीर प्रभु के समवसरण में अचानक कैसे आ पहुँचे? उसकी रोमांचक कथा सुनो। ऋजुकूला नदी के तट पर वीर प्रभु को केवलज्ञान हुआ, समवसरण की रचना हुई, किन्तु 66 दिन तक दिव्यध्वनि नहीं खिरी; विहार करते-करते प्रभु राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। छियासठ दिन बीत जाने पर भी भगवान का उपदेश क्यों नहीं हुआ? भगवान तो तीर्थंकर हैं, इसलिए दिव्यध्वनि के उपदेश द्वारा तीर्थप्रवर्तन हुए बिना नहीं रह सकता; किन्तु इतना विलम्ब क्यों?  भव्यजीव वाणी सुनने के लिये प्यासे चातक की भाँति आतुर हो रहे हैं। अन्त में इन्द्र का धैर्य समाप्त हुआ; उसने दिव्यज्ञान से देखा कि तीर्थकर देव के धर्मोपदेश के समय जिसकी अनिवार्य उपस्थिति होनी चाहिए, ऐसा कोई गणधर इस सभा में उपस्थित नहीं है। वह गणधर होने वाला जीव तो इस समय वेद-वेदान्त में पारंगत महापण्डित के रूप में गौतमग्राम (गुणावा नगरी) में बैठा है; ऐसा ...

भगवान महावीर स्वामी (57)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (57) उत्तम छाया तथा दिव्यप्रकाश द्वारा जो प्रभु की सेवा कर रहा था, वह अशोक वृक्ष आश्चर्य उत्पन्न करता था कि जड़ के बिना इतना विशाल वृक्ष कैसे बना!... और देखो, यह भी एक आश्चर्य की बात है कि वहाँ जगत में श्रेष्ठ सिंहासन होने पर भी प्रभु उस पर बैठते नहीं हैं; उससे ऊपर अन्तरिक्ष में बैठकर ऐसा प्रगट करते हैं कि यह रत्नसिंहासन कोई चैतन्यपद नहीं है; चैतन्य का पद तो अन्तर में अतिन्द्रिय ज्ञान-आनन्द द्वारा निर्मित है... उस पर प्रभु आरूढ़ हैं।  ज्ञानानन्द पद में विराजमान सर्वज्ञ महावीर को देखकर भव्यजीव भी ज्ञानानन्द में लीन हो जाते थे...और प्रभु की दिव्यवाणी का श्रवण करने के लिये अत्यन्त आतुर थे। प्रभु कैसा अद्भुत बोलेंगे! कैसा अचिन्त्य आत्मस्वरूप बतलायेंगे... प्रभु अभी बोलेंगे... प्रातःकाल बोलेंगे... मध्याह्न में बोलेंगे... सायंकाल बोलेंगे... कल तो अवश्य बोलेंगे!...। “बोलो, बोलो न वीतराग, अबोला क्यों हमसे लिया है?” यद्यपि वीरप्रभु अभी बोलते नहीं हैं, परन्तु मौन रहकर, अनिच्छा से गगनविहार करते हैं। विहार करते-करते वे राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। दिवसों पर दि...

भगवान महावीर स्वामी (56)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (56) सर्वज्ञ महावीर सर्वज्ञ प्रभु महावीर राग और इन्द्रियों के बिना ही परिपूर्ण सुख और ज्ञानरूप परिणमित हुए। अद्भुत थी वह दशा! इन्द्रियों विद्यमान होने पर भी मानो अविद्यमान हों - इस प्रकार प्रभु ने उनका सम्बन्ध सर्वथा छोड़ दिया। ‘भगवान भले अतीन्द्रिय हुए और हमारा साथ छोड़ दिया, फिर भी हमें प्रभु के साथ रहने में ही लाभ है’ - ऐसा मानकर वे जड़ इन्द्रियाँ अभी प्रभु का साथ नहीं छोड़ती थीं। प्रभु तो इन्द्रियों से निरपेक्ष रहकर स्वयमेव सुखी थे। पराधीन इन्द्रियसुखों से ऊब जा रहे जगत को प्रभु ने बता दिया कि आत्मा इन्द्रिय विषयों के बिना ही स्वाधीनरूप से सुखी है। ‘सुख आत्मा का स्वभाव है, इन्द्रियों का नहीं।’ शुद्धोपयोग के प्रभाव से आत्मा स्वयं परम सुखरूप परिणमता है। इन्द्रियतीत तथा लोकोत्तम ऐसे वे वीर भगवान केवलज्ञान होते ही पृथ्वी से ५००० धनुष ऊपर आकाश में विराजमान हुए। अब, पृथ्वी का अवलम्बन उनको नहीं रहा और अब वे फिर कभी पृथ्वी पर नहीं उतरेंगे। उनका शरीर छायारहित परम औदारिक हो गया; सब को देखनेवाले प्रभु स्वयं भी सर्व दिशाओं से दिखने लगे। प्रभु के केवलज्ञान का महोत...

भगवान महावीर स्वामी (55)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (55) ऋजुवालिका के किनारे : प्रभु को केवलज्ञान महावीर मुनिराज कौशाम्बी नगरी में चन्दना कुमारी के हाथ से पारणा करने के पश्चात् उद्यान में जाकर ध्यान मग्न हो गये। पश्चात वे सिद्धपद साधक सन्त विहार करते हुए अनन्त सिद्धों के सिद्धिधाम सम्मेदशिखर पधारे। सिद्धिधाम में वे भावी सिद्ध ध्यान में बैठे थे। वह दृश्य वास्तव में अद्भुत था। प्रभु के चरण स्पर्श से शिखरजी की पावन भूमि पुनः पावन हुई; दो तीर्थों का मिलन हुआ। एक भावतीर्थ और दूसरा स्थापना-तीर्थ; अथवा एक चेतनतीर्थ और दूसरा अचेतन-तीर्थ। हमें ऐसा लगेगा कि क्या भगवान तीर्थयात्रा हेतु आये होंगे! अरे, किन्तु प्रभु तो स्वयं ही चलते-फिरते जीवंत-तीर्थ हैं। शिखरसम्मेद तो स्थापना तीर्थ है, जबकि प्रभु तो स्वयं रत्नत्रयरूप परिणमित जीवन्त-तीर्थ हैं। मोक्षयात्रा तो सदा कर ही रहे हैं और साक्षात् रत्नत्रय तीर्थरूप परिणमित, ऐसे महात्माओं के प्रताप से ही भूमि-पर्वतों को तीर्थपना प्राप्त हुआ है। सम्मेदशिखर तीर्थ के निकट 15-20 किलोमीटर दूर जांभिक ग्राम के समीप ऋजुवालिका नदी बहती है; जैसा सुन्दर नाम है, वैसी ही सुन्दर नदी है। म...

भगवान महावीर स्वामी (54)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (54) मृगावती - तुम्हारी बात सत्य है बहिन! एक ओर तुम्हारा दासी जीवन देखकर शोक और दूसरी ओर तुम्हारे ही हाथ से वीर प्रभु का पारणा देखकर हर्ष,- इस प्रकार शोक और हर्ष दोनों एक साथ; इनमें से मैं शोक का वेदन करूँ या हर्ष का? नहीं; हर्ष और शोक दोनों से परे चैतन्यभाव ही आत्मा का सच्चा स्वरूप है और उसी में सच्चा सुख है, - यह बात स्पष्ट समझ में आती है। पाठक! इस घटना में चन्दना की बेड़ी टूट गई, वह दासत्व से छूट गई; परन्तु वास्तव में अकेली चन्दना ही नहीं, सारे भारतवर्ष से दासत्व के/गुलामी के बन्धन टूट गये... दासत्व प्रथा की जड़ उखड़ गई; नारियों के शील की महान प्रतिष्ठा हुई और भारत की नारियों में अपनी आत्मशक्ति का विश्वास पैदा हुआ। भारत की नारियों ने विश्व में उत्तम स्थान प्राप्त किया। अहा! अपने देश के पास जो श्रेष्ठ, सदाचार एवं अध्यात्म का अमूल्य वैभव है वह क्या दुनिया के किसी और देश के पास है?  24 तीर्थंकरों तथा समस्त चक्रवर्तियों को जन्म देने वाली इस भारत भूमि का गौरव विश्व में महान है... भारत में जन्म लेनेवाले हम सब गर्वपूर्वक कह सकते हैं कि ‘हम उस देश के वास...

भगवान महावीर स्वामी (53)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (53) सारी कौशाम्बी नगरी उमड़ पड़ी है, महावीर मुनि को पारणा करानेवाली उन चन्दना देवी के दर्शन करने तथा उन्हें अभिनन्दन देने। अहा! आज तक जिसे हम दासी समझते थे वह तो भगवती देवी निकली! उन्होंने वीर प्रभु को पारणा कराके अपनी कौशाम्बी नगरी का सम्मान बढ़ाया और उसे विश्व प्रसिद्ध कर दिया! अपनी नगरी में वीर प्रभु का आहार नहीं होने का जो कलंक लग रहा था उसे आज चन्दना ने आहारदान देकर मिटा दिया! बहुतों को तो आश्चर्य हो रहा था कि आहारदान और किसी के हाथ से नहीं, एक दासी के हाथ से हुआ! (अरे नगरजनों! कलंक तो तुम्हारी नगरी में चन्दना जैसी सतियों के दासीरूप में बिकने उसका था... प्रभु महावीर ने उस दासी के ही हाथ से पारणा करके वह कलंक मिटा दिया... दासी प्रथा दूर कर दी... मनुष्य, मनुष्य को बेचे, वह कलंक धो दिया; तथा यह भी प्रचारित किया कि धर्मसाधना में धनवान होने का कोई महत्व नहीं है... सद्गुणों का महत्व है।) नागरिकों के मन में प्रश्न उठने लगे कि यह चन्दना देवी है कौन? कहाँ की है? दिखने में तो पुण्यात्मा लगती है... इस प्रकार सब उनका परिचय प्राप्त करने को आतुर थे... इतने में र...

भगवान महावीर स्वामी (52)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (52) मुनिराज महावीर प्रतिदिन नगरी में पधारते और बिना आहार किये लौट जाते... उन प्रभु ने आज आहार ग्रहण किया....... यह समाचार नगरी में फैलते ही लोग घर से दौड़ते हुए बाहर आने लगे कि चलो! उस भाग्यशाली आत्मा के दर्शन करें और अभिनन्दन दें, जिसके हाथ से यह महान कार्य हुआ है।  लोगों ने जब देखा कि वृषभदत्त सेठ की एक दासी के हाथ से प्रभु ने आहार लिया है, तब वे आश्चर्यचकित हो गये... अरे! लोगों को क्या खबर थी कि वह दासी नहीं, अपितु प्रभु महावीर की मौसी है... उनकी श्रेष्ठ उपासिका है। प्रभु को पारणा कराके चन्दना धन्य हो गई... आहार ग्रहण करके वे वीर योगीराज तो ऐसे सहजभाव से वन की ओर गमन कर गये, मानो कुछ भी नहीं हुआ हो और वहाँ जाकर आत्मध्यान में लीन हो गये। जब तक प्रभु जाते हुए दिखाई देते, तब तक चन्दना उन्हें टकटकी बाँधे देखती रही... आकाश में देव और पृथ्वी पर जन-समूह उन्हें धन्यवाद देकर उनकी प्रशंसा कर रहे थे... किंतु चन्दना तो सारे जगत को भूलकर, समस्त परभावों से परे, चैतन्यतत्त्व के निर्विकल्प ध्यान में शांति-पूर्वक बैठी थी... उसकी गंभीरता अद्भुत थी। इधर वृषभदत्त...

भगवान महावीर स्वामी (51)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (51) प्रभु महावीर पधारे कौशाम्बी नगरी में सती चन्दना को बंधनमुक्त करने। पाँच मास और पच्चीस दिन के उपवासी प्रभु महावीर आहार हेतु नगर में पधारे हैं। उनका शरीर दुर्बल नहीं हुआ, उनकी मुद्रा निस्तेज नहीं हुई; अपितु तप के दिव्य तेज से चमक रही हैं; उनके चैतन्य का प्रतपन अनोखा है। ऐसे प्रभु वीर मुनिराज वृषभदत्त सेठ के घर की ओर आ रहे हैं... चन्दना ने दूर से प्रभु को अपने घर की ओर आते देखा तो उसका रोम-रोम प्रदेश-प्रदेश हर्षातिरेक से... भक्ति से तथा आश्चर्य से पुलकित हो उठा... ‘पधारो प्रभु पधारो!’ प्रभु निकट आये और हर्षविभोर चन्दना प्रभु को आहार दान देने के लिये आगे बढ़ी... आश्चर्य! उसकी बेड़ियाँ खुल गईं, सिर भी पूर्ववत सुन्दर केशों से सुसज्जित हो गया- भा रही थी भावना आहार देने के लिये। बेड़ियाँ खुल गई उसकी वीर के शुभ दर्श से। सारा वातावरण एकदम बदल गया। बन्धन मुक्त चन्दना का लक्ष्य तो प्रभु की ओर था। बन्धन था और टूट गया, उसका भी लक्ष्य उसे नहीं है... जिस प्रकार स्वानुभूति के काल में मुमुक्षु साधक को बन्ध-मोक्ष का लक्ष नहीं रहता, तथापि बन्धन टूट जाते हैं; आत्मदर्शन म...

भगवान महावीर स्वामी (50)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (50) अब सुभद्रा सेठानी भयंकर वैरबुद्धि से चन्दना को अपमानित करने तथा बदला लेने को तत्पर है।  एक दिन जब सेठ नगर से बाहर गये हुए थे, तब सेठानी ने चन्दना को एकान्त में बुलाकर उसके सुन्दर केश काटकर सिर मुँडवा दिया। अरे! अत्यन्त रूपवती को कुरूप बना देने का प्रयत्न किया... इतने से उसका क्रोध शांत नहीं हुआ तो चन्दना के हाथ-पाँव में बेड़ी डालकर उसे एक अँधेरी कोठरी में बन्द कर दिया; ऊपर से तरह-तरह के कटु वचन कहे और भोजन भी नहीं दिया।  अरे! सिर मुँडवाकर जिसे बेड़ी पहिना दी गई हो, उस सुकुमारी निर्दाेष स्वानुभवी राजकुमारी का उस समय क्या हाल होगा? आँखों से आँसू बह रहे हैं; मन में वीरनाथ प्रभु का स्मरण हो रहा है। उसे विश्वास है कि मेरे महावीर मुझे संकट से उबारने अवश्य आएँगे... जिन महावीर ने मुझे सम्यक्त्व देकर भव बंधन से मुक्त किया है, वे ही प्रभु मुझे दर्शन देकर इन बेड़ियों से भी छुड़ाएँगे। इस प्रकार वीर प्रभु के स्मरण में लीन होकर वह भूख-प्यास को भी भूल जाती थी... क्षणभर तो उसकी आत्मा मुक्तरूप से किसी देहातीत अगम्यभाव में निमग्न हो जाती थी। ऐसी स्थिति में ए...

भगवान महावीर स्वामी (49)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (49) दासी के रूप में बिक कर भी चन्दनबाला स्वयमेव एक सज्जन जैन श्रावक के घर में आ गई है, यह जानकर चन्दना को सन्तोष हुआ; उसे इतनी प्रसन्नता हुई मानो वह महावीर की मंगल छाया में ही आ गई हो!... उसका हृदय पुकार उठा - ‘जैनधर्म से रहित चक्रवर्ती पद भी अच्छा नहीं है। यह भले ही दासत्व का जीवन हो; परन्तु जैनधर्म में वास है, तो वह भी अच्छा है।’ ऐसी कठिन परिस्थिति में भी उसे वीरकुमार के साथ हुई धर्मचर्चा का स्मरण हुआ और वह अपूर्व क्षण याद आया, जब उसने वीरकुमार के मार्गदर्शन से स्वयं निर्विकार आत्मानुभूति पूर्वक सम्यग्दर्शन प्राप्त किया था।  प्रतिकूल प्रसंगों में घिर जाने से वह आत्मा को भूल जाये, ऐसी कोई साधारण स्त्री नहीं है; वह तो चैतन्यतत्त्व की ज्ञाता, मोक्ष की साधिका है। ऐसी प्रतिकूलता में भी ज्ञानचेतना क्षीण नहीं होती है, पृथक् की पृथक् ही रहती है। राजपुत्रीपना या दासीपना, सत्कार या तिरस्कार, इन सब से चन्दना के चैतन्य की प्रभा भिन्न की भिन्न रहती है। वाह चन्दना!... धन्य है! तुम्हारी चैतन्य प्रभा! “वाह रे कर्मों का उदय!” एक मुमुक्षु धर्मात्मा राजकुमारी वर...

भगवान महावीर स्वामी (48)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (48) चन्दनबाला भगवान महावीर की मौसी चन्दनबाला भी महावीर की भांति विवाह न करने का निश्चय करके वैराग्यमय आत्मभावना में जीवन व्यतीत करती थी।  एक बार चन्दना कुमारी अपनी सहेलियों के साथ नगर के बाहर उद्यान में क्रीड़ा कर रही थी कि उसके लावण्यमय यौवन से आकर्षित होकर एक विद्याधर ने उसका अपहरण कर लिया; परन्तु बाद में अपनी पत्नी के भय से उसने चन्दना को कौशाम्बी के वन में छोड़ दिया। कहाँ वैशाली और कहाँ कौशाम्बी! वन के भील सरदार ने उसे पकड़ लिया और एक वेश्या को सौंप दिया। एक के बाद एक होनेवाली इन अप्रिय घटनाओं से चन्दना व्याकुल हो गई कि अरे! यह क्या हो रहा है?... ऐसी अद्भुत सुन्दरी को देखकर एक वेश्या विचारने लगी कि कौशाम्बी के नागरिकों ने ऐसी रूपवती स्त्री कभी देखी नहीं है। इसे रूप के बाज़ार में बेचकर मैं अच्छा धन कमाऊँगी। - ऐसा सोचकर वह स्त्री चन्दनबाला को वेश्याओं के बाज़ार में बेचने ले गई। अरे रे! इस संसार में पुण्य-पाप की कैसी विचित्रता है कि एक सती नारी वेश्या के हाथों बिक रही है! (किन्तु पाठकगण! तुम घबराना नहीं... क्योंकि ऐसे पुण्य-पाप के उदय में भी अपनी आत्मा को ...

भगवान महावीर स्वामी (47)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (47) तप कल्याणक वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्द्धमान और महावीर - ऐसे पंच-मंगल नामधारी प्रभु का चित्त तो पंचमहाव्रत की साधना हेतु पंचमभाव में ही लगा था। अहा! बचपन में भी जिनके अद्भुत शौर्य के समक्ष सर्प भी शरण में आ गया था, तो मुनिदशा में विद्यमान उन तीर्थंकर देव की परम शान्त, गंभीर मुद्रा के समक्ष चण्डकौशिक जैसे विषधर नाग भी सहम जाएं, तो उसमें आश्चर्य क्या है? वीरनाथ की वीतरागी शान्ति के सम्मुख चण्डकौशिक का प्रचण्ड आक्रोश कैसे टिक सकता था?  अरे! सामान्य लब्धिधारी मुनिराज के सम्मुख भी क्रूर पशु अपनी क्रूरता को छोड़कर शान्त हो जाते हैं, तब फिर यह तो तीर्थंकर-मुनिराज वर्धमान हैं, उनकी आश्चर्यजनक लब्धियाँ एवं शान्ति के प्रभाव की तो बात ही क्या? जिनके पास क्रूर से क्रूर जीव भी ऐसे शान्त हो जाते हैं कि वे दूसरे जीवों का भी घात नहीं करते, सिंह हिरन को नहीं मारता, नेवला सर्प को नहीं छेड़ता; तो फिर उन्हें स्वयं को सर्प डसे या कोई कानों में कीलें ठोक दे - यह बात ही कहाँ रही? दूसरों की बात और है, परन्तु यह तो तीर्थंकर महात्मा हैं, उनके ऐसा कुयोग कभी नहीं बनता। जैनध...

भगवान महावीर स्वामी (46)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (46) भगवान महावीर : मुनिदशा में आत्मसाधना मुनि होकर आत्मा की निर्विकल्प आनन्द दशा में झूलते-झूलते भगवान ने साढ़े बारह वर्ष तक मौन रहकर आत्मसाधना की। मात्र अपने एक स्वभाव में ही अग्र तथा अन्य समस्त द्रव्यों से अत्यन्त निरपेक्ष - ऐसी आत्मसाधना करते-करते महावीर प्रभु मोक्षमार्ग में विचर रहे हैं, और बोले बिना भी वीतराग मोक्षमार्ग का अर्थबोध करा रहे हैं। दीक्षा के पश्चात् दो दिन के उपवास हुए और तीसरे दिन कुलपाक नगरी के राजा ने भक्ति पूर्वक आहारदान देकर वीरनाथ मुनिराज को पारणा कराया। आहारदान के प्रभाव से वहाँ देवों ने रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किये। अहा! तीर्थंकर की आत्मा जैसा सर्वोत्तम आश्चर्य जहाँ विद्यमान हो, वहाँ जगत के अन्य छोटे-मोटे आश्चर्य आयें, वह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतः मोक्ष की साधना में ही जिनका चित्त लगा है, ऐसे उन महात्मा को वे पाँच आश्चर्यकारी घटनाएँ किंचित आश्चर्यचकित नहीं कर सकीं।  अहा! आश्चर्यकारी चैतन्यतत्त्व की साधना में लीन मुमुक्षु को जगत की कौन-सी वस्तु आश्चर्य में डाल सकेगी; उन मोक्षसाधक महात्मा का कितना वर्णन करें। ह...

भगवान महावीर स्वामी (45)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (45) कोई जीव जिस वस्तु का त्याग करे, उस से ऊँची वस्तु का ग्रहण करना यदि उसे आता हो, तभी वह उसका सच्चा त्याग कर सकता है। पुण्यराग का सच्चा त्याग वही कर सकता है जिसे वीतरागभाव ग्रहण करना आता हो। त्याग लाभदायक होना चाहिए, हानिकारक नहीं। जीव जो त्यागे उसकी अपेक्षा उच्च वस्तु, उच्च भाव प्राप्त करे, तभी उसका वह त्याग लाभदायी कहा जाएगा। भगवान महावीर का त्याग ऐसा था कि उन्होंने जिन हेयतत्त्वों को छोड़ा, उनसे विशेष उपादेय तत्वों को ग्रहण किया। उनकी शुद्धता की श्रेणी का क्या कहना, जब वे निर्विकल्पता के महान् आनन्द में डूबते थे, तब उनके शुद्धोपयोग की प्रचण्डता देखकर बेचारी शेष चार संज्वलन कषाय भी इस प्रकार चुपचाप होकर छिप जाती थीं, कि कषाय जीवित है या मृत- यह जानना भी कठिन लगता था, क्योंकि उस समय उनकी कोई प्रवृत्ति दिखाई नहीं देती थी। इस प्रकार एक ओर प्रभु महावीर कषायों को जीत रहे थे, तब दूसरी ओर त्रिशला माता भी वीर के वीतराग चारित्र का अनुमोदन करके अपने मोहबन्धन को ढीला कर रही थीं।  ‘अरे रे! राजभवन में जिसका लालन-पालन हुआ है, ऐसा मेरा पुत्र वन-जंगल में कैसे ...

भगवान महावीर स्वामी (44)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (44) दीक्षा कल्याणक महोत्सव अभेद आत्मानुभूति में लीन उन श्रमण-भगवंत महावीर को वन्दन हो! वैशाली के नागरिक अपने प्रिय राजपुत्र को ऐसी वीतरागदशा में देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुए। वे न तो हर्ष कर सके और न शोक! बस, मानो हर्ष-शोकातीत ऐसी वीतरागता ही करने योग्य है - ऐसा उस कल्याणक प्रसंग का वातावरण था। हर्ष और शोक के बिना भी मोक्ष का महोत्सव मनाया जा सकता है - ऐसा प्रभु का यह दीक्षा कल्याणक महोत्सव घोषित करता था। उन चैतन्यवीर को वीतरागदशा में देखकर धर्मज्ञों के अंतर में चारित्र की लहरें उठती थीं। मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के संध्याकाल स्वयं दीक्षित होकर महावीर मुनिराज षष्ठी के उपवास का तप धारण करके अभ्रमभाव से चैतन्यध्यान में लीन हो गये। अहा, दो रत्न से वृद्धिगत होकर भगवान त्रिरत्नवंत हुए; तीन ज्ञान से चार ज्ञानवंत हुए। अनेक महान लब्धियाँ सेवा करने आ गईं। उनकी अतिन्द्रिय ज्ञानधारा तो केवलज्ञान के साथ केलि करने लगी। केवलज्ञान ने उसी समय अपने ज्येष्ठ पुत्र समान मनःपर्ययज्ञान को भेजकर शीघ्र ही अपने आगमन की पूर्व सूचना दे दी। परन्तु प्रभु का लक्ष्य उस मनःपर्यय की ओर...

भगवान महावीर स्वामी (43)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (43)    आज पूरी रात राजकुमार वर्द्धमान चैतन्य की अनोखी धुन में थे; निद्रा का तो नाम ही नहीं था। उपयोग बार-बार चैतन्य की अनुभूति में स्थिर हो जाता था। परभावों से थक कर विमुख हुआ उनका उपयोग अब आनन्दमय निजघर में ही सम्पूर्ण रूप से स्थिर रहना चाहता था। तीस वर्ष के राजकुमार का चित्त आज अचानक ही संसार से विरक्त हो गया है; मोक्षार्थी जीव प्रशम हेतु किसी बाह्य कारणों को नहीं ढूँढ़ता। प्रशम तो उसके अन्तर से स्वयमेव स्फुरित होता है। आज प्रातःकाल महावीर ने सिद्धों का स्मरण करके आत्मा का ध्यान किया। आज उनके वैराग्य की धारा कोई अप्रतिम थी। विशुद्धता में वृद्धि हो रही है। उपयोग क्षणभर में अन्तर्मुख निर्विकल्प हो जाता है और पुनः बाहर आ जाता है, परन्तु बाहर में उसे चैन नहीं पड़ता। वह सर्वत्र से छूटकर, विभावरूप परदेश से लौटकर स्वभाव रूप स्वदेश में स्थिर रहना चाहता है। बारम्बार ऐसी दशा में झूलते हुए प्रभु के मतिज्ञान में सहसा कोई विशिष्ट निर्मलता झलक उठी, उनको जातिस्मरण हुआ। स्वर्गलोक के दिव्य दृश्य देखे, चक्रवर्ती का वैभव देखा, सिंह देखा, सम्यक्त्व का बोध देते हुए मु...

भगवान महावीर स्वामी (42)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (42)  भगवान महावीर : वैराग्य और दीक्षा (मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी) वीरकुमार चैतन्य-उद्यान की प्रशंसा कर रहे थे। इतने में एक कुमार ने सुन्दर पुष्प लाकर आदर सहित वीरकुमार के चरणों में रख दिया। सब लोग आनन्दपूर्वक उसे देख रहे थे। तब वीरकुमार ने गम्भीरता से कहा - बन्धु! यह पुष्प वृक्ष की डाल पर जैसी शोभा दे रहा था, वैसी अब नहीं दे रहा। उस की शोभा नष्ट हो गई है। वह माता से बिछुड़े बालक की भांति मुरझा रहा है। पुष्प को उसकी डाली से पृथक् करना तो वृक्ष और पुष्प दोनों की सुन्दरता को नष्ट कर देना है। देखो! यह कैसा शोकमग्न दिखाई दे रहा है। अपनी प्रसन्नता के लिए  हम दूसरे जीवों का सौन्दर्य नष्ट कर दें, वह क्या उचित लगता है? दूसरों को कष्ट दिये बिना हम आनन्द प्रमोद करें, वही उचित है। इस प्रकार सहज रूप से अहिंसादि की प्रेरणा करके वीरकुमार वीतरागता फैला रहे थे। धन्य उनका जीवन! गृहवास में भी धर्मात्मा राजपुत्र का जीवन अलौकिक था। वे गृहवासी भगवान बार-बार सामायिक का प्रयोग भी करते थे। सामायिक की स्थिति में वे इस प्रकार मन की एकाग्रतापूर्वक धर्मध्यान रूप आत्मचिंतन करते थे...