छहढाला(59)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(59) छठवीं ढाल का लक्षण-संग्रह अंतरंग तपः शुभाशुभ इच्छाओं के निरोधपूर्वक आत्मा में निर्मल ज्ञान आनंद के अनुभव से अखण्डित प्रतापवन्त रहना, निस्तरंग चैैतन्यरूप से शोभित होना। अनुभवः स्वोन्मुख हुए ज्ञान और सुख का रसास्वादन। वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावे विश्राम, रस स्वादन सुख ऊपजै, अनुभव याको नाम। आवश्यकः मुनियों को अवश्य करने योग्य स्ववश शुद्ध आचरण। कायगुप्तिः काया की ओर उपयोग न जाकर आत्मा में ही लीनता। गुप्तिः मन, वचन, काया की ओर उपयोग की प्रवृत्ति को भलीभाँति आत्मभानपूर्वक रो कना अर्थात् आत्मा में ही लीनता होना सो गुप्ति है। तप - स्वरूपविश्रान्त, निस्तरंगरूप से निज शुद्धता प्रतापवन्त शोभायमान होना, सो तप है। उसमें जितनी शुभाशुभ इच्छाओं का निरोध होकर शुद्धता बढ़ती है, वह तप है, अन्य बारह भेद तो व्यवहार (उपचार) तप के हैं। ध्यान - सर्व विकल्पों को छोड़कर अपने ज्ञान को लक्ष में करना, सो ध्यान है। नय - वस्तु के एक अंश को मुख्य करके जाने वह नय है और वह उपयोगात्मक है। सम्यक् श्रुतज्ञानप्रमाण का अंग, वह नय है। निक्षेप - नयज्ञान द्वारा ब...