तीसरी छहढाला(20)
अ ध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(20) (सुबोध टीका) तीसरी निकल परमात्मा का लक्षण तथा परमात्मा के ध्यान का उपदेश ज्ञानशरीरी त्रिविध कर्ममल वर्जित सिद्ध महन्ता, ते हैं निकल अमल परमातम भोगें शर्म अनन्ता। बहिरातमता हेय जानि तजि, अन्तर आतम हूजै, परमातमको ध्यान निरन्तर जो नित आनन्द पूजै ॥ ६ ॥ अन्वयार्थ : (ज्ञानशरीरी) ज्ञानमात्र जिनका शरीर है ऐसे (त्रिविध) ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म, रागादि भावकर्म तथा औदारिक शरीरादि नोकर्म, ऐसे तीन प्रकार के (कर्ममल) कर्मरूपी मैल से (वर्जित) रहित, (अमल) निर्मल और (महन्ता) महान (सिद्ध) सिद्ध परमेष्ठी (निकल) निकल (परमातम) परमात्मा हैं। वे (अनन्त) अपरिमित (शर्म) सुख (भोग) भोगते हैं। इन तीनों में (बहिरातमता) बहिरात्मपने को (हेय) छोड़ने योग्य(जानि ) जानकर और (तजि ) उसे छोड़कर (अन्तर आतम) अन्तरात्मा (हूजै) होना चाहिये और (निरन्तर) सदा (परमातमको) निज परमात्मपद का (ध्यान) ध्यान करना चाहिए; (जो) जिसके द्वारा (नित) अर्थात् अनन्त ( आनन्द) आनन्द (पूजै) प्राप्त किया जाता है। भावार्थः औदारिक आदि शरीर रहित शुद्ध ज्ञानमय द्रव्य-भाव-नोकर्म रहित, न...