भगवान महावीर स्वामी (38)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (38) एक ओर बालक महावीर...., दूसरी ओर क्रोधाग्नि में दहकता मदोन्मत्त हाथी। बालक महावीर धीर-गंभीर चाल से उस ओर बढ़ने लगे, जिधर से हाथी दौड़ता आ रहा था। वे हाथी के सामने आकर उस पर दृष्टि स्थिर करके खड़े हो गए और क्षण दो क्षण शांत दृष्टि से हाथी को देखते रहे। अहा! कैसी शान्तरस भरी थी वह अमी दृष्टि! मानो उससे अमृत झर रहा था। उस दृष्टि द्वारा महावीर कह रहे थे कि अरे गजराज! यह पागलपन छोड़! लोग तेरे पागलपन का कारण नहीं जानते, किन्तु मैं जानता हूँ। अरे! ये चार गति के दुःख और उनमें यह तिर्यंच गति की वेदना.... उससे तू अकुला गया है और छूटने को अधीर हुआ है.... परन्तु धैर्य रख, शांत हो! उद्वेग करने से यह दुःख दूर नहीं होगा। अहा! हाथी तो मानो भगवान के नेत्रों से झरते हुए शान्त रस के स्रोत का पान कर रहा हो, इस प्रकार टकटकी बाँधकर प्रभु की ओर देखता ही रह गया। आसपास के वातावरण को वह भूल गया। वाह! कैसी शान्ति है इन कुमार के मुखमण्डल पर! मुझे भी ऐसी शान्ति प्राप्त हो जाए, तो कितना अच्छा हो! ऐसा विचारते हुए वह हाथी बिल्कुल शान्त हो गया। लोगों ने यह चमत्कार देखा; परन्तु वे समझ...