आचार्य वंदना
आचार्य वंदना (प्रवचन से पहले प्राकृत भाषा में की जाने वाली आचार्य/सिद्ध/श्रुत भक्ति का अर्थ - प्रातःकालीन की जाए, तो पौर्वाह्णिक और दोपहर के बाद सायंकालीन की जाए, तो अपराह्णिक कहा जाता है।) सिद्ध भक्ति नमोऽस्तु पौर्वाह्णिक (अपराह्णिक) आचार्य-वंदना-क्रियायां पूर्वाचार्यनुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वंदना-स्तव-समेतं श्री सिद्धभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम्। शब्दार्थ : हे आचार्य देव! (नमोऽस्तु) नमस्कार हो (पौर्वाह्णिक) प्रातःकालीन (अपराह्णिक) सायंकालीन (आचार्य-वंदना-क्रियायां) आचार्य वंदना की क्रिया में (पूर्वाचार्यनुक्रमेण) पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार (सकल-कर्म-क्षयार्थं) सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए (भावपूजा-वंदना- स्तव-समेत) भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित (श्री सिद्धभक्ति-कायोत्सर्गं) श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्ग को (अहम्) मैं (करोम्यहम्) करता हूँ। अर्थ- हे आचार्य देव! नमस्कार हो प्रातःकालीन/ सायंकालीन आचार्य वंदना की क्रिया में पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्...