छहढाला (2)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला (2) (सुबोध टीका) ग्रंथ रचना का उद्देश्य और जीवों की इच्छा जे त्रिभुवन में जीव अनन्त, सुख चाहें दुखतैं भयवंत। तातैं दुखहारी सुखकार, कहैं सीख गुरु करुणा धार।।२।। अन्वयार्थ : (त्रिभुवन में) तीनों लोकों में (जे) जो (अनन्त) अनन्त (जीव) प्राणी (हैं वे) (सुख) सुख को (चाहें) इच्छा करते हैं। (दुखते) दुःख से (भयवंत) डरते हैं, (ताते) इसलिए (गुरु) आचार्य (करुणा) दया (धार) करके (दुखहारि) दुःखों को दूर करनेवाली तथा (सुखकार) सुख को देनेवाली (सीख) शिक्षा (कहें) कहते हैं। भावार्थ : तीन लोकों में जो अनन्त जीव (प्राणी) हैं, वे दुःख से डरते हैं और सुख को चाहते हैं। इसलिए आचार्य दुःख का नाश करनेवाली तथा सुख देनेवाली शिक्षा देते हैं।२। गुरुशिक्षा सुनने का आदेश तथा संसार-परिभ्रमण का कारण ताहि सुनो भवि मन थिर आन, जो चाहो अपनो कल्यान; मोह महामद पियो अनादि, भूल आपको भरमत वादि।।३।। अन्वयार्थ : (भवि) हे भव्य जीवों! (जो) यदि (अपनो) अपना (कल्यान) हित (चाहो) चाहते हो तो (ताहि) गुरु की वह शिक्षा (मन) मन को (थिर) स्थिर (आन) करके (सुनो) सुनो कि इस संसार में प्रत्येक ...