छठवीं ढाल (56)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(56) सिद्धदशा का (सिद्ध स्वरूप) का वर्णन पुनि घाति शेष अघाति विधि, छिनमांहि अष्टम भू वसैं; वसु कर्म विनसैं सुगुण वसु, सम्यक्त्व आदिक सब लसैं। संसार खार अपार पारावार तरि तीरहि गये, अविकार अकल अरूप शुचि, चिद्रूप अविनाशी भये ॥१२॥ अन्वयार्थ - (पुनि) केवलज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् (शेष) आठ कर्मों का (विनसैं) नाश हो जाने से (सम्यक्त्व आदिक) शेष चार (अघाति विधि) अघातिया कर्मों का (घाति) नाश करके (छिनमांहि) कुछ ही समय में (अष्टम भू) आठवीं पृथ्वी- ईषत्प्राग्भार - मोक्ष क्षेत्र में (वसैं) निवास करते हैं; उनको (वसु कर्म) सम्यक्त्वादि (सब) समस्त (वसु सुगुण) आठ मुख्य गुण (लसैं) शोभायमान होते हैं। ऐसे सिद्ध होनेवाले मुक्तात्मा (संसार खार अपार पारावार) संसाररूपी खारे तथा अगाध समुद्र को (तरि) पार करके (तीरहि) किनारे पर (गये) पहुंच जाते हैं और (अविकार) विकाररहित, (अकल) शरीर रहित, (अरूप) रूपरहित, (शुचि) शुद्ध-निर्दोष (चिद्रूप) दर्शन-ज्ञान-चेतना स्वरूप तथा (अविनाशी) नित्य-स्थायी (भये) होते हैं। भावार्थ - अरिहन्त दशा अथवा केवलज्ञान प्राप्त करने के प...