जिन मंदिर दर्शन
जिन मंदिर दर्शन बहु पुण्य उदय मम आयो, सुन्दर जिन भवन लखायो। भव्यों को सुख का कारण,करता भव ताप निवारण। जो समवशरण सम राजे, जिन सम जिन चैत्य विराजे, जहाँ गन्ध कुटी सम वेदी, सिंहासन छत्र सफेदी। शशि द्युति से अधिक उजाले, जहाँ यक्ष चँवर बहु ढोरें, अति उन्नत शिखर बनी है, जिस पर शुभ ध्वजा लगी है।। फहरे दे शुभ संदेशा, यहाँ दुःख का नहीं अंदेशा, हे सुख इच्छुक यहाँ आओ, दुःख कारण पाप भगाओ। यहाँ खुद ही भाव बदलते, सब बहुविधि पुण्य सु करते, सुन्दर स्तोत्र उच्चारें, ध्वनि गगन माहिं गुंजारें, कोई शुभ पूजन करके, कोई ध्यान प्रभु का धर के, जग की सब सुधि बुधि खोते, निज सुख में मग्न सु होते।। जहाँ शास्त्र सभा है होती, जिससे मिथ्यामति भगती, कोई लीन धर्म चर्चा में, देखत उठतीं शुभ लहरें। मति मार बाढे संसार, यह वृक्ष है छायादार, भव वन में पथिक भटकते, अकुलाते धैर्य न धरते, उन सब को आश्रयदाता, जिन मंदिर जग में त्राता, प्रभु हर्षं प्रसंग महा है, जिन मंदिर दर्श मिला है।। सद् देव शास्त्र गुरु पाए, रोमांच काय में आए, शुभ भाव हृदय में जागा, अज्ञान प्रमाद सु भागा। अब मैं चाहूँ जगदीश, निज चैत्य बनाऊँ ईश, परिणति करूँ...