भगवान महावीर स्वामी (47)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (47) तप कल्याणक वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्द्धमान और महावीर - ऐसे पंच-मंगल नामधारी प्रभु का चित्त तो पंचमहाव्रत की साधना हेतु पंचमभाव में ही लगा था। अहा! बचपन में भी जिनके अद्भुत शौर्य के समक्ष सर्प भी शरण में आ गया था, तो मुनिदशा में विद्यमान उन तीर्थंकर देव की परम शान्त, गंभीर मुद्रा के समक्ष चण्डकौशिक जैसे विषधर नाग भी सहम जाएं, तो उसमें आश्चर्य क्या है? वीरनाथ की वीतरागी शान्ति के सम्मुख चण्डकौशिक का प्रचण्ड आक्रोश कैसे टिक सकता था? अरे! सामान्य लब्धिधारी मुनिराज के सम्मुख भी क्रूर पशु अपनी क्रूरता को छोड़कर शान्त हो जाते हैं, तब फिर यह तो तीर्थंकर-मुनिराज वर्धमान हैं, उनकी आश्चर्यजनक लब्धियाँ एवं शान्ति के प्रभाव की तो बात ही क्या? जिनके पास क्रूर से क्रूर जीव भी ऐसे शान्त हो जाते हैं कि वे दूसरे जीवों का भी घात नहीं करते, सिंह हिरन को नहीं मारता, नेवला सर्प को नहीं छेड़ता; तो फिर उन्हें स्वयं को सर्प डसे या कोई कानों में कीलें ठोक दे - यह बात ही कहाँ रही? दूसरों की बात और है, परन्तु यह तो तीर्थंकर महात्मा हैं, उनके ऐसा कुयोग कभी नहीं बनता। जैनध...