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जीवन है पानी की बूंद (71-75)

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  जीवन है पानी की बूंद (71-75) रचयिता व प्रणेता : परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे। होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥ कुछ भी नहीं कमायेगा, आगे फिर क्या खायेगा, गम का बोझ उठायेगा-2 भक्ति कर कुछ कमा यहां, व्यर्थ समय मत गंवा यहां, निकले जो वक्त, हो ऽऽ ...., निकले जो वक्त वो लौट न आये रे.... जीवन (71) कब तक तुम झुठलाओगे, पर में मन बहलाओगे, इक दिन ठोकर खाओगे-2 ठोकर को मारे ठोकर, वो ही बनता तीर्थंकर, ऊंचे ख़्वाबों को, हो ऽऽ ...., ऊंचे ख़्वाबों को तुम दिल में लाओ रे.... जीवन (72) धन हाथों का मैल अरे, सब किस्मत का खेल अरे, धन से मिलती जेल अरे-2, छल से मिले नहीं ज़्यादा, ये ऋषियों ने बतलाया, फिर भी इंसा को, हो ऽऽ ..... फिर भी इंसा को ये समझ न आये रे.... जीवन (73) बीज गमों के बोते हैं, सुख पाने को रोते हैं, ऊंचे ख़्वाब संजोते हैं-2 ऊँची भरे उड़ान यहाँ, गिरने का फिर काम कहाँ, दिल हो वैसा ही, हो ऽऽ ..... दिल हो वैसा ही ये मन हो जाये रे.... जीवन (74) किस की ख़ातिर खाता तू, खाता यहाँ बनाता तू, वक़्...