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आचार्य वंदना

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  आचार्य वंदना   (प्रवचन से पहले प्राकृत भाषा में की जाने वाली आचार्य/सिद्ध/श्रुत भक्ति का अर्थ - प्रातःकालीन की जाए, तो पौर्वाह्णिक और दोपहर के बाद सायंकालीन की जाए, तो अपराह्णिक कहा जाता है।) सिद्ध भक्ति नमोऽस्तु पौर्वाह्णिक (अपराह्णिक) आचार्य-वंदना-क्रियायां पूर्वाचार्यनुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वंदना-स्तव-समेतं श्री सिद्धभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम्। शब्दार्थ : हे आचार्य देव! (नमोऽस्तु) नमस्कार हो (पौर्वाह्णिक) प्रातःकालीन (अपराह्णिक) सायंकालीन (आचार्य-वंदना-क्रियायां) आचार्य वंदना की क्रिया में (पूर्वाचार्यनुक्रमेण) पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार (सकल-कर्म-क्षयार्थं) सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए (भावपूजा-वंदना- स्तव-समेत) भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित (श्री सिद्धभक्ति-कायोत्सर्गं) श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्ग को (अहम्) मैं (करोम्यहम्) करता हूँ। अर्थ- हे आचार्य देव! नमस्कार हो प्रातःकालीन/ सायंकालीन आचार्य वंदना की क्रिया में पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्...

क्या आप जानते हैं?

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  क्या आप जानते हैं? विहरमान बीस तीर्थंकर और उनकी 20 विशेषतायें - 1️⃣भरत ऐरावत क्षेत्र की तरह महाविदेह क्षेत्र में एक के बाद एक ऐसे चौबीस तीर्थंकरों की व्यवस्था नहीं है। महाविदेह क्षेत्र की पुण्यवानी अनंतानंत और अद्भुत है. वहां सदाकाल बीस तीर्थंकर विचरते रहते हैं, उनके नाम भी हमेशा एक सरीखे ही रहते हैं; इसलिए उन्हें जिनका कभी भी वियोग न हो, ऐसे विहरमान बीस तीर्थंकर भी कहते हैं। 2️⃣ महाविदेह क्षेत्र में कभी भी बीस से कम तीर्थंकर नहीं होते हैं। अतः उन्हें जयवंता जगदीश भी कहते हैं, क्योकि वे सभी साक्षात् परमात्म स्वरुप में विद्यमान रहते हैं। 3️⃣ इस तरह महाविदेह क्षेत्र में तीर्थंकरों का कभी भी अभाव नहीं होता है। 4️⃣ महाविदेह क्षेत्र का समय सदाकाल एक-सा ही रहता है और वहां सदैव चतुर्थ काल के प्रारम्भ काल के समान समय रहता है। 5️⃣ महाविदेह क्षेत्र के मध्य के अतिरिक्त पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण इस तरह चार विभाग करने से पाँचों महाविदेहों में 5×4=20 विभाग हुए। एक विभाग में एक; ऐसे बीस तीर्थंकर सदा विचरते हैं।  6️⃣ ये बीस विहरमान तीर्थंकर सदाकाल से धर्म-दीप को प्रदीप्त कर रहे हैं और क...

‘उत्तम सत्य’ पर आधारित लघु नाटिका

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  ‘उत्तम सत्य’ पर आधारित लघु नाटिका पात्र- एक गेहूँ का व्यापारी,   पत्नी, एक पुत्र - सागर उम्र- 13-14 वर्ष,  एक पुत्री- उपासना 13-14 वर्ष, (दोनों जुड़वां हैं), पुत्र के तीन मित्र,  एक अध्यापक,  एक साहूकार,  उसके दो नौकर, एक पड़ोसिन,  दो व्यापारी कहानी की रूपरेखा गेहूँ का व्यापारी अपने पुत्र को पढ़ा-लिखा कर बैरिस्टर बनाना चाहता है और पुत्री को केवल घर के काम सीखने में लगाए रखता है..... तुमने अपने भाई के लिए नहाने का गर्म पानी भी नहीं रखा, उसके कपड़े भी नहीं निकाले। इसे विद्यालय में जाने में देर हो जाएगी.... आदि आदि पत्नी को भी झिड़कता रहता है कि मेरे बेटे के लिए हलुआ बना दो। देखो! यह कितनी मेहनत करता है। पढ़ाई करना आसान नहीं है। लड़की को हलुआ खाने नहीं देता... तू क्या करेगी हलवा खाकर। मोटी हो जाएगी, तो कोई ब्याह भी नहीं करेगा। जा! कुएँ से पानी भर कर ला। पिता भाई को पढ़ाने बिठाते हैं और उसे 8 का पहाड़ा सिखाते हैं। बोलो... आठ एकम आठ... बेटा दोहराता है। आठ दूनी सोलह... बेटा फिर दोहराता है। आठ तिया चौबीस... बेटा फिर दोहराता है। उसकी बहिन भी पास बैठी सुन रही होती है ...

भगवान महावीर स्वामी (64)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (64) महावीर प्रभु के लिये निर्वाण प्राप्ति अभी पंचमकाल का प्रारम्भ होने में तीन वर्ष आठ मास तथा पन्द्रह दिन का समय शेष था। चौथा काल चल रहा था। प्रभु महावीर का विहार थम गया; वाणी का योग भी मोक्षगमन के दो दिन पूर्व (धन्य त्तेरस से) रुक गया। प्रजाजन समझ गये कि अब प्रभु के मोक्षगमन की तैयारी है। प्रत्येक देश के राजा तथा लाखों प्रजाजन प्रभु के दर्शनार्थ आ पहुँचे। परम वैराग्य का वातावरण छा गया। भले ही वाणी बन्द हो गई थी, तथापि प्रभु की शान्तरस झरती मुद्रा देखकर भी अनेक जीव धर्म का मर्म प्राप्त कर रहे थे। गौतम गणधरादि मुनिवर ध्यान में अधिकाधिक एकाग्र हो रहे थे। प्रभु की उपस्थिति में प्रमाद छोड़कर अनेक जीवों ने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की आराधना प्रारम्भ कर दी।  इस प्रकार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तथा चतुर्दशी के दो दिन तक देवेन्द्रों तथा नरेन्द्रों ने सर्वज्ञ महावीर तीर्थंकर की अन्तिम महापूजा की। मोक्ष-महोत्सव का महान मेला लग रहा था... संसार को भूलकर सब मोक्ष की महिमा में तल्लीन थे। चतुर्दशी की रात्रि हुई, अर्धरात्रि भी बीत गई और... रात्रि के पिछले प्रहर (...

भगवान महावीर स्वामी (63)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (63) इस प्रकार सर्वज्ञ महावीर को देखते ही आत्मशक्ति की प्रतीति करके अनेक जीव परमात्मा बन गये। प्रभु ने दिव्य ध्वनि द्वारा ‘प्रत्येक जीव में परमेश्वरत्व’ की प्रतिष्ठा की। अहा! प्रत्येक आत्मा परमात्म वैभव से परिपूर्ण है और वह स्वाधीन रूप से परमात्मा हो सकता है। - ऐसा गूढ़ रहस्य परमेश्वर के अतिरिक्त कौन बता सकता है? और उसे झेलने वाले कोई साधारण जीव नहीं, अपितु ‘जिनेश्वर के नन्दन’ होते हैं, मोक्षमार्ग के पथिक होते हैं। हे वीर! आपका मार्ग वीरों का मार्ग है; वीतरागता का मार्ग है। वीतरागता में निहित सच्ची वीरता को आपके भक्तों के सिवा और कौन समझेगा? लोग कहते हैं कि आकाश में पुष्प नहीं होते; परन्तु ऐसा कहने वालों ने प्रभु के श्रीविहार को नहीं देखा। आकाशगामी प्रभु जहाँ भी विचरते हैं, वहाँ उनके चरणों के नीचे 225 अद्भुत कमलों की रचना हो जाती है। मानो आकाश में पुष्पवाटिका खिली हो! और प्रभु के प्रताप से भव्यजीवों के चैतन्याकाश में भी रत्नत्रय के पुष्प खिल उठते हैं। एक ओर वीतरागी सर्वज्ञता द्वारा चैतन्य की सर्वोत्तम सुन्दरता, तथा दूसरी ओर परम औदारिककता द्वारा शरीर-पु...

भगवान महावीर स्वामी (62)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (62) अहो, वीरनाथ के समीप चेतना की विशुद्धता के बल से नरक के पाप भी मानो धुल गये हों। इस प्रकार श्रेणिक राजा तो चेतनरस के वेदन में ही तत्पर थे। वीर प्रभु के प्रति परम उपकार के सूचक हर्षाश्रु उनकी आँखों से झर रहे थे। अरे! देखो तो सही, जीव के परिणाम का परिवर्तन! कहाँ एक समय मुनि की विराधना के दुष्परिणाम! और कहाँ इस समय तीर्थंकर प्रकृति के योग्य विशुद्ध परिणाम! कहाँ उस समय का मिथ्यात्व और कहाँ आज का क्षणिक सम्यक्त्व! एक ही जीव के जीवन में कैसे-कैसे परिवर्तन आते हैं!  वाह, जिनशासन! सत् को उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य स्वरूप बतलाने वाला तेरा उपदेश हमें वीतरागता का ही भाव कराता है। नरकगामी भी वही... और किंचित दीर्घदृष्टि से देखें, तो मोक्षगामी भी वही। अहा! जीव के परिणामों की शक्ति तो देखो, चाहे जैसा पापी या विराधक जीव भी सीधा चलने लगे, तो क्षण में धर्मी होकर मोक्ष का साधक बन जाता है। इसका उदाहरण एक वेद-वेदांत में पारंगत इन्द्रभूति-गौतम गणधर और दूसरे बौद्ध धर्म को मानने वाले श्रेणिक राजा- भावी तीर्थंकर। क्षणिक सम्यक्त्व को प्राप्त श्रेणिक राजा ने अंतर में अतीन्द्...

भगवान महावीर स्वामी (61)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (61) भारत में भगवान महावीर तीर्थंकर से पूर्व २३वें पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; अहिंसाधर्म की महिमा फैल रही थी। भगवान महावीर ने भी वह बात प्रचारित की कि राग से भिन्न आत्मा के अनुभव द्वारा ही अहिंसाधर्म का पालन हो सकता है; क्योंकि राग स्वयं हिंसा है, इसलिए जो जीव जितना राग में वर्तता है, उतना वह हिंसा में ही वर्त रहा है। जिसमें राग नहीं है, ऐसे ज्ञान की अनुभूति वह परम अहिंसाधर्म है और उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे अहिंसाधर्म के उपदेशक प्रभु महावीर ने विपुलाचल से विहार करके भारतभूमि को पावन किया। जहाँ वे पधारते, वहाँ अहिंसामय शान्त वातावरण हो जाता था। सर्प और नेवले जैसे विरोधी जीव भी एक-दूसरे के मित्र बन जाते थे। सिंह और गाय, शेर और खरगोश... सब भयरहित होकर एक साथ बैठते थे... और वीरवाणी का अमृत-पान करते थे। प्रभु ने अनेकान्त तत्व का स्वरूप समझाया- जीव अतीन्द्रिय चेतनतत्व है, वह जड़ से भिन्न है। चेतन और जड़ प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वधर्म में स्थित हैं। एक ही वस्तु का एकसाथ अपने अनेक धर्मों में तन्मय रूप से रहना ही ‘अनेकान्त’ है। एक ही आत्...

भगवान महावीर स्वामी (60)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (60) अहा, गौतम गणधर भी जिनकी स्तुति करते हों, उन सर्वज्ञ महावीर की महिमा का क्या कहना! हे महावीर देव! आपके गुण इतने अधिक महान हैं कि छद्मस्थ जीव उनकी स्तुति करते हुए थक जाता है, तथापि मैं आपके गुणों के प्रति सच्ची महिमा के कारण आपकी स्तुति करता हूँ। प्रभो! आपके अंतर में उदित हुआ केवलज्ञान सूर्य हानि-वृद्धि से रहित स्थिर है; वह सूर्य की भांति आतप देनेवाला नहीं, किन्तु आतप हरनेवाला है। आपकी वीतरागी सर्वज्ञता की अतुल्य महिमा का चिन्तन हमें राग से भिन्न ज्ञानस्वभावी आत्मा की अनुभूति कराता है... और सम्यक्त्व सहित महान आनन्द प्रकट होता है। प्रभो! आपकी यथार्थ प्रतीत्ति का यह महान फल है। धन्य सर्वज्ञदेव! आपका प्रभाव अद्वितीय है। स्वानुभूति के बिना आपके अचिन्त्य गुण चिन्तन में नहीं आ सकते। जब हम आपके अनन्त गुणों को ज्ञान में लेकर उनका चिन्तन करते हैं, तब हमारा ज्ञान वैसे आत्मगुणों में एकाग्र हो जाता है और विकल्पों से परे परमशान्त चैतन्यरस अनुभव में आता है। यही है आपका परमार्थ स्तवन!... यही है आपका पावन पंथ। जो इन्द्रियों को जीतकर जाने विशेष निजात्मा को। निश्चय...

भगवान महावीर स्वामी (59)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (59) इन्द्रभूति गौतम ज्यों ही मानस्तम्भ के निकट आये और प्रभु का वैभव देखा, त्यों ही उनका मान विगलित हो गया...। उन्होंने महावीर को देखा और देखते ही सर्वज्ञ की तथा जीव के अस्तित्व की प्रतीति हो गई। अहा! ऐसे वैभव में भी प्रभु वीतराग रूप से विराज रहे हैं! कैसी शांत है उनकी दृष्टि! उनकी आत्मा की दिव्यता का क्या कहना! अवश्य ही यह सर्वज्ञ हैं। गौतम को प्रभु के प्रति परम सम्मान का भाव जागृत हुआ और जीव के अस्तित्व सम्बन्धी उनकी सूक्ष्म शंकाएँ दूर हो गईं...। गर्व का स्थान ज्ञान ने लिया। निःशल्य हुए गौतम ने विनयपूर्वक अपने पाँच सौ शिष्यों सहित प्रभु का मार्ग अंगीकार किया और नतमस्तक होकर प्रभु की स्तुति की - मोक्षमार्गस्य नेतारं भेतारं कर्मभूतानाम्।  ज्ञातारं विश्वतत्त्वानां वन्दे तद्गुणलब्धये॥ अहा! कैसा आनंददायी होगा वह दृश्य! वीर प्रभु की दिव्यवाणी खिरती होगी और गौतम गणधर उसे झेलते होंगे। प्रभु की वाणी सुनकर तत्क्षण गौतम-इन्द्रभूति चार ज्ञानधारी श्रुतकेवली हुए और बारह अंगरूप श्रुत की रचना द्वारा परमात्मा की वाणी का प्रसाद पंचमकाल के भव्य जीवों के लिये संग्...

भगवान महावीर स्वामी (58)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (58) इन्द्रभूति-गौतम के अतिरिक्त उनके दो भाई अग्निभूति और वायुभूति तथा शुचिदत्त, सुधर्म, मांडव्य, मौर्यपुत्र, अकम्पन, अचल, मेदार्य एवं प्रभास, - ऐसे कुल 11 गणधर महावीर प्रभु के थे। अब, वे गौतमस्वामी वीर प्रभु के समवसरण में अचानक कैसे आ पहुँचे? उसकी रोमांचक कथा सुनो। ऋजुकूला नदी के तट पर वीर प्रभु को केवलज्ञान हुआ, समवसरण की रचना हुई, किन्तु 66 दिन तक दिव्यध्वनि नहीं खिरी; विहार करते-करते प्रभु राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। छियासठ दिन बीत जाने पर भी भगवान का उपदेश क्यों नहीं हुआ? भगवान तो तीर्थंकर हैं, इसलिए दिव्यध्वनि के उपदेश द्वारा तीर्थप्रवर्तन हुए बिना नहीं रह सकता; किन्तु इतना विलम्ब क्यों?  भव्यजीव वाणी सुनने के लिये प्यासे चातक की भाँति आतुर हो रहे हैं। अन्त में इन्द्र का धैर्य समाप्त हुआ; उसने दिव्यज्ञान से देखा कि तीर्थकर देव के धर्मोपदेश के समय जिसकी अनिवार्य उपस्थिति होनी चाहिए, ऐसा कोई गणधर इस सभा में उपस्थित नहीं है। वह गणधर होने वाला जीव तो इस समय वेद-वेदान्त में पारंगत महापण्डित के रूप में गौतमग्राम (गुणावा नगरी) में बैठा है; ऐसा ...

भगवान महावीर स्वामी (57)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (57) उत्तम छाया तथा दिव्यप्रकाश द्वारा जो प्रभु की सेवा कर रहा था, वह अशोक वृक्ष आश्चर्य उत्पन्न करता था कि जड़ के बिना इतना विशाल वृक्ष कैसे बना!... और देखो, यह भी एक आश्चर्य की बात है कि वहाँ जगत में श्रेष्ठ सिंहासन होने पर भी प्रभु उस पर बैठते नहीं हैं; उससे ऊपर अन्तरिक्ष में बैठकर ऐसा प्रगट करते हैं कि यह रत्नसिंहासन कोई चैतन्यपद नहीं है; चैतन्य का पद तो अन्तर में अतिन्द्रिय ज्ञान-आनन्द द्वारा निर्मित है... उस पर प्रभु आरूढ़ हैं।  ज्ञानानन्द पद में विराजमान सर्वज्ञ महावीर को देखकर भव्यजीव भी ज्ञानानन्द में लीन हो जाते थे...और प्रभु की दिव्यवाणी का श्रवण करने के लिये अत्यन्त आतुर थे। प्रभु कैसा अद्भुत बोलेंगे! कैसा अचिन्त्य आत्मस्वरूप बतलायेंगे... प्रभु अभी बोलेंगे... प्रातःकाल बोलेंगे... मध्याह्न में बोलेंगे... सायंकाल बोलेंगे... कल तो अवश्य बोलेंगे!...। “बोलो, बोलो न वीतराग, अबोला क्यों हमसे लिया है?” यद्यपि वीरप्रभु अभी बोलते नहीं हैं, परन्तु मौन रहकर, अनिच्छा से गगनविहार करते हैं। विहार करते-करते वे राजगृही में विपुलाचल पर पधारे। दिवसों पर दि...

भगवान महावीर स्वामी (56)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (56) सर्वज्ञ महावीर सर्वज्ञ प्रभु महावीर राग और इन्द्रियों के बिना ही परिपूर्ण सुख और ज्ञानरूप परिणमित हुए। अद्भुत थी वह दशा! इन्द्रियों विद्यमान होने पर भी मानो अविद्यमान हों - इस प्रकार प्रभु ने उनका सम्बन्ध सर्वथा छोड़ दिया। ‘भगवान भले अतीन्द्रिय हुए और हमारा साथ छोड़ दिया, फिर भी हमें प्रभु के साथ रहने में ही लाभ है’ - ऐसा मानकर वे जड़ इन्द्रियाँ अभी प्रभु का साथ नहीं छोड़ती थीं। प्रभु तो इन्द्रियों से निरपेक्ष रहकर स्वयमेव सुखी थे। पराधीन इन्द्रियसुखों से ऊब जा रहे जगत को प्रभु ने बता दिया कि आत्मा इन्द्रिय विषयों के बिना ही स्वाधीनरूप से सुखी है। ‘सुख आत्मा का स्वभाव है, इन्द्रियों का नहीं।’ शुद्धोपयोग के प्रभाव से आत्मा स्वयं परम सुखरूप परिणमता है। इन्द्रियतीत तथा लोकोत्तम ऐसे वे वीर भगवान केवलज्ञान होते ही पृथ्वी से ५००० धनुष ऊपर आकाश में विराजमान हुए। अब, पृथ्वी का अवलम्बन उनको नहीं रहा और अब वे फिर कभी पृथ्वी पर नहीं उतरेंगे। उनका शरीर छायारहित परम औदारिक हो गया; सब को देखनेवाले प्रभु स्वयं भी सर्व दिशाओं से दिखने लगे। प्रभु के केवलज्ञान का महोत...

भगवान महावीर स्वामी (55)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (55) ऋजुवालिका के किनारे : प्रभु को केवलज्ञान महावीर मुनिराज कौशाम्बी नगरी में चन्दना कुमारी के हाथ से पारणा करने के पश्चात् उद्यान में जाकर ध्यान मग्न हो गये। पश्चात वे सिद्धपद साधक सन्त विहार करते हुए अनन्त सिद्धों के सिद्धिधाम सम्मेदशिखर पधारे। सिद्धिधाम में वे भावी सिद्ध ध्यान में बैठे थे। वह दृश्य वास्तव में अद्भुत था। प्रभु के चरण स्पर्श से शिखरजी की पावन भूमि पुनः पावन हुई; दो तीर्थों का मिलन हुआ। एक भावतीर्थ और दूसरा स्थापना-तीर्थ; अथवा एक चेतनतीर्थ और दूसरा अचेतन-तीर्थ। हमें ऐसा लगेगा कि क्या भगवान तीर्थयात्रा हेतु आये होंगे! अरे, किन्तु प्रभु तो स्वयं ही चलते-फिरते जीवंत-तीर्थ हैं। शिखरसम्मेद तो स्थापना तीर्थ है, जबकि प्रभु तो स्वयं रत्नत्रयरूप परिणमित जीवन्त-तीर्थ हैं। मोक्षयात्रा तो सदा कर ही रहे हैं और साक्षात् रत्नत्रय तीर्थरूप परिणमित, ऐसे महात्माओं के प्रताप से ही भूमि-पर्वतों को तीर्थपना प्राप्त हुआ है। सम्मेदशिखर तीर्थ के निकट 15-20 किलोमीटर दूर जांभिक ग्राम के समीप ऋजुवालिका नदी बहती है; जैसा सुन्दर नाम है, वैसी ही सुन्दर नदी है। म...

भगवान महावीर स्वामी (54)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (54) मृगावती - तुम्हारी बात सत्य है बहिन! एक ओर तुम्हारा दासी जीवन देखकर शोक और दूसरी ओर तुम्हारे ही हाथ से वीर प्रभु का पारणा देखकर हर्ष,- इस प्रकार शोक और हर्ष दोनों एक साथ; इनमें से मैं शोक का वेदन करूँ या हर्ष का? नहीं; हर्ष और शोक दोनों से परे चैतन्यभाव ही आत्मा का सच्चा स्वरूप है और उसी में सच्चा सुख है, - यह बात स्पष्ट समझ में आती है। पाठक! इस घटना में चन्दना की बेड़ी टूट गई, वह दासत्व से छूट गई; परन्तु वास्तव में अकेली चन्दना ही नहीं, सारे भारतवर्ष से दासत्व के/गुलामी के बन्धन टूट गये... दासत्व प्रथा की जड़ उखड़ गई; नारियों के शील की महान प्रतिष्ठा हुई और भारत की नारियों में अपनी आत्मशक्ति का विश्वास पैदा हुआ। भारत की नारियों ने विश्व में उत्तम स्थान प्राप्त किया। अहा! अपने देश के पास जो श्रेष्ठ, सदाचार एवं अध्यात्म का अमूल्य वैभव है वह क्या दुनिया के किसी और देश के पास है?  24 तीर्थंकरों तथा समस्त चक्रवर्तियों को जन्म देने वाली इस भारत भूमि का गौरव विश्व में महान है... भारत में जन्म लेनेवाले हम सब गर्वपूर्वक कह सकते हैं कि ‘हम उस देश के वास...

भगवान महावीर स्वामी (53)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (53) सारी कौशाम्बी नगरी उमड़ पड़ी है, महावीर मुनि को पारणा करानेवाली उन चन्दना देवी के दर्शन करने तथा उन्हें अभिनन्दन देने। अहा! आज तक जिसे हम दासी समझते थे वह तो भगवती देवी निकली! उन्होंने वीर प्रभु को पारणा कराके अपनी कौशाम्बी नगरी का सम्मान बढ़ाया और उसे विश्व प्रसिद्ध कर दिया! अपनी नगरी में वीर प्रभु का आहार नहीं होने का जो कलंक लग रहा था उसे आज चन्दना ने आहारदान देकर मिटा दिया! बहुतों को तो आश्चर्य हो रहा था कि आहारदान और किसी के हाथ से नहीं, एक दासी के हाथ से हुआ! (अरे नगरजनों! कलंक तो तुम्हारी नगरी में चन्दना जैसी सतियों के दासीरूप में बिकने उसका था... प्रभु महावीर ने उस दासी के ही हाथ से पारणा करके वह कलंक मिटा दिया... दासी प्रथा दूर कर दी... मनुष्य, मनुष्य को बेचे, वह कलंक धो दिया; तथा यह भी प्रचारित किया कि धर्मसाधना में धनवान होने का कोई महत्व नहीं है... सद्गुणों का महत्व है।) नागरिकों के मन में प्रश्न उठने लगे कि यह चन्दना देवी है कौन? कहाँ की है? दिखने में तो पुण्यात्मा लगती है... इस प्रकार सब उनका परिचय प्राप्त करने को आतुर थे... इतने में र...

भगवान महावीर स्वामी (52)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (52) मुनिराज महावीर प्रतिदिन नगरी में पधारते और बिना आहार किये लौट जाते... उन प्रभु ने आज आहार ग्रहण किया....... यह समाचार नगरी में फैलते ही लोग घर से दौड़ते हुए बाहर आने लगे कि चलो! उस भाग्यशाली आत्मा के दर्शन करें और अभिनन्दन दें, जिसके हाथ से यह महान कार्य हुआ है।  लोगों ने जब देखा कि वृषभदत्त सेठ की एक दासी के हाथ से प्रभु ने आहार लिया है, तब वे आश्चर्यचकित हो गये... अरे! लोगों को क्या खबर थी कि वह दासी नहीं, अपितु प्रभु महावीर की मौसी है... उनकी श्रेष्ठ उपासिका है। प्रभु को पारणा कराके चन्दना धन्य हो गई... आहार ग्रहण करके वे वीर योगीराज तो ऐसे सहजभाव से वन की ओर गमन कर गये, मानो कुछ भी नहीं हुआ हो और वहाँ जाकर आत्मध्यान में लीन हो गये। जब तक प्रभु जाते हुए दिखाई देते, तब तक चन्दना उन्हें टकटकी बाँधे देखती रही... आकाश में देव और पृथ्वी पर जन-समूह उन्हें धन्यवाद देकर उनकी प्रशंसा कर रहे थे... किंतु चन्दना तो सारे जगत को भूलकर, समस्त परभावों से परे, चैतन्यतत्त्व के निर्विकल्प ध्यान में शांति-पूर्वक बैठी थी... उसकी गंभीरता अद्भुत थी। इधर वृषभदत्त...