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कर्मों के बंधन तोड़ो -3 झूठ

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  कर्मों के बंधन तोड़ो -3 झूठ सरिता जैन, हिसार द्वारा रचित सुन्दर नाटिका सच्चे का बोलबाला!! कक्षा के कमरे का दृश्य -   1 ब्लैक बोर्ड, 1 कुर्सी, 1 मेज, दरी, मेज पर घड़ी, पैन, किताब, चॉक, डस्टर। पात्र - गुरुजी, सम्यक, जीवन कुमार, सत्येन्द्र, अनीता (लड़की)    सूत्रधार -  कर्मों के बंधन तोड़ो  जिनवर से नाता जोड़ो। धर्म प्रेमियों! आपस में प्रेम करो, धर्म प्रेमियों! आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - सच्चे का बोलबाला!! आइए! हम आपको कर्म-बंधन का लेखा-जोखा समझाते हैं और पात्रों का परिचय देते हैं। (पात्र परिचय - एक-एक पात्र मंच पर आता है और हाथ जोड़ता हुआ दूसरी ओर चला जाता है।) ये हैं - गुरु जी - सफेद धोती, कुर्ता, जैकेट, टोपी हाथ में रजिस्टर लेकर आता है सम्यक - हाथ में स्कूल बैग, ब्राउन पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है । सम्यक के बैग में एक चाॅक का डिब्बा है।  जीवन कुमार - हाथ में स्कूल बैग, सफेद पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है   सत्येन्द्र - हाथ में स्कूल बैग, काली पैंट, हल्की नीली कमीज पहनकर आती है अनीता - हाथ में स्कूल बैग,  सफेद स...

अंजीर का रहस्य

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  अंजीर का रहस्य गाँव के एक छायादार बगीचे में अनुज और उसका मित्र आरव खेल रहे थे। खेलते-खेलते अनुज की नजर एक अंजीर के पेड़ पर पड़ी, जिस पर ढेर सारे मीठे-रसीले अंजीर लगे थे। अनुज ने खुशी-खुशी एक अंजीर तोड़ा और आरव से बोला, ‘चलो, इसे खाते हैं!’ आरव ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, ‘नहीं अनुज, मैं अंजीर नहीं खाता।’ अनुज हैरान हुआ, ‘क्यों? ये तो बहुत स्वादिष्ट होता है!’ आरव ने अनुज का हाथ पकड़कर उसे पेड़ के नीचे बैठाया और बोला, ‘मैं तुम्हें एक अद्भुत रहस्य बताता हूँ।’ जैन धर्म में हम अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। इसका अर्थ है - किसी भी जीव को, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो, उसे हानि नहीं पहुँचाना। अब सुनो, अंजीर का फल बाहर से तो आम फल जैसा लगता है, लेकिन उसके अंदर एक अनोखी दुनिया छुपी होती है। जब अंजीर का फूल फल बनने लगता है, तो एक छोटी सी ततैया उसमें एक छोटे से छेद से घुसती है। वह वहाँ अपने अंडे देती है। लेकिन अंजीर के अंदर घुसने के बाद उसके पंख और पैर टूट जाते हैं, जिससे वह बाहर नहीं निकल पाती। वह ततैया वहीं मर जाती है। अंजीर के अंदर एक खास एंजाइम होता है, जो उस ततैया के शरीर को धीरे-धीरे...

कर्मों के बंधन तोड़ो -2 (हिंसा)

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  कर्मों के बंधन तोड़ो -2 सरिता जैन, हिसार द्वारा रचित सुन्दर नाटिका जीना यहाँ!! कक्षा के कमरे का दृश्य -  1 ब्लैक बोर्ड, 1 कुर्सी, 1 मेज, दरी, मेज पर घड़ी, पैन, किताब, चॉक, डस्टर। पीछे की ओर एक डण्डा रखा है। पात्र - गुरुजी, विवेक, जीवन कुमार, विद्या (लड़की), प्रज्ञा (लड़की)  सूत्रधार -  कर्मों के बंधन तोड़ो  जिनवर से नाता जोड़ो। धर्म प्रेमियों! आपस में प्रेम करो, धर्म प्रेमियों! आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - ’जीना यहाँ’  आइए हम आपको कर्म-बंधन का लेखा-जोखा समझाते हैं और पात्रों का परिचय देते हैं। (पात्र परिचय - एक-एक पात्र मंच पर आता है और हाथ जोड़ता हुआ दूसरी ओर चला जाता है।) ये हैं - गुरु जी - सफेद धोती, कुर्ता, जैकेट, टोपी हाथ में रजिस्टर लेकर आता है विवक - हाथ में स्कूल बैग, ब्राउन पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है  जीवन कुमार - हाथ में स्कूल बैग, सफेद पैंट, सफेद कमीज पहनकर आता है  विद्या - हाथ में स्कूल बैग,  सफेद सलवार - हल्की नीली कमीज पहनकर आती है प्रज्ञा - हाथ में स्कूल बैग,  सफेद सलवार - हल्की ब्राउन कमीज पहनकर ...

ठण्डा पानी

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ठण्डा पानी ( प्रेरणादायक लघु नाटिका) पात्र परिचय — माँ - उम्र 60 वर्ष, अधपके बाल, क्रीम रंग की साढ़ी पहने हुए बड़ा बेटा शीतल प्रसाद- उम्र 30 वर्ष, सफेद रंग का कुर्ता-पायजामा पहने हुए बेटी रसना रानी - उम्र 25 वर्ष, गुलाबी रंग का सलवार कमीज़ पहने हुए दूसरा बेटा गेंदामल - उम्र 22 वर्ष, पीली कमीज़, काली पैंट पहने हुए, हर समय कुछ सूंघते हुए  तीसरा बेटा दर्शन कुमार - उम्र 20 वर्ष, प्रिंटिड कमीज़ और जींस पहने हुए, आँखों पर काला चश्मा चौथा बेटा कर्ण प्रसाद - उम्र 18 वर्ष, नीली कमीज़, काली पैंट पहने हुए, कानों में इयर फोन लगाए हुए पड़ोसिन देवकी - उम्र 25 वर्ष, हरी साढ़ी पहने हुए कमरे का दृश्य - एक ओर खाट बिछी हुई है, जिस पर दरी, चद्दर और एक तकिया रखा है, साढ़ी, सूई धागे, फाॅल। दूसरी ओर पानी से भरा मटका और उस पर एक गिलास रखा है। एक चूल्हा, उस पर एक रोटियों का कटोरदान, जिसमें 5 रोटियाँ रखी हैं, एक डोंगे में सब्जी, पास ही पांच थालियां, पांच कटोरियां, पांच चम्मच और एक कड़छी रखी है। सूत्रधार - आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - ठण्डा पानी (माँ खाट पर   हाथ में कोई...

कर्मों के बंधन तोड़ो-1 (लघु नाटिका)

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कर्मों के बंधन तोड़ो-1  (लघु नाटिका) सरिता जैन, हिसार द्वारा रचित सुन्दर   नाटिका कक्षा के कमरे का दृश्य -   1 ब्लैक बोर्ड, 1 कुर्सी, 1 मेज, दरी, मेज पर घड़ी, पैन, किताब, चॉक, डस्टर। पात्र - गुरुजी, ज्ञानचन्द, दर्शन कुमार, मोहिनी (लड़की), अंतरा (लड़की) वेदना (लड़की), आयुष, नामवर  व गोत्र कुमार, जीवन कुमार सूत्रधार —  कर्मों के बंधन तोड़ो जिनवर से नाता जोड़ो। धर्म प्रेमियों! आपस में प्रेम करो, धर्म प्रेमियों! आज हम आपको एक प्रेरणादायक लघु नाटिका दिखाने जा रहे हैं - *कर्मों के बंधन तोड़ो*  आइए हम आपको अष्ट कर्मों का लेखा-जोखा समझाते हैं और पात्रों का परिचय देते हैं। (पात्र परिचय — एक-एक पात्र मंच पर आता है और हाथ जोड़ता हुआ दूसरी ओर चला जाता है।) ये हैं - गुरु जी — सफेद धोती, कुर्ता, टोपी हाथ में रजिस्टर लेकर  आता है ज्ञानचन्द — हाथ में स्कूल बैग, ब्राउन पैंट,  सफेद  कमीज़ पहनकर  आता है दर्शनकुमार —  हाथ में स्कूल बैग, डार्क ब्राउन पैंट, सफेद कमीज़ पहनकर आता है मोहिनी —  हाथ में स्कूल बैग,  सफेद  सलवार - चमकदार...

कुन्द.कुन्द का सार है

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कुन्द.कुन्द का सार है पारुल जैन, दिल्ली द्वारा रचित सुन्दर भजन कुन्द-कुन्द का सार है, निज वैभव अपार है।  बाहर में क्यों भटके चेतन, निज में ही जब सार है॥  अणु मात्र तेरा नहीं, राग तू फिर क्यों करता।  इसी राग के कारण ही तू, क्यों भव-भव में फिरता॥  अब तो आँख खोल ले प्राणी, ये संसार असार है।  बाहर में क्यों भटके प्राणी निज में ही जब सार है।  आतम ही बस सार है, बाकी सब निःसार है।  निज आनंद में रह ले प्राणी, भव से बेड़ा पार है॥ -2 श्रद्धा कर ले निज आतम की, जिसमें ही बस सार है।  बाहर में क्यों भटके प्राणी, निज में ही जब सार है॥  ज्ञान चक्षु तू खोल ले, निज ज्ञायक तू देख ले।  स्वसंवेदन ज्ञान से चेतन, निज वैभव तू देख ले॥  चिंतन ही बस सार है, महिमा अपरम्पार है।    बाहर में क्यों भटके चेतन, निज में ही जब सार है॥   समयसार का सार है जीव और पुद्गल भिन्न।   राग द्वेष मोह त्याग दे सबसे हो के अभिन्न॥   भेदज्ञान तू जान ले, निज को अब पहचान ले।   बाहर में क्यों भटके चेतन, निज में ही जब सार है।  ...

सिद्धों को नमस्कार

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  सिद्धों को नमस्कार  पारुल जैन, दिल्ली द्वारा रचित सुन्दर भजन अष्ट कर्म से रहित हैं जो प्रभु, अष्ट गुणों से सहित हुए। निज घर में जो रहने वाले, निज में ही जो व्यस्त हुए। स्पर्श वर्ण रस गंध रहित जो,अविनाशी अविकारी हैं। किंचित कम वो तनुमात्र से, पूर्व भव अवगाहनी हैं। शाश्वत निर्मल अशरीरी जो, अनन्त गुण भंडारी हैं। निज आनन्द का पान करें जो, निज में संयम धारी हैं। पर से भिन्न एकत्व विभक्त का, आनन्द निज में धारी हैं॥ सभी विकारी भावों से हट, निज स्वभाव के धारी हैं॥ मोक्ष मार्ग के नेता भी हैं, हैं वो भी सर्वज्ञ प्रभु। लेकिन हित उपदेश न देते, निज में ही वो लीन प्रभु॥ ऐसे समता धारी को मैं, विनय भाव से करूँ प्रणाम। उन जैसा बनने की खातिर, मैं भी निज में करूँ विराम॥ स्वयं पूर्ण हूँ मैं भी निज में, शाश्वत आनन्द धारी हूँ। कर्म रहित मैं होऊँ प्रभुवर, यही भावना भाती हूँ॥  ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं...

रे मन मुसाफिर

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रे मन मुसाफिर पारुल जैन, दिल्ली द्वारा संकलित एवं प्रेषित सुन्दर भजन  रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा। भाड़े के क्वाटर को क्या तू संभाले, इक दिन तुझे उसका मालिक निकाले, इसका किराया भी भरना पड़ेगा,...... रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा,..... काया का घर खाली करना पड़ेगा,... आयेगा नोटिस ज़मानत न होगी, तेरे पास कोई अमानत न होगी, होकर के कैद तुझे जाना पड़ेगा, रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा,... यमराज की तू अदालत चढ़ेगा, पूछेगा हाकिम तो तू क्या कहेगा, पापों की अग्नि में जलना पड़ेगा, रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा,... सतायेंगे कर्म फिरेगा तू रोता, लाख चैरासी में खायेगा गोता, घर-घर जनम और मरना पड़ेगा, रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा,... रे मन मुसाफिर... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक...

छहढाला(59)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(59) छठवीं ढाल का लक्षण-संग्रह अंतरंग तपः शुभाशुभ इच्छाओं के निरोधपूर्वक आत्मा में निर्मल ज्ञान आनंद के अनुभव से अखण्डित प्रतापवन्त रहना, निस्तरंग चैैतन्यरूप से शोभित होना। अनुभवः स्वोन्मुख हुए ज्ञान और सुख का रसास्वादन। वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावे विश्राम, रस स्वादन सुख ऊपजै, अनुभव याको नाम। आवश्यकः मुनियों को अवश्य करने योग्य स्ववश शुद्ध आचरण। कायगुप्तिः काया की ओर उपयोग न जाकर आत्मा में ही लीनता। गुप्तिः मन, वचन, काया की ओर उपयोग की प्रवृत्ति को भलीभाँति आत्मभानपूर्वक रो कना अर्थात् आत्मा में ही लीनता होना सो गुप्ति है। तप - स्वरूपविश्रान्त, निस्तरंगरूप से निज शुद्धता प्रतापवन्त शोभायमान होना, सो तप है। उसमें जितनी शुभाशुभ इच्छाओं का निरोध होकर शुद्धता बढ़ती है, वह तप है, अन्य बारह भेद तो व्यवहार (उपचार) तप के हैं। ध्यान - सर्व विकल्पों को छोड़कर अपने ज्ञान को लक्ष में करना, सो ध्यान है। नय - वस्तु के एक अंश को मुख्य करके जाने वह नय है और वह उपयोगात्मक है। सम्यक् श्रुतज्ञानप्रमाण का अंग, वह नय है। निक्षेप - नयज्ञान द्वारा ब...