तीसरी छहढाला(22)
अ ध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(22) (सुबोध टीका) तीसरी आकाश, काल और आस्रव के लक्षण अथवा भेद सकल द्रव्यको वास जासमें, सो आकाश पिछानो; नियत वर्तना निशिदिन सो, व्यवहारकाल परिमानो । यों अजीव, अब आस्रव सुनिये, मन-वच-काय त्रियोगा; मिथ्या अविरत अरु कषाय, परमाद सहित उपयोगा ।। ८ ।। अन्वयार्थः- (जासमें) जिसमें (सकल) समस्त (द्रव्यन) द्रव्यों का (वास) निवास है, (सो) वह (आकाश) आकाश द्रव्य (पिछानो ) जानना; (वर्तना) स्वयं प्रवर्तित हो और दूसरों को प्रवर्तित होन ेमें निमित्त हो वह (नियत) निश्चय कालद्रव्य है; तथा (निशिदिन) रात्रि, दिवस आदि (व्यवहारकाल) व्यवहार-काल (परिमानो) जानो । (यों) इस प्रकार (अजीव) अजीव तत्त्व का वर्णन हुआ। (अब) अब (आस्रव) आस्रव तत्त्व ( सुनिये) सुनो। ( मन-वच-काय) मन, वचन और काया के आलम्बन सेआत्मा के प्रदेश चंचल होने रूप (त्रियोगा) तीन प्रकार के योग तथा मिथ्यात्व, अविरत, कषाय (अरु) और (परमाद) प्रमाद् (सहित) सहित ( उपयोग ) आत्मा की प्रवृत्ति वह ( आस्रव ) आस्रवतत्त्व कहलाता है । भावार्थः जिसमें छह द्रव्यों का निवास है, उस स्थान को आकाश कहते हैं। जो अपने ...