छहढाला(4)
अ ध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(4) (सुबोध टीका) तिर्यंच के दुःख की अधिकता और नरक गति की प्राप्ति का कारण बध बन्धन आदिक दुःख घने, कोटि जीभतैं जात न भने; अति संक्लेश भावतैं मरयो, घोर श्वभ्रसागर में परयो॥9॥ अन्वयार्थः इस तिर्यंचगति में जीव ने अन्य भी (बध) मारा जाना, (बन्धन) बँधना, (आदिक) आदि (घने) अनेक (दुःख) दुःख सहन किये; वे (कोटि) करोड़ों (जीभतैं) जीभों से (भने न जात) नहीं कहे जा सकते। इस कारण (अति संक्लेश) अत्यन्त बुरे (भावतैं) परिणामों से (मरयो) मरकर (घोर) भयानक (श्वभ्रसागर में) नरक रूपी समुद्र में (परयो) जा गिरा। भावार्थः इस जीव ने तिर्यंच गति में मारा जाना, बँधना आदि अनेक दुःख सहन किये; जो करोड़ों जीभों से भी नहीं कहे जा सकते हैं और अंत में इतने बुरे परिणामों (आर्तध्यान) से मरा कि जिसे बड़ी कठिनता से पार किया जा सके, ऐसे समुद्र समान घोर नरक में जा पहुँचा। नरकों की भूमि और नदियों का वर्णन तहाँ भूमि परसत दुख इसो, बिच्छू सहस्र डसे नहिं तिसो; तहाँ राध-श्रोणितवाहिनी, कृमि-कुल-कलित, देह-दाहिनी।।१०।। अन्वयार्थः (तहाँ) उस नरक में (भूमि) धरती (परसत) स्पर्श करने से (इसो) ऐस...