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भगवान महावीर स्वामी (37)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (37) शान्तदृष्टि से हाथी को वश में करने की घटना देखो! देखो!! वह दिख रहा है वैशाली राज्य का नंदावर्त राजप्रासाद; जिस पर अहिंसा धर्म की ध्वजा फहरा रही है। कैसी अद्भुत है इस राजप्रासाद की शोभा! क्यों न हो, बालतीर्थंकर जिसके अन्तर में वास करते हों, उसकी शोभा का क्या कहना! उस प्रासाद की शोभा चाहे जैसी हो, तथापि इन्द्रियगम्य एवं नश्वर थी; जब कि उसमें निवास करने वाले प्रभु के सम्यक्त्वादि गुणों की शोभा अतीन्द्रियगोचर एवं अविनश्वर थी। प्रभु के पुण्य ही उस प्रासाद का रूप धारण करके, सेवक रूप में सेवा करने आये थे। उस सात खण्ड ऊँचे राजप्रासाद के प्रांगण में छोटे-से वीरप्रभु खड़े हों, तब प्रेक्षकों को वीर प्रभु बड़े लगते थे और प्रासाद छोटा लगता था। राजप्रासाद के निकट हस्तिशाला में कितने ही श्रेष्ठ हाथी शोभा देते थे। राजप्रासाद के मार्ग से आने-जाने वाले हजारों प्रजाजनों को वर्धमान कुँवर के दर्शनों की उत्कण्ठा रहने से उनकी दृष्टि राजप्रासाद के प्रत्येक झरोखे पर घूम जाती थी और कभी किसी को झरोखे में खड़े हुए वीरप्रभु के दर्शन हो जाते, तो उसका हृदय आनन्द से नाच उठता था......

भगवान महावीर स्वामी (36)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (36) बालवीर की महा-वीरता जीत लिया मिथ्यात्व-विष, सम्यक् मंत्र प्रभाव। नाग लगा फुफकारने, प्रभु को समता भाव।। जहाँ इन्द्रियातीत भाव है, वहाँ नाग क्या करता? रूप बदलकर बना देव वह, नमन वीर को करता।। फूँ.... फूँ.... करता हुआ एक भयंकर विषैला नाग अचानक ही फुँफकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देखकर सब राजकुमार इधर-उधर भागने लगे; क्योंकि उन बालकों ने पहले कभी ऐसा भयंकर सर्प नहीं देखा था। परंतु महावीर न तो भयभीत हुए और न भागे। अहिंसा के अवतार महावीर को मारनेवाला कौन है? वे तो निर्भयता से सर्प की चेष्टाएँ देखते रहे। जैसे मदारी साँप का खेल कर रहा हो और हम देख रहे हों, तदनुसार वर्धमान कुमार उसे देख रहे थे। शांतचित्त से निर्भयतापूर्वक अपनी ओर देखते हुए वीरकुमार को देखकर नागदेव आश्चर्यचकित हो गया कि वाह! यह वर्धमान कुमार आयु में छोटे होने पर भी महान हैं, वीर हैं। उसने उन्हें डराने के लिये अनेक प्रयत्न किये, बहुत फुँफकारा.... परंतु वीर तो अडिग रहे, वे निर्भयता से सर्प के साथ खेलने के लिये उसकी ओर जाने लगे। दूर खड़े राजकुमार यह देखकर घबराने लगे कि अब क्या होगा? सर्प को भगा...

भगवान महावीर स्वामी (35)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (35) माता को आनंदित करके वीरकुमार बोले - “माँ, मेरे मित्र बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनके पास जाता हूँ।” माँ ने कहा - “अवश्य जाओ, बेटा! सबको आनंद देने के लिये तो तुम्हारा अवतार है।” माताजी से आज्ञा लेकर वीरकुमार राजगृह में आये। उन्हें देखकर ही देवकुमार तथा राजकुमार हर्षपूर्वक जय-जयकार करने लगे और अनेक प्रकार से उनका सम्मान किया। वर्धमान कुमार ने भी प्रसन्न दृष्टि से सबको देखा और माताजी के साथ हुई आनन्दकारी चर्चा कह सुनायी। यह सुनकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। एक राजकुमार बोले - अहा! तीर्थंकर के मित्र होने से अपने को उनके साथ रहने तथा खेलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, तो हम सब उनके साथ मोक्ष की साधना भी अवश्य करेंगे। वे दीक्षा ग्रहण करेंगे, तब उनके साथ हम सब भी दीक्षा लेंगे। यह सुनकर देवकुमारों के मुख पर उदासी छा गई।  तुम क्यों उदास हो गये, मित्र?  ऐसा पूछने पर देवकुमारों ने कहा - हे मित्र! तुम तो मनुष्य पर्याय में हो, इसलिए प्रभु के साथ दीक्षा ले सकोगे; परन्तु हम देवपर्याय में होने के कारण प्रभु के साथ दीक्षा नहीं ले सकते, इस विचार से हम...

भगवान महावीर स्वामी (34)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (34)    पुत्र - माता! मेरी मोक्षसाधिका, धन्य-धन्य है तुझ को..... तव स्नेह भरी मीठी आशीष, प्यारी लगती है मुझको... माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।। माता - बेटा! तेरी अद्भुत महिमा, सरस हृदय जैसी है.... तेरा दर्शन करके भविजन, मोह के बन्धन तोड़े हैं.... बेटा! दर्शन तेरा रे.... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता! तेरी मीठी वाणी, मानो फूल ही बरस रहे हैं.... तेरे हृदय हेतु फव्वारे, इधर-इधर झरते हैं.... माता! दर्शन तेरा रे... जगत को आनन्ददायक है।। माता - तेरी वाणी सुनकर भविजन, मोक्षमार्ग में दौड़े... चेतन रस का स्वाद चखकर, राजपाट सब छोड़े.... बेटा जन्म तुम्हारा रे.... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता मुझको जगे भावना, कब मैं बनूँ वैरागी... रागमयी बंधन सब तोड़ूँ, बनूँ परिग्रह त्यागी.... माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।। माता - बेटा! तू तो पाँच वर्ष का, पर गंभीर बहुत है... गृहवासी तू फिर भी उदासी, दशा मोह से विरहित है... बेटा! जन्म तुम्हारा रे... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता! तू तो अंतिम माता, फिर नहीं होगी माता... रत्नत्रय से केवल मि...

भगवान महावीर स्वामी (33)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (33)  वर्धमानकुमार ने प्रातःकाल सिद्धों का स्मरण करके आत्मचिन्तन किया। फिर माता के पास आये। त्रिशला माता ने बड़े उत्साहपूर्वक पंचपरमेष्ठी का स्मरण करके प्रिय पुत्र को तिलक किया और बलैयाँ लेकर मंगल आशीर्वाद दिया। माता का आशीष लेकर वीरकुमार प्रसन्न हुए और उनसे आनन्दपूर्वक चर्चा करने लगे।  अहा! माताजी के साथ वीर कुँवर कैसी आनन्ददायक चर्चा करते हैं, वह सुनने के लिये हम राजा सिद्धार्थ के राजभवन में चलें! त्रिशला माता के राजभवन में वाह! देखो, यह राजा सिद्धार्थ का राजभवन कितना भव्य एवं विशाल है! इसका शृंगार भी कितने अद्भुत ढंग से किया गया है! आज चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को वीरप्रभु का जन्म दिन होने से राजभवन के प्रांगण में हजारों प्रजाजन वीर कुँवर के दर्शनार्थ एकत्रित हुए हैं; आज वे अपनी आयु के पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। राजभवन के भीतर उस कक्ष की शोभा तो स्वर्ग की इन्द्रसभा को भी भुला दे - ऐसी है; परन्तु अपना लक्ष्य वहाँ नहीं जाता। अपनी दृष्टि तो सीधी महावीर कुँवर पर केन्द्रित है। अहा, वे कैसे सुशोभित हो रहे हैं! त्रिशला माता अपने इकलौते पुत्र ...

भगवान महावीर स्वामी (32)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (32) देवकुमारों तथा राजकुमारों की तत्त्वचर्चा एक बार चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन वीरकुंवर का जन्म-दिन मनाने हेतु देव कुमार और राजकुमार कुण्डग्राम के राजोद्यान में एकत्रित हुए थे। वीरकुंवर के आने में कुछ देर होने से वे तत्त्व-चर्चा करने लगे। उनकी चर्चा कितनी सुन्दर थी! आओ, हम भी देखें - देव कुमार - भाइयों! आज वीरकुंवर का जन्म-दिन है। जब तक वे राजभवन से यहाँ पधारें, तब तक हम थोड़ी धर्मचर्चा करें। राजकुमार बोले - वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। धर्म के जन्म के महान दिवस पर तो धर्मचर्चा ही शोभा देती है। देव कुमार - ठीक है। आज हम ‘सर्वज्ञ’ के स्वरूप की चर्चा करेंगे। बोलो, राजकुमार! हम किस धर्म को मानते हैं? और हमारे इष्टदेव कौन हैं? राजकुमार - हम जैनधर्म को मानते हैं। उसमें आत्मा के शुद्धभाव द्वारा मोह को जीतते हैं और भगवान ‘सर्वज्ञ’ अपने इष्टदेव हैं। सर्वज्ञ कौन हैं? ‘सर्वज्ञ’ नाम कोई व्यक्ति-वाचक नहीं है, परन्तु मोह का नाश करके ज्ञानस्वभावी आत्मा की सर्व ज्ञान-शक्ति जिनके अंदर विकसित हो गई है, वे सर्वज्ञ हैं। इस प्रकार ‘सर्वज्ञ’ शब्द गुणवाचक है। सर्वज्ञ क...

भगवान महावीर स्वामी (31)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (31) प्रभु के जन्म कल्याणक का भव्य उत्सव करके देवगण अपने स्वर्गलोक में चले गए; किन्तु कितने ही देव छोटे बच्चे का रूप धारण करके वीर कुंवर के साथ वहीं क्रीड़ा करने हेतु रुक गये। अहा! तीर्थंकर जैसे बालक के साथ रहना तथा खेलना किसे अच्छा नहीं लगेगा? ... वाह, उसमें तो बहुत ही आनन्द आयेगा। उन देवकुमारों के साथ क्रीड़ा करते हुए वीर कुंवर को देखकर उनमें देव कौन है और मनुष्य कौन? उसका पता भी नहीं चलता था; क्योंकि सबका रूप एक जैसा था; परन्तु जब वे देवकुमार तीर्थंकर देव का चरण स्पर्श करते, तब समझ में आता था कि देव कौन है। वे देव कहते थे कि हे प्रभो! हम देव नहीं हैं; वास्तव में तो देव आप ही हैं। इस प्रकार गुणों की विशेषता के कारण वीर कुंवर सबसे अलग पहचाने जाते थे। वीर कुंवर का जन्म होने से वैशाली सर्व प्रकार से वृद्धिगत होने लगी; उसका वैभव भी बढ़ने लगा और आत्मा के गुण भी; इसलिए माता-पिता एवं प्रजाजनों ने उन वीर कुंवर को वर्धमान नाम से सम्बोधन किया। “पणमामि वड्ढमाणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं” (प्रवचनसार) अहा! ‘वर्धमान’ ऐसे सुन्दर नाम से जो वाच्य है, जिन प्रभु के गुणों क...

भगवान महावीर स्वामी (30)

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   तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (30) जन्मकल्याणक   तीर्थंकर बनने वाले आत्मसाधक आत्मा की पहचान बाह्य नेत्रों द्वारा नहीं, किन्तु अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा ही होती है। इसलिए जन्मकल्याणक में तुम प्रभु को मात्र इन्द्रियज्ञान द्वारा न देखकर उन्हें अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा पहचानना; उससे प्रभु के कल्याणक के साथ तुम्हारा भी कल्याण होगा, तुम्हें सम्यग्दर्शनादि कल्याणकारी भाव प्राप्त होंगे। अति शोभायमान शाश्वत मेरुपर्वत जिनप्रभु के जन्माभिषेक से अत्यधिक सुसज्जित हो उठा; अथवा ऐसे कहो कि जिनराज ने आकर मेरु की शोभा का हरण कर लिया; क्योंकि लोग तो मेरु की दिव्य शोभा को देखना छोड़कर प्रभु के मुखारविन्द को निहार रहे थे। प्रभु में लगे हुए उनके चित्त को दूसरा कोई आकर्षित नहीं कर सकता था। मेरु पर ‘स्थापनारूप जिन’ तो सदा-शाश्वत विराजते हैं, तदुपरान्त आज तो ‘द्रव्यजिन’ तथा अंशतः ‘भावजिन’ वहाँ पधारे थे; फिर उसके गौरव की क्या बात? अहा, वह तो जगत का एक पूजनीय तीर्थ बन गया था। वहाँ ध्यान धरकर अनेक मुनिवर निर्वाण प्राप्त करते हैं, इसलिए वह सिद्धिधाम (निर्वाण तीर्थ) भी है। अहा, तीर्थ स्वरूप आत्मा का जहा...

भगवान महावीर स्वामी (29)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (29) जन्म कल्याणक वैशाली में महावीर-जन्म की मंगल बधाई आज तो बधाई राजा सिद्धार्थ दरबार जी... त्रिशलादेवी कुंवर जायो जग का तारनहार जी... वैशाली में नौबत बाजे देव करें जयकार जी... भव्यों के इस भाग्योदय से हर्षित सब नरनार जी... आत्मा को धन्य करने, समकित को उज्ज्वल करने; बाल-तीर्थंकर दर्शन करने, चलो जाएं वैशाली धाम। (इस पुस्तक के लेखक ने वीर सं. २५०२ की चैत्र शुक्ला १३ का मंगलवार-दिवस वीर जन्मधाम वैशाली में आनन्द पूर्वक मनाया था; इस पुराण का कुछ भाग वहीं रहकर लिखा है और वीरप्रभु की रथयात्रा के समय इसकी पाण्डुलिपि को रथ में विराजमान करके उसकी पूजा की है।) चैत्रशुक्ला त्रयोदशी के मंगल-दिन वैशाली-कुण्डग्राम में भगवान महावीर का अवतार हुआ। उस काल (ईसवी सन पूर्व 598 वर्ष, तारीख 28 मार्च सोमवार को) समस्त ग्रह सर्वोच्च स्थान में थे। ज्योतिषविज्ञान के अनुसार ऐसा उत्तमयोग 10 कोड़ाकोड़ी सागरोपम में 24 बार ही आता है और वीरप्रभु की यह जन्म-कुण्डली उनका बालब्रह्मचारिपने को सूचित करती है। तीर्थंकर का अवतार होते ही तीनों लोक आश्चर्यकारी आनन्द से खलबला उठे। इन्द्र ऐरावत हाथी...

भगवान महावीर स्वामी (28)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (28) भगवान महावीर : पंचकल्याणक माता त्रिषला और देवियों के मध्य ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्नोत्तर हुए और धर्मचर्चा चली। कई बार तो ऐसा होता था कि माता प्रश्न पूछें, तब चाहे देवी को उत्तर न आता हो, किन्तु ज्यों ही माता के उदर में विराजमान तीर्थंकर का स्मरण करते ही उन्हें तुरन्त उत्तर आ जाता था। मानो प्रभु स्वयं ही उदर-भवन में बैठे-बैठे सब प्रश्नों के उत्तर दे रहे हों। उदार आत्मा अवधिज्ञानी है, तो उनकी सेवा करने वाली देवियाँ भी अवधिज्ञानी हैं, उनमें से कुछ तो सम्यक्दर्शन को प्राप्त हैं और कुछ प्राप्त करने में तत्पर हैं- ऐसी वे देवियाँ माता से पूछती हैं - हे माता! अनुभूति स्वरूप परिणमित आत्मा आपके अंतर में विराजमान है, तो ऐसी अनुभूति कैसे होती है? माता ने कहा - हे देवी! अनुभूति की महिमा अति गंभीर है। आत्मा स्वयं ज्ञान की अनुभूति स्वरूप है। उस ज्ञान की अनुभूति में राग की अनुभूति नहीं;- ऐसा भेदज्ञान हो, तब अपूर्व अनुभूति प्रकट होती है। दूसरी देवी ने पूछा - हे माता! आत्मा की अनुभूति होने से क्या होता है? ‘देवी, सुनो! अनुभूति होने पर सम्पूर्ण आत्मा स्वयं अ...

भगवान महावीर स्वामी (27)

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   तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (27) भगवान महावीर : पंचकल्याणक आज त्रिशलादेवी के हर्षोल्लास का पार नहीं था; और जब राजसभा में सिद्धार्थ महाराजा के श्रीमुख से उन स्वप्नों का महान फल सुना कि चौबीसवें तीर्थंकर का उनके गर्भ में अवतरण हुआ है, तब तो उन्हें किसी अचिन्त्य निधान की प्राप्ति जैसा अपार हर्ष हुआ। सारी नगरी में भी चारों ओर आनन्द छा गया। लोगों के मुख से ‘धन्य है, धन्य है!’ के उद्घोष निकल रहे थे और कह रहे थे कि “अपनी नगरी में हम बाल तीर्थंकर को खेलते-बोलते हुए देखेंगे, हम सब का जीवन धन्य हो!” इन्द्र-इन्द्राणी ने भी वैशाली आकर माता-पिता का सम्मान किया; दिग्कुमारी देवियाँ त्रिशला माता की सेवा करने लगीं। देव तो ठीक, नरक के जीवों ने भी दो घड़ी साता का वेदन किया; और उससे तीर्थंकर महिमा जानकर गहरे विचार में मग्न होने से अनेक जीव चैतन्यविभूति को लक्षगत करके सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए। धन्य है तीर्थंकर के कल्याणक का प्रभाव और धन्य है उनको देखने वाले! अहा! माता के उदर में विद्यमान वह जीव, अपर्याप्त दशा में भी मति-श्रुत-अवधि तीन ज्ञान का धारी था, सम्यग्दृष्टि था, आत्मानुभूति के वैभव सहि...

भगवान महावीर स्वामी (26)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (26) भगवान महावीर : पंचकल्याणक यत् स्वर्गावतरोत्सवे यद्भवत् जन्माभिषेकोत्सवे, यत् दीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिल ज्ञानप्रकाशोत्सवे। यत् निर्वाणगमोत्सवे जिनपतेः पूजाद्भुतं तद्रवे; संगीतः स्तुति मंगलैः प्रसरतां मे सुप्रभातोत्सवः॥ सर्वज्ञ भगवान महावीर स्वामी के पंचकल्याणक जगत का कल्याण करें। हे जिनेन्द्र! आप श्री के मंगल पंचकल्याणक प्रसंग पर आपकी शुद्धात्मा की दिव्य महिमा को हृदयंगम करके इन्द्रादि आराधक भक्तजनों ने अद्भुत पूजन-स्तुतिपूर्वक जो मंगल उत्सव किया, उसके मधुर संस्मरण आज भी आनंद उत्पन्न कर रहे हैं; मानो आप ही मेरे हृदय में विराज कर बोल रहे हैं। ऐसे आपके मंगल चिन्तन पूर्वक आपके पंचकल्याणक का भक्ति सहित आलेखन करता हूँ। जिन भावों से स्वर्ग के हरि ने आपकी भक्ति की थी, उन्हीं भावों से मैं इस मनुष्य लोक का हरि आपकी भक्ति करता हूँ। अहो! त्रिकाल मंगल रूप उन तीर्थंकरों को नमस्कार हो कि जिनके पंचकल्याणक अनेक जीवों के कल्याण के कारण हुए हैं। भगवान महावीर की आत्मा का भव-भ्रमण पूरा हुआ; अब अंतिम तीर्थंकर अवतार में उनके पंचकल्याणक होते हैं। उस महान आत्मा का अनादिकाल ...