छहढाला(7)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(7) (सुबोध टीका) पहली ढाल का सारांश तीन लोक में जो अनंत जीव हैं, वे सब सुख चाहते हैं और दुःख से डरते हैं। यदि वे अपना यथार्थ स्वरूप समझें, तभी सुखी हो सकते हैं। चार गतियों के संयोग किसी भी सुख-दुःख का कारण नहीं हैं, तथापि पर में एकत्वबुद्धि द्वारा इष्ट-अनिष्टपना मानकर जीव अकेला दुःखी होता है; और वहाँ भ्रमवश होकर कैसे संयोग के आश्रय से विकार करता है- वह संक्षेप में कहा है। तिर्यंचगति के दुःख का वर्णन - यह जीव निगोद में अनंत काल तक रहकर, वहाँ एक श्वास में अठारह बार जन्म धारण करके अकथनीय वेदना सहन करता है। वहाँ से निकलकर अन्य स्थावर पर्यायें धारण करता है। त्रसपर्याय तो चिन्तामणि रत्न के समान अति दुर्लभता से प्राप्त होती है। वहाँ भी विकलत्रय शरीर (ऐसे त्रस जीव, जिनके 2, 3 या 4 इन्द्रियाँ अर्थात् एक इन्द्रिय से अधिक और 5 इन्द्रिय से कम इन्द्रियाँ होती हैं) धारण करके अत्यन्त दुःख सहन करता है। कदाचित् असंज्ञी (मन रहित) पंचेन्द्रिय हुआ तो मन के बिना दुःख प्राप्त करता है। संज्ञी (मन सहित) हो, तो वहाँ भी निर्बल प्राणी बलवान प्राणी द्वारा सताया ...