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नवकार जपने से

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नवकार जपने से धुन - क्या ख़ूब लगती हो...... नवकार जपने से सारे सुख मिलते हैं, -2 जाप जपो, जपते रहो, बन्धन कटते हैं, मन उपवन में ख़ुशियों के, फूल खिलते हैं.....नवकार पैंतीस अक्षर हैं इसके ..हाँ.. इसके, जो ध्याता है, पाप कटें सब उसके, परमेष्ठी पाँच हैं पावन ..हाँ.. पावन, पाँचों पद हैं पवित्र और मनभावन, जाप जपो, जपते रहो, बन्धन कटते हैं, मन उपवन में ख़ुशियों के, फूल खिलते हैं.....नवकार पापों से बचकर रहना ..हाँ.. रहना, दुःख आए तो हंसते-हंसते सहना, नवकार करेगा रक्षा ..हाँ.. रक्षा, पंच परमेष्ठी प्रसन्नता का नक्शा, जाप जपो, जपते रहो, बन्धन कटते हैं, मन उपवन में ख़ुशियों के, फूल खिलते हैं.....नवकार जब कोई हमसे रूठे ..हाँ.. रूठे, दिल टूटे और रिश्ता कोई छूटे, मन में न उदासी लाना ..हाँ..  लाना, परमेष्ठी से दिल का नाता बनाना, जाप जपो, जपते रहो, बन्धन कटते हैं, मन उपवन में ख़ुशियों के, फूल खिलते हैं.....नवकार ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा ...

वीरा तेरे चरणों को

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वीरा  तेरे चरणों को वीरा  तेरे चरणों को, कहां छोड़ कर जाना है , महावीरा तेरे चरणों को, कहां छोड़ कर जाना है , यह तन भी पराया है, एक दिन तो मिट जाना है  वीरा तेरे चरणों को ------ बचपन से जो जोड़ा था, सब यहीं रह जाना है,  धन दौलत और वैभव भी, साथ ना कुछ जाना है,  तेरे नाम का दीपक ही, अंत समय काम आना है, महावीर तेरे चरणों को ------- जीवन की यह डोली भी, एक दिन उठ जानी है,  कर्मों की इस नगरी से, आत्मा तो उड़ जानी है, तेरे बताए पथ पर ही, सच्चा घर पाना है,  महावीरा तेरे चरणों को------ राग द्वेष के बंधन सब, धीरे-धीरे तोड़ूं मैं,  तेरी भक्ति के रंग में, जीवन अपना  जोड़ूं मैं  तेरे चरणों में ही प्रभु, खुद को अब खो जाना है,  महावीर तेरे चरणों को ------- अरिहंत तेरा दर ही, सच्चा एक ठिकाना है,  सिद्धों की इस नगरी में, आत्मा को जाना है,  तेरी कृपा से ही प्रभु, भवसागर तर जाना है,  महावीरा तेरे चरणों को------ जिनवाणी का अमृत प्रभु, मन में बसाना है , सम्यक दर्शन ज्ञान से, अज्ञान मिटाना है , कर्मों की इस जंजीर को, धीरे-धीरे तोड़...

आचार्य श्री विद्यासागर स्तुति

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  आचार्य श्री विद्यासागर स्तुति   ( पारुल जैन, दरियागंज, दिल्ली) ॥ आचार्य जिनसेनाचार्याय नमः ॥ विद्या गुरु, विद्या गुरु, विद्या गुरु, विद्या गुरु।  चरणों में त्रियोग से, वंदन करूँ विद्या गुरु ॥ -2 भगवान को देखा नहीं, पर देखा तुम को है गुरु।  'वीतरागी' के गुणों को, देख मैं पाया गुरु ॥ -2 भले नहीं सर्वज्ञ हो, पर ज्ञान निर्मल है गुरु।  अज्ञान तम सबका हटाते, सूर्य सम मेरे गुरु ॥ विद्या गुरु........  मोह गर्त से निकाले, निज से मिलवाते गुरु।  मन को ठंडे बस्ते में, रखना सिखाते हैं गुरु ॥ -2 थोड़ा-थोड़ा ग्रहण कर, ये ही बताते हैं गुरु।  जुड़ो नहीं जोड़ो नहीं, यही भाव सिखलाते गुरु ॥ विद्या गुरु........ मूक माटी के रचियता, मूक अब हो गए गुरु।  संलेखना कर उत्तम समाधि] धारण किए मेरे गुरु ॥  स्वात्मा में लीन हो, अब शांत हो गए मेरे गुरु। विद्या गुरु........... यदि तेरा आशीष मिल जाए तो जीवन हो शुरू विद्या गुरु........ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और ...

पंचकल्याणक- हिसार (हरियाणा)

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  पंचकल्याणक (श्री 1008 भगवान मल्लिनाथ)  (छोटा मन्दिर जी, गांधी चौक) 9 नवम्बर 2017 - 15 नवम्बर 2017 हिसार (हरियाणा) की पावन धरा तर्ज़ - बस्ती-बस्ती, पर्वत-पर्वत गाता जाए बंजारा...... गली-गली और कूचे-कूचे, गाता जाए बंजारा, सब देखो भव्य नज़ारा........ मल्लिनाथ का पंचकल्याणक, सफल हुआ है हमारा, सब देखो भव्य नज़ारा........2 सौधर्म इंद्र और सभी देवगण, हर्षित हुए हैं भारी, सारे नगर ने अहोभाव से, कर ली सब तैयारी। गली-गली और .............. मिथिला नगरी की संरचना, आभा अति मनोहारी, पूजा, हवन और प्रवचन सुन, हर्षित हैं नर-नारी। गली-गली और .............. नगर-नगर से बैण्ड हैं आए, बग्घी शोभाकारी, देव कुबेर के रत्नों की वर्षा, हुई अति सुखकारी। गली-गली और .............. मल्लिनाथ भगवान के अतिशय, मनती रोज़ दीवाली, नगरी की शोभा अनुपम थी, सुरभित क्यारी-क्यारी। गली-गली और .............. मुनि विरंजन सागर जी ने अतिशय पुण्य कमाया, आचार्य श्री विराग सागर को, संघ सहित है बुलाया। गली-गली और .............. संत समागम, धर्म की चर्चा, था अद्भुत ये नजारा, ‘कालिदास संत’ ने ‘धन्ना, ते भगवंता’ उचारा। गली-गली और .........

छहढाला(39)

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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(39) अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत, परिग्रहपरिमाणाणुव्रत तथा दिग्व्रत का लक्षण जल-मृत्तिका बिन और नाहिं कछु गहै अदत्ता; निज वनिता बिन सकल नारिसों रहै विरत्ता । अपनी शक्ति विचार, परिग्रह थोरो राखै; दश दिश गमन प्रमाण ठान, तसु सीम न नाखै ॥ ११ ॥ अन्वयार्थः (जल-मृत्तिका बिन) पानी और मिट्टी के अतिरिक्त (और कछु) अन्य कोई वस्तु (अदत्ता) बिना दिये (नाहिं)नहीं (ग्रहे) लेना, उसे अचौर्याणुव्रत कहते हैं। (निज) अपनी (वनिता बिन) स्त्री के अतिरिक्त (सकल नारि सौं) अन्य सर्व स्त्रियों से (विरत्ता) विरक्त (रहे) रहना, वह ब्रह्मचर्याणुव्रत है। (अपनी) अपनी (शक्ति विचार) शक्ति का विचार करके (परिग्रह) परिग्रह (थोरो) मर्यादित (राखै) रखना, सो परिग्रहपरिमाणानुव्रत है। (दस दिश) दस दिशाओं में (गमन) जाने-आने की (प्रमाण) मर्यादा (ठान) रखकर (तसु) उस (सीम) सीमा का (न नाखै) उल्लंघन न करना, सो दिग्व्रत है। भावार्थः--जन-समुदाय के लिये जहाँ रोक न हो तथा किसी विशेष व्यक्ति का स्वामित्व न हो- ऐसी पानी तथा मिट्टी जैसी वस्तु के अतिरिक्त परायी वस्तु (जिस पर अपना स्वामित्व न हो) उ...

होली खेलें मुनिराज

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होली खेलें मुनिराज होली खेलें मुनिराज अकेले वन में। काहे का रंग काहे की पिचकारी, काहे गुलाल उड़ाये वन में, होली ........... समता रंग क्षमा की पिचकारी, ज्ञान गुलाल उड़ाये वन में, होली ............. । काहे की कीच काहे का गारा, काहे की धूल उड़ावे वन में, होली .......... धर्म की कीच ज्ञान का गारा, कर्मों की धूल उड़ावे वन में, होली ............. । ऐसी होली जो कोई खेले, पाप कटे उसके क्षण में, होली .......... ।  काहे का रंग काहे की पिचकारी, काहे गुलाल उड़ाये वन में, होली ........... समता रंग क्षमा की पिचकारी, ज्ञान गुलाल उड़ाये वन में, होली ............. । काहे की कीच काहे का गारा, काहे की धूल उड़ावे वन में, होली .......... धर्म की कीच ज्ञान का गारा, कर्मों की धूल उड़ावे वन में, होली ............. । ऐसी होली जो कोई खेले, पाप कटे उसके क्षण में, होली .......... । ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे ल...

अकेले वन में

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अकेले वन में होली खेलें मुनिराज, अकेले वन में। अकेले वन में, अकेले वन में -2 काहे का रंग खेलें मुनिवर, काहे की पिचकारी, -2  दया धर्म का रंग पिचकारी, दया धर्म पिचकारी रंग उड़ावे वन में -2 होली खेलें मुनिराज, अकेले वन में। -2 किस के संग गुरु खेलें होली, किसकी बनाई टोली -2 ज्ञान की टोली कर्म की होली -2 होली खेलें मुनिराज, अकेले वन में। -2 अकेले वन में -2 दया धर्म श्रद्धा भक्ति का, हमको भी रंग लगा दो - 2 रूपक से न उतरे ये रंग, पक्का रंग लगा दो -2  होली खेलें मुनिराज, अकेले वन में। -2 अकेले वन में -2 ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

इतनी शक्ति हमें देना

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इतनी शक्ति हमें देना गुरुवर  इतनी शक्ति हमें देना गुरुवर, मन का विश्वास कमज़ोर हो न।  हम चले नेक रस्ते पर हमसे, भूलकर भी कोई भूल हो न ॥ दूर अज्ञान के हों अंधेरे, तू हमें ज्ञान की रोशनी दे।  हर बुराई से बचकर रहें हम, जितनी भी दे भली जिंदगी दे।  वैर हो न किसी का किसी से, भावना मन में बदले की हो न। हम चले नेक......................... हर तरफ जुल्म है, बेबसी है, सहमा सहमा सा हर आदमी है।  पाप का बोझ बढ़ता ही जाए, जाने कैसे ये धरती थमी है।  बोझ ममता का तू ये उठा ले, तेरी रचना का भी अंत हो न। हम चले नेक ......................... हम न सोचें हमें क्या मिला है, हम ये सोचें किया क्या है अर्पण।  फूल खुशियों के बाँटें सभी को, सबका जीवन ही बन जाए मधुवन।  अपनी करुणा का जल तू बहाकर, कर दे पावन हर इक मन का कोना। हम चले नेक ......................... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं...

उद्धार कैसे होता हमारा

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  उद्धार कैसे होता हमारा  तर्ज़-हमें और जीने की चाहत न होती...  उद्धार कैसे होता हमारा, अगर तुम न होते-2  गुरुजी तुम्हारा सहारा न मिलता, भंवर में ही रहते किनारा न मिलता।  दिखाई न देती अंधेरे में मंजिल, अगर तुम न होते-2................... । करके दरश तो लगता है ऐसे, महावीर फिर से आए हों जैसे।  पंचम काल के महावीर हो तुम, विराग सागर गुरुवर हमारे। उद्धार कैसे .......................... । दया इतनी कर दो हम पे गुरुवर, कल्याण होवे बनें आप जैसे।  बनें आप जैसे यही भावना है, यही भावना है यही चाहना है। उद्धार कैसे .......................... ।  ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

जिस भजन में

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जिस भजन में  जिस भजन में प्रभु का नाम न हो। उस भजन को गाना न चाहिए ॥ जिस सभा में अपना मान न हो। उस सभा में जाना न चाहिए ॥ जिस भजन............ चाहे बेटा कितना लाडला हो। उसे सिर पर बिठाना न चाहिए ॥  चाहे बेटी कितनी लाडली हो। घर-घर में घुमाना न चाहिए ॥ जिस भजन... जिस पिता ने हमको पाला है। उसे कभी भुलाना न चाहिए ॥  जिस माँ ने हमको जन्म दिया, उसे कभी सताना न चाहिए ॥ जिस भजन ....... चाहे मित्र कितना बैरी हो। उसे कभी हराना नहीं चाहिए ॥  चाहे बीबी कितनी सुन्दर हो। हर राज बताना न चाहिए ॥ जिस भजन .. चाहे कितनी अमीरी आ जाए। प्रभु नाम भुलाना न चाहिए ॥  चाहे कितनी गरीबी आ जाए। पर खेद बढ़ाना न चाहिए ॥ जिस भजन ........ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

कभी प्यासे को

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  कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं  कभी प्यासे को पानी पिलाया नहीं, बाद अमृत पिलाने से क्या फायदा।  कभी गिरते हुए को उठाया नहीं, बाद आँसू बहाने से क्या फायदा। कभी प्यासे....... मैं तो मंदिर गया, पूजा आरती की। पूजा करते हुए ये ख्याल आ गया।  कभी माँ-बाप की सेवा की ही नहीं, सिर्फ पूजा के करने से क्या फायदा। कभी प्यासे...... मैं तो सत्संग गया, गुरुवाणी सुनी। गुरुवाणी को सुन कर, ख्याल आ गया।  जन्म मानव का ले के, दया न करी, फिर मानव कहलाने से क्या फायदा। कभी प्यासे...... मैंने दान किया, मैंने जप तप किया, दान करते हुए ये ख्याल आ गया।  कभी भूखे को भोजन कराया नहीं, दान लाखों का करने से क्या फायदा। कभी प्यासे...... गंगा नहाने हरिद्वार, काशी गया, गंगा नहाते ही मन में ख्याल आ गया।  तन को धोया मगर, मन को धोया नहीं, फिर गंगा नहाने से क्या फायदा। कभी प्यासे....... मैंने वेद पढ़े, मैंने शास्त्र पढ़े, शास्त्र पढ़ते हुए ये ख्याल आ गया।  मैंने ज्ञान किसी को बांटा नहीं, फिर ज्ञानी कहलाने से क्या फायदा। कभी प्यासे...... मात-पिता के ही चरणों में चारों धाम हैं, आजा आजा यही म...

प्रभु नाम जपने से

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प्रभु नाम जपने से  प्रभु नाम जपने से, नव जीवन मिलता है, तन मन का मुरझाया उपवन खिलता है, अन्तर के कोने में इक दीपक जलता है। प्रभु नाम........................................ श्रीपाल प्रभु गुण गाकर, हाँ... गाकर-2 तूफां में भी पार हुए थे सागर, चंदन बाला दर्शन से, हाँ.. दर्शन से-2 देखो पल में, मुक्ति हुई बंधन से। तन मन का..................................... हो सर्प अगर विष वाला, हाँ... विष वाला-2 कर लो मन से ध्यान, बन जाये माला, सब पाप सभी कट जाएं, हाँ... कट जाएं-2 सुमरण से, संताप सभी मिट जाएं। तन मन का..................................... संसार समुद्र तोै गहरा, हाँ... गहरा-2 कर्मों ने चहुँ ओर लगाया पहरा, सब छोड़ जगत की माया, हाँ... माया-2 ले लो तुम, महावीर शरण की छाया। तन मन का.....................................   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अ...

हमने जग की

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 हमने जग की   हमने जग की अजब तस्वीर देखी, इक हंसता है, दस रोते हैं। ये प्रभु की अद्भुत जागीर देखी, इक हंसता ....................... हमें हंसते मुखड़े चार मिले, दु:खियारे चेहरे हज़ार मिले। यहाँ सुख से सौ गुना पीर देखी, इक हंसता ...................... दो एक सुखी यहाँ लाखों में, आँसू हैं करोड़ों आँखों में। हमने गिन गिन हर तकदीर देखी, इक हंसता ........................ कुछ बोल प्रभु, ये क्या माया, तेरा खेल समझ में न आया। हमने देखे महल, ये कुटीर देखी, इक हंसता ....................... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

जिनवाणी स्तुति

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“जिनवाणी स्तुति”   मिथ्यातम नाशवे को, ज्ञान के परकाशवे को, आपा परभासवे को, भानु सी बखानी है। छहों द्रव्य जानवे को, बंध विधि भानवे को, स्वपर पिछानवे को, परम प्रमानी है। अनुभव बतायवे को, जीव के जतायवे को, काहू न सतायवे को, भव्य उर आनी है। जहाँ तहाँ तारवे को, पार के उतारवे को, सुख विस्तारवे को, ये ही जिनवाणी है। जा वाणी के ज्ञान से, सूझे लोकालोक, सो वाणी मस्तक धरूँ, सदा देत हूँ धोक। हे जिनवाणी भारती, तोहि जपूं दिन रैन, जो तेरा शरणा गहे, सो पावे सुख चैन। देव भजूँ अरिहन्त को, गुरु सेवा निर्ग्रन्थ, दया धर्म पालो सदा, यही मोक्ष का पन्थ। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

हे प्रभु

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हे प्रभु  हे प्रभु चरणों में तेरे आ गए, भावना अपनी का फल हम पा गए। वीतरागी हो तुम्ही सर्वज्ञ हो, सप्त तत्वों के तुम्ही मर्मज्ञ हो,  मुक्ति का मार्ग तुम्ही से पा गए, भावना ___________ । विश्व सारा है झलकता ज्ञान में, किन्तु प्रभुवर लीन हैं निज ध्यान में,  ध्यान में निज ज्ञान को हम पा गए, भावना ___________ । तुमने बतलाया जगत के आत्मा, द्रव्य दृष्टि से सदा परमात्मा,  आज निज परमात्मा पद पा गए, भावना ___________ । ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद