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छहढाला(58)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(58) छठवीं ढाल का सारांश जिस चारित्र के होने से समस्त परपदार्थों से वृत्ति हट जाती है, वर्णादि तथा रागादि से चैतन्यभाव को पृथक् कर लिया जाता है, अपने आत्मा में, आत्मा के लिये, आत्मा द्वारा, अपने आत्मा का ही अनुभव होने लगता है, वहाँ नय, प्रमाण, निक्षेप, गुण-गुणी, ज्ञान-ज्ञाता ज्ञेय, ध्यान-ध्याता-ध्येय, कर्ता-कर्म और क्रिया आदि भेदों का किंचित् विकल्प नहीं रहता; शुद्ध उपयोगरूप अभेद रत्नत्रय द्वारा शुद्ध चैतन्य ही अनुभव होने लगता है, उसे स्वरूपाचरणचारित्र कहते हैं; यह स्वरूपाचरणचारित्र चौथे गुणस्थान से प्रारम्भ होकर मुनि-दशा में अधिक उच्च होता है। तत्पश्चात् शुक्लध्यान द्वारा चार घाति कर्मों का नाश होने पर वह जीव केवलज्ञान प्राप्त करके १८ दोष रहित श्री अरिहन्तपद प्राप्त करता है; फिर शेष चार अघाति कर्मों का भी नाश करके क्षणमात्र में मोक्ष प्राप्त कर लेता है; उस आत्मा में अनन्तकाल तक अनन्त चतुष्टय का (अनन्तज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य का) एक-सा अनुभव होता रहता है; फिर उसे पंचपरावर्तनरूप संसार में नहीं भटकना पड़ता; वह कभी अवतार धारण नहीं करता; सदैव ...

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  1 Jan. 2021  से शुरू                                                                                                                                                   अ -                                                                      *1.        अच्चेमि , पुज्जेमि , वंदामि , णमस्सामिय जिन भक्ति 14 मई *2.        अकेले वन में - 27 मई *3. अक्षय तृतीया 7 जून 4- अथ अठाई...