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भगवान महावीर स्वामी (48)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (48) चन्दनबाला भगवान महावीर की मौसी चन्दनबाला भी महावीर की भांति विवाह न करने का निश्चय करके वैराग्यमय आत्मभावना में जीवन व्यतीत करती थी।  एक बार चन्दना कुमारी अपनी सहेलियों के साथ नगर के बाहर उद्यान में क्रीड़ा कर रही थी कि उसके लावण्यमय यौवन से आकर्षित होकर एक विद्याधर ने उसका अपहरण कर लिया; परन्तु बाद में अपनी पत्नी के भय से उसने चन्दना को कौशाम्बी के वन में छोड़ दिया। कहाँ वैशाली और कहाँ कौशाम्बी! वन के भील सरदार ने उसे पकड़ लिया और एक वेश्या को सौंप दिया। एक के बाद एक होनेवाली इन अप्रिय घटनाओं से चन्दना व्याकुल हो गई कि अरे! यह क्या हो रहा है?... ऐसी अद्भुत सुन्दरी को देखकर एक वेश्या विचारने लगी कि कौशाम्बी के नागरिकों ने ऐसी रूपवती स्त्री कभी देखी नहीं है। इसे रूप के बाज़ार में बेचकर मैं अच्छा धन कमाऊँगी। - ऐसा सोचकर वह स्त्री चन्दनबाला को वेश्याओं के बाज़ार में बेचने ले गई। अरे रे! इस संसार में पुण्य-पाप की कैसी विचित्रता है कि एक सती नारी वेश्या के हाथों बिक रही है! (किन्तु पाठकगण! तुम घबराना नहीं... क्योंकि ऐसे पुण्य-पाप के उदय में भी अपनी आत्मा को ...

भगवान महावीर स्वामी (47)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (47) तप कल्याणक वीर, अतिवीर, सन्मति, वर्द्धमान और महावीर - ऐसे पंच-मंगल नामधारी प्रभु का चित्त तो पंचमहाव्रत की साधना हेतु पंचमभाव में ही लगा था। अहा! बचपन में भी जिनके अद्भुत शौर्य के समक्ष सर्प भी शरण में आ गया था, तो मुनिदशा में विद्यमान उन तीर्थंकर देव की परम शान्त, गंभीर मुद्रा के समक्ष चण्डकौशिक जैसे विषधर नाग भी सहम जाएं, तो उसमें आश्चर्य क्या है? वीरनाथ की वीतरागी शान्ति के सम्मुख चण्डकौशिक का प्रचण्ड आक्रोश कैसे टिक सकता था?  अरे! सामान्य लब्धिधारी मुनिराज के सम्मुख भी क्रूर पशु अपनी क्रूरता को छोड़कर शान्त हो जाते हैं, तब फिर यह तो तीर्थंकर-मुनिराज वर्धमान हैं, उनकी आश्चर्यजनक लब्धियाँ एवं शान्ति के प्रभाव की तो बात ही क्या? जिनके पास क्रूर से क्रूर जीव भी ऐसे शान्त हो जाते हैं कि वे दूसरे जीवों का भी घात नहीं करते, सिंह हिरन को नहीं मारता, नेवला सर्प को नहीं छेड़ता; तो फिर उन्हें स्वयं को सर्प डसे या कोई कानों में कीलें ठोक दे - यह बात ही कहाँ रही? दूसरों की बात और है, परन्तु यह तो तीर्थंकर महात्मा हैं, उनके ऐसा कुयोग कभी नहीं बनता। जैनध...

भगवान महावीर स्वामी (46)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (46) भगवान महावीर : मुनिदशा में आत्मसाधना मुनि होकर आत्मा की निर्विकल्प आनन्द दशा में झूलते-झूलते भगवान ने साढ़े बारह वर्ष तक मौन रहकर आत्मसाधना की। मात्र अपने एक स्वभाव में ही अग्र तथा अन्य समस्त द्रव्यों से अत्यन्त निरपेक्ष - ऐसी आत्मसाधना करते-करते महावीर प्रभु मोक्षमार्ग में विचर रहे हैं, और बोले बिना भी वीतराग मोक्षमार्ग का अर्थबोध करा रहे हैं। दीक्षा के पश्चात् दो दिन के उपवास हुए और तीसरे दिन कुलपाक नगरी के राजा ने भक्ति पूर्वक आहारदान देकर वीरनाथ मुनिराज को पारणा कराया। आहारदान के प्रभाव से वहाँ देवों ने रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्य प्रगट किये। अहा! तीर्थंकर की आत्मा जैसा सर्वोत्तम आश्चर्य जहाँ विद्यमान हो, वहाँ जगत के अन्य छोटे-मोटे आश्चर्य आयें, वह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अतः मोक्ष की साधना में ही जिनका चित्त लगा है, ऐसे उन महात्मा को वे पाँच आश्चर्यकारी घटनाएँ किंचित आश्चर्यचकित नहीं कर सकीं।  अहा! आश्चर्यकारी चैतन्यतत्त्व की साधना में लीन मुमुक्षु को जगत की कौन-सी वस्तु आश्चर्य में डाल सकेगी; उन मोक्षसाधक महात्मा का कितना वर्णन करें। ह...

भगवान महावीर स्वामी (45)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (45) कोई जीव जिस वस्तु का त्याग करे, उस से ऊँची वस्तु का ग्रहण करना यदि उसे आता हो, तभी वह उसका सच्चा त्याग कर सकता है। पुण्यराग का सच्चा त्याग वही कर सकता है जिसे वीतरागभाव ग्रहण करना आता हो। त्याग लाभदायक होना चाहिए, हानिकारक नहीं। जीव जो त्यागे उसकी अपेक्षा उच्च वस्तु, उच्च भाव प्राप्त करे, तभी उसका वह त्याग लाभदायी कहा जाएगा। भगवान महावीर का त्याग ऐसा था कि उन्होंने जिन हेयतत्त्वों को छोड़ा, उनसे विशेष उपादेय तत्वों को ग्रहण किया। उनकी शुद्धता की श्रेणी का क्या कहना, जब वे निर्विकल्पता के महान् आनन्द में डूबते थे, तब उनके शुद्धोपयोग की प्रचण्डता देखकर बेचारी शेष चार संज्वलन कषाय भी इस प्रकार चुपचाप होकर छिप जाती थीं, कि कषाय जीवित है या मृत- यह जानना भी कठिन लगता था, क्योंकि उस समय उनकी कोई प्रवृत्ति दिखाई नहीं देती थी। इस प्रकार एक ओर प्रभु महावीर कषायों को जीत रहे थे, तब दूसरी ओर त्रिशला माता भी वीर के वीतराग चारित्र का अनुमोदन करके अपने मोहबन्धन को ढीला कर रही थीं।  ‘अरे रे! राजभवन में जिसका लालन-पालन हुआ है, ऐसा मेरा पुत्र वन-जंगल में कैसे ...

भगवान महावीर स्वामी (44)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (44) दीक्षा कल्याणक महोत्सव अभेद आत्मानुभूति में लीन उन श्रमण-भगवंत महावीर को वन्दन हो! वैशाली के नागरिक अपने प्रिय राजपुत्र को ऐसी वीतरागदशा में देखकर आश्चर्य को प्राप्त हुए। वे न तो हर्ष कर सके और न शोक! बस, मानो हर्ष-शोकातीत ऐसी वीतरागता ही करने योग्य है - ऐसा उस कल्याणक प्रसंग का वातावरण था। हर्ष और शोक के बिना भी मोक्ष का महोत्सव मनाया जा सकता है - ऐसा प्रभु का यह दीक्षा कल्याणक महोत्सव घोषित करता था। उन चैतन्यवीर को वीतरागदशा में देखकर धर्मज्ञों के अंतर में चारित्र की लहरें उठती थीं। मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के संध्याकाल स्वयं दीक्षित होकर महावीर मुनिराज षष्ठी के उपवास का तप धारण करके अभ्रमभाव से चैतन्यध्यान में लीन हो गये। अहा, दो रत्न से वृद्धिगत होकर भगवान त्रिरत्नवंत हुए; तीन ज्ञान से चार ज्ञानवंत हुए। अनेक महान लब्धियाँ सेवा करने आ गईं। उनकी अतिन्द्रिय ज्ञानधारा तो केवलज्ञान के साथ केलि करने लगी। केवलज्ञान ने उसी समय अपने ज्येष्ठ पुत्र समान मनःपर्ययज्ञान को भेजकर शीघ्र ही अपने आगमन की पूर्व सूचना दे दी। परन्तु प्रभु का लक्ष्य उस मनःपर्यय की ओर...

भगवान महावीर स्वामी (43)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (43)    आज पूरी रात राजकुमार वर्द्धमान चैतन्य की अनोखी धुन में थे; निद्रा का तो नाम ही नहीं था। उपयोग बार-बार चैतन्य की अनुभूति में स्थिर हो जाता था। परभावों से थक कर विमुख हुआ उनका उपयोग अब आनन्दमय निजघर में ही सम्पूर्ण रूप से स्थिर रहना चाहता था। तीस वर्ष के राजकुमार का चित्त आज अचानक ही संसार से विरक्त हो गया है; मोक्षार्थी जीव प्रशम हेतु किसी बाह्य कारणों को नहीं ढूँढ़ता। प्रशम तो उसके अन्तर से स्वयमेव स्फुरित होता है। आज प्रातःकाल महावीर ने सिद्धों का स्मरण करके आत्मा का ध्यान किया। आज उनके वैराग्य की धारा कोई अप्रतिम थी। विशुद्धता में वृद्धि हो रही है। उपयोग क्षणभर में अन्तर्मुख निर्विकल्प हो जाता है और पुनः बाहर आ जाता है, परन्तु बाहर में उसे चैन नहीं पड़ता। वह सर्वत्र से छूटकर, विभावरूप परदेश से लौटकर स्वभाव रूप स्वदेश में स्थिर रहना चाहता है। बारम्बार ऐसी दशा में झूलते हुए प्रभु के मतिज्ञान में सहसा कोई विशिष्ट निर्मलता झलक उठी, उनको जातिस्मरण हुआ। स्वर्गलोक के दिव्य दृश्य देखे, चक्रवर्ती का वैभव देखा, सिंह देखा, सम्यक्त्व का बोध देते हुए मु...

भगवान महावीर स्वामी (42)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (42)  भगवान महावीर : वैराग्य और दीक्षा (मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी) वीरकुमार चैतन्य-उद्यान की प्रशंसा कर रहे थे। इतने में एक कुमार ने सुन्दर पुष्प लाकर आदर सहित वीरकुमार के चरणों में रख दिया। सब लोग आनन्दपूर्वक उसे देख रहे थे। तब वीरकुमार ने गम्भीरता से कहा - बन्धु! यह पुष्प वृक्ष की डाल पर जैसी शोभा दे रहा था, वैसी अब नहीं दे रहा। उस की शोभा नष्ट हो गई है। वह माता से बिछुड़े बालक की भांति मुरझा रहा है। पुष्प को उसकी डाली से पृथक् करना तो वृक्ष और पुष्प दोनों की सुन्दरता को नष्ट कर देना है। देखो! यह कैसा शोकमग्न दिखाई दे रहा है। अपनी प्रसन्नता के लिए  हम दूसरे जीवों का सौन्दर्य नष्ट कर दें, वह क्या उचित लगता है? दूसरों को कष्ट दिये बिना हम आनन्द प्रमोद करें, वही उचित है। इस प्रकार सहज रूप से अहिंसादि की प्रेरणा करके वीरकुमार वीतरागता फैला रहे थे। धन्य उनका जीवन! गृहवास में भी धर्मात्मा राजपुत्र का जीवन अलौकिक था। वे गृहवासी भगवान बार-बार सामायिक का प्रयोग भी करते थे। सामायिक की स्थिति में वे इस प्रकार मन की एकाग्रतापूर्वक धर्मध्यान रूप आत्मचिंतन करते थे...

भगवान महावीर स्वामी (41)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (41) एक सभाजन ने आतुरता से पूछा - प्रभो! ‘आत्मा अनन्तशक्ति सम्पन्न है’, तो उसमें कैसी-कैसी शक्तियाँ हैं, वह आपके श्रीमुख से सुनने की उत्कण्ठा है। उसके उत्तर में मोक्षसाधक युवराज महावीर ने चैतन्य स्वरूप आत्मा की अनन्त शक्तियों का अद्भुत, परम अध्यात्मरस पूरित वर्णन किया - अभेदरूप ज्ञानलक्षण द्वारा लक्षित करके ज्ञायक का अनुभव करने पर जीवत्व, चेतन, सुख, वीर्य, प्रभुता, विभुता, स्वसंवेदनता आदि अनन्त चैतन्य शक्तिरूप से आत्मा एक साथ वेदन अर्थात् अनुभव में आता है। अहो, जिसकी प्रत्येक शक्ति की महत्ता अपार है, ऐसी अनन्त शक्तियाँ, वे भी रागरहित शुद्ध परिणमन युक्त ऐसी अगाध शक्तिवान आत्मा की अद्भुत महिमा एक भावी तीर्थंकर के श्रीमुख से साक्षात सुनकर अनेक भव्यजीव उस चैतन्यमहिमा में इतने गहरे उतर गये कि तत्क्षण ही महा आनन्द सहित निर्विकल्प आत्मानुभूति को प्राप्त हुए और अनन्त शक्तियों का स्वाद एक साथ स्वानुभूति में चख लिया।  सहजानन्द स्वरूप अनंत शक्तिसंपन्न चैतन्य चित् चमत्कार चिंतामणि भगवान की जय! वाह! आत्मा के अपार वैभव का मधुर वर्णन सुनकर सभाजन शांत रस में निम...

भगवान महावीर स्वामी (40)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (40) राजसभा में युवराज महावीर की धर्मचर्चा (वीर की अपूर्व महिमा का वर्णन) भगवान वीर कुँवर तीस वर्ष के हो गए थे। युवा होने पर भी आध्यात्म रस के रसिक वे राजकुमार राजयोगी के समान जीवन जीते थे। कभी-कभी वे चैतन्य की धुन में लीन हो जाते और कभी तो अर्धरात्रि के समय राजभवन से बाहर निकलकर उद्यान में खड़े-खड़े ध्यान धरते थे। मानो कोई मुनिराज खड़े हों। ऐसा होने पर भी दिनभर शून्यमनस्क या उदास नहीं रहते थे। वे सबके साथ हिलते-मिलते और प्रजाजनों के सुख-दुःख की बातें सुनते थे। यद्यपि राज्य का कार्यभार संभालने में उनकी रुचि नहीं थी, फिर भी वे कई बार राजसभा में जाते और पिता सिद्धार्थ के समीप बैठते थे। उनके आगमन से राजसभा सुशोभित हो उठती थी, सभाजन उनके दर्शन से आनंदित होते और उनकी मधुर वाणी सुनकर मुग्ध हो जाते थे। एक बार सभाजनों ने महाराजा सिद्धार्थ से प्रार्थना की - “हे देव! आज की राजसभा अद्भुत लग रही है। वीर कुंवर को देखकर मानो अंतर में रत्नत्रय का उद्यान खिल उठा हो, ऐसी प्रसन्नता हो रही है। उनके श्रीमुख से हम सब आत्मतत्त्व की अचिन्त्य महिमा सुनना चाहते हैं।” महाराजा ने ...

तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (39)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (39) सन्मतिनाथ (संजय और विजय मुनिवरों का प्रसंग) तीर्थंकर वर्धमान जब बाल्यावस्था में थे, उस काल में पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; उस शासन में संजय और विजय नाम के दो मुनि विचर रहे थे; रत्नत्रयवन्त वे मुनिवर आकाशगामी थे। स्वानुभूति की चर्चा करते-करते वे सिद्ध क्षेत्र की यात्रा हेतु सम्मेद शिखर तीर्थ भूमि में पधारे और वहाँ अनन्त सिद्धों का स्मरण करके आत्मध्यान किया। पश्चात् संजय मुनि बोले- अहा! स्वानुभूति में आत्मा स्पष्ट ज्ञात होता है। वहाँ मतिश्रुतज्ञान होने पर भी वे अतीन्द्रिय भाव से काम करते हैं। इसलिए स्वसंवेदन ये प्रत्यक्षपना है। उसमें कोई संदेह नहीं रहता। तब विजय मुनि ने कहा - “हे मुनिराज! आपकी बात सत्य है। परंतु मतिश्रुतज्ञान के निर्बल होने से किसी सूक्ष्म ज्ञेयों में संदेह भी बना रहता है। देखो न! सूक्ष्म अगुरुलघुत्वजनित षट्गुण वृद्धिहानि के किसी गंभीर स्वरूप का हल अभी हमें़ नहीं मिलता और सूक्ष्म-शल्य रहा ही करती है। पार्श्वनाथ भगवान तो मोक्ष पधार गए; वर्धमान तीर्थंकर अभी बाल्यावस्था में हैं। किन्हीं केवली या श्रुतकेवली के दर्शन से ही हमा...

भगवान महावीर स्वामी (38)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (38) एक ओर बालक महावीर...., दूसरी ओर क्रोधाग्नि में दहकता मदोन्मत्त हाथी। बालक महावीर धीर-गंभीर चाल से उस ओर बढ़ने लगे, जिधर से हाथी दौड़ता आ रहा था। वे हाथी के सामने आकर उस पर दृष्टि स्थिर करके खड़े हो गए और क्षण दो क्षण शांत दृष्टि से हाथी को देखते रहे। अहा! कैसी शान्तरस भरी थी वह अमी दृष्टि! मानो उससे अमृत झर रहा था। उस दृष्टि द्वारा महावीर कह रहे थे कि अरे गजराज! यह पागलपन छोड़! लोग तेरे पागलपन का कारण नहीं जानते, किन्तु मैं जानता हूँ। अरे! ये चार गति के दुःख और उनमें यह तिर्यंच गति की वेदना.... उससे तू अकुला गया है और छूटने को अधीर हुआ है.... परन्तु धैर्य रख, शांत हो! उद्वेग करने से यह दुःख दूर नहीं होगा। अहा! हाथी तो मानो भगवान के नेत्रों से झरते हुए शान्त रस के स्रोत का पान कर रहा हो, इस प्रकार टकटकी बाँधकर प्रभु की ओर देखता ही रह गया। आसपास के वातावरण को वह भूल गया। वाह! कैसी शान्ति है इन कुमार के मुखमण्डल पर! मुझे भी ऐसी शान्ति प्राप्त हो जाए, तो कितना अच्छा हो! ऐसा विचारते हुए वह हाथी बिल्कुल शान्त हो गया। लोगों ने यह चमत्कार देखा; परन्तु वे समझ...

भगवान महावीर स्वामी (37)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (37) शान्तदृष्टि से हाथी को वश में करने की घटना देखो! देखो!! वह दिख रहा है वैशाली राज्य का नंदावर्त राजप्रासाद; जिस पर अहिंसा धर्म की ध्वजा फहरा रही है। कैसी अद्भुत है इस राजप्रासाद की शोभा! क्यों न हो, बालतीर्थंकर जिसके अन्तर में वास करते हों, उसकी शोभा का क्या कहना! उस प्रासाद की शोभा चाहे जैसी हो, तथापि इन्द्रियगम्य एवं नश्वर थी; जब कि उसमें निवास करने वाले प्रभु के सम्यक्त्वादि गुणों की शोभा अतीन्द्रियगोचर एवं अविनश्वर थी। प्रभु के पुण्य ही उस प्रासाद का रूप धारण करके, सेवक रूप में सेवा करने आये थे। उस सात खण्ड ऊँचे राजप्रासाद के प्रांगण में छोटे-से वीरप्रभु खड़े हों, तब प्रेक्षकों को वीर प्रभु बड़े लगते थे और प्रासाद छोटा लगता था। राजप्रासाद के निकट हस्तिशाला में कितने ही श्रेष्ठ हाथी शोभा देते थे। राजप्रासाद के मार्ग से आने-जाने वाले हजारों प्रजाजनों को वर्धमान कुँवर के दर्शनों की उत्कण्ठा रहने से उनकी दृष्टि राजप्रासाद के प्रत्येक झरोखे पर घूम जाती थी और कभी किसी को झरोखे में खड़े हुए वीरप्रभु के दर्शन हो जाते, तो उसका हृदय आनन्द से नाच उठता था......

भगवान महावीर स्वामी (36)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (36) बालवीर की महा-वीरता जीत लिया मिथ्यात्व-विष, सम्यक् मंत्र प्रभाव। नाग लगा फुफकारने, प्रभु को समता भाव।। जहाँ इन्द्रियातीत भाव है, वहाँ नाग क्या करता? रूप बदलकर बना देव वह, नमन वीर को करता।। फूँ.... फूँ.... करता हुआ एक भयंकर विषैला नाग अचानक ही फुँफकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देखकर सब राजकुमार इधर-उधर भागने लगे; क्योंकि उन बालकों ने पहले कभी ऐसा भयंकर सर्प नहीं देखा था। परंतु महावीर न तो भयभीत हुए और न भागे। अहिंसा के अवतार महावीर को मारनेवाला कौन है? वे तो निर्भयता से सर्प की चेष्टाएँ देखते रहे। जैसे मदारी साँप का खेल कर रहा हो और हम देख रहे हों, तदनुसार वर्धमान कुमार उसे देख रहे थे। शांतचित्त से निर्भयतापूर्वक अपनी ओर देखते हुए वीरकुमार को देखकर नागदेव आश्चर्यचकित हो गया कि वाह! यह वर्धमान कुमार आयु में छोटे होने पर भी महान हैं, वीर हैं। उसने उन्हें डराने के लिये अनेक प्रयत्न किये, बहुत फुँफकारा.... परंतु वीर तो अडिग रहे, वे निर्भयता से सर्प के साथ खेलने के लिये उसकी ओर जाने लगे। दूर खड़े राजकुमार यह देखकर घबराने लगे कि अब क्या होगा? सर्प को भगा...

भगवान महावीर स्वामी (35)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (35) माता को आनंदित करके वीरकुमार बोले - “माँ, मेरे मित्र बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनके पास जाता हूँ।” माँ ने कहा - “अवश्य जाओ, बेटा! सबको आनंद देने के लिये तो तुम्हारा अवतार है।” माताजी से आज्ञा लेकर वीरकुमार राजगृह में आये। उन्हें देखकर ही देवकुमार तथा राजकुमार हर्षपूर्वक जय-जयकार करने लगे और अनेक प्रकार से उनका सम्मान किया। वर्धमान कुमार ने भी प्रसन्न दृष्टि से सबको देखा और माताजी के साथ हुई आनन्दकारी चर्चा कह सुनायी। यह सुनकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। एक राजकुमार बोले - अहा! तीर्थंकर के मित्र होने से अपने को उनके साथ रहने तथा खेलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, तो हम सब उनके साथ मोक्ष की साधना भी अवश्य करेंगे। वे दीक्षा ग्रहण करेंगे, तब उनके साथ हम सब भी दीक्षा लेंगे। यह सुनकर देवकुमारों के मुख पर उदासी छा गई।  तुम क्यों उदास हो गये, मित्र?  ऐसा पूछने पर देवकुमारों ने कहा - हे मित्र! तुम तो मनुष्य पर्याय में हो, इसलिए प्रभु के साथ दीक्षा ले सकोगे; परन्तु हम देवपर्याय में होने के कारण प्रभु के साथ दीक्षा नहीं ले सकते, इस विचार से हम...

भगवान महावीर स्वामी (34)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (34)    पुत्र - माता! मेरी मोक्षसाधिका, धन्य-धन्य है तुझ को..... तव स्नेह भरी मीठी आशीष, प्यारी लगती है मुझको... माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।। माता - बेटा! तेरी अद्भुत महिमा, सरस हृदय जैसी है.... तेरा दर्शन करके भविजन, मोह के बन्धन तोड़े हैं.... बेटा! दर्शन तेरा रे.... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता! तेरी मीठी वाणी, मानो फूल ही बरस रहे हैं.... तेरे हृदय हेतु फव्वारे, इधर-इधर झरते हैं.... माता! दर्शन तेरा रे... जगत को आनन्ददायक है।। माता - तेरी वाणी सुनकर भविजन, मोक्षमार्ग में दौड़े... चेतन रस का स्वाद चखकर, राजपाट सब छोड़े.... बेटा जन्म तुम्हारा रे.... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता मुझको जगे भावना, कब मैं बनूँ वैरागी... रागमयी बंधन सब तोड़ूँ, बनूँ परिग्रह त्यागी.... माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।। माता - बेटा! तू तो पाँच वर्ष का, पर गंभीर बहुत है... गृहवासी तू फिर भी उदासी, दशा मोह से विरहित है... बेटा! जन्म तुम्हारा रे... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता! तू तो अंतिम माता, फिर नहीं होगी माता... रत्नत्रय से केवल मि...

भगवान महावीर स्वामी (33)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (33)  वर्धमानकुमार ने प्रातःकाल सिद्धों का स्मरण करके आत्मचिन्तन किया। फिर माता के पास आये। त्रिशला माता ने बड़े उत्साहपूर्वक पंचपरमेष्ठी का स्मरण करके प्रिय पुत्र को तिलक किया और बलैयाँ लेकर मंगल आशीर्वाद दिया। माता का आशीष लेकर वीरकुमार प्रसन्न हुए और उनसे आनन्दपूर्वक चर्चा करने लगे।  अहा! माताजी के साथ वीर कुँवर कैसी आनन्ददायक चर्चा करते हैं, वह सुनने के लिये हम राजा सिद्धार्थ के राजभवन में चलें! त्रिशला माता के राजभवन में वाह! देखो, यह राजा सिद्धार्थ का राजभवन कितना भव्य एवं विशाल है! इसका शृंगार भी कितने अद्भुत ढंग से किया गया है! आज चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को वीरप्रभु का जन्म दिन होने से राजभवन के प्रांगण में हजारों प्रजाजन वीर कुँवर के दर्शनार्थ एकत्रित हुए हैं; आज वे अपनी आयु के पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। राजभवन के भीतर उस कक्ष की शोभा तो स्वर्ग की इन्द्रसभा को भी भुला दे - ऐसी है; परन्तु अपना लक्ष्य वहाँ नहीं जाता। अपनी दृष्टि तो सीधी महावीर कुँवर पर केन्द्रित है। अहा, वे कैसे सुशोभित हो रहे हैं! त्रिशला माता अपने इकलौते पुत्र ...