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सिद्धों को नमस्कार

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  सिद्धों को नमस्कार  ( पारुल जैन, दिल्ली) अष्ट कर्म से रहित हैं जो प्रभु, अष्ट गुणों से सहित हुए। निज घर में जो रहने वाले, निज में ही जो व्यस्त हुए ॥ स्पर्श वर्ण रस गंध रहित जो, अविनाशी अविकारी हैं। किंचित कम वो तनुमात्र से, पूर्व भव अवगाहनी हैं॥ शाश्वत निर्मल अशरीरी जो, अनंत गुण भंडारी हैं। निज आनन्द का पान करें जो, निज में सयंम धारी हैं॥ पर से भिन्न एकत्व विभक्त का, आनन्द निज में धारी हैं। सभी विकारी भावों से हट, निज स्वभाव के धारी हैं॥ मोक्ष मार्ग के नेता भी हैं, हैं वो भी सर्वज्ञ प्रभु । लेकिन हित उपदेश न देते निज में हैं वो लीन प्रभु ॥ ऐसे समता धारी को मैं, विनय भाव से करूँ प्रणाम । उन जैसा बनने की खातिर मैं भी निज में करूँ विराम॥ स्वयं पूर्ण हूँ मैं भी निज में, शाश्वत आनन्द धारी हूँ। कर्म रहित मैं होऊँ प्रभुवर, यही भावना भाती हूँ ॥ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरण...

पांचवीं ढाल का सारांश

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(48) पांचवीं ढाल का सारांश यह बारह भावनाएँ चारित्रगुण की आंशिक शुद्ध पर्यायें हैं; इसलिये वे सम्यग्दृष्टि जीव को ही हो सकती हैं। सम्यक् प्रकार से यह बारह प्रकार की भावनाएँ भाने से वीतरागता की वृद्धि होती है; उन बारह भावनाओं का चिंतवन मुख्यरूप से तो वीतरागी दिगम्बर जैन मुनिराज को ही होता है तथा गौणरूप से सम्यग्दृष्टि को होता है। जिस प्रकार पवन के ल ग ने से अग्नि भभक उठती है, उसी प्रकार अन्तरंग परिणामों की शुद्धता सहित इन भावनाओं का चिंतवन करने से समताभाव प्रगट होता है और उससे मोक्षसुख प्रगट होता है। स्वोन्मुखतापूर्वक इन भावनाओं से संसार, शरीर और भोगों के प्रति विशेष उपेक्षा होती है और आत्मा के परिणामों की निर्मलता बढ़ती है। अनित्यादि चिंतवन द्वारा शरीरादि को बुरा जानकर, अहित मानकर उनसे उदास होने का नाम अनुप्रेक्षा नहीं है, क्योंकि यह  तो जिस प्रकार पहले किसी को मित्र मानता था तब उसके प्रति राग  था और फिर उसके अवगुण देखकर उसके प्रति उदासीन हो ग या,   समीपकर पहले शरीरादिसे राग था, किन्तु बाद में उनके अनित्यादि अवगुण देखकर उद...

बधाई

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बधाई कहाँ सोवे महारानी लल्ला गोदी ले लेरी । गोदी ले लेरी अमृत घूंटी दे लेरी॥ कहाँ..... घर घर नारी मंगल गावें, सुर नर खग सब घूम मचावें । जग में हो रहा हल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ..... १ घड़ी आज से सुख की आई, जल्दी उठकर जिनवर भाई। भरवा अपना पल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ.....२ कहीं रतन सुगन बरसाते कहीं भिखारी भीख में पाते। कंचन कपड़ा गल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ.... ३ जगत ‘सुमत’ शिव मग दर्शावें, गेंद समान कर्म लुढ़कावें।   चार ज्ञान का बल्ला, लल्ला गोदी ले लेरी॥ कहाँ..... ४।।   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

तेरे दर को

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  तेरे दर को     तेरे दर को छोड़ कर किस दर जाऊँ मैं। </ style="text-align: center;">    सुनता मेरी कौन है, किसे सुनाऊँ मैं॥ जब से नाम भुलाया तेरा, लाखों कष्ट उठाये हैं। न जाने इस जीवन के अन्दर कितने पाप कमाए हैं॥ हूँ शर्मिन्दा आपसे, क्या बतलाऊँ मैं...... मेरे दुष्ट कर्म ही मुझको, तुमसे न मिलने देते हैं। जब मैं चाहूँ दर्शन पाना, रोक तभी वे लेते हैं॥ छींटा दो प्रभु ज्ञान का, शरण में आऊँ मैं...... मोह मिथ्या में रहकर स्वामी, नाम तिहारा भूला था। जिसको समझा था सुख मैंने, दुःख का गाोरख धन्धा था॥ मोह माया को छोड़ कर शरण खड़ा हूँ मैं....... बीत चुकी सो बीत चुकी अब, शरण तिहारी आया हूँ । दर्शन भिक्षा पाने को, दो नयन कटोरे लाया हूँ॥ मन में अपने ज्ञान का दीप जलाऊँ मैं.... सुनता मेरी कौन है किसे सुनाऊँ मैं॥ तेरे दर को..... ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसल...
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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(47) ११-बोधिदुर्लभ भावना अंतिम-ग्रीवक लौं की हद, पायो अनन्त विरियाँ पद; पर सम्यग्ज्ञान न लाघौ, दुर्लभ निजमें मुनि साधौ ।।१३।। अन्वयार्थः- (अंतिम) अंतिम नौवें (ग्रीवकलौंकी हद) ग्रैवेयक तक के (पद) पद (अनन्त विरियाँ) अनन्त बार (पायो) प्राप्त किये, तथापि (सम्यग्ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (न लाघौ) प्राप्त न हुआ; (दुर्लभ) ऐसे दुर्लभ सम्यग्ज्ञान को (मुनि) मुनिराजों ने (निजमें) अपने आत्मा में (साधौ) धारण किया है। भावार्थः- मिथ्यादृष्टि जीव मंद कषाय के कारण अनेक बार ग्रैवेयक तक उत्पन्न होकर अहमिन्द्र पद को प्राप्त हुआ है, परन्तु उसने एक बार भी सम्यग्ज्ञान प्राप्त नहीं किया, क्योंकि सम्यग्ज्ञान प्राप्त करना अपूर्व है। उसे तो स्वोन्मुखता के अनन्त पुरुषार्थ द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है और ऐसा होने पर विपरीत अभिप्राय आदि दोषों का अभाव होता है। सम्यग्दर्शन.ज्ञान आत्मा के आश्रय से ही होते हैं । पुण्य से, शुभराग से, जड़ कर्मादि से नहीं होते। इस जीव ने बाह्य संयोग, चारों गति के लौकिक पद अनन्तबार प्राप्त किये हैं, किन्तु निज आत्मा का यथार्थ स्वरूप स्व...

छहढाला(46)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(46) ९--निर्जरा भावना निज काल पाय विधि झरना, तासों निज काज न सरनाय तप करि जो कर्म खिपार्वै, सोई शिवसुख दरसार्वै ॥११॥ अन्वयार्थ -- जो (निज काल) अपनी-अपनी स्थिति (पाय) पूर्ण होने पर (विधि) कर्म (झरना) खिर जाते हैं, (तासों) उससे (निज काज) जीव का धर्मरूपी कार्य (न सरना) नहीं होता, किन्तु (जो) निर्जरा, (तप करि) आत्मा के शुद्ध प्ररूपण द्वारा (कर्म) कर्मों का (खिपार्वै) नाश करती है, वह अविपाक अथवा सकाम निर्जरा है। (सोई) वह (शिवसुख) मोक्ष का सुख (दरसार्वै) दिखलाती है। भावार्थ- अपनी-अपनी स्थिति पूर्ण होने पर कर्मों का खिर जाना तो प्रति समय अज्ञानी को भी होता है, वह कहीं शुद्धि का कारण नहीं होता। परन्तु सम्यग्दर्शन--ज्ञान--चारित्र द्वारा अर्थात् आत्मा के शुद्ध प्ररूपण द्वारा जो कर्म खिर जाते हैं, वह अविपाक अथवा सकाम निर्जरा कहलाती है। तदनुसार शुद्धि की वृद्धि होते होते सम्पूर्ण निर्जरा होती है। तब जीव शिवसुख (सुख की पूर्णतारूप मोक्ष) प्राप्त करता है। ऐसा जानता हुआ सम्यग्दृष्टि जीव स्वद्रव्य के आलम्बन द्वारा जो शुद्धि की वृद्धि करता है, वह "निर्...

वीर पालना

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वीर पालना वीर स्वामी का सुन्दर अधर पालना ।  सज रहा है सिद्धार्थ के घर पालना ॥ टेक  जिसमें रेशम की सुन्दर पड़ी डोरियाँ ।  सच्चे मोती लगाये—चहुँ ओरियाँ ॥  है सुशोभित यह सुन्दर अधर पालना ॥ वीर० ॥ १  झुन झुना माता त्रिशलावती ले रही ।  वीर के हाथ में हँस के जब दे रही ॥  वीर का हिल रहा बेखतर पालना ॥ वीर० ॥ २  देव इन्द्रादि मिल पुष्प बरसा रहे ।  सारे नर नारी हृदय में हर्षा रहे ॥  देखने जा रहा हर बसर पालना ॥ वीर० ॥ ३  जन्म उत्सव का दिन मिल मनाओ सभी ।  यह ‘किशन’ ने लिखा है अमर पालना ॥ वीर० ॥ ४ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

छहढाला (45) पाँचवीं ढाल

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(45) ७-आस्रव भावना जो योगनकी चपलाई तातैं है आस्रव भाई; आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हें निरवेरे ॥९॥ अन्वयार्थ -- (भाई) हे भव्य जीव! ( योगनकी ) योगों की (जो) जो (चपलाई) चंचलता है (तातैं) उससे (आस्रव) आस्रव (ह्वै) होता है, और (आस्रव) वह आस्रव (घनेरे) अत्यन्त (दुखकार) दुःखदायक है, इसलिये (बुधिवन्त) बुद्धिमान (तिन्हें) उसे (निरवेरे) दूर करें। भावार्थ - विकारी शुभाशुभभावरूप जो अरूपी दशा जीव में होती है वह भावास्रव है; और उस समय नवीन कर्मयोग्य रजकणों का स्वयं स्वतः आना (आत्मा के साथ एक क्षेत्र में आगमन होना) सो द्रव्यास्रव है।  उसमें जीव की अशुद्ध पर्यायें निमित्त मात्र हैं। पुण्य और पाप दोनों आस्रव और बन्ध के भेद हैं। पुण्य - दया, दान, भक्ति, पूजा, व्रत आदि शुभराग सरागी जीव को होते हैं, वे अरूपी अशुभ भाव हैं, और वह भावपुण्य है। तथा उस समय नवीन कर्मयोग्य रजकणों का स्वयं स्वतः आना (आत्मा के साथ एक क्षेत्र में आगमन होना) सो द्रव्यपुण्य है। उसमें जीव की अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र है।, पाप - हिंसा, असत्य, चोरी इत्यादि जो अशुभभाव हैं वह ...

अक्षय तृतीया

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अक्षय तृतीया अक्षय तृतीया पर्व है, मंगलमय अविकार, ऋषभदेव मुनिराज का हुआ प्रथम आहार। दीक्षा लेकर ऋषभ मुनीश्वर, छह महीने उपवास किया, फिर आहार निमित्त ऋषीश्वर, जगह जगह परिभ्रमण किया। कोई हाथी घोड़े वस्त्राभूषण, रत्नों के भर थाल, ले सन्मुख आदर से आवें, देख साधु लौटे तत्काल।  नहीं जानें आहार विधि, इससे सब ही लाचार हुए, अन्तराय का उदय रहा, तेरह महीने नौ दिवस हुए।  धन्य मुनीश्वर धन्य आत्मबल, आकुलता का लेश नहीं, तृप्त स्वयं में, मग्न स्वयं में, किचित भी संक्लेश नहीं। उदय नहीं हो दुःख का कारण, यदि स्वभाव का आश्रय हो, निज से च्युत हो दुःखी रहे, तो फिर उपचार उदय पर हो।  दोष देखना किन्तु उदय का , नहीं ये नीति जिनागम में, उदय उदय में ही रहता है, नहीं प्रविष्ट हो आतम में। भेद ज्ञान कर द्रव्य दृष्टि कर, स्वयं स्वयं में मग्न रहो, स्वाश्रय से ही शांति मिलेगी, आकुलता नहीं व्यर्थ करो। अशरण जग में अरे आत्मन, नहीं कोई हो अवलम्बन, तज कर झूठी आस बनाई, अपने प्रभु का करो भजन। इन्द्रादिक से सेवक चक्री, कामदेव से सुत जिनके, देखा एक समय पहले भी, नहीं आहार हुए उनके। हुई योग्यता सहजपने ही, सर्व निमित्त...

छहढाला (44)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(44) ५-अन्यत्व भावना जल-पय ज्यों जिय-तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला; तो प्रगट जुदे धन धामा, क्यों है इक मिलि सुत रामा ।।७।। अन्वयार्थ - (जिय-तन) जीव और शरीर (जल-पय ज्यों) पानी और दूध की भांति (मेला) मिले हुए हैं (पैं) तथापि (भेला) एकरूप (नहिं) नहीं हैं, (भिन्न-भिन्न) पृथक्-पृथक् हैं, (तो) तो फिर (प्रगट) जो बाह्य में प्रगटरूप से (जुदे) पृथक् दिखाई देते हैं। ऐसे (धन) लक्ष्मी, (धामा) मकान, (सुत) पुत्र और (रामा) स्त्री आदि (मिलि) मिलकर (इक) एक (क्यों) कैसे (ह्वै) हो सकते हैं?  भावार्थ-- जिस प्रकार दूध और पानी एक आकाश-क्षेत्र में मिले हुए हैं, परन्तु अपने अपने गुण आदि की अपेक्षा से दोनों बिल्कुल भिन्न-भिन्न हैं; उसी प्रकार यह जीव और शरीर भी मिले हुए- एकाकार दिखाई देते हैं, तथापि वे दोनों अपने अपने स्वरूप आदि की अपेक्षा से (स्वद्रव्य क्षेत्र-काल-भाव से ) बिल्कुल पृथक् पृथक् हैं, तो फिर प्रगटरूप से भिन्न दिखाई देने वाले ऐसे मोटर गाडी, धन, मकान, बाग, पुत्र, पुत्री, स्त्री आदि अपने साथ कैसे एक हो सकते हैं? अर्थात् स्त्री पुत्र आदि कोई ...

प्रभु रथ में

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प्रभु रथ में (रथ में विराजमान भगवान के सामने गाने का भजन) प्रभु रथ में हुए सवार, नक्कारा बाज रहा । टेक  क्या ठुमक ठुमक रथ चलता है । ये छतर शीश पर हिलता है ॥  क्या छाई आज बहार ॥ नक्कारा० १ किस छवि से नाथ विराज रहे । नासा दृष्टि से छाज रहे ॥  अद्भुत बाजे सब बाज रहे । सब बोलो जय जय कार ॥ नक्कारा० २ ढोलक अरु बाजे नकारा है । बाजे का स्वर अति प्यारा है ॥  तबले का ठुमका न्यारा है । झाँझन की हो झङ्कार ॥ नक्कारा० ३ कहे "किशन" जा रचें वाला है । तेरे नाम पै वो मतवाला है ।  सब पियो धरम का प्याला है । हो भव सागर से पार ॥ नक्कारा० ४   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद