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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(47) ११-बोधिदुर्लभ भावना अंतिम-ग्रीवक लौं की हद, पायो अनन्त विरियाँ पद; पर सम्यग्ज्ञान न लाघौ, दुर्लभ निजमें मुनि साधौ ।।१३।। अन्वयार्थः- (अंतिम) अंतिम नौवें (ग्रीवकलौंकी हद) ग्रैवेयक तक के (पद) पद (अनन्त विरियाँ) अनन्त बार (पायो) प्राप्त किये, तथापि (सम्यग्ज्ञान) सम्यग्ज्ञान (न लाघौ) प्राप्त न हुआ; (दुर्लभ) ऐसे दुर्लभ सम्यग्ज्ञान को (मुनि) मुनिराजों ने (निजमें) अपने आत्मा में (साधौ) धारण किया है। भावार्थः- मिथ्यादृष्टि जीव मंद कषाय के कारण अनेक बार ग्रैवेयक तक उत्पन्न होकर अहमिन्द्र पद को प्राप्त हुआ है, परन्तु उसने एक बार भी सम्यग्ज्ञान प्राप्त नहीं किया, क्योंकि सम्यग्ज्ञान प्राप्त करना अपूर्व है। उसे तो स्वोन्मुखता के अनन्त पुरुषार्थ द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है और ऐसा होने पर विपरीत अभिप्राय आदि दोषों का अभाव होता है। सम्यग्दर्शन.ज्ञान आत्मा के आश्रय से ही होते हैं । पुण्य से, शुभराग से, जड़ कर्मादि से नहीं होते। इस जीव ने बाह्य संयोग, चारों गति के लौकिक पद अनन्तबार प्राप्त किये हैं, किन्तु निज आत्मा का यथार्थ स्वरूप स्व...

छहढाला(46)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(46) ९--निर्जरा भावना निज काल पाय विधि झरना, तासों निज काज न सरनाय तप करि जो कर्म खिपार्वै, सोई शिवसुख दरसार्वै ॥११॥ अन्वयार्थ -- जो (निज काल) अपनी-अपनी स्थिति (पाय) पूर्ण होने पर (विधि) कर्म (झरना) खिर जाते हैं, (तासों) उससे (निज काज) जीव का धर्मरूपी कार्य (न सरना) नहीं होता, किन्तु (जो) निर्जरा, (तप करि) आत्मा के शुद्ध प्ररूपण द्वारा (कर्म) कर्मों का (खिपार्वै) नाश करती है, वह अविपाक अथवा सकाम निर्जरा है। (सोई) वह (शिवसुख) मोक्ष का सुख (दरसार्वै) दिखलाती है। भावार्थ- अपनी-अपनी स्थिति पूर्ण होने पर कर्मों का खिर जाना तो प्रति समय अज्ञानी को भी होता है, वह कहीं शुद्धि का कारण नहीं होता। परन्तु सम्यग्दर्शन--ज्ञान--चारित्र द्वारा अर्थात् आत्मा के शुद्ध प्ररूपण द्वारा जो कर्म खिर जाते हैं, वह अविपाक अथवा सकाम निर्जरा कहलाती है। तदनुसार शुद्धि की वृद्धि होते होते सम्पूर्ण निर्जरा होती है। तब जीव शिवसुख (सुख की पूर्णतारूप मोक्ष) प्राप्त करता है। ऐसा जानता हुआ सम्यग्दृष्टि जीव स्वद्रव्य के आलम्बन द्वारा जो शुद्धि की वृद्धि करता है, वह "निर्...

वीर पालना

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वीर पालना वीर स्वामी का सुन्दर अधर पालना ।  सज रहा है सिद्धार्थ के घर पालना ॥ टेक  जिसमें रेशम की सुन्दर पड़ी डोरियाँ ।  सच्चे मोती लगाये—चहुँ ओरियाँ ॥  है सुशोभित यह सुन्दर अधर पालना ॥ वीर० ॥ १  झुन झुना माता त्रिशलावती ले रही ।  वीर के हाथ में हँस के जब दे रही ॥  वीर का हिल रहा बेखतर पालना ॥ वीर० ॥ २  देव इन्द्रादि मिल पुष्प बरसा रहे ।  सारे नर नारी हृदय में हर्षा रहे ॥  देखने जा रहा हर बसर पालना ॥ वीर० ॥ ३  जन्म उत्सव का दिन मिल मनाओ सभी ।  यह ‘किशन’ ने लिखा है अमर पालना ॥ वीर० ॥ ४ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

छहढाला (45) पाँचवीं ढाल

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(45) ७-आस्रव भावना जो योगनकी चपलाई तातैं है आस्रव भाई; आस्रव दुखकार घनेरे, बुधिवन्त तिन्हें निरवेरे ॥९॥ अन्वयार्थ -- (भाई) हे भव्य जीव! ( योगनकी ) योगों की (जो) जो (चपलाई) चंचलता है (तातैं) उससे (आस्रव) आस्रव (ह्वै) होता है, और (आस्रव) वह आस्रव (घनेरे) अत्यन्त (दुखकार) दुःखदायक है, इसलिये (बुधिवन्त) बुद्धिमान (तिन्हें) उसे (निरवेरे) दूर करें। भावार्थ - विकारी शुभाशुभभावरूप जो अरूपी दशा जीव में होती है वह भावास्रव है; और उस समय नवीन कर्मयोग्य रजकणों का स्वयं स्वतः आना (आत्मा के साथ एक क्षेत्र में आगमन होना) सो द्रव्यास्रव है।  उसमें जीव की अशुद्ध पर्यायें निमित्त मात्र हैं। पुण्य और पाप दोनों आस्रव और बन्ध के भेद हैं। पुण्य - दया, दान, भक्ति, पूजा, व्रत आदि शुभराग सरागी जीव को होते हैं, वे अरूपी अशुभ भाव हैं, और वह भावपुण्य है। तथा उस समय नवीन कर्मयोग्य रजकणों का स्वयं स्वतः आना (आत्मा के साथ एक क्षेत्र में आगमन होना) सो द्रव्यपुण्य है। उसमें जीव की अशुद्ध पर्याय निमित्तमात्र है।, पाप - हिंसा, असत्य, चोरी इत्यादि जो अशुभभाव हैं वह ...

अक्षय तृतीया

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अक्षय तृतीया अक्षय तृतीया पर्व है, मंगलमय अविकार, ऋषभदेव मुनिराज का हुआ प्रथम आहार। दीक्षा लेकर ऋषभ मुनीश्वर, छह महीने उपवास किया, फिर आहार निमित्त ऋषीश्वर, जगह जगह परिभ्रमण किया। कोई हाथी घोड़े वस्त्राभूषण, रत्नों के भर थाल, ले सन्मुख आदर से आवें, देख साधु लौटे तत्काल।  नहीं जानें आहार विधि, इससे सब ही लाचार हुए, अन्तराय का उदय रहा, तेरह महीने नौ दिवस हुए।  धन्य मुनीश्वर धन्य आत्मबल, आकुलता का लेश नहीं, तृप्त स्वयं में, मग्न स्वयं में, किचित भी संक्लेश नहीं। उदय नहीं हो दुःख का कारण, यदि स्वभाव का आश्रय हो, निज से च्युत हो दुःखी रहे, तो फिर उपचार उदय पर हो।  दोष देखना किन्तु उदय का , नहीं ये नीति जिनागम में, उदय उदय में ही रहता है, नहीं प्रविष्ट हो आतम में। भेद ज्ञान कर द्रव्य दृष्टि कर, स्वयं स्वयं में मग्न रहो, स्वाश्रय से ही शांति मिलेगी, आकुलता नहीं व्यर्थ करो। अशरण जग में अरे आत्मन, नहीं कोई हो अवलम्बन, तज कर झूठी आस बनाई, अपने प्रभु का करो भजन। इन्द्रादिक से सेवक चक्री, कामदेव से सुत जिनके, देखा एक समय पहले भी, नहीं आहार हुए उनके। हुई योग्यता सहजपने ही, सर्व निमित्त...

छहढाला (44)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(44) ५-अन्यत्व भावना जल-पय ज्यों जिय-तन मेला, पै भिन्न-भिन्न नहिं भेला; तो प्रगट जुदे धन धामा, क्यों है इक मिलि सुत रामा ।।७।। अन्वयार्थ - (जिय-तन) जीव और शरीर (जल-पय ज्यों) पानी और दूध की भांति (मेला) मिले हुए हैं (पैं) तथापि (भेला) एकरूप (नहिं) नहीं हैं, (भिन्न-भिन्न) पृथक्-पृथक् हैं, (तो) तो फिर (प्रगट) जो बाह्य में प्रगटरूप से (जुदे) पृथक् दिखाई देते हैं। ऐसे (धन) लक्ष्मी, (धामा) मकान, (सुत) पुत्र और (रामा) स्त्री आदि (मिलि) मिलकर (इक) एक (क्यों) कैसे (ह्वै) हो सकते हैं?  भावार्थ-- जिस प्रकार दूध और पानी एक आकाश-क्षेत्र में मिले हुए हैं, परन्तु अपने अपने गुण आदि की अपेक्षा से दोनों बिल्कुल भिन्न-भिन्न हैं; उसी प्रकार यह जीव और शरीर भी मिले हुए- एकाकार दिखाई देते हैं, तथापि वे दोनों अपने अपने स्वरूप आदि की अपेक्षा से (स्वद्रव्य क्षेत्र-काल-भाव से ) बिल्कुल पृथक् पृथक् हैं, तो फिर प्रगटरूप से भिन्न दिखाई देने वाले ऐसे मोटर गाडी, धन, मकान, बाग, पुत्र, पुत्री, स्त्री आदि अपने साथ कैसे एक हो सकते हैं? अर्थात् स्त्री पुत्र आदि कोई ...

प्रभु रथ में

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प्रभु रथ में (रथ में विराजमान भगवान के सामने गाने का भजन) प्रभु रथ में हुए सवार, नक्कारा बाज रहा । टेक  क्या ठुमक ठुमक रथ चलता है । ये छतर शीश पर हिलता है ॥  क्या छाई आज बहार ॥ नक्कारा० १ किस छवि से नाथ विराज रहे । नासा दृष्टि से छाज रहे ॥  अद्भुत बाजे सब बाज रहे । सब बोलो जय जय कार ॥ नक्कारा० २ ढोलक अरु बाजे नकारा है । बाजे का स्वर अति प्यारा है ॥  तबले का ठुमका न्यारा है । झाँझन की हो झङ्कार ॥ नक्कारा० ३ कहे "किशन" जा रचें वाला है । तेरे नाम पै वो मतवाला है ।  सब पियो धरम का प्याला है । हो भव सागर से पार ॥ नक्कारा० ४   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

कर्मों का फल

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कर्मों का फल इस जन्म में न मिले, परभव में मिलता है। अपने-अपने कर्मों का फल सब को मिलता है। हैं वो भाई दोनों ही, दुनिया के मेले में, एक दर-दर का भिखारी, दूजा महलों में। एक से पैदा हुए, नहीं भाग्य मिलता है, अपने-अपने कर्मों का........। एक है पत्थर की मूरत, पूजा करते हैं। दूजा फ़र्शों में जड़ा, जिस पर हम चलते हैं। पर्वत और चट्टान से, इक साथ निकलता है, अपने-अपने कर्मों का........। सीप दो हैं, एक की किस्मत निराली है, एक में मोती भरा और दूजा खाली है, एक ही सागर में इनको जन्म मिलता है, अपने-अपने कर्मों का........। फूल इक मंदिर में प्रभु के चरणों में चढ़ता है, दूसरा गिर कर पड़ा है, ख़ाक में मिलता है, फ़ूल वह तो एक ही चमन में खिलता है। अपने-अपने कर्मों का........। जैसी करनी वैसी भरनी, कर्म शुभ करना, मोल ना लगता , ख़ज़ाना पुण्य का भरना,  नेकियां करने से ही तो स्वर्ग मिलता है, अपने-अपने कर्मों का........। 'कर्म का फल' का अर्थ है— हमारे द्वारा किए गए कार्यों (सोच, वाणी और व्यवहार) का निश्चित परिणाम। प्रकृति का अटल नियम है कि जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे। जो भी अनुभव हमें आज मिल रहे हैं, वे अतीत के क...

सिरी जिनवाणी (प्राकृत)

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सिरी जिनवाणी सिरी जिनवाणी जग  कल्लाणी जगजणमदतममोहहरी जणमणहारी गणहरहारी जम्मजराभयरोगहरी । तित्थयराणं दिव्वझुणिं जो पढइ सुणइ मईए धारइ णाणं सोक्खमणंतं धरिय सासद मोक्खपदं पावइ ।। हिन्दी अर्थः श्री जिनवाणी जगत् का कल्याण करने वाली है। जगत् के प्राणियों के मद, अज्ञान अंधकार और मोह का हरण करती है। सभी जनों के लिए मनोहर है, गणधरों के द्वारा धारण की जाती है। जन्म, जरा रूप संसार का रोग हरण करती है। तीर्थंकरों की दिव्य ध्वनि (जिनवाणी) को जो पढ़ता है, सुनता है और मति में धारण करता है, वह अनन्त ज्ञान और अनन्त सुख को धारण करके शाश्वत मोक्ष पद को प्राप्त करता है। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

छहढाला(43) पाँचवीं ढाल

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(43) २-अशरण भावना सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि, काल दले ते;  मणि मंत्र तंत्र बहु होई, मरते न बचावे कोई ॥ ४ ॥ अन्वयार्थः —  (सुर असुर खगाधिप) देवों के इन्द्र, असुरों के इन्द्र और खगेन्द्र गरुड़, हंस (जेते) जो-जो हैं (ते) उन सब का (मृग हरि ज्यों) जिस प्रकार हिरन को सिंह मार डालता है, उसी प्रकार (काल) मृत्यु (दले) नाश करता है। (मणि) चिन्तामणि आदि मणिरत्न, (मंत्र) बड़े-बड़े रक्षा मंत्र; (तंत्र) तंत्र, (बहु होई) बहुत से होने पर भी (मरते) मरने वाले को (कोइ) वे कोई (न बचावे) नहीं बचा सकते।  भावार्थ - इस संसार में जो-जो देवेन्द्र, असुरेन्द्र, खगेन्द्र (पक्षियोंके राजा) आदि हैं, उन सबका- जिस प्रकार हिरन को सिंह मार डालता है, उसी प्रकार - काल (मृत्यु) नाश करता है। चिन्तामणि आदि मणि, मंत्र और जंत्र-तंत्रादि कोई भी मृत्यु से नहीं बचा सकता। यहाँ ऐसा समझना कि निज आत्मा ही शरण है; उसके अतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं है। कोई जीव अन्य जीव की रक्षा कर सकने में समर्थ नहीं है, इसलिये पर से रक्षा की आशा करना व्यर्थ है । सर्वत्र...

जिन मंदिर दर्शन

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जिन मंदिर दर्शन बहु पुण्य उदय मम आयो, सुन्दर जिन भवन लखायो। भव्यों को सुख का कारण,करता भव ताप निवारण। जो समवशरण सम राजे, जिन सम जिन चैत्य विराजे, जहाँ गन्ध कुटी सम वेदी, सिंहासन छत्र सफेदी। शशि द्युति से अधिक उजाले, जहाँ यक्ष चँवर बहु ढोरें, अति उन्नत शिखर बनी है, जिस पर शुभ ध्वजा लगी है।। फहरे दे शुभ संदेशा, यहाँ दुःख का नहीं अंदेशा, हे सुख इच्छुक यहाँ आओ, दुःख कारण पाप भगाओ। यहाँ खुद ही भाव बदलते, सब बहुविधि पुण्य सु करते, सुन्दर स्तोत्र उच्चारें, ध्वनि गगन माहिं गुंजारें, कोई शुभ पूजन करके, कोई ध्यान प्रभु का धर के, जग की सब सुधि बुधि खोते, निज सुख में मग्न सु होते।। जहाँ शास्त्र सभा है होती, जिससे मिथ्यामति भगती, कोई लीन धर्म चर्चा में, देखत उठतीं शुभ लहरें। मति मार बाढे संसार, यह वृक्ष है छायादार, भव वन में पथिक भटकते,  अकुलाते धैर्य न धरते, उन सब को आश्रयदाता, जिन मंदिर जग में त्राता, प्रभु हर्षं प्रसंग महा है, जिन मंदिर दर्श मिला है।। सद् देव शास्त्र गुरु पाए, रोमांच काय में आए, शुभ भाव हृदय में जागा, अज्ञान प्रमाद सु भागा। अब मैं चाहूँ जगदीश, निज चैत्य बनाऊँ ईश, परिणति करूँ...

नाम तुम्हारा तारण हारा

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नाम तुम्हारा तारण हारा नाम तुम्हारा तारण हारा, कब तेरा दर्शन होगा, जिनकी प्रतिमा इतनी सुन्दर, वो कितना सुन्दर होगा.  तुमने तारे लाखों प्राणी, यह संतों की वाणी है, तेरी छवि पर मेरे भगवन्, यह दुनिया दीवानी है. भाव से तेरी पूजा रचाऊँ, जीवन में मंगल होगा।  सुर नर मुनिजन तुम चरणों में निशदिन शीश झुकाते हैं, जो गाते हैं तेरी महिमा वो सब कुछ पा जाते हैं, अपने कष्ट मिटाने को तेरे चरणों का वन्दन होगा।  मन की मुरादें लेकर स्वामी, तेरे चरणों में आते हैं, हम हैं बालक तेरे जिनवर, तेरे ही गुण गाते हैं, भव से पार उतरने को, तेरे गीतों का सरगम होगा।  दीन दयाला करुणा सागर, जग में नाम तुम्हारा है, भटके हुए हम भक्तों का प्रभु, तू ही एक सहारा है, धन्य घड़ी समझूँगा उस दिन, जब तेरा दर्शन होगा।  ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

चरणों में तेरे भगवन्

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चरणों में तेरे भगवन्  तर्ज - होठों से छू लो तुम - - - - - - चरणों में तेरे भगवन्, निज शीश झुकाऊँ मैं। भक्ति में तेरी भगवन, निज मन को लगाऊँ मैं।  हो आप वीतरागी, कैसे मनाऊँ भगवन्, इच्छा तुम्हें न कुछ भी, क्या भेंट लाऊँ भगवन्, श्रद्धा के फूल लाया, इनको ही चढ़ाऊँ मैं ॥  इस जग के कण-कण से सुनता सुयश तुम्हारा, पापी अधम औ अंजन तस्कर को तुमने तारा, अपने दुष्कर्मों को, कहो कैसे मिटाऊँ मैं ॥  नहीं रागी, नहीं द्वेषी, तुम हो दया के सागर, मुझको भी पार कर दो भगवान अब कृपा कर, सुनते तुम्ही हो भगवन, ओर किसको सुनाऊँ मैं ॥ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्य-२ आज घड़ी

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धन्य-२ आज घड़ी, कैसी सुखकार है, जिन चरणों की भक्ति करके आनन्द अपार है। खुशियाँ अपार आज हर दिल में छायी  है, दर्शन के हेतु देखो, जनता अकुलाई है। चारों ओर देख लो भीड़ बेशुमार है, जिन .......... भक्ति भावन से नृत्य गायन कोई हैं कर रहे, आतम सुबोध कर पापों से डर रहे, पल-२ पुण्य का कर रहे भंडार हैं, जिन ........... जय-जय के नाद से गूंजा ये आकाश है, छूट जाएंगे पाप सारे, निश्चय ये आज है, देखो सौभाग्य से खुला, मुक्ति का द्वार है। जिन ....... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।