छठवीं ढाल (55)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला() स्वरूपाचरणचारित्र का लक्षण और निर्विकल्प ध्यान परमाण नय निक्षेपको न उद्योत अनुभवमें दिखै; दृग – ज्ञान – सुख – बलमय सदा, नहि आन भाव जु मो विषै । मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनिर्तै; चित् पिंड चंड अखंड सुगुणकरंड च्युत पुनि कलनिर्तै ॥ १० ॥ अन्वयार्थः- उस स्वरूपाचरणचारित्र के समय मुनियों के (अनुभवमें) आत्मानुभव में (परमाण) प्रमाण, (नय) नय और (निक्षेपको) निक्षेप का विकल्प (द्योत ) प्रगट (न दिखै ) दिखाई नहीं देता; परन्तु ऐसा विचार होता है कि - ( मैं ) मैं ( सदा) सदा ( दृग – ज्ञान – सुख – बलमय ) अनन्तदर्शन – अनन्तज्ञान – अनन्तसुख और अनन्तवीर्यमय हूँ । (मो बिखै) मेरे स्वरूप में (आन) अन्य राग-द्वेषादि (भाव) भाव (नहिँ) नहीं हैं, (मैं) मैं (साध्य) साध्य, (साधक) साधक तथा (कर्म) कर्म (अरु) और (तसु) उसके (फलनि तैं) फलों के (अबाधक) विकल्प रहित ( चित् पिंड) ज्ञान-दर्शन-चेतना स्वरूप (चण्ड) निर्मल तथा ऐश्वर्यवान (अखंड) अखंड (सुगुण करंड) सुगुणों का भंडार (पुनि) और (कलनि तैं) अशुद्धता से (च्युत) रहित हूँ। भावार्थ - इस स्वरूपाचरण...