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कुन्द.कुन्द का सार है

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कुन्द.कुन्द का सार है पारुल जैन, दिल्ली द्वारा रचित सुन्दर भजन कुन्द-कुन्द का सार है, निज वैभव अपार है।  बाहर में क्यों भटके चेतन, निज में ही जब सार है॥  अणु मात्र तेरा नहीं, राग तू फिर क्यों करता।  इसी राग के कारण ही तू, क्यों भव-भव में फिरता॥  अब तो आँख खोल ले प्राणी, ये संसार असार है।  बाहर में क्यों भटके प्राणी निज में ही जब सार है।  आतम ही बस सार है, बाकी सब निःसार है।  निज आनंद में रह ले प्राणी, भव से बेड़ा पार है॥ -2 श्रद्धा कर ले निज आतम की, जिसमें ही बस सार है।  बाहर में क्यों भटके प्राणी, निज में ही जब सार है॥  ज्ञान चक्षु तू खोल ले, निज ज्ञायक तू देख ले।  स्वसंवेदन ज्ञान से चेतन, निज वैभव तू देख ले॥  चिंतन ही बस सार है, महिमा अपरम्पार है।    बाहर में क्यों भटके चेतन, निज में ही जब सार है॥   समयसार का सार है जीव और पुद्गल भिन्न।   राग द्वेष मोह त्याग दे सबसे हो के अभिन्न॥   भेदज्ञान तू जान ले, निज को अब पहचान ले।   बाहर में क्यों भटके चेतन, निज में ही जब सार है।  ...

सिद्धों को नमस्कार

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  सिद्धों को नमस्कार  पारुल जैन, दिल्ली द्वारा रचित सुन्दर भजन अष्ट कर्म से रहित हैं जो प्रभु, अष्ट गुणों से सहित हुए। निज घर में जो रहने वाले, निज में ही जो व्यस्त हुए। स्पर्श वर्ण रस गंध रहित जो,अविनाशी अविकारी हैं। किंचित कम वो तनुमात्र से, पूर्व भव अवगाहनी हैं। शाश्वत निर्मल अशरीरी जो, अनन्त गुण भंडारी हैं। निज आनन्द का पान करें जो, निज में संयम धारी हैं। पर से भिन्न एकत्व विभक्त का, आनन्द निज में धारी हैं॥ सभी विकारी भावों से हट, निज स्वभाव के धारी हैं॥ मोक्ष मार्ग के नेता भी हैं, हैं वो भी सर्वज्ञ प्रभु। लेकिन हित उपदेश न देते, निज में ही वो लीन प्रभु॥ ऐसे समता धारी को मैं, विनय भाव से करूँ प्रणाम। उन जैसा बनने की खातिर, मैं भी निज में करूँ विराम॥ स्वयं पूर्ण हूँ मैं भी निज में, शाश्वत आनन्द धारी हूँ। कर्म रहित मैं होऊँ प्रभुवर, यही भावना भाती हूँ॥  ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं...

रे मन मुसाफिर

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रे मन मुसाफिर पारुल जैन, दिल्ली द्वारा संकलित एवं प्रेषित सुन्दर भजन  रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा। भाड़े के क्वाटर को क्या तू संभाले, इक दिन तुझे उसका मालिक निकाले, इसका किराया भी भरना पड़ेगा,...... रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा,..... काया का घर खाली करना पड़ेगा,... आयेगा नोटिस ज़मानत न होगी, तेरे पास कोई अमानत न होगी, होकर के कैद तुझे जाना पड़ेगा, रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा,... यमराज की तू अदालत चढ़ेगा, पूछेगा हाकिम तो तू क्या कहेगा, पापों की अग्नि में जलना पड़ेगा, रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा,... सतायेंगे कर्म फिरेगा तू रोता, लाख चैरासी में खायेगा गोता, घर-घर जनम और मरना पड़ेगा, रे मन मुसाफिर निकलना पड़ेगा, काया का घर खाली करना पड़ेगा,... रे मन मुसाफिर... ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक...

छहढाला(59)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(59) छठवीं ढाल का लक्षण-संग्रह अंतरंग तपः शुभाशुभ इच्छाओं के निरोधपूर्वक आत्मा में निर्मल ज्ञान आनंद के अनुभव से अखण्डित प्रतापवन्त रहना, निस्तरंग चैैतन्यरूप से शोभित होना। अनुभवः स्वोन्मुख हुए ज्ञान और सुख का रसास्वादन। वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावे विश्राम, रस स्वादन सुख ऊपजै, अनुभव याको नाम। आवश्यकः मुनियों को अवश्य करने योग्य स्ववश शुद्ध आचरण। कायगुप्तिः काया की ओर उपयोग न जाकर आत्मा में ही लीनता। गुप्तिः मन, वचन, काया की ओर उपयोग की प्रवृत्ति को भलीभाँति आत्मभानपूर्वक रो कना अर्थात् आत्मा में ही लीनता होना सो गुप्ति है। तप - स्वरूपविश्रान्त, निस्तरंगरूप से निज शुद्धता प्रतापवन्त शोभायमान होना, सो तप है। उसमें जितनी शुभाशुभ इच्छाओं का निरोध होकर शुद्धता बढ़ती है, वह तप है, अन्य बारह भेद तो व्यवहार (उपचार) तप के हैं। ध्यान - सर्व विकल्पों को छोड़कर अपने ज्ञान को लक्ष में करना, सो ध्यान है। नय - वस्तु के एक अंश को मुख्य करके जाने वह नय है और वह उपयोगात्मक है। सम्यक् श्रुतज्ञानप्रमाण का अंग, वह नय है। निक्षेप - नयज्ञान द्वारा ब...

छहढाला(58)

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  अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(58) छठवीं ढाल का सारांश जिस चारित्र के होने से समस्त परपदार्थों से वृत्ति हट जाती है, वर्णादि तथा रागादि से चैतन्यभाव को पृथक् कर लिया जाता है, अपने आत्मा में, आत्मा के लिये, आत्मा द्वारा, अपने आत्मा का ही अनुभव होने लगता है, वहाँ नय, प्रमाण, निक्षेप, गुण-गुणी, ज्ञान-ज्ञाता ज्ञेय, ध्यान-ध्याता-ध्येय, कर्ता-कर्म और क्रिया आदि भेदों का किंचित् विकल्प नहीं रहता; शुद्ध उपयोगरूप अभेद रत्नत्रय द्वारा शुद्ध चैतन्य ही अनुभव होने लगता है, उसे स्वरूपाचरणचारित्र कहते हैं; यह स्वरूपाचरणचारित्र चौथे गुणस्थान से प्रारम्भ होकर मुनि-दशा में अधिक उच्च होता है। तत्पश्चात् शुक्लध्यान द्वारा चार घाति कर्मों का नाश होने पर वह जीव केवलज्ञान प्राप्त करके १८ दोष रहित श्री अरिहन्तपद प्राप्त करता है; फिर शेष चार अघाति कर्मों का भी नाश करके क्षणमात्र में मोक्ष प्राप्त कर लेता है; उस आत्मा में अनन्तकाल तक अनन्त चतुष्टय का (अनन्तज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य का) एक-सा अनुभव होता रहता है; फिर उसे पंचपरावर्तनरूप संसार में नहीं भटकना पड़ता; वह कभी अवतार धारण नहीं करता; सदैव ...

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  1 Jan. 2021  से शुरू                                                                                                                                                   अ -                                                                      *1.        अच्चेमि , पुज्जेमि , वंदामि , णमस्सामिय जिन भक्ति 14 मई *2.        अकेले वन में - 27 मई *3. अक्षय तृतीया 7 जून 4- अथ अठाई...