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स्तवन रत्न - गौतम स्वामी

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स्तवन रत्न गौतम स्वामी, महावीर प्रभु के प्रथम शिष्य थे। उन्हें प्रभु के प्रति बहुत राग था। प्रभु का विरह उनसे सहन नहीं होता था। अपने निर्वाण का समय नज़दीक आया जानकर,प्रभु महावीर ने गौतम स्वामी के लिए एक युक्ति की। उन्होंने गौतम स्वामी को आज्ञा दी कि पास के गाँव में जाकर एक श्रावक को धर्म उपदेश देकर आओ। भगवान की आज्ञा गौतम स्वामी के लिए ब्रह्मवाक्य जैसी थी, आज्ञा मिलते ही वे प्रसन्न चित्त से श्रावक के घर जाने के लिए निकल पड़े। वे बस आधे रास्ते ही पहुँचे होंगे कि तभी भगवान महावीर के निर्वाण की आकाशवाणी हुई। यह सुनकर गौतम स्वामी को बहुत आघात लगा कि सब कुछ जानते हुए भी प्रभु ने अंत समय मुझे उनसे दूर कर दिया! भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? क्यों? क्यों?.... गौतम स्वामी सोच में पड़ गए। और विचार शृंखला आगे बढ़ी तो उनकी दृष्टि भगवान पर से हटकर खुद पर पड़ी। विचारों की शृंखला ने अपनी काया पलटी... "अरे रे! मेरी भूल हो गई! मैंने भगवान के लिए कैसा गलत सोचा! मुझे भगवान के लिए राग है लेकिन भगवान तो वीतराग हैं। भगवान को किसी के साथ राग-द्वेष नहीं होता। भगवान तो अत्यंत करुणा वाले हैं, वीतराग हैं...

प्यारी दुनिया है

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भजन- प्यारी दुनिया है चाल — (कवाली) कोई चतुर ऐसी सखी न मिली प्यारी दुनिया है सागर दु:खों से भरा या में सुख कहीं आता नजर ही नहीं या में मोह का जाल पड़ा है सती या में जीव फंसे हों खबर ही नहीं ॥टेक॥ कौन माता पिता कौन बन्धु सुता कैसे भाई बहिन कैसे दारा पति इस दुनिया के नाते हैं झूठे सभी सच पूछो तो रहने का घर ही नहीं ॥टेक॥ नदी नाव संजोग से आके मिले जैसे पेड़ पे पंखी बसेरा करे जब भोर भई सब बिछड़ के चले संग चलने का कोई ज़िकर ही नहीं ॥टेक॥ रानी स्वारथ की सारी है दुनिया लखो या में भूल के कोई न नेह करो सूखे दरिया पे नर पशु पंछी कोई देखो करता है आके गुजर ही नहीं ॥टेक॥ चाहे फौज प्यादे हजारों रहो चाहे महल किले में जा बंद करो चाहे जंतर मंतर लाखों पढ़ो मौत टारी किसी से भी टरती नहीं ॥टेक॥ धन दौलत राज खजाना सभी कोई अन्त समय काम आवे नहीं आ मुसीबत में कोई सहाई करे ऐसा कोई भी सुर या असुर ही नहीं ॥टेक॥ ऐसा जान के प्यारी विचार करो दु:ख शोक तजो समता को भजो मोह माया को मन सेती दूर करो मोह करने का अच्छा समर ही नहीं ॥ जिन राज भजो मन धीर धरो तप सयंम शील सिंगार करो धर ध्यान निज आतम कर्म हरो बिन धर्म के होगा ग...

तोरा मन दर्पण

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तोरा मन दर्पण   तोरा मन दर्पण कहलाए -2 भले बुरे सारे कर्मों को, देखे और दिखाए -टेक मन ही देवता मन ही ईश्वर, मन से बड़ा न कोय  मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय  इस उजले दर्पण पर प्राणी, धूल न जमने पाये—टेक  सुख की कलियां दुख के कांटे मन सब का आधार  मन से कोई बात छुपे ना मन के नयन हज़ार  जग से चाहे भाग ले कोई, मन से भाग न पाये  तन की दौलत ढलती छाया, मन का धन अनमोल  तन के कारण मन के धन को मत माटी में रोल  मन की कदर भुलाने वाला हीरा जन्म गवांये—टेक ---  । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

भेष दिगम्बर धार

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भेष दिगम्बर धार भेष दिगम्बर धार, चले हैं मुनि दूल्हा बन के। -2 ले के हर्ष अपार, चले हैं मुनि दूल्हा बन के। -2 पंच महाव्रत जामा सजाया, दसलक्षण का सेहरा बंधाया। -2 चारित्र रथ हो सवार, चले हैं मुनि दूल्हा बन के ।। भेष दिगम्बर धार,-2 बारह भावना संग बाराती। समिति गुप्ति सब हिल मिल गाती। -2 हर्ष से मंगलाचार, चले हैं मुनि दूल्हा बन के ।। भेष दिगम्बर धार,-2 राग-द्वेष आतिशबाजी छूटी। क्रोध-कषाय की लड़ियाँ टूटी।-2 दमका पायल झंकार, चले हैं मुनि दूल्हा बन के ।। भेष दिगम्बर धार,-2 शुक्ल ध्यान की अग्नि जलाकर, होम किया निज कर्म खपा कर। तप तेरा यशगान , चले हैं मुनि दूल्हा बन के ।। भेष दिगम्बर धार,-2 शुभ बेला शिव रमणी वरेंगे, मुक्ति महल में प्रवेश करेंगे। गूंजेगी ध्वनि जयकार, चले हैं मुनि दूल्हा बन के। -2 भेष दिगम्बर धार, चले हैं शिव रमणी वरने।  भेष दिगम्बर धार, चले हैं मुनि दूल्हा बन के। -2 । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत ...

फैला हुआ है राजा

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भजन -  फैला हुआ है राजा चाल :—एक तीर फैंकता जा तिरछी कमान वाले । फैला हुआ है राजा, करमों का जाल सारे दरिया पहाड़ नाले, सूरज कि चांद तारे ॥टेक॥ तिर्यंच नर सुरासुर, ब्रह्मा ऋषि हरिहर फिरते हैं सब चराचर, कर्मों के मारे मारे ॥टेक॥ क्या आन कान बारे, क्या शाह शान बारे कर्मों के आगे सब के, जाते हैं मान मारे ॥टेक॥ रावन ने हरनाकुश ने क्या क्या नहीं किया था आखिर करम बली से, सब ही गये हैं हारे ॥टेक॥ सुख और दु:ख का देना, करमों के हाथ में हैं चलती नहीं किसी की, करलो यतन अपारे ॥टेक॥ । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद ★ विवेक का विपर्यय हो मोह है। Here is the transcription of the printed Hindi text from the page into Unicode Devanagari format: --- ##  --- ★ **तप का मूल धैर्य है।** [ २० ] ★ राग द्वेष से मुक्त होना ही परिनिर्वाण है, [ २१ ] भज...