धर्म के नाम पर
धर्म के नाम पर तर्ज :- कभी सुख के धर्म के नाम पर खुद को, मिटाना किस को आता है ? हृदय में ज्ञान का दीपक, जलाना किस को आता है ।...(ध्रुव) सती सीता विशुद्ध मन से, रही रावण की कुटिया में । सती जैसा सही भूषण, सजाना किस को आता है......(१) सुदर्शन सेठ ने प्रण पर, किये थे प्राण न्योछावर । समय पर ऐसे नियमों का, निभाना किस को आता है......(२) सत्य खातिर हरिश्चन्द्र ने प्रिया सुत राज्य भी छोड़ा । स्वयं को सत्य में ऐसे, रमाना किस को आता है......(३) सती राजीमती ने भी, नहीं खण्डन किया व्रत का । सती जैसी नियम निष्ठा, दिखाना किस को आता है......(४) लगाते हैं हजारों जन, निरन्तर प्रेम पैसे से । 'कन्हैया' प्रेम प्रभुवर से, लगाना किस को आता है ॥५॥ [8:52 am, 14/8/2026] Sarita Jain: रचियता — आचार्य श्री तुलसी तर्ज :— जो व्यथाएं प्रेरणा दें भाव भीनी वंदना भगवान् चरणों में चढ़ाएं । शुद्ध ज्योतिर्मय निरामय रूप अपने आप पायें ॥ (ध्रुव) ज्ञान से निज को निहारें, दृष्टि से निज को निखारें । आचरण की उर्वरा में, लक्ष्य तरुवर लहलहाएं ॥१॥ सत्य में आस्था अचल हो, चित्त संशय से न चल हो । सिद्ध कर आत्मानुशान, विजय का...