छहढाला(12)
अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(12) (सुबोध टीका) निर्जरा और मोक्ष की विपरीत श्रद्धा तथा अगृहीतमिथ्याज्ञान रोके न चाह निजशक्ति खोय, शिवरूप निराकुलता न जोय; याही प्रतीतिजुत कछुक ज्ञान, सो दुखदायक अज्ञान जान ॥ अन्वयार्थः मिथ्यादृष्टि जीव ( निजशक्ति ) अपने आत्मा-की शक्ति ( खोय ) खोकर ( चाह ) इच्छा को ( न रोके ) नहीं रोकता, और ( निराकुलता ) आकुलता के अभाव को ( शिवरूप ) मोक्ष का स्वरूप ( न जोय ) नहीं मानता। ( याही ) इस ( प्रतीतिजुत ) मिथ्या मान्यता सहित ( कछुक ज्ञान ) जो कुछ ज्ञान है ( सो ) वह ( दुखदायक ) कष्ट देनेवाला ( अज्ञान ) अगृहीत मिथ्याज्ञान है - ऐसा ( जान ) समझना चाहिये । भावार्थः - निर्जरातत्त्व में भूलः आत्मा में आंशिक शुद्धि की वृद्धि तथा अशुद्धि की हानि होना, उसे संवरपूर्वक निर्जरा कहा जाता है; वह निश्चयसम्यग्दर्शन पूर्वक ही हो सकती है । ज्ञानानन्दस्वरूप में स्थिर होने से शुभ-अशुभ इच्छा का निरोध होता है, वह तप है । तप दो प्रकार का हैः (१) बालतप (२) सम्यक् तप; अज्ञानदशा में जो तप किया जाता है, वह बालतप है, उससे कभी सच्ची निर्जरा नहीं होती; किन्तु आत्मस्व...