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भगवान महावीर स्वामी (43)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (43)    आज पूरी रात राजकुमार वर्द्धमान चैतन्य की अनोखी धुन में थे; निद्रा का तो नाम ही नहीं था। उपयोग बार-बार चैतन्य की अनुभूति में स्थिर हो जाता था। परभावों से थक कर विमुख हुआ उनका उपयोग अब आनन्दमय निजघर में ही सम्पूर्ण रूप से स्थिर रहना चाहता था। तीस वर्ष के राजकुमार का चित्त आज अचानक ही संसार से विरक्त हो गया है; मोक्षार्थी जीव प्रशम हेतु किसी बाह्य कारणों को नहीं ढूँढ़ता। प्रशम तो उसके अन्तर से स्वयमेव स्फुरित होता है। आज प्रातःकाल महावीर ने सिद्धों का स्मरण करके आत्मा का ध्यान किया। आज उनके वैराग्य की धारा कोई अप्रतिम थी। विशुद्धता में वृद्धि हो रही है। उपयोग क्षणभर में अन्तर्मुख निर्विकल्प हो जाता है और पुनः बाहर आ जाता है, परन्तु बाहर में उसे चैन नहीं पड़ता। वह सर्वत्र से छूटकर, विभावरूप परदेश से लौटकर स्वभाव रूप स्वदेश में स्थिर रहना चाहता है। बारम्बार ऐसी दशा में झूलते हुए प्रभु के मतिज्ञान में सहसा कोई विशिष्ट निर्मलता झलक उठी, उनको जातिस्मरण हुआ। स्वर्गलोक के दिव्य दृश्य देखे, चक्रवर्ती का वैभव देखा, सिंह देखा, सम्यक्त्व का बोध देते हुए मु...

भगवान महावीर स्वामी (42)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (42)  भगवान महावीर : वैराग्य और दीक्षा (मार्गशीर्ष कृष्णा दशमी) वीरकुमार चैतन्य-उद्यान की प्रशंसा कर रहे थे। इतने में एक कुमार ने सुन्दर पुष्प लाकर आदर सहित वीरकुमार के चरणों में रख दिया। सब लोग आनन्दपूर्वक उसे देख रहे थे। तब वीरकुमार ने गम्भीरता से कहा - बन्धु! यह पुष्प वृक्ष की डाल पर जैसी शोभा दे रहा था, वैसी अब नहीं दे रहा। उस की शोभा नष्ट हो गई है। वह माता से बिछुड़े बालक की भांति मुरझा रहा है। पुष्प को उसकी डाली से पृथक् करना तो वृक्ष और पुष्प दोनों की सुन्दरता को नष्ट कर देना है। देखो! यह कैसा शोकमग्न दिखाई दे रहा है। अपनी प्रसन्नता के लिए  हम दूसरे जीवों का सौन्दर्य नष्ट कर दें, वह क्या उचित लगता है? दूसरों को कष्ट दिये बिना हम आनन्द प्रमोद करें, वही उचित है। इस प्रकार सहज रूप से अहिंसादि की प्रेरणा करके वीरकुमार वीतरागता फैला रहे थे। धन्य उनका जीवन! गृहवास में भी धर्मात्मा राजपुत्र का जीवन अलौकिक था। वे गृहवासी भगवान बार-बार सामायिक का प्रयोग भी करते थे। सामायिक की स्थिति में वे इस प्रकार मन की एकाग्रतापूर्वक धर्मध्यान रूप आत्मचिंतन करते थे...

भगवान महावीर स्वामी (41)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (41) एक सभाजन ने आतुरता से पूछा - प्रभो! ‘आत्मा अनन्तशक्ति सम्पन्न है’, तो उसमें कैसी-कैसी शक्तियाँ हैं, वह आपके श्रीमुख से सुनने की उत्कण्ठा है। उसके उत्तर में मोक्षसाधक युवराज महावीर ने चैतन्य स्वरूप आत्मा की अनन्त शक्तियों का अद्भुत, परम अध्यात्मरस पूरित वर्णन किया - अभेदरूप ज्ञानलक्षण द्वारा लक्षित करके ज्ञायक का अनुभव करने पर जीवत्व, चेतन, सुख, वीर्य, प्रभुता, विभुता, स्वसंवेदनता आदि अनन्त चैतन्य शक्तिरूप से आत्मा एक साथ वेदन अर्थात् अनुभव में आता है। अहो, जिसकी प्रत्येक शक्ति की महत्ता अपार है, ऐसी अनन्त शक्तियाँ, वे भी रागरहित शुद्ध परिणमन युक्त ऐसी अगाध शक्तिवान आत्मा की अद्भुत महिमा एक भावी तीर्थंकर के श्रीमुख से साक्षात सुनकर अनेक भव्यजीव उस चैतन्यमहिमा में इतने गहरे उतर गये कि तत्क्षण ही महा आनन्द सहित निर्विकल्प आत्मानुभूति को प्राप्त हुए और अनन्त शक्तियों का स्वाद एक साथ स्वानुभूति में चख लिया।  सहजानन्द स्वरूप अनंत शक्तिसंपन्न चैतन्य चित् चमत्कार चिंतामणि भगवान की जय! वाह! आत्मा के अपार वैभव का मधुर वर्णन सुनकर सभाजन शांत रस में निम...

भगवान महावीर स्वामी (40)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (40) राजसभा में युवराज महावीर की धर्मचर्चा (वीर की अपूर्व महिमा का वर्णन) भगवान वीर कुँवर तीस वर्ष के हो गए थे। युवा होने पर भी आध्यात्म रस के रसिक वे राजकुमार राजयोगी के समान जीवन जीते थे। कभी-कभी वे चैतन्य की धुन में लीन हो जाते और कभी तो अर्धरात्रि के समय राजभवन से बाहर निकलकर उद्यान में खड़े-खड़े ध्यान धरते थे। मानो कोई मुनिराज खड़े हों। ऐसा होने पर भी दिनभर शून्यमनस्क या उदास नहीं रहते थे। वे सबके साथ हिलते-मिलते और प्रजाजनों के सुख-दुःख की बातें सुनते थे। यद्यपि राज्य का कार्यभार संभालने में उनकी रुचि नहीं थी, फिर भी वे कई बार राजसभा में जाते और पिता सिद्धार्थ के समीप बैठते थे। उनके आगमन से राजसभा सुशोभित हो उठती थी, सभाजन उनके दर्शन से आनंदित होते और उनकी मधुर वाणी सुनकर मुग्ध हो जाते थे। एक बार सभाजनों ने महाराजा सिद्धार्थ से प्रार्थना की - “हे देव! आज की राजसभा अद्भुत लग रही है। वीर कुंवर को देखकर मानो अंतर में रत्नत्रय का उद्यान खिल उठा हो, ऐसी प्रसन्नता हो रही है। उनके श्रीमुख से हम सब आत्मतत्त्व की अचिन्त्य महिमा सुनना चाहते हैं।” महाराजा ने ...

तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (39)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (39) सन्मतिनाथ (संजय और विजय मुनिवरों का प्रसंग) तीर्थंकर वर्धमान जब बाल्यावस्था में थे, उस काल में पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; उस शासन में संजय और विजय नाम के दो मुनि विचर रहे थे; रत्नत्रयवन्त वे मुनिवर आकाशगामी थे। स्वानुभूति की चर्चा करते-करते वे सिद्ध क्षेत्र की यात्रा हेतु सम्मेद शिखर तीर्थ भूमि में पधारे और वहाँ अनन्त सिद्धों का स्मरण करके आत्मध्यान किया। पश्चात् संजय मुनि बोले- अहा! स्वानुभूति में आत्मा स्पष्ट ज्ञात होता है। वहाँ मतिश्रुतज्ञान होने पर भी वे अतीन्द्रिय भाव से काम करते हैं। इसलिए स्वसंवेदन ये प्रत्यक्षपना है। उसमें कोई संदेह नहीं रहता। तब विजय मुनि ने कहा - “हे मुनिराज! आपकी बात सत्य है। परंतु मतिश्रुतज्ञान के निर्बल होने से किसी सूक्ष्म ज्ञेयों में संदेह भी बना रहता है। देखो न! सूक्ष्म अगुरुलघुत्वजनित षट्गुण वृद्धिहानि के किसी गंभीर स्वरूप का हल अभी हमें़ नहीं मिलता और सूक्ष्म-शल्य रहा ही करती है। पार्श्वनाथ भगवान तो मोक्ष पधार गए; वर्धमान तीर्थंकर अभी बाल्यावस्था में हैं। किन्हीं केवली या श्रुतकेवली के दर्शन से ही हमा...

भगवान महावीर स्वामी (38)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (38) एक ओर बालक महावीर...., दूसरी ओर क्रोधाग्नि में दहकता मदोन्मत्त हाथी। बालक महावीर धीर-गंभीर चाल से उस ओर बढ़ने लगे, जिधर से हाथी दौड़ता आ रहा था। वे हाथी के सामने आकर उस पर दृष्टि स्थिर करके खड़े हो गए और क्षण दो क्षण शांत दृष्टि से हाथी को देखते रहे। अहा! कैसी शान्तरस भरी थी वह अमी दृष्टि! मानो उससे अमृत झर रहा था। उस दृष्टि द्वारा महावीर कह रहे थे कि अरे गजराज! यह पागलपन छोड़! लोग तेरे पागलपन का कारण नहीं जानते, किन्तु मैं जानता हूँ। अरे! ये चार गति के दुःख और उनमें यह तिर्यंच गति की वेदना.... उससे तू अकुला गया है और छूटने को अधीर हुआ है.... परन्तु धैर्य रख, शांत हो! उद्वेग करने से यह दुःख दूर नहीं होगा। अहा! हाथी तो मानो भगवान के नेत्रों से झरते हुए शान्त रस के स्रोत का पान कर रहा हो, इस प्रकार टकटकी बाँधकर प्रभु की ओर देखता ही रह गया। आसपास के वातावरण को वह भूल गया। वाह! कैसी शान्ति है इन कुमार के मुखमण्डल पर! मुझे भी ऐसी शान्ति प्राप्त हो जाए, तो कितना अच्छा हो! ऐसा विचारते हुए वह हाथी बिल्कुल शान्त हो गया। लोगों ने यह चमत्कार देखा; परन्तु वे समझ...

भगवान महावीर स्वामी (37)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (37) शान्तदृष्टि से हाथी को वश में करने की घटना देखो! देखो!! वह दिख रहा है वैशाली राज्य का नंदावर्त राजप्रासाद; जिस पर अहिंसा धर्म की ध्वजा फहरा रही है। कैसी अद्भुत है इस राजप्रासाद की शोभा! क्यों न हो, बालतीर्थंकर जिसके अन्तर में वास करते हों, उसकी शोभा का क्या कहना! उस प्रासाद की शोभा चाहे जैसी हो, तथापि इन्द्रियगम्य एवं नश्वर थी; जब कि उसमें निवास करने वाले प्रभु के सम्यक्त्वादि गुणों की शोभा अतीन्द्रियगोचर एवं अविनश्वर थी। प्रभु के पुण्य ही उस प्रासाद का रूप धारण करके, सेवक रूप में सेवा करने आये थे। उस सात खण्ड ऊँचे राजप्रासाद के प्रांगण में छोटे-से वीरप्रभु खड़े हों, तब प्रेक्षकों को वीर प्रभु बड़े लगते थे और प्रासाद छोटा लगता था। राजप्रासाद के निकट हस्तिशाला में कितने ही श्रेष्ठ हाथी शोभा देते थे। राजप्रासाद के मार्ग से आने-जाने वाले हजारों प्रजाजनों को वर्धमान कुँवर के दर्शनों की उत्कण्ठा रहने से उनकी दृष्टि राजप्रासाद के प्रत्येक झरोखे पर घूम जाती थी और कभी किसी को झरोखे में खड़े हुए वीरप्रभु के दर्शन हो जाते, तो उसका हृदय आनन्द से नाच उठता था......

भगवान महावीर स्वामी (36)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (36) बालवीर की महा-वीरता जीत लिया मिथ्यात्व-विष, सम्यक् मंत्र प्रभाव। नाग लगा फुफकारने, प्रभु को समता भाव।। जहाँ इन्द्रियातीत भाव है, वहाँ नाग क्या करता? रूप बदलकर बना देव वह, नमन वीर को करता।। फूँ.... फूँ.... करता हुआ एक भयंकर विषैला नाग अचानक ही फुँफकारता हुआ वहाँ आ पहुँचा, जिसे देखकर सब राजकुमार इधर-उधर भागने लगे; क्योंकि उन बालकों ने पहले कभी ऐसा भयंकर सर्प नहीं देखा था। परंतु महावीर न तो भयभीत हुए और न भागे। अहिंसा के अवतार महावीर को मारनेवाला कौन है? वे तो निर्भयता से सर्प की चेष्टाएँ देखते रहे। जैसे मदारी साँप का खेल कर रहा हो और हम देख रहे हों, तदनुसार वर्धमान कुमार उसे देख रहे थे। शांतचित्त से निर्भयतापूर्वक अपनी ओर देखते हुए वीरकुमार को देखकर नागदेव आश्चर्यचकित हो गया कि वाह! यह वर्धमान कुमार आयु में छोटे होने पर भी महान हैं, वीर हैं। उसने उन्हें डराने के लिये अनेक प्रयत्न किये, बहुत फुँफकारा.... परंतु वीर तो अडिग रहे, वे निर्भयता से सर्प के साथ खेलने के लिये उसकी ओर जाने लगे। दूर खड़े राजकुमार यह देखकर घबराने लगे कि अब क्या होगा? सर्प को भगा...

भगवान महावीर स्वामी (35)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (35) माता को आनंदित करके वीरकुमार बोले - “माँ, मेरे मित्र बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं, मैं उनके पास जाता हूँ।” माँ ने कहा - “अवश्य जाओ, बेटा! सबको आनंद देने के लिये तो तुम्हारा अवतार है।” माताजी से आज्ञा लेकर वीरकुमार राजगृह में आये। उन्हें देखकर ही देवकुमार तथा राजकुमार हर्षपूर्वक जय-जयकार करने लगे और अनेक प्रकार से उनका सम्मान किया। वर्धमान कुमार ने भी प्रसन्न दृष्टि से सबको देखा और माताजी के साथ हुई आनन्दकारी चर्चा कह सुनायी। यह सुनकर सबको बड़ी प्रसन्नता हुई। एक राजकुमार बोले - अहा! तीर्थंकर के मित्र होने से अपने को उनके साथ रहने तथा खेलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, तो हम सब उनके साथ मोक्ष की साधना भी अवश्य करेंगे। वे दीक्षा ग्रहण करेंगे, तब उनके साथ हम सब भी दीक्षा लेंगे। यह सुनकर देवकुमारों के मुख पर उदासी छा गई।  तुम क्यों उदास हो गये, मित्र?  ऐसा पूछने पर देवकुमारों ने कहा - हे मित्र! तुम तो मनुष्य पर्याय में हो, इसलिए प्रभु के साथ दीक्षा ले सकोगे; परन्तु हम देवपर्याय में होने के कारण प्रभु के साथ दीक्षा नहीं ले सकते, इस विचार से हम...

भगवान महावीर स्वामी (34)

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तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (34)    पुत्र - माता! मेरी मोक्षसाधिका, धन्य-धन्य है तुझ को..... तव स्नेह भरी मीठी आशीष, प्यारी लगती है मुझको... माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।। माता - बेटा! तेरी अद्भुत महिमा, सरस हृदय जैसी है.... तेरा दर्शन करके भविजन, मोह के बन्धन तोड़े हैं.... बेटा! दर्शन तेरा रे.... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता! तेरी मीठी वाणी, मानो फूल ही बरस रहे हैं.... तेरे हृदय हेतु फव्वारे, इधर-इधर झरते हैं.... माता! दर्शन तेरा रे... जगत को आनन्ददायक है।। माता - तेरी वाणी सुनकर भविजन, मोक्षमार्ग में दौड़े... चेतन रस का स्वाद चखकर, राजपाट सब छोड़े.... बेटा जन्म तुम्हारा रे.... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता मुझको जगे भावना, कब मैं बनूँ वैरागी... रागमयी बंधन सब तोड़ूँ, बनूँ परिग्रह त्यागी.... माता! दर्शन तेरा रे.... जगत को आनन्ददायक है।। माता - बेटा! तू तो पाँच वर्ष का, पर गंभीर बहुत है... गृहवासी तू फिर भी उदासी, दशा मोह से विरहित है... बेटा! जन्म तुम्हारा रे... जगत को मंगलकारक है।। पुत्र - माता! तू तो अंतिम माता, फिर नहीं होगी माता... रत्नत्रय से केवल मि...

भगवान महावीर स्वामी (33)

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 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (33)  वर्धमानकुमार ने प्रातःकाल सिद्धों का स्मरण करके आत्मचिन्तन किया। फिर माता के पास आये। त्रिशला माता ने बड़े उत्साहपूर्वक पंचपरमेष्ठी का स्मरण करके प्रिय पुत्र को तिलक किया और बलैयाँ लेकर मंगल आशीर्वाद दिया। माता का आशीष लेकर वीरकुमार प्रसन्न हुए और उनसे आनन्दपूर्वक चर्चा करने लगे।  अहा! माताजी के साथ वीर कुँवर कैसी आनन्ददायक चर्चा करते हैं, वह सुनने के लिये हम राजा सिद्धार्थ के राजभवन में चलें! त्रिशला माता के राजभवन में वाह! देखो, यह राजा सिद्धार्थ का राजभवन कितना भव्य एवं विशाल है! इसका शृंगार भी कितने अद्भुत ढंग से किया गया है! आज चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को वीरप्रभु का जन्म दिन होने से राजभवन के प्रांगण में हजारों प्रजाजन वीर कुँवर के दर्शनार्थ एकत्रित हुए हैं; आज वे अपनी आयु के पाँचवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। राजभवन के भीतर उस कक्ष की शोभा तो स्वर्ग की इन्द्रसभा को भी भुला दे - ऐसी है; परन्तु अपना लक्ष्य वहाँ नहीं जाता। अपनी दृष्टि तो सीधी महावीर कुँवर पर केन्द्रित है। अहा, वे कैसे सुशोभित हो रहे हैं! त्रिशला माता अपने इकलौते पुत्र ...

भगवान महावीर स्वामी (32)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (32) देवकुमारों तथा राजकुमारों की तत्त्वचर्चा एक बार चैत्र शुक्ला त्रयोदशी के दिन वीरकुंवर का जन्म-दिन मनाने हेतु देव कुमार और राजकुमार कुण्डग्राम के राजोद्यान में एकत्रित हुए थे। वीरकुंवर के आने में कुछ देर होने से वे तत्त्व-चर्चा करने लगे। उनकी चर्चा कितनी सुन्दर थी! आओ, हम भी देखें - देव कुमार - भाइयों! आज वीरकुंवर का जन्म-दिन है। जब तक वे राजभवन से यहाँ पधारें, तब तक हम थोड़ी धर्मचर्चा करें। राजकुमार बोले - वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। धर्म के जन्म के महान दिवस पर तो धर्मचर्चा ही शोभा देती है। देव कुमार - ठीक है। आज हम ‘सर्वज्ञ’ के स्वरूप की चर्चा करेंगे। बोलो, राजकुमार! हम किस धर्म को मानते हैं? और हमारे इष्टदेव कौन हैं? राजकुमार - हम जैनधर्म को मानते हैं। उसमें आत्मा के शुद्धभाव द्वारा मोह को जीतते हैं और भगवान ‘सर्वज्ञ’ अपने इष्टदेव हैं। सर्वज्ञ कौन हैं? ‘सर्वज्ञ’ नाम कोई व्यक्ति-वाचक नहीं है, परन्तु मोह का नाश करके ज्ञानस्वभावी आत्मा की सर्व ज्ञान-शक्ति जिनके अंदर विकसित हो गई है, वे सर्वज्ञ हैं। इस प्रकार ‘सर्वज्ञ’ शब्द गुणवाचक है। सर्वज्ञ क...

भगवान महावीर स्वामी (31)

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  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (31) प्रभु के जन्म कल्याणक का भव्य उत्सव करके देवगण अपने स्वर्गलोक में चले गए; किन्तु कितने ही देव छोटे बच्चे का रूप धारण करके वीर कुंवर के साथ वहीं क्रीड़ा करने हेतु रुक गये। अहा! तीर्थंकर जैसे बालक के साथ रहना तथा खेलना किसे अच्छा नहीं लगेगा? ... वाह, उसमें तो बहुत ही आनन्द आयेगा। उन देवकुमारों के साथ क्रीड़ा करते हुए वीर कुंवर को देखकर उनमें देव कौन है और मनुष्य कौन? उसका पता भी नहीं चलता था; क्योंकि सबका रूप एक जैसा था; परन्तु जब वे देवकुमार तीर्थंकर देव का चरण स्पर्श करते, तब समझ में आता था कि देव कौन है। वे देव कहते थे कि हे प्रभो! हम देव नहीं हैं; वास्तव में तो देव आप ही हैं। इस प्रकार गुणों की विशेषता के कारण वीर कुंवर सबसे अलग पहचाने जाते थे। वीर कुंवर का जन्म होने से वैशाली सर्व प्रकार से वृद्धिगत होने लगी; उसका वैभव भी बढ़ने लगा और आत्मा के गुण भी; इसलिए माता-पिता एवं प्रजाजनों ने उन वीर कुंवर को वर्धमान नाम से सम्बोधन किया। “पणमामि वड्ढमाणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं” (प्रवचनसार) अहा! ‘वर्धमान’ ऐसे सुन्दर नाम से जो वाच्य है, जिन प्रभु के गुणों क...

भगवान महावीर स्वामी (30)

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   तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (30) जन्मकल्याणक   तीर्थंकर बनने वाले आत्मसाधक आत्मा की पहचान बाह्य नेत्रों द्वारा नहीं, किन्तु अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा ही होती है। इसलिए जन्मकल्याणक में तुम प्रभु को मात्र इन्द्रियज्ञान द्वारा न देखकर उन्हें अतीन्द्रिय ज्ञान द्वारा पहचानना; उससे प्रभु के कल्याणक के साथ तुम्हारा भी कल्याण होगा, तुम्हें सम्यग्दर्शनादि कल्याणकारी भाव प्राप्त होंगे। अति शोभायमान शाश्वत मेरुपर्वत जिनप्रभु के जन्माभिषेक से अत्यधिक सुसज्जित हो उठा; अथवा ऐसे कहो कि जिनराज ने आकर मेरु की शोभा का हरण कर लिया; क्योंकि लोग तो मेरु की दिव्य शोभा को देखना छोड़कर प्रभु के मुखारविन्द को निहार रहे थे। प्रभु में लगे हुए उनके चित्त को दूसरा कोई आकर्षित नहीं कर सकता था। मेरु पर ‘स्थापनारूप जिन’ तो सदा-शाश्वत विराजते हैं, तदुपरान्त आज तो ‘द्रव्यजिन’ तथा अंशतः ‘भावजिन’ वहाँ पधारे थे; फिर उसके गौरव की क्या बात? अहा, वह तो जगत का एक पूजनीय तीर्थ बन गया था। वहाँ ध्यान धरकर अनेक मुनिवर निर्वाण प्राप्त करते हैं, इसलिए वह सिद्धिधाम (निर्वाण तीर्थ) भी है। अहा, तीर्थ स्वरूप आत्मा का जहा...