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  जीवन है पानी की बूंद () रचयिता व प्रणेता : परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे। होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥  
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जीवन है पानी की बूंद (106-110) रचयिता व प्रणेता : परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे। होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥   चारपाई पर लेटा है, पास न बेटी-बेटा है। चिल्लाता है पानी दो, कोई न पानी देता है। भूखा प्यासा ही, हो ऽऽ ....,   भूखा प्यासा ही, इक दिन मर जाये रे।।106।।जीवन है...... जीवन बीता अरघट में, पुण्य पाप की करवट में। चढ़कर अर्थी पर जाये, अन्त समय भी मरघट में। तेरा ही बेटा, हो ऽऽ ....,   तेरा ही बेटा, तेरा कफन सजाये रे।।107।।जीवन है...... सिर पर जिसे बिठाया है, गोदी में भी खिलाया है। लाड़ प्यार से पाला है, सुख की नींद सुलाया है। तेरा ही बेटा, हो ऽऽ ...., तेरा ही बेटा, तुझे आग लगाये रे।।108।।जीवन है...... जिसके लिए कमाता है, जीवन साथी बताता है। जिसकी चिन्ता कर करके, अपना चैन गंवाता है। देहरी से बाहर, हो ऽऽ ....,   देहरी से बाहर, वो साथ न जाये रे।।109।।जीवन है...... जीवन है पानी की बूँद कब मिट जाये रे-ऽऽ होनी-अनहोनी, हो ऽऽ ...., -कब क्या घट जाये रे -ऽऽ जीवित क र ना धर्म हमें, तो हम पैदा ज्ञान करें । जिनगुरु का स...

जीवन है पानी की बूंद (101-105)

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जीवन है पानी की बूंद (101-105) रचयिता व प्रणेता : परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज   जीवन है पानी की बूंद कब मिट जाए रे होनी अनहोनी कब क्या घट जाए रे।। पढ़ा न जरा विचारा है, खुद को नहीं सुधारा है। खुद को नहीं सुधारा है, इसीलिए अंधियारा है।। इसीलिए अँधियारा है, दिल में नहीं उतारा है। खुद को ही पढ़ ले,  हो ऽऽ ...., खुद को ही पढ़ ले, सब कुछ पढ़ जाए रे ।।101।। जीवन है..... करना है वो आज करें , कल पर मत विश्वास करें। कल पर मत विश्वास करें, आज करें वो अभी करें।। कल को किस ने देखा है, कल का नहीं भरोसा हैं। कल-कल करके तू,  हो ऽऽ ...., कल-कल करके तू,  क्यों अकल गंवाये रे।।102।। जीवन है...... साथ निभायेगा बेटा, सोच रहा लेटा-लेटा। हाय बुढ़ापा आयेगा पास न आयेगा बेटा। ख्वाबों में तू क्यों,  हो ऽऽ ....,   ख्वाबों में तू क्यों, आनन्द मनाये रे ।।103।।जीवन है...... अर्द्धमृतक समवृद्धापन, झुकी कमर सिकुड़न-सिकुड़न| गोदी में पोता-पोती, खोज रहा बचपन यौवन| बीते जीवन के,  हो ऽऽ ...., बीते जीवन के, तू गीत सुनाये रे ।।104।।जीवन है......  हाथों में लकड़ी थामी...

नमस्कार

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  नमस्कार   जिनके दर्शन से कटे, जन्म जन्म के पाप। जिनके सुमिरण से मिटे, भव भव के सन्ताप॥ जिनका उज्ज्वल ध्यान है, तीन भुवन में सार। ऐसे वीर जिनेश पद, वन्दों बारम्बार॥ १ जय जय जय महावीर नमस्ते, जय जय जय गुण धीर नमस्ते। जय जय जगदाधार नमस्ते, जय जय सुख दातार नमस्ते॥ जय जय दीनदयाल नमस्ते, जय जय जग प्रतिपाल नमस्ते। जय जय करुणा धाम नमस्ते, महावीर शुभ नाम नमस्ते॥ जय जय जय अरिहंत नमस्ते, जय जय जय सत् सन्त नमस्ते। पतितों के पतवार नमस्ते, जीवन के आधार नमस्ते॥ जय जय जय योगीश नमस्ते, जय जय जय जगदीश नमस्ते। कुण्डलपुर लिया जन्म नमस्ते, इन्द्र महोत्सव कीन नमस्ते॥ जय जय जय शृंगार नमस्ते, शिव पथ के करतार नमस्ते। जय जय जय जग भानु नमस्ते, जय जय जग के मान नमस्ते॥ प्राणों के सन्तोष नमस्ते, विद्या जीवन ज्योति नमस्ते। पावापुर से मुक्त नमस्ते, अधम अनेकन तार नमस्ते॥ हृदय कुंज में आन विराजो, नैनन में भगवान विराजो। जिह्वा से हो सुमिरन तेरा, कान सुनें शुभ वर्णन तेरा॥ रोम रोम में अरिहंत ध्वनि हो, आशा तेरी सहचरनी हो। धाम नमस्ते, नाम नमस्ते, चरणाम्बुज धर माथ नमस्ते॥ दोहा- वीर प्रभु तुम चरण में, आशा यही दिन र...

महावीर स्वामी की आरती

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  महावीर स्वामी की आरती करौँ आरती वर्द्धमान की, पावापुर निर्वाण थान की॥ टेक राग बिना सब जग जन तारे, द्वेष बिना सब कर्म बिदारे। शील धुरन्धर शिव तिय भोगी, मन बच काय न कहिये योगी॥ रतन त्रय निधि परिग्रह हारी, ज्ञान सुधा भोजन व्रत धारी। लोक अलोक व्यापे निज माहीं, सुखमय इन्द्रिय सुख दु:ख नाहीं॥ पंच कल्याणक पूज्य विरागी, विमल दिगम्बर अम्बर त्यागी। गुन मनि भूषण भूषित स्वामी, जगत उदास जगन्तरजामी॥ कहैँ कहाँ लो तुम सब जानो, ‘द्यानत’ की अभिलाष प्रमानो। करौँ आरती वर्द्धमान की, पावापुर निर्वाण थान की॥ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

श्रीचौबीस तीर्थंकरों के चिन्ह

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श्रीचौबीस तीर्थंकरों के चिन्ह वृषभनाथ का ‘वृषभ’ जु जान। अजितनाथ के ‘हाथी’ मान। संभवजिन के ‘घोड़ा’ कहा। अभिनंदन पद ‘बंदर’ लहा ॥१ सुमतिनाथ के ‘चकवा’ होय। पद्मप्रभ के ‘कमल’ जु जोय। जिनसुपास के ‘सातिया’ कहा। चंद्रप्रभपद ‘चंद्र’ जु लहा ॥२ पुष्पदंत पद ‘मगर’ पिछान। ‘कल्पवृक्ष’ शीतल पद मान। श्री श्रेयांसपद ‘गेंडा’ होय। वासुपूज्य के ‘भैंसा’ जोय ॥३ विमलनाथ पद ‘शूकर’ मान। अनँतनाथ के ‘सेही’ जान।  धर्मनाथ के ‘वज्र’ कहाय। शांतिनाथ पद ‘हिरन’ लहाय ॥४ कुंथुनाथ के पद ‘अज’ चीन्ह। अरजिन के पद चिन्ह जु ‘मीन’ ॥५ मल्लिनाथ पद ‘कलसा’ कहा। मुनिसुव्रत के ‘कछुआ’ लहा ॥५ ‘लालकमल’ नमिजिन के होय। नेमिनाथ-पद ‘शंख’ जु होय ॥ पार्श्वनाथ के ‘सर्प’ जु कहा। वर्द्धमान पद ‘सिंह’ हि लहा ॥६ ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

वीर प्रभु गुण गावो रे

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वीर प्रभु गुण गावो रे (धुन - चलत मुसाफिर मोह लिया रे....) वीर प्रभु गुण गावो रे, मोरे प्यारे सजनवा॥ टेक॥ कठिन कठिन नर चोला तैने पाया था। पुण्य उदय भारी तेरा कोई छाया था। क्यों विरथा इसे लुटायो रे, मोरे प्यारे सजनवा॥१॥ विषय वासना में सुख तैने चाहा था। इस झूठे संसार में यूँ ही भरमाया था। चैन कहीं भी न पायो रे, मोरे.....॥२॥ वीर नाम है बड़ा अलबेला। इसमें लगे न तेरा कोई पाई धेला। क्यों प्रभु नाम भुलायो रे, मोरे.....॥३॥ ‘कैलाश’ वीर शरण में आजा। जीवन अपना सफल बना जा। आतम जोत जगायो रे, मोरे.......॥४॥ । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

है दुर्लभ ज्ञान

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है दुर्लभ ज्ञान चाल—यह कैसे बाल बिखरे हैं यह क्यों सूरत बनी गम की । है दुर्लभ ज्ञान दुनिया में, धरम सब से अमोलक है यही भगवान ने भाषा, धरम सब से अमोलक है ॥टेक॥ रखो तन अपना धन देकर, बचाओ लाज तन देकर धरम पर वार दो सब कुछ, धरम सब से अमोलक है ॥टेक॥ धरम के सामने सब हे य, है सामान दुनिया का धरम ही सार है जग में, धरम सब से अमोलक है ॥टेक॥ धरम के वास्ते सीता, किया परवेश अगनी में गये बन राज तज रघुवर, धरम सबसे अमोलक है ॥टेक॥ धरम के वास्ते गर जान भी, जाये तो दे दीजे समझ लीजे यकीं कीजे, धरम सब से अमोलक है ॥टेक॥ । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद