भगवान महावीर स्वामी (61)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (61) भारत में भगवान महावीर तीर्थंकर से पूर्व २३वें पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था; अहिंसाधर्म की महिमा फैल रही थी। भगवान महावीर ने भी वह बात प्रचारित की कि राग से भिन्न आत्मा के अनुभव द्वारा ही अहिंसाधर्म का पालन हो सकता है; क्योंकि राग स्वयं हिंसा है, इसलिए जो जीव जितना राग में वर्तता है, उतना वह हिंसा में ही वर्त रहा है। जिसमें राग नहीं है, ऐसे ज्ञान की अनुभूति वह परम अहिंसाधर्म है और उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। ऐसे अहिंसाधर्म के उपदेशक प्रभु महावीर ने विपुलाचल से विहार करके भारतभूमि को पावन किया। जहाँ वे पधारते, वहाँ अहिंसामय शान्त वातावरण हो जाता था। सर्प और नेवले जैसे विरोधी जीव भी एक-दूसरे के मित्र बन जाते थे। सिंह और गाय, शेर और खरगोश... सब भयरहित होकर एक साथ बैठते थे... और वीरवाणी का अमृत-पान करते थे। प्रभु ने अनेकान्त तत्व का स्वरूप समझाया- जीव अतीन्द्रिय चेतनतत्व है, वह जड़ से भिन्न है। चेतन और जड़ प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने स्वधर्म में स्थित हैं। एक ही वस्तु का एकसाथ अपने अनेक धर्मों में तन्मय रूप से रहना ही ‘अनेकान्त’ है। एक ही आत्...