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श्री महावीर जिनपूजा

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  श्री महावीर जिनपूजा (शिखा जैन, दिल्ली) बोलो श्री महावीर भगवान की जय ऊँ नमः सिद्धेभ्यः! ऊँ नमः सिद्धेभ्यः! ऊँ नमः सिद्धेभ्यः! वीरप्रभु, महावीर प्रभु जी, सिद्धालय के वासी हो, मोक्षमार्ग प्रदाता स्वामी, अनंत गुण की राशि हो। हृदय पधारूँ तुमको भगवन्, अब न देर लगाऊँ मैं, कर्मशत्रु का नाश करके, तुम सम ही बन जाऊँ मैं।। ऊँ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौष्ट्। (आह्वाननं) आइए प्रभु! आपके आने से मेरा मन, भाव, चेतन, परिणाम सब निर्मल हो जाएं। ऊँ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ ठः ठः। (स्थापनं) आपके चरण-कमल मेरी आत्मा के प्रत्येक प्रदेश में, मेरी आत्मा का प्रत्येक प्रदेश  आपके चरणों में स्थापित हो।  ऊँ ह्रीं श्री महावीर जिनेन्द्र! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्। (सन्निधिकरणं) आपका सान्निध्य पाकर प्रभु! आपके ज्ञान के प्रकाश से मेरी आत्मा पर अनादि से आच्छादित मोह-मिथ्यात्व और अज्ञान का अंधकार उसी प्रकार दूर हो जाए, जैसे कभी आपका हुआ था। इसी भाव से पूजा जी की स्थापना करते हैं। अष्टक क्षीरोदधि का नीर, झारि भर लाया हूँ, भवसागर तिरने, चरण चढ़ाने आया हूँ। हे वर्द्धमान...

तीसरी छहढाला(17)

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अ ध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(17) (सुबोध  टीका) तीसरी  निश्चय सम्यक्दर्शन-ज्ञान-चारित्र का स्वरूप परद्रव्य ते भिन्न आप में रुचि सम्यकत्तव भला है। आप रूप को जानपनो, सो सम्यक् ज्ञान कला है। आप रूप में लीन रहे थिर, सम्यक् चारित सोई। अब व्यवहार मोक्षमग सुनिये, हेतु नियत को होई ॥२॥ अन्वयार्थ- (आपमें) आत्मा में (परद्रव्यन ते) परवस्तुओं से (भिन्न) भिन्नपने की (रुचि) श्रद्धा करना सो (भला) निश्चय (सम्यक्त्त्व) सम्यग्दर्शन है। (आप रूप को) आत्मा के स्वरूप को (परद्रव्यन ते भिन्न) परद्रव्यों से भिन्न (जानपनो) जानना (सो) वह (सम्यक् ज्ञान) निश्चय सम्यग्ज्ञान (कला) प्रकाश (है) है। (परद्रव्यन ते भिन्न) परद्रव्यों से भिन्न ऐसे (आप रूप में) आत्मस्वरूप में (थिर) स्थिरतापूर्वक (लीन रहे) लीन होना, सो (सम्यक् चारित) निश्चय सम्यग्चारित्र (सोई) है। (अब) अब (व्यवहार मोक्षमग) व्यवहार-मोक्षमार्ग (सुनिये) सुनो कि जो व्यवहारमोक्षमार्ग (नियतको) निश्चय-मोक्षमार्ग का (हेतु) निमित्त-कारण (होई) है। भावार्थः-- पर पदार्थों से त्रिकाल भिन्न ऐसे निज-आत्मा में अटल विश्वास करना उसे निश्चयसम्यग्दर्श...

देव-शास्त्र-गुरु पूजा

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 देव-शास्त्र-गुरु पूजा (पारुल जैन, दिल्ली)  Sung by Parul Jain, Delhi बोलो पंच परमेष्ठी भगवन्तों की जय ऊँ नमः सिद्धेभ्यः! ऊँ नमः सिद्धेभ्यः! ऊँ नमः सिद्धेभ्यः! हे वीतरागी सर्वज्ञ प्रभु, जग हितकारी को नमस्कार। निर्मल भावों से करूँ वन्दना, ध्याऊँ तुमको बारम्बार।। इस जग को जो मंगलकारी, उस जिनवाणी को नमस्कार। जो मोक्षमार्गी निर्ग्रन्थ गुरु, उनको वंदू मैं नंत बार।। हृदयांगन में करूँ प्रतीक्षा, शुद्ध भाव से आज।  पर परिणति से विमुख हो, ये ही मन की आस।।  ऊँ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरु समूह! अत्र अवतर अवतर संवौष्ट् (आह्वाननं) आइए प्रभु! आपके आने से मेरा मन, भाव, चेतन, परिणाम सब निर्मल हो जाएं। ऊँ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरु समूह! अत्र तिष्ठ ठः ठः (स्थापनं) आपके चरण-कमल मेरी आत्मा के प्रत्येक प्रदेश में, मेरी आत्मा का प्रत्येक प्रदेश आपके चरणों में स्थापित हो।  ऊँ ह्रीं श्री देव-शास्त्र-गुरु समूह! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् (सन्निधिकरणं) आपका सान्निध्य पाकर प्रभु! आपके ज्ञान के प्रकाश से मेरी आत्मा पर अनादि से आच्छादित मोह-मिथ्यात्व और अज्ञान का अंधकार उसी प्रकार दूर ...

कर्म रूपी मिट्टी ने

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कर्म रूपी मिट्टी ने  पारुल जैन, दिल्ली की लेखनी द्वारा रचित सुन्दर भजन Sung by- Parul Jain, Delhi कर्म रूपी मिट्टी ने प्रभु जी, चेतन को है ढाक दिया। दे दो प्रभु जी प्रज्ञा छेनी, जिससे उसको हटा दिया।। निर्मल शुद्ध है चेतन मेरा, ये मुझको है भान हुआ। लेकिन पाऊँ इसको कैसे, इसका प्रभु न ज्ञान हुआ।। मेरे अंतर के परिणामों, को तुम आज जगा देना। अंतर में शुद्ध चेतन है प्रभु, अनुभूति आज करा देना।। ‘हूँ’ का ज्ञान करूँ मैं कैसे, ’हूँ’ को कैसे पहचानूँ। चेतन राजा मिलेंगे कैसे, कैसे निज को पहचानूँ।। कैसे ज्ञान किया प्रभु तुमने, कैसे तुम समता पाई। पाप पुण्य सब नष्ट किये तुम, कैसे निज महिमा आई।। हे प्रभु मुझको भी वो बल दो, तुम जैसा मैं हो जाऊँ। विषय भोग इस लोक के प्रभु जी, भूल स्वयं में खो जाऊँ।। मैं शुद्ध स्वरूपी चेतन हूँ, मैं निर्मल ज्ञान स्वभावी हूँ। जिनवाणी सुन भान हुआ, मैं दर्शन ज्ञान स्वरूपी हूँ। अब छोड़ लोक के वैभव को, अंतर का रूप लखाऊँगा। अब भूल पराई माया को, निज के घर में अब आऊँगा। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्र...

महावीर का पालना

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  महावीर का पालना सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा Sung by- Bindu Jain, Delhi धुनः होलिया में उड़े रे गुलाल..... रत्नों की बरसे बदरिया, कुण्डलपुर की नगरिया। चैत्र की शुक्ला तेरस आई, कुण्डलपुर में खुशियाँ लाई। जब जन्मे श्री महावीरा, कुण्डलपुर की नगरिया।। राय सिद्धारथ राजदुलारे, त्रिशला की आँखों के तारे। सारी सखियाँ झुलावें पालनिया, कुण्डलपुर की नगरिया। देवी आवें मंगल गावें, ललना को ले मोद मनावें। महावीरा की लेवें बलैंयां, कुण्डलपुर की नगरिया। इन्द्र देव ने प्रभु को उठाया, पाण्डुक शिला पर न्हवन कराया। सोने चाँदी के ले के कलशिया, कुण्डलपुर की नगरिया। पट-भूषण से उन्हें सजाया, सोने के रथ में बिठलाया। सूरज चमका हो जैसे गगनिया, कुण्डलपुर की नगरिया। सिर पर उनके छत्र विराजे, रत्नों का सिंहासन साजे। दोनों हाथों से ढुरावें चँवरिया, कुण्डलपुर की नगरिया। सम्यक् दर्शन, ज्ञान-चरण-तप, हम को दिखलाते हैं भगवन्। मोक्ष नगर की डगरिया, कुण्डलपुर की नगरिया। रत्नों की बरसे बदरिया, कुण्डलपुर की नगरिया। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र नि...

छहढाला(तीसरी)(16)

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अ ध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(16) (सुबोध टीका)  तीसरी ढाल नरेन्द्र छन्द ( जोगीरासा ) आत्महित, सच्चा सुख तथा दो प्रकार से मोक्षमार्ग का कथन आतम को हित है सुख, सो सुख आकुलता बिन कहिये; आकुलता शिवमांहि न तातैं, शिवमग लाग्यो चहिये । सम्यग्दर्शन ज्ञान चरन शिव, मग सो द्विविध विचारो; जो सत्यारथ रूप सो निश्चय, कारण सो व्यवहारो ।। १ ।। अन्यार्थः (आतम को) आत्मा का (हित) कल्याण (है) है (सुख) सुख की प्राप्ति, (सो सुख) वह सुख (आकुलता बिन ) आकुलता रहित (कहिए) कहा जाता है। (आकुलता) आकुलता (शिवमांहि) मोक्ष में (न) नहीं है (तातें) इसलिए (शिवमग) मोक्षमार्ग में (लाग्ये) लगना (चाहिये) चाहिये। (सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरन) सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र इन तीनों की एकता वह (शिवमग) मोक्ष का मार्ग है। (सो) उस मोक्षमार्ग का (द्विविध) दो प्रकार से (विचारो) विचार करना चाहिये कि (जो) जो (सत्यारथरूप) वास्तविक स्वरूप है (सो) वह (निश्चय) निश्चय-मोक्षमार्ग है और (कारण) जो निश्चय-मोक्षमार्ग का निमित्तकारण है (सो) उसे (व्यवहारो) व्यवहार-मोक्षमार्ग कहते हैं। भावार्थ - (१) सम्यक्चारित्र निश्चयसम्यग्दर्शन-ज्ञ...

दूसरी ढालकी प्रश्नावली

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  दूसरी ढाल की प्रश्नावली १) अगृहीत-मिथ्याचारित्र, अगृहीत मिथ्याज्ञान, अगृहीत मिथ्या-दर्शन, कुदेव, कुगुरु, कुधर्म, गृहीत-मिथ्यादर्शन, गृहीत मिथ्या-ज्ञान, गृहीत मिथ्याचारित्र, जीवादि छह द्रव्य- इन सबका लक्षण बतलाओ । (२) मिथ्यात्व और मिथ्यादर्शन में, अगृहीत और गृहीत में, आत्मा और जीव में तथा सुगुरु, कुगुरु और विद्यागुरु में क्या अन्तर है, वह बतलाओ । (३) अगृहीत का नामान्तर, आत्महित का मार्ग, एकेन्द्रिय को ज्ञान न माननेसे हानि, कुदेवादि की सेवा से हानि; दूसरी ढाल में कही हुई वास्तविकता, मृत्युकाल में जीव निकलते हुए दिखाई नहीं देता; उसका कारण, मिथ्यादृष्टि की रुचि, मिथ्यादृष्टि की अरुचि, मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र की सत्ता का काल; मिथ्यादृष्टि को दुःख देनेवाली वस्तु, मिथ्या-धार्मिक कार्य करने-कराने या उसमें सम्मत होने से हानि तथा सात तत्त्वों की विपरीत श्रद्धा के प्रकारादि का स्पष्ट वर्णन करो। (४) आत्महित, आत्मशक्ति का विस्मरण, गृहीत मिथ्यात्व, जीवतत्त्व की पहिचान न होने में किसका दोष है, तत्त्व का प्रयोजन, दुःख, मोक्षसुख की अप्राप्ति और संसार-परिभ्रमण के कारण दर्शाओ। (५) मिथ्यादृष्टि का...

भावमयी पूजा

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 श्री 1008 चौबीस तीर्थंकरों की भावमयी पूजा  Written  by- Parul Jain, Dariaganj, Delhi ॐ नमः सिद्धेभ्यः! ॐ नमः सिद्धेभ्यः! ॐ नमः सिद्धेभ्यः!   कर लो जिनवर का गुणगान, आई शुभ की घड़ी। -2 आई शुभ की घड़ी, देखो मंगल घड़ी।। -2 बोलो चौबीसों भगवान की जय चौबीसों भगवान को, धारूँ मैं निज ज्ञान। आह्वानन उनका करूँ, पाऊँ सम्यक् ज्ञान।। स्थापन उनके गुण करूँ, अपने हृदय में आज। चिंतन, मनन, सुमिरन करूँ, शुद्धभाव से आज।। -2 ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वानम्। आइए प्रभु! आपके आने से मेरी आत्मा, मेरी चेतना, मेरा मन, मेरे भाव सब निर्मल हो जाएं। ॐ ह्रीं  श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। आपके ज्ञान रूपी चरण-कमल मेरी आत्मा के प्रत्येक प्रदेश में, मेरी आत्मा का प्रत्येक प्रदेश  आपके चरणों में स्थापित हो।  ॐ ह्रीं श्री वृषभादि चौबीस तीर्थंकरेभ्यः अत्र मम सन्निहितो भव  भव वषट् सन्निधिकरणम्।  हे प्रभु! आपका सान्निध्य पाकर आपके ज्ञान के प्रकाश से मेरी आत्मा पर आच्छादित मोह-मिथ्यात्व और अज्ञान का अंधका...

दूसरी ढाल का सारांश

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  दूसरी ढाल का सारांश (१) यह जीव मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्र के वश में होकर चार गतियों में परिभ्रमण करके प्रतिसमय अनन्त दुःख भोग रहा है। जब तक देहादि से भिन्न अपने आत्मा की सच्ची प्रतीति तथा रागादि का अभाव न करे, तब तक सुख-शान्ति और आत्मा का उद्धार नहीं हो सकता। (२) आत्महित के लिये (सुखी होने के लिये) प्रथम (१) सच्चे देव, गुरु और धर्म की यथार्थ प्रतीति, (२) जीव आदि सात तत्त्वों की यथार्थ प्रतीति, (३) स्व-पर के स्वरूप की श्रद्धा, (४) निज शुद्धात्मा केप्रतिभासरूप आत्मा की श्रद्धा - इन चार लक्षणों के अविनाभाव सहित सत्य श्रद्धा (निश्चय सम्यग्दर्शन) जब तक जीव प्रगट न करे, तब तक जीव (आत्मा) का उद्धार नहीं हो सकता अर्थात् धर्म का प्रारम्भ भी नहीं हो सकता; और तब तक आत्मा को अंशमात्र भी सुख प्राप्त नहीं होता। (३) सात तत्त्वों की मिथ्या श्रद्धा करना - उसे मिथ्यादर्शन कहते हैं। अपने स्वतंत्र स्वरूप की भूल का कारण आत्मस्वरूप में विपरीत श्रद्धा होने से ज्ञानावरणी आदि द्रव्यकर्म, शरीरादि नौकर्म तथा पुण्य-पाप आदि मलिनभावों में एकत्वबुद्धि-कर्तृत्वबुद्धि है; और इसलिए शुभराग तथा पुण्य...

दूसरी ढाल का भेद-संग्रह

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  दूसरी ढाल का भेद-संग्रह दूसरी ढाल का भेद-संग्रह इन्द्रियविषय -स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द। तत्त्व - जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष। द्रव्य - जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल। मिथ्यादर्शन - गृहीत, अगृहीत। मिथ्याज्ञान - गृहीत (बाह्यकारणप्राप्त), अगृहीत (निसर्गज-स्वयं पूर्वजन्म से प्राप्त)। मिथ्याचारित्र - गृहीत और अगृहीत। महादुःख - स्वरूप सम्बन्धी अज्ञान; मिथ्यात्व। विमानवासी - कल्पोपपन्न और कल्पातीत। दूसरी ढाल का लक्षण-संग्रह अनेकान्तवाद - प्रत्येक वस्तु में वस्तुपने को प्रमाणित-निश्चित करनेवाली।  अस्तित्व-नास्तित्व आदि परस्पर-विरुद्ध दो शक्तियों का एक साथ प्रकाशित होना। (आत्मा सदैव स्व-रूप से है और पर-रूप से नहीं है, ऐसी जो दृष्टि है, वह अनेकान्तदृष्टि है)। अमूर्तिकः - रुप, रस, गंध और स्पर्श रहित वस्तु । आत्माः - जानने-देखने अथवा ज्ञान-दर्शन शक्ति वाली वस्तु को आत्मा कहा जाता है। जो सदा जाने और जानने रूप परिणमित हो, उसे जीव अथवा आत्मा कहते हैं। उपयोगः  जीव की ज्ञान-दर्शन अथवा जानने-देखने को शक्ति का व्यापार। एकान्तवादः  अनेक धर्मों की सत्ता क...

छहढाला (15)

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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला (15) (सुबोध टीका) गृहीत मिथ्याचारित्र का लक्षण जो ख्याति लाभ पूजा आदि चाह, धरि करन विविध विध देहदाह। आत म  अनात्म के ज्ञानहीन, जे जे करनी तन करन छीन।।१४।। अन्वयार्थः - (जो) जो (ख्याति) प्रसिद्धि (लाभ) लाभ तथा (पूजा आदि) मान्यता और आदर-सम्मान आदि की ( चाह  धरि) इच्छा करके (देहदाह) शरीर को कष्ट देने वाली (आतम अनात्म के) आत्मा और परपदार्थों के (ज्ञानहीन) भेदज्ञान से रहित (तन) शरीर को (छीन) क्षीण (करन) करने वाली (विविध विध) अनेक प्रकार की ( जे जे करनी ) जो-जो क्रियाएँ हैं, वे सब ( मिथ्याचारित्र ) मिथ्या चारित्र हैं । भावार्थः - शरीर और आत्मा का भेदविज्ञान न होने से जो यश, धन-सम्पत्ति, आदर-सत्कार आदि की इच्छा से मानादि कषाय के वशीभूत होकर शरीर को क्षीण करने वाली अनेक प्रकार की क्रियाएँ करता है, उसे “गृहीत मिथ्याचारित्र” कहते हैं। मिथ्याचारित्र के त्याग का तथा आत्महित में लगने का उपदेश   ते सब मिथ्याचारित्र त्याग, अब आतम के हित पंथ लाग;  जगजाल-भ्रमण को देहु त्याग, अब दौलत! निज आतम सुपाग । १५ । अनव्यार्थ : (ते) उस (सब) समस्त (मि...