बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 22)

बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी (भाग - 22)

श्री कृष्ण की मृत्यु

द्वारिका नगरी को जलता हुआ छोड़ कर श्री कृष्ण और बलभद्र दक्षिण की ओर जा रहे थे। वहाँ कौशाम्बी का भयंकर वन आया। वहाँ ‘मृगजल’ तो बहुत दिखाई देता था, पर प्यास बुझाने के लिए वास्तविक जल मिलना मुश्किल था। थके हुए श्री कृष्ण को बहुत प्यास लगी। उन्होंने अपने भाई बलभद्र से कहा - हे बन्धु! पानी के बिना मेरे प्राण कण्ठ तक आ गए हैं। जिस प्रकार संसार-दुःख से सन्तप्त प्राणी का भवाताप सम्यग्दर्शन रूपी जल से मिट जाता है, उसी प्रकार आप मुझे शीतल जल लाकर दो, जिससे मेरी तृषा शान्त हो और मेरे प्राण बच सकें।

बलभद्र उन्हें जिनेन्द्र-गुणस्मरण करने को कह कर उनके लिए पानी की खोज में गए। पानी खोजते-खोजते वे कहीं दूर चले गए। इधर थके हुए, हताश एवं प्यासे श्री कृष्ण पीताम्बर ओढ़ कर पैर पर पैर रख कर वृक्ष की छाया में लेट गए और उन्हें नींद आ गई। उसी समय एक सनसनाता हुआ तीर आया और श्रीकृष्ण को बींध गया....।

कौन था वह बाण चलाने वाला....? वह था उन्हीं का भाई जरत्कुमार! एक भाई तो उनके प्राण बचाने के लिए पानी लेने गया है और दूसरे भाई ने उनके प्राण ले लिए। भाई के हाथ से भाई का प्राणान्त हुआ। यद्यपि उसकी मंशा अपने भाई को मारने की नहीं थी। वह तो ख़ुद इसी भावना से वन में भटक रहा था कि उसके हाथ से भाई श्री कृष्ण की मृत्यु न हो, परन्तु होनहार को कौन टाल सकता है?

श्री कृष्ण के पीतवस्त्र का एक सिरा हवा में उड़ रहा था। उसे ख़रगोश का कान समझ कर जरत्कुमार ने बाण छोड़ा और उस बाण से उसके भाई बिंध गए। जब उसने पास आकर देखा कि ये तो मेरे भाई श्री कृष्ण हैं, तो उसे बहुत पश्चाताप हुआ। श्री कृष्ण के कहने पर उसने धनुष-बाण फेंक दिए, शिकार करना छोड़ दिया और वह पाण्डवों के पास यह समाचार देने के लिए चल पड़ा कि द्वारिका भस्म हो गई है और श्री कृष्ण मृत्यु को प्राप्त हो गए हैं।

किसी ने सच ही कहा है -

राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार,

मरना सब को एक दिन, अपनी-अपनी बार।

अरे! कहाँ वह तीन खण्ड का राजवैभव और कहाँ निर्जन वन में बिना पानी के मरण!!

क्रमशः

।।ओऽम् श्री नेमिनाथ जिनेन्द्राय नमः।।

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