तेरी छत्रच्छाया
समाधि भक्ति (शब्द शिल्प अनुकम्पा: आचार्य श्री विभव सागर जी महाराज) Sung by -Bindu Jain, Delhi तेरी छत्रच्छाया भगवन्! मेरे सिर पर हो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो जिनवाणी रसपान करूँ मैं, जिनवर को ध्याऊँ। आर्यजनों की संगति पाऊँ, व्रत संयम चाहूँ। गुणीजनों के सद्गुण गाऊँ, जिनवर यह वर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो परनिन्दा न मुँह से निकले, मधुर वचन बोलूँ। हृदय तराजू पर हितकारी, सम्भाषण तोलूँ आत्म तत्व की रहे भावना, भाव विमल कर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो जिन शासन में प्रीति बढ़ाऊँ, मिथ्यापथ छोड़ूँ। निष्कलंक चैतन्य भावना, जिनमत से जोड़ूँ जन्म-जन्म में जैन धर्म, यह मिले कृपा कर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो मरण समय गुरु पाद-मूल हो, सन्त समूह रहे। जिनालयों में जिनवाणी की, गंगा नित्य बहे भव-भव में संन्यास मरण हो, नाथ हाथ धर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो बाल्यकाल से अब तक मैंने, जो सेवा की हो। देना चाहो प्रभो! आप तो, बस इतना फल दो श्वास-श्वास अन्तिम श्वासों में, णमोकार भर दो। मेरा अन्तिम मरण समाधि, तेरे दर पर हो विषय कषायों को मैं त्...