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Showing posts from May, 2026

जिनवर का दरबार है-आरती भक्तामर जी की

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 मंगल आरती भक्तामर जी की Sung by & Bindu Jain, Delhi. तर्ज - भव सागर अपार है......... जिनवर का दरबार है, नमन करें शतबार हैं। भक्तामर की देखो कैसी, महिमा अपरम्पार है।।टेक।। मंगल आरती लेकर प्रभु जी, आया तेरे द्वार जी। भक्तामर का पाठ करे जो, होगा बेड़ा पार जी।। यही जगत का सार है, झूठा सब संसार है। भक्तामर की देखो...........।। चौबीसों जिन, पंच परम गुरु, रत्नत्रय उर धार जी। अवधि ऋद्धिधारक ऋषिगण को, भक्ति सहित शिर धार जी।। यही गले का हार है, मानव का शृंगार है। भक्तामर की देखो...........।। इक दिन तेरा यह तन चेतन, मिट्टी में मिल जाएगा। भक्तामर का ध्यान धरे जो, मानतुंग बन जाएगा।। मूल मंत्र आधार है, बीज मंत्र साकार है। भक्तामर की देखो...........।। यह तन तेरा इक दिन चेतन, अग्नि में जल जाएगा। ‘अभयमती’ कहे जप तप करले, नहिं पीछे पछताएगा।। प्रभु की भक्ति अपार है, पावे मुक्ति सार है। भक्तामर की देखो कैसी, महिमा अपरम्पार है।।टेक। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया com...

कर्म की गति

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कर्म की गति कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 चिट्ठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग्य न बाँचे कोय। पल में सुख दे, पल में दुःख दे, ये कर्मन की रीत-2  बीती जाय सारी उमरिया-2,  दिन पर दिन ढल जाये, कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 चार दिनों की है ज़िंदगानी, हर पल बीती जाये, -2 कुछ तो ऐसा कारज कर ले, जीवन सफल हो जाये।  कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 अब तो चेत सयाने नर तन, बार-बार नहीं पाये-2 इस चक्कर में क्यों तू फंसा रे, नेहा प्रभु से लगाये। कर्म की गति न्यारी रे भाई-2 चिट्ठिया हो तो हर कोई बाँचे, भाग्य न बाँचे कोय। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

लघु शांतिनाथ पूजन विधान

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लघु शांतिनाथ पूजन विधान ( रचनाकार - मुनि श्री सुव्रतसागर जी) सिद्ध शिला वासी हे भगवन्!  तुमको आज बुलाऊं मैं, स्वार्थ के सारे नाते हैं, हे सिरताज भुलाऊं मैं। भक्ति भाव के उर आसन पर, श्रद्धा सहित बिठाऊं मैं, भक्ति भावना पूरी करिए, सुर संगीत रिझाऊं मैं। नाना वाद्य बजाऊं मैं, शांतिनाथ गुण गाऊं मैं, बार बार सिर नवाऊं मैं। ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्र सर्व कर्म  बंधन विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे पंचमचक्रेश्वर! अत्र अवतर अवतर संवौषट्! (आह्वाननम्) ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्र सर्व कर्म  विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे द्वादश कामदेवेन्द्र! अत्र तिष्ठ! तिष्ठ! ठ:! ठ! (स्थापनम्) ॐ ह्रीं श्री शांतिनाथ  जिनेन्द्राय सर्व कर्म  बंधन विमुक्त सकल विघ्न  शांतिकर सम्पूर्णोत्तम मंगलप्रद! हे षोडश तीर्थंकर! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्! (सन्निधिकरणम्) पुष्पांजलिं वापी कूप सरोवर सिंधु का जल, कहां से लाऊं मैं। युगल नयन का नीर हे भगवन्! तव पद पद्म चढ़ाऊं मैं। शांतिनाथ शांति के दाता, सर्व अशांति दूर करो। विघ्न...

छहढाला(41)

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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(41)  सामायिक, प्रोषध, भोगोपभोगपरिमाण और अतिथिसंविभागव्रत धर उर समताभाव, सदा सामायिक करिये, परव चतुष्टयमांहि, पाप तज प्रोषध धरिये; भोग और उपभोग, नियमकरि ममत निवारै, मुनिको भोजन देय फेर, निज करहि अहारै ।। १४ ।। अन्वयार्थ:-  (उर) मन में (समताभाव) निर्विकल्पता अर्थात् शल्य के अभाव को (धर) धारण करके (सदा) हमेशा (सामायिक) सामायिक (करिये) करना, सो सामायिक शिक्षाव्रत है;  (परव चतुष्टयमांहि ) चार पर्व के दिनों में (पाप) पापकार्यों को छोड़कर (प्रोषध) प्रोषधोपवास (धरिये) करना,  सो प्रोषध उपवास शिक्षा-व्रत है;  (भोग) एक बार भोगा जा सके, ऐसी वस्तुओं का तथा (उपभोग) बारम्बार भोगा जा सके, ऐसी वस्तुओं का (नियमकरि) परिमाण करके --मर्यादा रखकर (ममत) मोह (निवारि) छोड़ दे, सो भोग-उपभोगपरिमाणव्रत है;  (मुनिको) वीतरागी मुनि को (भोजन) आहार (देय) देकर (फेर) फिर (निज अहारै) स्वयं भोजन करे, सो अतिथिसंविभागव्रत कहलाता है ।  भावार्थः-- स्वोन्मुखता द्वारा अपने परिणामों को स्थिर करके प्रतिदिन विधिपूर्वक सामायिक करना सो सामायिक शिक्षाव्रत है...

प्रभु भक्ति

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  प्रभु भक्ति (दर्शन करते हुए के भाव)   ( पारुल जैन, दरियागंज, दिल्ली) तेरे चरणों में हे भगवन्! मैं शीश झुकाता हूँ। आशीष मिले तेरा यही भावना भाता हूँ। दर्शन तेरा पाऊँ, दर्शन मैं कर पाऊँ। निज में निज को देखूँ, तुम-सा ही बन जाऊँ॥ प्रभु आत्म-बोध जगे, यही आस ले आया हूँ। तेरा दर्शन कर पाऊँ, यही भावना भाता हूँ॥ तेरे चरणों ... प्रभु वीतरागी मुद्रा, ये शांत छवि तेरी- जिसको लख कर प्रभु जी, मैं शांति पाता हूँ। ये नासा दृष्टि तेरी, प्रभुवर सिखलाती है। देखें जानूँ सब कुछ, निज में रहना चाहूँ॥ तेरे चरणों .... कर पर कर रखे देख, यही भाव समझता हूँ। कर्ता नहीं जब तुम हो, मैं व्यर्थ भटकता हूँ ॥ कर्ता नहीं वह निज पर का, फिर क्यों मैं अटकता हूँ। कर्ता बुद्धि त्यागूं, यही भावना भाता हूँ॥ तेरे चरणों ... तुम तो प्रभु वो दर्पण, जो निज को दिखाते हो मैं दोषों से हूँ भरा, मुझको दिखलाते हो प्रभु दूर करूँ सब दोष, समकित को अपनाऊँ । प्रभु भावना निर्मल हो, यही भावना भाता हूँ ॥ तेरे चरणों ... मैं त्यागूं राग और द्वेष, प्रभु मोह को त्यागूं मैं। समता उर में लाकर, मैं निज को पाता हूँ ॥ समता उर में ...

प्रभु के गीत

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प्रभु के गीत प्रभु के गीत गाने में मज़ा है....... प्रभु के गीत गाने में मज़ा है। लग्न दिल में लगाने में मज़ा है। यदि संसार रूठे, रूठ जाए, सभी घरबार छूटे, छूट जाए। उसे अपना बनाने में मज़ा है।...... साजे दिल के इन तारों को मिलाकर, मधुर नगमे सुनाने में मज़ा है।...... सिकन्दर सा किसी पर हो खज़ाना, नहीं सर सामने उसके झुकाना। मिले भगवान का कोई दिवाना, उसी को सर झुकाने में मज़ा है। साजे दिल के इन तारों को मिलाकर, मधुर नगमे सुनाने में मज़ा है।...... हज़ारों आपदाएं सर्द आएं, खड़ा हो काल भी नज़रें गड़ाए। कदम अपने मगर न रोक पाये, पैर आगे बढ़ाने में मज़ा है। साजे दिल के इन तारों को मिलाकर, मधुर नगमे सुनाने में मज़ा है।...... यदि स्वाभिमान से जीना न आया, जामे उल्फत अगर पीना न आया। फटे दिल को अगर सीना न आया, ज़हर बेमोल खाने में मज़ा है।  साजे दिल के इन तारों को मिलाकर, मधुर नगमे सुनाने में मज़ा है।......   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने वि...

णमोकार मय सारा जीवन

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णमोकार मय सारा जीवन णमोकार मय सारा जीवन बना लो । महामंत्र के चेतन को सजा लो ॥ णमोकार के पंच परमेष्ठी प्यारे । भरे शुद्ध भावों से जग में हैं न्यारे ॥   महामंत्र की शक्ति निज में मिला लो । महामंत्र से चेतना को सजा लो ॥ णमोकार...... रहे ज्ञान ही ज्ञान में मेरा ध्यान । महामंत्र सब दुःख हर ले महान ॥   सभी हो सुखी और सबका भला हो । महामंत्र से चेतना को सजा लो ॥ णमोकार........ न तन में हो रोग, न मन में अशान्ति । हो सारे जहाँ में परम शान्ति शान्ति ॥  परम शान्ति अर्हम् सभी को मिला लो । महामंत्र से चेतना को सजा लो ॥ णमोकार......   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

णमोकारमय मेरा

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णमोकारमय मेरा णमोकारमय मेरा, जीवन बना दो,  चरणों की धूलि से......  चरणों की धूलि से, मस्तक सजा दो......-2 मैं हूँ फूल छोटा-सा, तुम्हारे चमन का, कहीं हर न ले जाए, झौंका पवन का, चरणों की छांव में......  चरणों की छांव में, मुझको बिठा लो, अरिहंत निजधाम, मुझ को बुला लो.......णमोकारमय मेरा रहे देह में पर, विदेही बने हो, बंधन में रह कर भी, बंध न सके हो, बंधते रहे झूठे ....... बंधते रहे झूठे, जग बंधनों में...... निराकार मुझको, स्वयं में मिला लो, णमोकारमय मेरा...... हृदय के कमल में हे, गुरुवर विराजो, आतम के अनुभव से, परिचय करा दो, नमन है मेरा जग के...... नमन है मेरा जग के, सब साधुओं को, नमनमय नमनमय, नमनमय बना दो, णमोकारमय मेरा..... .   ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

जब बिन बोले मिलता

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जब बिन बोले मिलता   जब बिन बोले मिलता,तो बोल के क्या मांगें।  मेरी दुनिया तुम ही हो, दुनिया से क्या मांगें।  धन दौलत क्या मांगें, मुस्कान  ये दी तुमने।      हमें गुरु भक्ति की जो पहचान  ये दी तुमने। किस्मत  को बनाते हो, किस्मत  से क्या मांगें।       कोई हमसे पूछे ज़रा, जन्नत कैसी होगी।  दावे से कहते हैं, तेरे दर जैसी होगी।       जीते जी स्वर्ग मिला , मरने पर क्या मांगें। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद

भवसागर में

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भवसागर में भवसागर में दुःख न मिलता, तेरी शरण में आता क्यों?  शरण में आकर सुख न मिलता, तेरी शरण में आता क्यों? सच कहता हूँ मेरे भगवन्, नहीं मैं प्रेम से आया हूँ, विपदाओं ने मुझको घेरा, व्यथा सुनाने आया हूँ। गर्मी जिसको नहीं सताती, वृक्ष के नीचे आता क्यों? भवसागर में दुःख...... तुम तो सुख के सागर गुरुवर!, दो बूंद मिल जाएंगी, जाने वाली अंतिम श्वासें, कुछ पल को रुक जाएंगी। नदियों में यदि जल न होता, हंस बैठने आता क्यों? भवसागर में दुःख..... जो कुछ तुम्हें सुनाया भगवन्!, वो मेरी मजबूरी है, जो कुछ करना चाहो गुरुवर!, करना बहुत ज़रूरी है। दूध यदि माँ नहीं पिलाती, बच्चा रुदन मचाता क्यों? भवसागर में दुःख.... भीख नहीं मैं मांग रहा हूँ, ना ही कोई भिखारी हूँ, स्वामी सेवक को देता है, मैं तो भक्त पुजारी हूँ। जितना नीर लुटाता बादल, उतना ऊपर जाता क्यों? भवसागर में दुःख....  ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा - सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और द...

छहढाला(40)

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अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत छहढाला(40)   अनर्थदण्डव्रत के भेद और उनका लक्षण काहूँकी धनहानि, किसी जय हार न चिन्तै; देय न सो उपदेश, होय अघ बनज कृषि तैं ॥ १२ ॥ (उत्तरार्द्ध) कर प्रमाद जल भूमि वृक्ष पावक न विराधै; असि धनु हल हिंसोपकरण नहिं दे यश लाधै। राग-द्वेष-करतार, कथा कबहुँ न सुनीजै; और हु अनरथ दंड, हेतु अघ तिन्हें न कीजै ॥ १३ ॥ अन्वयार्थः- १- (काहूकी) किसी के (धनहानि ) धन के नाश का, (किसी) किसी की (जय) विजय का अथवा (हार) किसी की हार का (न चिन्तै) विचार न करना उसे अपध्यान-अनर्थदंडव्रत कहते हैं। २-(वनज) व्यापार और (कृषि तैं) खेती से (अघ) पाप (होय) होता है; इसलिये (सो) उसको (उपदेश) उपदेश (न देय) न देना, उसे पापोपदेश-अनर्थदंड व्रत कहा जाता है। ३-(प्रमाद कर) प्रमाद से विना प्रयोजन (जल) जलकायिक, (भूमि) पृथ्वीकायिक, (वृक्ष) वनस्पति- कायिक, (पावक) अग्निकायिक  और वायुकायिक जीवों का (न विराधै) घात न करना, सो प्रमादचर्या-अनर्थदंडव्रत कहलाता है। ४-(असि) तलवार, (धनु) धनुष्य, (हल) हल  आदि (हिंसोपकरण) हिंसा होने में कारणभूत पदार्थों को (दे) देकर (यश) यश (नहि लाधै) न लेन...

निर्वाण कांड

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जय निर्वाण कांड गुणमाल ||    वीतराग वंदौं सदा, भावसहित सिरनाय। कहूँ काण्ड निर्वाण की भाषा सुगम बनाय॥ अष्टापद आदीश्वर स्वामी, वासुपूज्य चम्पापुरि नामि । नेमिनाथ स्वामी गिरनार, बन्दौं भाव भगति उरधार ॥(1) चरम तीर्थंकर चरम शरीर, पावापुरि स्वामी महावीर। शिखर समेद जिनेसुर बीस, भाव सहित बन्दौं निशदीस ॥(2) वरदत्तराय रु इंद्र मुनिंद, सायरदत्त आदिगुणवृंद। नगरतारवर मुनि अठकोडि, बन्दौं भाव सहित कर जोड़ि ॥(3) श्री गिरनार शिखर विख्यात, कोडि बहत्तर अरु सौ सात। शम्भु प्रद्युम्न कुमार द्वै भाय, अनिरुद्ध आदि नमूँ तसु पाय ॥(4) रामचंद के सुत द्वै वीर, लाडनरिन्द आदि गुणधीर। पाँचकोड़ि मुनि मुक्ति मँझार, पावागिरी बंदौ निरधार ॥(5) पाण्डव तीन द्रविड़ राजान आठकोड़ि मुनि मुकति पयान। श्री शत्रुंजय गिरि के सीस, भाव सहित बन्दौं निशदीस ॥(6) जे बलभद्र मुकति में गये, आठकोड़ि मुनि औरहु भये। श्री गजपंथ शिखर सुविशाल, तिनके चरण नमूँ तिहुँ काल ॥(7) राम हनू सुग्रीव सुडील, गवय गवाख्य नील महानील। कोड़ि निण्याणवै मुक्तिपयान, तुङ्गीगिरी वंदौ धरि ध्यान ॥(8) नंग अनंगकुमार सुजान, पाँच कोड़ि अरु अर्द्ध प्रमाण। मुक्ति गये स...