सामायिक-मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 22 सितम्बर, 2022 के प्रवचन का सारांश

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 22 सितम्बर, 2022 के प्रवचन का सारांश

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)

जो निज आत्मा की मस्ती में लीन रहता है, उसी अवस्था का नाम सामायिक है। आज हम अपनी आत्मा की सम्पदा को भूल कर भौतिक सम्पदा में लीन रहते हैं। पुद्गल वस्तुओं को इकट्ठा करने में ही सुख मानते हैं। यह वास्तविक सुख नहीं है, क्योंकि यह तो एक दिन नष्ट हो जाने वाला है। भवन पुराना हो जाए, तो उसका नवीनीकरण करा लेते हो; हमारा यह चर्म भवन अर्थात् शरीर भी तो खण्डहर में बदलता जा रहा है, इसको भी नया बना लो। जब तक पुण्य का उदय चल रहा है, तब तक यह शरीर हमारा साथ दे रहा है। जब पुण्य के फूल मुरझा जाएंगे, तो वह दो कौड़ी का भी नहीं रह जाएगा। जैसे फूल मुरझाने पर फेंक दिया जाता है या नींबू में से रस निकाल कर उसका छिलका फेंक दिया जाता है, वैसे ही पाप का उदय आने पर हमारा भी यही हाल होगा। समय रहते सावधान हो जाओ।

राजा को रंक बनते देर नहीं लगती। यदि पुण्य के फल से धन मिला है, स्वस्थ शरीर मिला है, तो इसे व्यसनों व पापों में मत लगाओ। अच्छे कर्म मोक्ष को प्राप्त कराते हैं और पाप कर्म 7वें नरक में भी पहुँचा सकता है। जो अनादिकाल से भूल करते चले आ रहे हो, उस भूल का सुधार कर लो, वरना भगवान तो क्या पुनः इंसान भी नहीं बन पाओगे। अब भी भूल को भूल नहीं पाओगे तो वह शूल बन कर चुभेगी। नरक गति व पशु गति के दुःख सहन करने पड़ेंगे।

तीन मकार मद्य, माँस, मधु व अन्य अभक्ष्य वस्तुओं आदि का सेवन न करना मनुष्य को जीव हिंसा से बचाता है। भक्ष्य वस्तुओं की भी सीमा बना लेने से इन्द्रिय लोलुपता पर नियन्त्रण किया जा सकता है। हेय-उपादेय का ध्यान रखो। पाप रूप कार्य, असंयम आदि हेय हैं और व्रत, नियम, संयम आदि उपादेय हैं। शरीर भी धर्मध्यान के लिए तो उपादेय है और राग करने योग्य न होने के कारण हेय है। शरीर का राग ही हमें पाप कार्य की ओर ले जाता है।

पंच परमेष्ठी की पूजा-आराधना करो, पर धर्मक्षेत्र में कभी मायाचारी न करो। शास्त्र स्वाध्याय का फल है - शुद्ध आहार, शुद्ध विहार और शुद्ध व्यापार। शुद्ध आहार व सावधानी से किया गया विहार तन-मन को शुद्ध बनाता है और शुद्ध व्यापार आत्मा को पवित्र बनाता है। अशुद्ध आहार-विहार से शुद्ध आत्मा को कैसे निहारोगे?

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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