भगवान शांतिनाथ की कथा(1)
भगवान शांतिनाथ की कथा (1)
(पूर्व भव में राजा मेघनाथ का वर्णन)
‘शांति कथा’ का महत्त्व
भगवान शांतिनाथ की प्रस्तुत कथा परम पावनी और भुवन भावनी है। इस कथा की महिमा महान है, अलौकिक है और अनुपम है। यह प्रीति और वात्सल्य में वृद्धि करती है। जीवन के पाप-ताप-संताप का शमन होता है। दैन्य और दुर्भाग्य का दमन होता है। नैराश्य का नमन और गर्व का गमन होता है। उमंग, उत्साह और उल्लास का उत्सव होता है। यह अहु (अन्न) का वरण, इच्छाओं का कल्पतरु और कामधेनु है। इसके द्वारा मनोवांछाओं की पूर्ति, ओजस्विता का आकर्षण और विजय का विचरण सहज ही संभव हो जाता है। इससे समृद्धि और शांति का संगम निश दिन बना रहता है।
‘शांति कथा’ सभी सिद्धियों को देने वाली है और सर्व विघ्नों का विनाश करने वाली है। जीवन के प्रत्येक पल में होने वाली कठिन से कठिन उलझनों या समस्याओं का सुगम और संतोष पूर्ण समाधान पलक झपकते एक समय के अंदर ही हो जाता है। शुभ और सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने का यह चमत्कारिक और प्रभावित रूप से एक मात्र उपाय है। इसकी आराधना से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक या अन्य किसी प्रकार के सभी कार्यों की सम्पूर्ति हो जाती है।
भगवान शांतिनाथ से पूर्व का काल
कहते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। इसी नियम के अनुसार जब-जब किसी काल विशेष में एक क्षेत्र के सभी लोगों की एक स्वर से प्रबल भावना होती है तथा जिस समय हर घड़ी उस देश के सभी नर नारियों के मुख से एक मात्र यही बात निकलती है कि त्राहि माम्.....तो उस समय उस देश के संपूर्ण आबाल वृद्ध नर-नारियों की उस एक ही मांग, एक ही प्रबल लालसा और सम्मिलित भावनाओं की सुदृढ़ शक्ति से एक महान शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और तीर्थंकर का अवतरण होता है।
इस प्राकृतिक नियम से उस समय इस पवित्र भारत भूमि पर पशु बलि और नरमेध यज्ञों की धूम मची हुई थी। मूक अबोध और निर्बल प्राणियों की पत्थर तक को पिघला देने वाली आहों से यहां के वातावरण का ज़र्रा ज़र्रा शोक, ताप व ग्लानि की श्वासें ले रहा था। यहां की समस्त भूमि ने प्राणियों के बहते हुए खून से एक लाल चादर-सी ओढ़ ली थी। उस अन्याय और अत्याचार का जड़ मूल से उच्छेदन करने के लिए भगवान शांति नाथ उस काल में यहां आए थे।
यथैव नाभेयजिनोयुगादौ,
बलौ पशूनां भगवांश्जवीरः,
तथैव मार्यां कुरुजांगलेऽम्,
श्री शांतिदेवोऽजनिशांतिदाता।।
महामारी का प्रचंड प्रकोप
जब आज से हज़ारों वर्ष पहले इसी भारत भूमि से पन्द्रहवें तीर्थंकर भगवान ‘श्री धर्मनाथ जी’ मोक्ष पधार गए, तब हस्तिनापुर और उसके पड़ोस के भूभाग पर महामारी का प्रचंड प्रकोप फैल रहा था।
मृत व्यक्तियों के शव जंगलों की ओर ढो-ढो कर ले जाए जा रहे थे। वहाँ की सारी वन भूमि श्मशानों में बदल रही थी। जब मृत्यु संख्या हद से अधिक बढ़ गई, तब तो लोग घबराकर मुर्दों को यूं ही जंगल में ले जाकर फेंकने लगे। वहां के वायुमंडल में यदि कोई आवाज़ सुनाई पड़ती थी, तो केवल आकाश को कंपा देने वाले रुदन की आर्त आहें व चिल्लाहट की ही आवाज़ थी।
त्राहि माम्.....की पुकार
संपूर्ण प्रजा महामारी से त्रस्त और भयभीत होकर त्राहि माम्.....की पुकार मचा रही थी। तब सभी ने एक मत और एक प्राण होकर जगत पति, दीनबंधु और उस अशरण शरण को पुकारा।
स्वर्ग से पृथ्वी की ओर
ऐसे विकट समय में सर्वार्थ सिद्धि नामक स्वर्ग से एक परम आत्मा अपनी 33 सागरोपम आयु को पूर्ण कर परम सुंदर और मनमोहक नगर ‘हस्तिनापुर’ में वहां के राजा विश्वसेन की परम आज्ञाकारिणी और सती साध्वी धर्मपत्नी अचला देवी की कोख में आई।
महामारी का मरण (समाप्ति) और गर्भ का गौरव
इस महान आत्मा के गर्भ में आते ही महामारी को स्वयं ही क्षयरोग लग गया। जिस प्रकार मेघों की वर्षा से प्रज्ज्वलित अग्नि का अभिमान चूर-चूर हो जाता है, ठीक उसी प्रकार उस महान शक्ति के गर्भ में आते ही महामारी का प्रचंड प्रकोप शांत और शमन होने लगा।
शांति की सांस
इस अचानक हुए परिवर्तन को देखकर लोगों को विश्वास हो गया कि किसी न किसी महान शक्तिशाली आत्मा का धरती पर प्रादुर्भाव होने वाला है। जैसे पूर्व दिशा की लालिमा की आभा मात्र से ही संसार को यह शुभ संदेश मिल जाता है कि अब शीघ्र ही अंधकार का लोप हो जाएगा और धरती पर सूर्य का प्रकाश चारों ओर फैल जाएगा, ठीक उसी प्रकार उस समय जो चारों ओर शांतिमय वातावरण फैला, उसके प्रभाव से लोगों के मन में यह विश्वास हो गया कि यह किसी महान आत्मा के आगमन की मनभावन पूर्व भूमिका है, जो निकट भविष्य में यहां जन्म लेकर जगत में शांति व सुख का विस्तार करेगी।
माता के 16 स्वप्न
जब भगवान शांतिनाथ की पावन आत्मा स्वर्ग से चलकर महारानी अचला देवी के गर्भ में आई, उस दिन रात्रि के समय अर्द्ध निद्रा की अवस्था में महारानी को ऐरावत हाथी, सफेद बैल, सिंह, लक्ष्मी, फूलों की माला, पूर्ण चंद्रमा, सूर्य, दो कलश, युगल मीन, सरोवर, समुद्र, सिंहासन, देव-विमान, नाग भवन, रत्नों की राशि और निर्धूम अग्नि के 16 शुभ स्वप्न दिखाई दिए।
स्वप्न फल की जिज्ञासा
इन स्वप्नों को देखकर महारानी सजग हो कर बैठ गई और उनके फलाफल पर क्रमशः विचार करने लगी। उन्हें तत्काल ही जान पड़ा कि इन शुभ स्वप्नों के फल स्वरुप उन्हें एक दिव्य पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी, जो महान शक्तिशाली होगा और अपने प्रबल पराक्रम और दिव्य कार्यों से जगत के पाप-ताप को धो कर बहाने में समर्थ होगा। इस प्रकार भांति-भांति के श्रेष्ठ विचार करती हुई वे अपने स्वामी के कमरे में गईं, जहां वे शयन कर रहे थे। उन्होंने मधुर आलाप से महाराज को जगाया। महाराज विश्व सेन ने सजग होकर महारानी को सामने देखा और उन्हें बैठने की आज्ञा दी तथा उस समय उनके वहां आने का कारण पूछा।
पतिदेव की आज्ञा पाकर महारानी भद्रासन पर बैठ गई। तब अपने देखे हुए स्वप्नों में से एक-एक करके 16 स्वप्न राजा को कह सुनाए और उन शुभ स्वप्नों का परिणाम पूछा।
राजा द्वारा स्वप्न फल कथन
राजा अपनी रानी के मुख से उन स्वप्नों की बात सुनकर आनंद विभोर हो गए। तब वह अपनी रानी से बोले - ये सभी स्वप्न शीघ्र ही बहुत उत्तम फल देने वाले हैं और साथ ही महान मांगलिक भी हैं। इनके अमर प्रभाव से धन-जन और राज्य की अभिवृद्धि होगी, राज्य के पापों और तापों का शमन होगा। राजा, राज्य और प्रजा चैन से रहेंगे। धरा धाम से अधर्म का अंत हो जाएगा, जिससे राजा और प्रजा के जीवन की उन्नति होगी। आज राज्य की दसों दिशाओं में जिस महामारी का प्राण लेवा आतंक फैला हुआ है, उसका कल नाम भी सुनने को नहीं मिलेगा। मेरे इस कथन की सच्चाई का प्रमाण तुम्हें उसे समय ज्ञात होगा, जब महामारी के शांत हो जाने का शुभ संदेश तुम सुन पाओगी। उस समय और भी कई प्रकार के मांगलिक कार्यों, शुभ संदेशों और धरा धाम के शांत और चित्ताकर्षक वातावरण से तुम्हें प्रत्यक्ष हो जाएगा कि किसी न किसी महान आत्मा का जन्म तुम्हारी कोख से अति निकट ही में होने वाला है।
गर्भ पालन एवं पुत्र जन्म
राजा के इस कथन से रानी का हृदय हर्ष के मारे उछल पड़ा। वह वहां से चलकर अपने शयनागार में आईं। रात्रि के उस अंतिम प्रहर को उन्होंने अनेक प्रकार की धार्मिक और ऐतिहासिक वीरों और लोक पावन कथाओं के चिंतन एवं मनन में बिताया। उसी दिन से रानी शास्त्रों के नियमानुसार अपने गर्भ का प्रति पालन करने लगी। 9 मास बीतने पर रानी ने एक परम पुण्यवान, महान् तेजस्वी और अमर यशस्वी बालक को जन्म दिया। बालक का जन्मोत्सव बहुत ही धूमधाम से मनाया गया।
यथा नाम तथा गुण - शांति के सम्राट्
यथासमय बालक का नामकरण संस्कार किया गया क्योंकि जिस घड़ी से यह बालक गर्भ में आया था, उसी क्षण से भारत व्यापी महामारी का शमन हो चुका था और उस दिन तो वह समूल नष्ट हो गई थी, जिस दिन उनका जन्म कल्याणक हुआ। देश की दसों दिशाओं में सर्वत्र शांति का एक छत्र अखंड राज्य व्याप्त हो गया। बस! तभी तो ‘यथा नाम तथा गुण’ वाले उस बालक का शुभ नाम ‘शांतिनाथ’ अर्थात् शांति के सम्राट रखा गया।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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