भगवान महावीर स्वामी (28)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (28)
भगवान महावीर : पंचकल्याणक

माता त्रिषला और देवियों के मध्य ऐसे भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रश्नोत्तर हुए और धर्मचर्चा चली। कई बार तो ऐसा होता था कि माता प्रश्न पूछें, तब चाहे देवी को उत्तर न आता हो, किन्तु ज्यों ही माता के उदर में विराजमान तीर्थंकर का स्मरण करते ही उन्हें तुरन्त उत्तर आ जाता था। मानो प्रभु स्वयं ही उदर-भवन में बैठे-बैठे सब प्रश्नों के उत्तर दे रहे हों। उदार आत्मा अवधिज्ञानी है, तो उनकी सेवा करने वाली देवियाँ भी अवधिज्ञानी हैं, उनमें से कुछ तो सम्यक्दर्शन को प्राप्त हैं और कुछ प्राप्त करने में तत्पर हैं- ऐसी वे देवियाँ माता से पूछती हैं -

हे माता! अनुभूति स्वरूप परिणमित आत्मा आपके अंतर में विराजमान है, तो ऐसी अनुभूति कैसे होती है?

माता ने कहा - हे देवी! अनुभूति की महिमा अति गंभीर है। आत्मा स्वयं ज्ञान की अनुभूति स्वरूप है। उस ज्ञान की अनुभूति में राग की अनुभूति नहीं;- ऐसा भेदज्ञान हो, तब अपूर्व अनुभूति प्रकट होती है।

दूसरी देवी ने पूछा - हे माता! आत्मा की अनुभूति होने से क्या होता है?

‘देवी, सुनो! अनुभूति होने पर सम्पूर्ण आत्मा स्वयं अपने में स्थिर हो जाता है; उसमें अनन्त गुणों के चैतन्यरस का ऐसा गंभीर वेदन होता है कि जिसके महान आनन्द को अनुभवी आत्मा ही जानती हैं; वह वेदन वाणीगम्य नहीं होता।’

हे माता! वाणी में आए बिना उस वेदन की कैसे खबर पड़ती है?

हे देवी! अंतर में अपने स्वसंवेदन से आत्मा को उसका पता चलता है। जैसे यह शरीर दिखाई देता है, वैसे ही अनुभूति में शरीर से भिन्न आत्मा शरीर से भी ‘विशेष स्पष्ट’ दृष्टिगोचर होता है।

हे माता! आँखों से शरीर दिखाई देता है, उसकी अपेक्षा आत्मा के ज्ञान को ‘विशेष स्पष्ट’ क्यों कहा? 

हे देवी! आँख आदि के द्वारा जो शरीर का ज्ञान होता है, वह तो इन्द्रियज्ञान है, परोक्ष है; और आत्मा को जानने वाला स्वसंवेदनज्ञान तो अतीन्द्रिय है, प्रत्यक्ष है, इसलिए वह अधिक सुस्पष्ट है।

अनुभूति के काल में तो मति-श्रुत ज्ञान है, तथापि इसे प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय क्यों कहा?

क्योंकि अनुभूति के समय उपयोग आत्मा में ऐसा लीन हुआ है कि उसमें इन्द्रियों का तथा मन का अवलम्बन छूट गया है, इसलिए उस समय प्रत्यक्षपना है। अहा! उस काल के अद्भुत निर्विकल्प आनन्द का क्या कहना!

देवियों ने प्रसन्नता से कहा - हे माता! आपने अनुभूति की अद्भुत बात समझाई, मानो आपके अंतर से कोई अलौकिक चैतन्यरस झर रहा है। यह आपके अंतर में विराजमान तीर्थंकर की आत्मा की अचिन्त्य महिमा है। उन बाल तीर्थंकर को गोद में लेकर हम कृतार्थ होंगे।

-इस प्रकार धर्मचर्चा द्वारा आनन्दमय उत्तम भावना भाते-भाते सवा नौ मास आनन्दपूर्वक बीत गए और तीर्थंकर के अवतार की धन्य घड़ी आ पहुँची।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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