भगवान महावीर स्वामी (49)
तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (49)
दासी के रूप में बिक कर भी चन्दनबाला स्वयमेव एक सज्जन जैन श्रावक के घर में आ गई है, यह जानकर चन्दना को सन्तोष हुआ; उसे इतनी प्रसन्नता हुई मानो वह महावीर की मंगल छाया में ही आ गई हो!... उसका हृदय पुकार उठा - ‘जैनधर्म से रहित चक्रवर्ती पद भी अच्छा नहीं है। यह भले ही दासत्व का जीवन हो; परन्तु जैनधर्म में वास है, तो वह भी अच्छा है।’ ऐसी कठिन परिस्थिति में भी उसे वीरकुमार के साथ हुई धर्मचर्चा का स्मरण हुआ और वह अपूर्व क्षण याद आया, जब उसने वीरकुमार के मार्गदर्शन से स्वयं निर्विकार आत्मानुभूति पूर्वक सम्यग्दर्शन प्राप्त किया था।
प्रतिकूल प्रसंगों में घिर जाने से वह आत्मा को भूल जाये, ऐसी कोई साधारण स्त्री नहीं है; वह तो चैतन्यतत्त्व की ज्ञाता, मोक्ष की साधिका है। ऐसी प्रतिकूलता में भी ज्ञानचेतना क्षीण नहीं होती है, पृथक् की पृथक् ही रहती है। राजपुत्रीपना या दासीपना, सत्कार या तिरस्कार, इन सब से चन्दना के चैतन्य की प्रभा भिन्न की भिन्न रहती है। वाह चन्दना!... धन्य है! तुम्हारी चैतन्य प्रभा!
“वाह रे कर्मों का उदय!” एक मुमुक्षु धर्मात्मा राजकुमारी वर्तमान में दासी बनकर पराये घर में निवास कर रही है। सेठ-सेठानी को पता नहीं है कि यह दासी कौन है? अरे, यह दासी तो जगत के परमेश्वर की मौसी है, धर्म का एक रत्न है, भारत के श्राविका संघ की शिरोमणि है और कौशाम्बी नगरी की महारानी मृगावती की लाड़ली बहन है, जो वर्तमान में कर्माेदयवश दासी बनी है; तथापि पुण्य का ऐसा कोई योग है कि दासीपना भी सेठ वृषभदत्त जैसे एक सज्जन-धर्मात्मा के घर में मिला है... जहाँ शीलधर्म की रक्षा सुगम है।
परन्तु अरे कर्मों का उदय! चन्दना के सौन्दर्य को देखकर सेठानी को सन्देह हुआ कि मेरी कोई संतान न होने से सेठ अवश्य मुझे छोड़कर इस चन्दना को मेरी सौत बनाएँगे। नहीं तो इस घर में दास-दासियों की क्या कमी थी जोकि इसे ले आये? सती चन्दना सब कुछ जानते हुए भी धैर्यपूर्वक सहन करती है; सेठानी के प्रति अपने हृदय में द्वेषभाव नहीं आने देती। वीरनाथ के बतलाये हुए चैतन्यतत्व का विचार करने से दासीपने के दुःख का विस्मरण हो जाता है। वह संसार से विरक्त होकर चिन्तन करती है कि मैं तो चैतन्य की महान स्वाधीन विभूति से भरपूर हूँ; यह सब तो पूर्व कर्मों से छूटने की चेष्टा मात्र है। प्रभु महावीर के प्रताप से मेरी ज्ञानचेतना प्रतिक्षण कर्मों से पृथक रहकर मोक्षमार्ग को साधती रहती है...।
एक दिन सेठ वृषभदत्त बाहर से थके हुए घर आये। सेठानी कहीं बाहर गई थी, कोई नौकर-चाकर भी घर में नहीं थे; इसलिए सदा की भाँति चन्दना पानी ले आई और पितातुल्य सेठजी के पाँव धोने लगी। पाँव धोते-धोते उसके कोमल केशों का जूड़ा खुल गया और केश धूलधूसरित होने लगे; इसलिए सेठ ने निर्दाेषभाव से वात्सल्यपूर्वक पुत्री के केश हाथ से ऊपर उठा लिये। ठीक उसी समय सुभद्रा सेठानी आ पहुँची और चन्दना के बाल सेठ के हाथ में देखकर क्रोध से आग बबूला हो गई। उसे लगा कि मेरी अनुपस्थिति में ये दोनों एक-दूसरे से प्रेमालाप कर रहे थे। बस, उस पर शंका का भूत सवार हो गया और उसने निश्चय कर लिया कि किसी भी प्रकार चन्दना को घर से निकालना है... रे दैव! न जाने तेरे भण्डार में क्या-क्या है।
जिज्ञासु पाठक! तुम निराश मत होना। कर्माेदय की तथा धर्मी जीव के परिणामों की विविधता देखो! यह कर्माेदय भी चन्दना के लिये वरदानरूप बन जाता है... वह तुम कुछ ही समय में देखोगे। कर्माेदय से व्याकुल हो जाना वह धर्मी जीवों का काम नहीं है; ... उस समय भी अपनी धर्मसाधना में आगे बढ़ते रहना ही धर्मात्माओं की पहचान है। वे जानते हैं कि...
जो कर्म के ही विविध उदय विपाक जिनवर ने कहे,
वे मम स्वभाव नहीं तथा मैं एक ज्ञायक भाव हूँ।
सब जीव में समता मुझे नहीं वैर किसी के संग मुझे,
आशा जगत की छोड़कर करूँ प्राप्ति अब मैं समाधि की।।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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