भगवान महावीर स्वामी (55)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (55)
ऋजुवालिका के किनारे : प्रभु को केवलज्ञान

महावीर मुनिराज कौशाम्बी नगरी में चन्दना कुमारी के हाथ से पारणा करने के पश्चात् उद्यान में जाकर ध्यान मग्न हो गये। पश्चात वे सिद्धपद साधक सन्त विहार करते हुए अनन्त सिद्धों के सिद्धिधाम सम्मेदशिखर पधारे। सिद्धिधाम में वे भावी सिद्ध ध्यान में बैठे थे। वह दृश्य वास्तव में अद्भुत था। प्रभु के चरण स्पर्श से शिखरजी की पावन भूमि पुनः पावन हुई; दो तीर्थों का मिलन हुआ। एक भावतीर्थ और दूसरा स्थापना-तीर्थ; अथवा एक चेतनतीर्थ और दूसरा अचेतन-तीर्थ। हमें ऐसा लगेगा कि क्या भगवान तीर्थयात्रा हेतु आये होंगे! अरे, किन्तु प्रभु तो स्वयं ही चलते-फिरते जीवंत-तीर्थ हैं। शिखरसम्मेद तो स्थापना तीर्थ है, जबकि प्रभु तो स्वयं रत्नत्रयरूप परिणमित जीवन्त-तीर्थ हैं। मोक्षयात्रा तो सदा कर ही रहे हैं और साक्षात् रत्नत्रय तीर्थरूप परिणमित, ऐसे महात्माओं के प्रताप से ही भूमि-पर्वतों को तीर्थपना प्राप्त हुआ है।

सम्मेदशिखर तीर्थ के निकट 15-20 किलोमीटर दूर जांभिक ग्राम के समीप ऋजुवालिका नदी बहती है; जैसा सुन्दर नाम है, वैसी ही सुन्दर नदी है। महावीर प्रभु सम्मेदशिखर से विहार करते हुए उस नदी के तट पर आये और एक स्फटिक समान स्वच्छ सुन्दर शिला पर ध्यानस्थ हुए। वैशाख मास की तीव्र तपन में भी मानो प्रभु तो चैतन्यशान्ति की हिम-शीतल गुफा में बैठे-बैठे अपूर्व वैराग्य शीतलता का वेदन कर रहे हैं... और मानो प्रकृति भी अनुकूल होकर प्रभु की सेवा कर रही हो, तदनुसार एक घटादार शाल्मली वृक्ष प्रभु को शीतल छाया दे रहा है। अहा! चैतन्य के साधक को सारा जगत अनुकूल ही वर्तता है।

प्रभु ध्यान में खड़े हैं... अहा! ऐसे वैरागी महात्मा मेरे तटपर पधारे!... इस प्रकार हर्षित होकर उछलती कल-कल करती नदी मानो आज विशेष हर्षित हो रही हो, तदनुसार जांभिक ग्राम के निकट वह दृश्य देखने के लिये क्षणभर थम जाती थी। अहा! मेरे किनारे आज कोई अद्भुत योगिराज आकर ध्यान लगा रहे हैं। प्रातःकाल से ध्यानमग्न योगिराज... न तो कुछ बोलते हैं, न खाते हैं और न पानी पीते हैं; यह नदी का किनारा, यह ग्रीष्म का ताप और यह शीतल मधुर जल... जो भी यात्री यहाँ आता है, वह शीतल जल पिये बिना नहीं रहता; परन्तु यह योगिराज तो ग्रीष्म के प्रचण्ड ताप में खड़े होने पर भी पानी का नाम तक नहीं लेते... मानो नदी को आश्चर्य हो रहा है, वह सोच रही है - क्या इन्हें गर्मी नहीं लगती होगी? क्या इन्हें तृषा नहीं सताती?... मैं उछलकर इनके मुखद्वार से हृदय में प्रविष्ट हो जाऊँ और अपनी शीतलता से इनकी तृषा मिटाकर सेवा करूँ!... किन्तु नहीं, वे यहाँ पानी के लिये नहीं आये... आँख उठाकर वे पानी की ओर देखते तक नहीं हैं... वे तो आँखें झुकाए अंतर में कुछ और ही देख रहे हैं। उनकी मुद्रा देखकर लगता है कि उन्हें बाहर में कुछ भी खोजने की इच्छा नहीं है।

उनके मुख पर सुख-दुःख की आकुलता के भाव भी दिखाई नहीं देते, ऊपर से तो परमशान्ति एवं प्रसन्नता झलक रही है। भक्ति तरंगों से कल-कल करती हुई ऋजुकूला नदी मानो अपनी उस ध्वनि से उनकी स्तुति कर रही है कि अहा! मैंने शीतल स्वभावी होने पर भी मुझ से अधिक शीतलता-शान्ति सम्पन्न इन योगिराज को तो आज ही देखा है। अंतर में वे न जाने कैसी अद्भुत शीतलता का वेदन कर रहे हैं कि उन्हें पानी की बाह्य शीतलता की इच्छा नहीं है। ऐसे योगिराज मेरे तट पर पधारे, जिससे मैं धन्य हो गई हूँ। अहा! इन योगिराज की चरण-रज से पावन होने के कारण लोग मेरी भी तीर्थरूप में पूजा करेंगे।

इधर मोह से युद्ध करने के लिये वीर योद्धा तैयार खड़े हैं... वीर राजा का महावीरपना आज सचमुच जागृत हो उठा है। क्षायिक सम्यक्त्व उनकी सेना का सेनापति है और अनन्तगुणों के विशुद्धिरूप शुक्लध्यान के श्रेणीरूप बाणों की वर्षा कर रहा है। अनन्त आत्मवीर्य उल्लसित हो रहा है और अनन्त सिद्ध भगवन्त उनके पक्ष में आ मिले हैं। केवलज्ञानलक्ष्मी विजयमाला लेकर तैयार खड़ी है और मोह की समस्त सेना प्रतिक्षण हार रही है। 

अरे! देखो... देखो...! प्रभु तो शुद्धोपयोगरूप चक्र की धार से मोह का नाश करने लगे हैं। क्षपक श्रेणी में आगे बढ़ते-बढ़ते आठवें, नौवें, दसवें गुणस्थान में तो क्षणमात्र में पहुँच गये हैं। प्रभु अब सर्वथा वीतराग हो गये... और सूर्यास्त से पूर्व तो वीरद्रभु के अंतर में, जो कभी अस्त न हो, ऐसा केवलज्ञान सूर्य जगमगा उठा... अहा! प्रभु महावीर सर्वज्ञ हुए... अरिहन्त हुए... परमात्मा हुए... ‘णमो अरिहंताणं’।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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