
स्वरूपाचरणचारित्र का लक्षण और निर्विकल्प ध्यान
परमाण नय निक्षेपको न उद्योत अनुभवमें दिखै;
दृग – ज्ञान – सुख – बलमय सदा, नहि आन भाव जु मो विषै ।
मैं साध्य साधक मैं अबाधक, कर्म अरु तसु फलनिर्तै;
चित् पिंड चंड अखंड सुगुणकरंड च्युत पुनि कलनिर्तै ॥ १० ॥
अन्वयार्थः- उस स्वरूपाचरणचारित्र के समय मुनियों के (अनुभवमें) आत्मानुभव में (परमाण) प्रमाण, (नय) नय और (निक्षेपको) निक्षेप का विकल्प (द्योत ) प्रगट (न दिखै ) दिखाई नहीं देता; परन्तु ऐसा विचार होता है कि - ( मैं ) मैं ( सदा) सदा ( दृग – ज्ञान – सुख – बलमय ) अनन्तदर्शन – अनन्तज्ञान – अनन्तसुख और अनन्तवीर्यमय हूँ । (मो बिखै) मेरे स्वरूप में (आन) अन्य राग-द्वेषादि (भाव) भाव (नहिँ) नहीं हैं, (मैं) मैं (साध्य) साध्य, (साधक) साधक तथा (कर्म) कर्म (अरु) और (तसु) उसके (फलनि तैं) फलों के (अबाधक) विकल्प रहित ( चित् पिंड) ज्ञान-दर्शन-चेतना स्वरूप (चण्ड) निर्मल तथा ऐश्वर्यवान (अखंड) अखंड (सुगुण करंड) सुगुणों का भंडार (पुनि) और (कलनि तैं) अशुद्धता से (च्युत) रहित हूँ।
भावार्थ - इस स्वरूपाचरणचारित्र के समय मुनियों के आत्मानुभव में प्रमाण, नय और निक्षेप का विकल्प तो नहीं उठता, किन्तु गुण-गुणी का भेद भी नहीं होता - ऐसा ध्यान होता है। प्रथम ऐसा ध्यान होता है कि मैं अनन्त दर्शन-अनन्त ज्ञान-अनन्त सुख और अनन्त वीर्य रूप हूँ, मुझमें कोई रागादिक भाव नहीं हैं; मैं ही साध्य हूँ, मैं ही साधक हूँ और कर्म तथा कर्मफल से पृथक् हूँ। मैं ज्ञान-दर्शन-चेतना स्वरूप निर्मल ऐश्वर्यवान तथा अखण्ड, सहज शुद्ध गुणों का भण्डार और पुण्य-पाप से रहित हूँ।
तात्पर्य यह है कि सर्व प्रकार के विकल्पों से रहित निर्विकल्प आत्मस्थिरता को स्वरूपाचरण चारित्र कहते हैं ।।१०।।
स्वरूपाचरण चारित्र और अरिहन्त दशा
यों चिन्त्य निजमें थिर भये, तिन अकथ जो आनंद लह्यो,
सो इन्द्र नाग नरेन्द्र वा अहमिन्द्रकैं नाहीं कह्यो।
तब ही शुकल ध्यानाग्नि करि, चउघाति विधि कानन दह्यो;
सब लख्यो केवलज्ञानकरि, भविलोक को शिवमग कह्यो ।।११।।
अन्वयार्थ - स्वरूपाचरणचारित्र में (यों) इस प्रकार (चिन्त्य) चिंतवन करके (निजमें) आत्मस्वरूप में (थिर भये) लीन होने पर (तिन) उन मुनियों को (जो) जो (अकथ) कहा न जा सके ऐसा - वचन से पार - (आनंद) आनन्द (लह्यो) होता है (सो) वह आनन्द (इन्द्र) इन्द्र को, (नाग) नागेन्द्र को, (नरेन्द्र) चक्रवर्ती को (वा अहमिन्द्रको) या अहमिन्द्र को (नहीं कह्यो) कहने में नहीं आया - नहीं होता। (तब ही) वह स्वरूपा-चरणचारित्र प्रगट होने के पश्चात् जब (शुक्ल ध्यानाग्नि करि) शुक्लध्यानरूपी अग्नि द्वारा (चउघाति विधि कानन) चार घाति- कर्मों रूपी वन (दह्यो) जल जाता है और (केवलज्ञानकरि) केवल-ज्ञान से (सब) तीन काल और तीन लोक में होने वाले समस्त पदार्थों के सर्वगुण तथा पर्यायों को (लख्यो) प्रत्यक्ष जान लेते हैं, तब (भवि-लोकको) भव्य जीवों को (शिवमग) मोक्षमार्ग (कह्यो) बतलाते हैं।
भावार्थ - इस स्वरूपाचरणचारित्र के समय मुनिराज जब उपरोक्तानुसार चिंतवन-विचार करके आत्मा में लीन हो जाते हैं तब उन्हें जो आनन्द होता है, वैसा आनन्द इन्द्र, नागेन्द्र, नरेन्द्र (चक्रवर्ती) या अहमिन्द्र (कल्पातीत देव) को भी नहीं होता। यह स्वरूपाचरणचारित्र प्रगट होने के पश्चात् स्वद्रव्य में उग्र एकाग्रता से शुक्लध्यानरूप अग्नि द्वारा चार घातिकर्मों का नाश होता है। और अरिहन्त दशा तथा केवलज्ञान की प्राप्ति होती है, जिसमें तीन काल और तीन लोक के समस्त पदार्थ स्पष्ट ज्ञात होते हैं और तब भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं।।११।
घातिकर्म दो प्रकार के हैं - द्रव्य-घातिकर्म और भाव-घातिकर्म। उनमें शुक्लध्यान द्वारा शुद्ध दशा प्रगट होने पर भाव-घातिकर्मरूप अशुद्ध पर्यायें उत्पन्न नहीं होतीं। वह भावघातिकर्म का नाश है, तथा उसी प्रकार द्रव्य-घातिकर्म का स्वयं अभाव होता है वह द्रव्य-घातिकर्म का नाश है।
1 - स्वरूपाचरण में मुनियों के आत्मानुभव में किस का विकल्प नहीं रहता? (प्रमाण, नय और निक्षेप का और गुण-गुणी का)
2 - स्वरूपाचरण में मुनियों को किसका ध्यान होता है? (अनन्त दर्शन-अनन्त ज्ञान-अनन्त सुख और अनन्त वीर्य रूप का)
3 - स्वरूपाचरण में मुनियों को किसका अभाव होता है? (रागादिक भावों का)
4 - स्वरूपाचरण में मुनि स्वयं को क्या मानता है? (साध्य भी और साधक भी)
5 - स्वरूपाचरण में मुनि स्वयं को किससे पृथक् मानता है? (कर्म तथा कर्मफल से)
6 - स्वरूपाचरण में मुनि को क्या आभास होता है? (मैं ज्ञान-दर्शन-चेतना स्वरूप निर्मल ऐश्वर्यवान तथा अखण्ड, सहज शुद्ध गुणों का भण्डार और पुण्य-पाप से रहित हूँ)
7 - स्वरूपाचरण में मुनि को कैसा आनन्द होता है? (वचन से पार, वर्णनातीत)
8 - स्वरूपाचरण में मुनि को जैसा आनन्द होता है, वैसा किस को नहीं होता? (इन्द्र, नागेन्द्र, नरेन्द्र या अहमिन्द्र को)
9 - शुक्लध्यानरूप अग्नि द्वारा किन कर्मों का नाश होता है? (चार घातिकर्मों का)
10 - चार घातिकर्मों का नाश होने से मुनि किस दशा को प्राप्त होता है? (अरिहन्त दशा तथा केवलज्ञान की दशा)
11 - अरिहन्त दशा में केवलज्ञान से क्या जाना जाता है? (तीन काल और तीन लोक के समस्त पदार्थ)
12 - अरिहन्त दशा में भगवान क्या करते हैं? (भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं)
13 - केवलज्ञानी भव्य जीवों को कौन-सा मार्ग दिखाते हैं? (मोक्ष का मार्ग)
14 - केवलज्ञानी ने अपने कौन-से कर्मों का नाश किया है? (घातिया)
15 - आत्मा का घात करने वाले कितने कर्म होते हैं? (4)
16 - आत्मा का घात करने वाले चार घातिया कर्म कौन-से होते हैं? (ज्ञानावरण,दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय)
17 - चार अघातिया कर्म कौन-से होते हैं? (आयु, नाम, गोत्र, वेदनीय )
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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