छहढाला(43) पाँचवीं ढाल

 

अध्यात्मप्रेमी कविवर पं० दौलतरामजी कृत

छहढाला(43)


२-अशरण भावना

सुर असुर खगाधिप जेते, मृग ज्यों हरि, काल दले ते; 

मणि मंत्र तंत्र बहु होई, मरते न बचावे कोई ॥ ४ ॥

अन्वयार्थः — (सुर असुर खगाधिप) देवों के इन्द्र, असुरों के इन्द्र और खगेन्द्र गरुड़, हंस (जेते) जो-जो हैं (ते) उन सब का (मृग हरि ज्यों) जिस प्रकार हिरन को सिंह मार डालता है, उसी प्रकार (काल) मृत्यु (दले) नाश करता है। (मणि) चिन्तामणि आदि मणिरत्न, (मंत्र) बड़े-बड़े रक्षा मंत्र; (तंत्र) तंत्र, (बहु होई) बहुत से होने पर भी (मरते) मरने वाले को (कोइ) वे कोई (न बचावे) नहीं बचा सकते। 

भावार्थ - इस संसार में जो-जो देवेन्द्र, असुरेन्द्र, खगेन्द्र (पक्षियोंके राजा) आदि हैं, उन सबका- जिस प्रकार हिरन को सिंह मार डालता है, उसी प्रकार - काल (मृत्यु) नाश करता है। चिन्तामणि आदि मणि, मंत्र और जंत्र-तंत्रादि कोई भी मृत्यु से नहीं बचा सकता।

यहाँ ऐसा समझना कि निज आत्मा ही शरण है; उसके अतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं है। कोई जीव अन्य जीव की रक्षा कर सकने में समर्थ नहीं है, इसलिये पर से रक्षा की आशा करना व्यर्थ है । सर्वत्र - सदैव एक निज आत्मा ही अपना शरण है। आत्मा निश्चय से मरता ही नहीं, क्योंकि वह अनादि अनन्त है, ऐसा स्वोन्मुखतापूर्वक चिंतवन करके सम्यग्दृष्टि जीव वीतरागता की वृद्धि करता है वह " अशरण भावना " है ।। ४ ।। 

३- संसार भावना

चहुँगति दुःख जीव भरें हैं, परिवर्तन पंच करें हैं; 

सबविधि संसार असारा, यामें सुख नहीं लगारा ।। ५।।

अन्वयार्थः - (जीव) जीव (चहुँगति) चार गतियों में (दुःख भरै है ) भोगता है और ( परिवर्तन पंच ) पांच परावर्तन पाँच प्रकार से परिभ्रमण ( करें है ) करता है । ( संसार ) संसार  (सबविधि ) सर्व प्रकार से (असारा) साररहित है, ( यामें ) इसमें (सुख ) सुख (लगारा ) लेशमात्र भी (नहीं) नहीं है ।

 भावार्थः - जीव की अशुद्ध पर्याय वह संसार है। अज्ञान के कारण जीव चार गतियों में दुःख भोगता है और पांच ( द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव तथा भाव ) परावर्त्तन करता रहता है किन्तु कभी शांति प्राप्त नहीं करताय इसलिये वास्तव में संसारभाव सर्वप्रकार से साररहित है, उसमें किंचित्मात्र सुख नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार सुख की कल्पना की जाती है, वैसा सुख का स्वरूप नहीं है और जिसमें सुख मानता है, वह वास्तव में सुख नहीं है, किन्तु वह परद्रव्य के आलम्बन रूप मलिन भाव होने से आकुलता उत्पन्न करने वाला भाव है। निज आत्मा ही सुखमय है, उसके ध्रुवस्वभाव में संसार है ही नहीं, ऐसा स्वोन्मुखतापूर्वक चिंतवन करके सम्यग्दृष्टि जीव वीतरागता में वृद्धि करता है, वह “संसार  भावना ” है। 

४- एकत्व भावना 

शुभ अशुभ करम फल जेते, भोगै जिय एक हि ते ते;  

सुत दारा होय न सीरी, सब स्वारथके हैं भीरी ॥ ६ ॥ 

अन्वयार्थ :–( जेते ) जितने ( शुभ-करमफल ) शुभकर्म के फल और (अशुभ-करमफल ) अशुभकर्म के फल हैं ( ते ते ) वे सब ( जिय ) यह जीव ( एक हि ) अकेला ही ( भोगै ) भोगता है; (सुत ) पुत्र ( दारा ) स्त्री ( सीरी ) साथ देने वाले ( न होय ) नहीं होते । (सब ) यह सब ( स्वार्थके ) अपने स्वार्थ के (भीरी ) सगे ( हैं ) हैं।

भावार्थ: – जीव का सदा अपने स्वरूप से अपना एकत्व और पर से विभक्तपना है; इसलिये वह स्वयं ही अपना हित अथवा अहित कर सकता है-पर का कुछ नहीं कर सकता । इसलिये जीव जो भी शुभ या अशुभ भाव करता है, उनका फल ( आकुलता ) वह स्वयं अकेला ही भोगता है, उसमें अन्य कोई- स्त्री, पुत्र, मित्रादि सहायक नहीं हो सकते, क्योंकि वे सब पर पदार्थ हैं और वे सब पदार्थ जीव को ज्ञेयमात्र हैं, इसलिये वे वास्तव में जीव के सगे-सम्बन्धी हैं ही नहीं; तथापि अज्ञानी जीव उन्हें अपना मानकर दु:खी होता है। पर के द्वारा अपना भला-बुरा होना मान कर पर के साथ कर्तृत्व-ममत्व का अधिकार माना है: वह अपनी भूल से ही अकेला दु:खी होता है।

संसार में और मोक्ष में यह जीव अकेला ही है - ऐसा जानकर सम्यग्दृष्टि जीव निज शुद्ध आत्मा के साथ ही सदैव अपना एकत्व मानकर अपनी निश्चयपरिणति द्वारा शुद्ध एकत्व की वृद्धि करता है, यह " एकत्व भावना " है । ६ ।

1- जिस प्रकार सिंह हिरण को मार देता है, उसी प्रकार काल किस को मार देता है? (देवेन्द्र, असुरेन्द्र, खगेन्द्र  आदि को)

2 - मृत्यु के समय कौन नहीं बचा सकता? (चिन्तामणि आदि मणि, मंत्र और जंत्र-तंत्रादि)

3 - जीव किस कारण चारों गतियों में दुःख भोगता है? (अज्ञान के कारण) 4 - संसार में परावर्तन कितने हैं? (5) 5 - पंच परावर्तन कौन-से हैं? (द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, भव) 6 - संसार सर्व प्रकार से कैसा है? (असार) 7 - संसार में लेशमात्र भी क्या नहीं है? (सुख) 8 - संसार के सुख-दुःख की भावना कौन-सी भावना है? (संसार भावना) 9 - जीव को अकेले क्या भोगना पड़ता है? (सुख, दुःख, कर्म के फल)

10 - कर्मफल के भोग में कौन-कौन साथी नहीं होते? (स्त्री, पुत्र, मित्रादि)

11 - अकेलेपन की भावना का चिन्तन कौन-सी भावना कहलाता है? (एकत्व भावना )

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा -सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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