दो ज्ञान इतना गुरुवर

दो ज्ञान इतना गुरुवर

 

दो ज्ञान इतना गुरुवर, बनूं तुमसा निर्विकारी,

सदा आत्म साधना की रहे भावना हमारी।

 सदा क्रोध में जला हूं अभिमान में पला हूं,

 छलकर स्वयं छला हूं कर लोभ जग रूला हूं,

 लंबी है जिंदगी की यूं दास्तान हमारी

 सदा आत्म साधना की------_---।

 मन में तुम ही हो  गुरुवर वचनों में भी तुम ही हो,

 हर सांस कह रही है जीवन में अब तुम ही हो,

 निर्बल हूं बांह थामो, गुरुदेव जी हमारी,

 सदा आत्म साधना की--------।

 अज्ञानता ने घेरा छाया गहन अंधेरा, 

कर्मों ने डाला डेरा व्याकुल है मन ये मेरा,

आराध्य देव मेरे, रक्षा करो हमारी,

 सदा आत्मा साधना की----------।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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