अक्षय तृतीया

अक्षय तृतीया



अक्षय तृतीया पर्व है, मंगलमय अविकार,

ऋषभदेव मुनिराज का हुआ प्रथम आहार।

दीक्षा लेकर ऋषभ मुनीश्वर, छह महीने उपवास किया,

फिर आहार निमित्त ऋषीश्वर, जगह जगह परिभ्रमण किया।

कोई हाथी घोड़े वस्त्राभूषण, रत्नों के भर थाल,

ले सन्मुख आदर से आवें, देख साधु लौटे तत्काल।

 नहीं जानें आहार विधि, इससे सब ही लाचार हुए,

अन्तराय का उदय रहा, तेरह महीने नौ दिवस हुए।

 धन्य मुनीश्वर धन्य आत्मबल, आकुलता का लेश नहीं,

तृप्त स्वयं में, मग्न स्वयं में, किचित भी संक्लेश नहीं।

उदय नहीं हो दुःख का कारण, यदि स्वभाव का आश्रय हो,

निज से च्युत हो दुःखी रहे, तो फिर उपचार उदय पर हो।

 दोष देखना किन्तु उदय का , नहीं ये नीति जिनागम में,

उदय उदय में ही रहता है, नहीं प्रविष्ट हो आतम में।

भेद ज्ञान कर द्रव्य दृष्टि कर, स्वयं स्वयं में मग्न रहो,

स्वाश्रय से ही शांति मिलेगी, आकुलता नहीं व्यर्थ करो।

अशरण जग में अरे आत्मन, नहीं कोई हो अवलम्बन,

तज कर झूठी आस बनाई, अपने प्रभु का करो भजन।

इन्द्रादिक से सेवक चक्री, कामदेव से सुत जिनके,

देखा एक समय पहले भी, नहीं आहार हुए उनके।

हुई योग्यता सहजपने ही, सर्व निमित्त मिले तत्क्षण,

मंगन स्वप्नों का फल सुन कर, श्री श्रेयांस थे हर्ष मगन।

देखा आते ऋ़षभ मुनि को, जाति स्मरण हुआ सुखकार,

नवधा भक्ति पूर्वक नृप ने, दिया इक्षुरस का आहार।

पंचाश्चर्य किए देवों ने, रत्न पुष्प थे बरसाए,

पवन सुगन्धित शीतल चलती, जय जय से नभ गुंजाए।

धन्य पात्र हंै, धन्य है दाता, धन्य दिवस धनि है आहार,

दानतीर्थ का हुआ प्रवर्तन, घर घर होवे मंगलाचार।

तिथि वैशाख सुदी तृतीया थी, अक्षय तृतीया पर्व चला,

आदीश्वर की स्तुति करते, सहज ही मुक्ति मार्ग मिला।

ऋ़षभदेव सम रहे धीरता, आराधन निर्विघ्न खिले,

भोजन भी न मिले फिर भी नहीं, आराधन से चित्त चले।

थकित हुआ हूँ भव भोगों से, लेश मात्र नहीं सुख पाया,

हो निराश सब जग से स्वामिन्, चरण शरण में हूँ आया।

यही भावना स्वयं स्वयं में, तृप्त रहूँ प्रभु तुष्ट रहूँ,

ध्येयरूप निजपद को ध्याते, ध्याते शिव पद प्रगट करूँ - 2

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

द्वारा - सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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