मेरी भावना (3) जैन धर्म की प्राचीनता
मेरी भावना (3) जैन धर्म की प्राचीनता (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं। ‘जिन’ भगवान को तीर्थंकर भी कहते हैं। ‘जिन’ अनन्त होते हैं, पर काल के हर ‘आरे’ में तीर्थंकर केवल 24 ही होते हैं। वर्तमान में चल रहे अवसर्पिणी काल में हुए 24 तीर्थंकरों में से प्रथम तीर्थंकर हैं भगवान आदिनाथ, जिन्हें ऋषभदेव भी कहते हैं। सभी प्राचीन ग्रंथों में ‘ऋषभदेव’ का नाम मिलता है, चाहे वह हिन्दू पुराण हो या जैन पुराण। जापान और जर्मनी आदि की धर्मिक पुस्तकों में भी इनका उल्लेख मिलता है, चाहे नाम बदल गया हो। जैसे इस्लाम में इन्हें ‘रसूल’ कहा जाता है। जब हम अन्य ग्रंथों में ‘ऋषभदेव’ के बारे में पढ़ते हैं या सुनते हैं, तब उन संदर्भों से जैन धर्म की प्राचीनता सिद्ध होती है। उन ग्रंथों से पता चलता है कि ‘ऋषभदेव’ से ही इस युग का प्रारम्भ हुआ है और वे ही धर्मतीर्थ के प्रथम तीर्थंकर हैं। यदि किसी भी सभ्यता की प्राचीनता की सिद्धि इसी बात से करना चाहते हो कि यह सिंधु घाटी सभ्यता 5000 वर्ष पुरानी है, तो अपने आप यह सिद्ध ...