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Showing posts from October, 2025

मेरी भावना (3) जैन धर्म की प्राचीनता

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  मेरी भावना (3) जैन धर्म की प्राचीनता  (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं। ‘जिन’ भगवान को तीर्थंकर भी कहते हैं। ‘जिन’ अनन्त होते हैं, पर काल के हर ‘आरे’ में तीर्थंकर केवल 24 ही होते हैं। वर्तमान में चल रहे अवसर्पिणी काल में हुए 24 तीर्थंकरों में से प्रथम तीर्थंकर हैं भगवान आदिनाथ, जिन्हें ऋषभदेव भी कहते हैं। सभी प्राचीन ग्रंथों में ‘ऋषभदेव’ का नाम मिलता है, चाहे वह हिन्दू पुराण हो या जैन पुराण। जापान और जर्मनी आदि की धर्मिक पुस्तकों में भी इनका उल्लेख मिलता है, चाहे नाम बदल गया हो। जैसे इस्लाम में इन्हें ‘रसूल’ कहा जाता है। जब हम अन्य ग्रंथों में ‘ऋषभदेव’ के बारे में पढ़ते हैं या सुनते हैं, तब उन संदर्भों से जैन धर्म की प्राचीनता सिद्ध होती है। उन ग्रंथों से पता चलता है कि ‘ऋषभदेव’ से ही इस युग का प्रारम्भ हुआ है और वे ही धर्मतीर्थ के प्रथम तीर्थंकर हैं।  यदि किसी भी सभ्यता की प्राचीनता की सिद्धि इसी बात से करना चाहते हो कि यह सिंधु घाटी सभ्यता 5000 वर्ष पुरानी है, तो अपने आप यह सिद्ध ...

मेरी भावना (2) बुद्ध किसे कहते हैं?

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  मेरी भावना (2) बुद्ध किसे कहते हैं? (परम पूज्य मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं। बुद्ध वीर जिन हरिहर ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो।  भक्ति भाव से प्रेरित होकर, चित्त उसी में लीन र हो। क्या आप जानते हैं कि बुद्ध किसे कहते हैं? जिस व्यक्ति ने अपने राग और द्वेष को जीत लिया है, वही बुद्ध बनता है। बुद्ध का अर्थ है - हमेशा अपने आप को अन्दर से जागृत रखना। जागृत रहने का अर्थ है कि इस दुनिया में रहते हुए भी इस की कोई मीठी या कड़वी बात हमारी Feelings पर Attack न कर पाए। तभी आप बुद्ध कहलाओगे। उन्हीं को वीर कहते हैं। वही महावीर कहलाते हैं, वे ही जिन हैं। यह तभी Possible है, जब हम अपने राग, द्वेष, मोह आदि की  Feelings  पर control कर लेते हैं, उनको जीत लेते हैं, तभी वे ‘जिन’ कहलाते हैं। जब हम ऐसी आत्मा का स्मरण करेंगे, तो हमारे अन्दर अपने आप Positive Energy के Source का Flowहोने लगेगा। यदि आप किसी बुरे व्यक्ति या डाकू, लुटेरे या आतंकवादी के बारे में सोचेंगे, तो हमारे मन में आएगा कि वह कैसे मरा होगा,...

मेरी भावना (1) सर्वज्ञ किसे कहते हैं?

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 मेरी भावना (1) सर्वज्ञ किसे कहते हैं? (परम पूज्य मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं। आज आप सभी के लिए मेरी भावना के माध्यम से कुछ अच्छी भावनाएँ प्रेषित काने का विचार मेरे मन में आया है। मेरी भावना का शाब्दिक अर्थ है - ‘ My Feeling ’, लेकिन यह ‘मेरी भावना’ यदि हमारी सबकी भावना बनेगी तभी वह आपकी व हमारी Feeling बनेगी, वरना वह रचयिता की भावना ही रह जाएगी।  मेरी भावना भारत के बहुत से स्कूलों में भी पढ़ाई जाती है। यदि हम अपने दिन का आरम्भ ‘मेरी भावना’ से करें, तो हमारे अन्दर अच्छे विचार और अच्छे भाव हमेशा बने रह सकते हैं। इन भावनाओं के माध्यम से हमारे मन और मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह हम स्वयं महसूस भी करेंगे।  जिसने रागद्वेष कामादिक जीते, सब जग जान लिया। ये ‘मेरी भावना’ की प्रारंभिक पंक्तियाँ हैं। एक तरह से यह एक मंगल भावना है और इस मंगल भावना में यह बताया जा रहा है कि जिसने राग, द्वेष, काम आदि को जीत लिया हैं, उसने सब जग को जान लिया है। वह व्यक्ति समस्त जगत को जानने वाला सर्वज्ञ हो ज...

महावीर भगवान जी के पांच नाम

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  महावीर भगवान जी के पांच नाम   महावीर भगवान जी के पांच नाम कैसे पड़े महावीर, वर्धमान, सन्मति, महावीर, अतिवीर, जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। एक लँगोटी तक का परिग्रह नहीं था उन्हें। हिंसा, पशुबलि, जाति-पाँति के भेदभाव जिस युग में बढ़ गए, उसी युग में पैदा हुए महावीर और इन्होंने अहिंसा का भरपूर विकास किया। महावीर के पाँच नाम निम्न प्रकार हैं- 1=वीर - जन्माभिषेक के समय इन्द्र को शंका हुई कि बालक इतने जल प्रवाह को कैसे सहन करेगा। बालक ने अवधि ज्ञान से जानकर पैर के अंगूठे से मेरु पर्वत को थोड़ा-सा दबाया, तब इन्द्र को ज्ञात हुआ इनके पास बहुत बल है। इन्द्र ने क्षमा माँगी एवं कहा कि ये तो ’वीर’ जिनेन्द्र हैं। 2=वर्द्धमान - राजा सिद्धार्थ ने कहा कि जब से यह बालक प्रियकारिणी के गर्भ में आया, उसी दिन से घर, नगर और राज्य में धन-धान्य की समृद्धि प्रारम्भ हो गई। अतः इस बालक का नाम ’वर्द्धमान’ रखा जाए। 3=सन्मति - एक समय संजय और विजय नाम के दो चारण ऋद्धिधारी मुनियों को तत्व सम्बन्धी कुछ जिज्ञासा थी। वर्द्धमान पर दृ...

उत्तम क्षमापना दिवस

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  उत्तम क्षमापना दिवस दसलक्षण पर्व व चातुर्मास की समाप्ति पर इस पुनीत क्षमापना दिवस के अवसर पर हम परिवार सहित आप सभी से ह्रदय की गहराइयों से क्षमा मांगते हैं। प्रथम क्षमा - प्रभु से, जिनकी हम विधिवत अर्चना नही कर पा रहे हैं। द्वितीय क्षमा - गुरु से,  जिनके प्रत्यक्ष दर्शन, वंदन वैय्यावृत्ति आदि नहीं कर पा रहे हैं। तृतीय क्षमा - जिनवाणी मां से, जिनकी बताये गए मार्ग पर हम दृढ़ता पूर्वक चल नहीं रहे हैं। चतुर्थ क्षमा - प्रकृति से, बेजुबान जीवों से, जिनके प्रति हम सदैव गैर जिम्मेदार बने रहते हैं। पांचवी क्षमा - समाज से,  जिनके बनाये गये नियमों की हम अवहेलना करते रहते हैं। छठवीं क्षमा - देश से, जिसके प्रति हम अपने कर्त्तव्यों से अनजान बने रहते हैं। सातवीं क्षमा - अपने से बडों के प्रति,  जिनकी बातों को हम अनसुना करते हैं। आठवीं क्षमा - अपने से छोटे से, जिनको हम कमतर आंक कर उपेक्षा करते रहते हैं। नवमी क्षमा - अपने सभी रिश्तेदारों से,  जिनका आदर-अनादर हम चेहरे देख कर करते हैं। दसवीं क्षमा - अपने उन सभी मित्रों से,  जिनकी अच्छी बातें भी हमें बुरी लगती हैं। हम पूर्णतः ...

प्रश्न- संकलन

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  प्रश्न- संकलन (उत्तर कही ढूंढने जाने की जरूरत नही है, प्रश्न में ही उत्तर है) प्रश्नों का संकलन बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है!! 1. सिद्ध शिला कितनी होती हैं? 2. जीव कितने प्रकार के होते हैं? 3. भोग भूमियाँ कितने प्रकार की होती हैं? 4. गतियां कितनी होती हैं? 5. ज्योतिष देव कितने प्रकार के होते हैं? 6. लेश्या कितनी होती हैं?  7. नरक कितने होते हैं? 8. मद कितने प्रकार के होते हैं? 9. नारायण कितने होते हैं?  10. धर्म के लक्षण कितने होते हैं?  11. भगवान महावीर के कुल कितने गणधर थे ?  12. अनुप्रेक्षा कितनी होती हैं?  13. चरित्र कितने प्रकार के होते हैं? 14. चक्रवर्ती के पास कुल कितने रत्न होते हैं? 15. प्रमाद कितने होते हैं? 16. शत्रुंजय तीर्थ के कितने उद्धार हुए? 17. कुंथुनाथ जी कौन से नम्बर के तीर्थंकर हैं? 18. तीर्थंकर कितने दोषों से मुक्त होते हैं? 19. मल्लिनाथ भगवान कौन से तीर्थंकर हैं? 20 तीर्थराज सम्मेद शिखर जी से कितने तीर्थंकर मोक्ष गए?  21. खड्गासन से कितने तीर्थंकर मोक्ष गए? 22. अभक्ष्य कितने होते हैं? 23. ऋजु विपुलमती मनः पर्ययः कौन से नम्ब...