मेरी भावना (2) बुद्ध किसे कहते हैं?

 मेरी भावना (2) बुद्ध किसे कहते हैं?

(परम पूज्य मुनि श्री 108 प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)

आदिनाथ भगवान की जय 

मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं।

बुद्ध वीर जिन हरिहर ब्रह्मा, या उसको स्वाधीन कहो। 

भक्ति भाव से प्रेरित होकर, चित्त उसी में लीन रहो।

क्या आप जानते हैं कि बुद्ध किसे कहते हैं? जिस व्यक्ति ने अपने राग और द्वेष को जीत लिया है, वही बुद्ध बनता है।

बुद्ध का अर्थ है - हमेशा अपने आप को अन्दर से जागृत रखना। जागृत रहने का अर्थ है कि इस दुनिया में रहते हुए भी इस की कोई मीठी या कड़वी बात हमारी Feelings पर Attack न कर पाए। तभी आप बुद्ध कहलाओगे। उन्हीं को वीर कहते हैं। वही महावीर कहलाते हैं, वे ही जिन हैं। यह तभी Possible है, जब हम अपने राग, द्वेष, मोह आदि की  Feelings  पर control कर लेते हैं, उनको जीत लेते हैं, तभी वे ‘जिन’ कहलाते हैं। जब हम ऐसी आत्मा का स्मरण करेंगे, तो हमारे अन्दर अपने आप Positive Energy के Source का Flowहोने लगेगा।

यदि आप किसी बुरे व्यक्ति या डाकू, लुटेरे या आतंकवादी के बारे में सोचेंगे, तो हमारे मन में आएगा कि वह कैसे मरा होगा, उसने कैसे किसी को मारा होगा।उेसा सोचते हुए आपका मन किसी काम में नहीं लगेगा। इसके विपरीत यदि आप कियी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचें कि जिन्होंने राग, द्वेष, मोह आदि को इतना जीत लिया कि उन्हें संसार से कोई प्रयोजन ही नहीं। वे अन्दर से इतने जागृत हैं कि दुनिया की सब बातें देखते और जानते हुए भी भीतर से कुछ भी React नहीं करते,उन्हें ही हम ‘जिन’ कहते हैं। ‘जिन’ का अर्थ है - जीतने वाला। जैन धर्म हमेशा आपको जीतना सिखाता है। किसको जीतना है? अपने पड़ोसी को या अपने साथ पढ़ने वाले विद्यार्थी को नहीं जीतना। उससे तो हिंसा का भाव आ जाएगा। फिर किसको जीतना है? अपने आप को, अपनी राग-द्वेष आदि की ग़लत Emotions को जीतो। कोई Negative Energy हम पर हावी न होने पाए, ऐसे Sources को जीतो। इसी का नाम ‘जिन’ है और जो ‘जिन’ का Path Follow करते हैं, उन्हीं को जैन कहते हैं।

जब हम जीतने वाले लोगों का स्मरण करेंगे, उनकी संगति करेंगे, तो हमारे अन्दर भी अपने ही मन को, उसमें उठने वाले ग़लत भावों को, अपने दुःखों को जीतने का भाव पैदा होगा।

जो अपने विकारी भावों को जीत लेगा, वही बुद्ध है, वही वीर है, वही जिन है, वही हरि (विष्णु) है, वही हर (शिव) है, वही ब्रह्मा है। उसे चाहे कोई भी नाम दे दो, पर उसके अन्दर अपने विकारी भावों को जीतने की Quality Develop हो चुकी है। जैन दर्शन हमेशा Quality को देखता है, Person को नहीं। यदि आप यह घोषणा करते हैं कि आपने राग, द्वेष, मोह को जीत लिया है, तो आप में सर्वज्ञता का गुण भी होना चाहिए। सर्वज्ञता उसी को प्राप्त होती है, जिसने राग-द्वेष-मोह  आदि को जीत लिया है। अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि भगवान बनने का कारण क्या है। हम ऐसे भगवान को याद करेंगे, उनके बताए Path पर चलेंगे, तो हमारे अन्दर अपने आप Positive Energy आएगी और हम अपने आप को गुणवान बना सकेंगे। 

इसीलिए कहा है कि ‘सब कुछ जान लिया।’ भगवान ने सब कुछ जान लिया कि आप क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे। आप कहाँ से आए हो, कहाँ जाओगे। क्या सोच रहे हो, क्या सोचोगे। जिसकी आत्मा में सब कुछ दिखाई दे रहा है कि हम पिछले जन्मों में कहाँ-कहाँ थे और अगले भवों में कहाँ-कहाँ जाएंगे, वही भगवान है। उसी को अर्हत कहते हैं, वीर कहते हैं, ब्रह्मा कहते हैं।

इसीलिए कहते हैं - 

जिसने रागद्वेष कामादिक जीते, सब जग जान लिया।

सब जीवों को मोक्षमार्ग का, निस्पृह हो उपदेश दिया।।

यदि हमने ऐसे ‘जिन’ को अपना आदर्श बना लिया, तो हमारे अन्दर अपने आप अच्छी Feelings, अच्छी भावनाएँ आने लगेंगी। जब Negative विचारों के लोग हमारे आदर्श बन जाते हैं, तो उनकी याद करके हम थकने लगते हैं। लेकिन जब हम जितेन्द्रिय भगवान को अपना आदर्श बनाएंगे, तो हमारे अन्दर जीने का नया उत्साह पैदा होगा और कोई भी बीमारी या कोराना हम पर Attack नहीं कर सकेगा। 

इसलिए बुद्ध बनो, बुद्धू नहीं।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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