जीवन है पानी की बूंद (6-10)
जीवन है पानी की बूंद (6-10) रचयिता व प्रणेता : परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे। होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥ चन्द दिनों का जीवन है, इसमें सुख कितना कम है, जीवन में कितना दम है - 2 झूठे सुख में मग्न रहा, लेकिन दर्द से गाफिल है, जाने कब तन से, हो ऽऽ ...., जाने कब तन से पंछी उड़ जाये रे.... जीवन....(6) किसको मानेअपना है, अपना भी तो सपना है, कोई नहीं यहाँ अपना है - 2 जिसके लिये माया जोड़ी, वो क्या तेरा अपना है, तेरी ही कुनबा, हो ऽऽ ...., तेरा ही कुनबा तेरा कफन सजाये रे.... जीवन....(7) कैसे-2 धन जोड़ा, अपनों का दिल तोड़ा, मोही बन कर सिर फोड़ा - 2 पोते बेटे करें मज़ा, फूटी किस्मत मिली सजा, मर कर मोही को ऽऽ ,...., मर कर मोही को धन साँप बनाये रे.... जीवन (8) दुनिया एक तमाशा है, पाप पुण्य का पाशा है, आशा और निराशा है - 2 जिसको जो भी भासा है, उसने वहीं तराशा है, चलती ये गाड़ी, हो ऽऽ ...., चलती ये गाड़ी कब ठप हो जाये रे.... जीवन....(9) जब हम तप को तपते हैं, तब ही यारों पकते हैं, संयम धारण करते है - 2 बिन संयम कल्याण नहीं, तीर्थंकर...