जीवन है पानी की बूंद(1-5)
जीवन है पानी की बूंद (1-5)
रचयिता व प्रणेता :
परमपूज्य आचार्य श्री 108 विनम्र सागर जी महाराज
गुरु चरण वन्दना
आपके द्वय चरण में विनम्र नमन
त्याग के रूप तुम ध्यान के रूप तुम
ज्ञान के रूप तुम ध्यान के रूप तुम
ए विरागी गुरू तुम विराग परम
जीवन है पानी की बूंद, कब मिट जाये रे।
होनी अनहोनी, कब क्या घट जाये रे ॥
महल बनाते ख्यालों में, हर दम हैं बेहालों में,
जीते रहते ख्वाबों में - 2
मिटते रहे अंधेरों में, चौरासी के फेरों में,
दुनिया में जीवन, होऽऽ.....,
दुनिया में जीवन तू कभी न पाये रे.... जीवन.....(1)
आँख खुले का सपना है, कौन यहाँ पर अपना है,
सपने में क्यों खपना है - 2
सपना अपना मत मानो, अपना ही अपना जानो,
अपना ही आगे, होऽऽ....,
अपना ही आगे अपना साथ निभाये रे.... जीवन.....(2)
जिसको तुमने पाला है, कहते हो मम लाला है,
वो ही तुमको हाला है - 2
इक दिन वो ही आयेगा, अरथी तेरी बनायेगा,
तेरा ही बेटा, होऽऽ....,
तेरा ही बेटा तुझ में आग लगाये रे... जीवन.....(3)
दुनिया रैन बसेरा है, क्या तेरा क्या मेरा है,
चंद दिनों का डेरा है - 2
आयेगा जब काल अरे, कर देगा कंगाल अरे,
तेरा ही कर्म, होऽऽ....
तेरा ही कर्म तेरा साथ निभाये रे.... जीवन ....(4)
जितना भी कर जाओगे, उतना ही फल पाओगे,
भ्रम में तुम फंस जाओगे - 2
करनी जो कर जाओगे, वैसी भरनी पाओगे,
कर्मों का फल, होऽऽ....,
कर्मों का फल ही ये अंजाम दिखाए रे.... जीवन.... (5)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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