जीवन है पानी की बूंद (6-10)
जीवन है पानी की बूंद (6-10)
रचयिता व प्रणेता :
चन्द दिनों का जीवन है, इसमें सुख कितना कम है, जीवन में कितना दम है - 2 झूठे सुख में मग्न रहा, लेकिन दर्द से गाफिल है, जाने कब तन से, होऽऽ....,
जाने कब तन से पंछी उड़ जाये रे.... जीवन....(6)
किसको मानेअपना है, अपना भी तो सपना है, कोई नहीं यहाँ अपना है - 2 जिसके लिये माया जोड़ी, वो क्या तेरा अपना है, तेरी ही कुनबा, होऽऽ....,
तेरा ही कुनबा तेरा कफन सजाये रे.... जीवन....(7)
कैसे-2 धन जोड़ा, अपनों का दिल तोड़ा, मोही बन कर सिर फोड़ा - 2 पोते बेटे करें मज़ा, फूटी किस्मत मिली सजा, मर कर मोही कोऽऽ,....,
मर कर मोही को धन साँप बनाये रे.... जीवन (8)
दुनिया एक तमाशा है, पाप पुण्य का पाशा है, आशा और निराशा है - 2 जिसको जो भी भासा है, उसने वहीं तराशा है, चलती ये गाड़ी, होऽऽ....,
चलती ये गाड़ी कब ठप हो जाये रे.... जीवन....(9)
जब हम तप को तपते हैं, तब ही यारों पकते हैं, संयम धारण करते है - 2 बिन संयम कल्याण नहीं, तीर्थंकर ने कहा यही, संयम प्राणी को, होऽऽ....,
संयम प्राणी को भव पार कराये रे.... जीवन....(10)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
द्वारा -सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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