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रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 2)

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रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 2) चित्रसेन और उसका मित्र रत्नसार दोनों वहां से चले गए। पद्मावती की सखियों ने राजा पद्मावत को सारा वृतान्त सुनाया। राजा ने कहा - तुम मत घबराओ। हम राजकुमार चित्रसेन को खोज लेंगे। पद्मरथ ने पद्मावती के स्वयंवर में आने के लिए सब देश देशांतरों के राजकुमारों को निमंत्रण दे दिया। स्वयंवर का मंडप बहुत ही सुंदर सजाया गया, जैसे साक्षात स्वर्ग ही पृथ्वी तल पर आ गया हो। स्वयंवर का समय आ गया। सारे राजकुमार अपने-अपने सिंहासन पर विराजमान हो गए। राजा ने मंडप में एक बहुत विशाल देव-रक्षित धनुष लाकर दिया और कहा कि जो कोई भी इस धनुष को चढ़ाएगा, वही इस रूपवती कन्या का पति होगा। राजकुमारी पद्मावती भी सहेलियों के साथ 16 शृंगार से सजकर, सुंदर वस्त्राभूषणों को धारण कर स्वयंवर मंडप में आकर अपने स्थान पर बैठ गई। सब राजकुमारों ने धनुष को चढ़ाने का साहस किया किन्तु सफल न हो सके। कुछ राजकुमार तो दृष्टिहीन हो गए। उन्हें तो यह भी मालूम नहीं हुआ कि धनुष कहाँ रखा है? इस प्रकार अशुभ कर्म के उदय से स्वयंवर की रचना निष्फल हो गई। राजकुमारी मन में सोचने लगी कि मैं अपने प्राण प्रिय के दर्शन क्यों...

कुरल काव्य भाग - 104 (खेती)

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तमिल भाषा का महान ग्रंथ कुरल काव्य भाग - 104 खेती मूल लेखक - श्री ऐलाचार्य जी पद्यानुवाद एवं टीकाकार - विद्याभूषण पं० श्री गोविन्दराय जैन शास्त्री महरोनी जिला ललितपुर (म. प्र.) आचार्य तिरुवल्लस्वामी ने कुरल काव्य जैसे महान ग्रंथ की रचना की, जिसमें उन्होंने सभी जीवों की आत्मा का उद्धार करने के लिए, आत्मा की उन्नति के लिए कल्याणकारी, हितकारी, श्रेयस्कर उपदेश दिया है। ‘कुरल काव्य’ तमिल भाषा का काव्य ग्रंथ है। कुछ लोग कहते हैं कि इसके रचयिता श्री एलाचार्य जी हैं जिनका अपर नाम कुंदकुंद आचार्य है, लेकिन कुछ लोग इस ग्रंथ को आचार्य तिरुवल्लुवर द्वारा रचित मानते हैं। यह मानवीय आचरण की पद्धति का बोधगम्य दिग्दर्शन देने वाला, सर्वाधिक लोकोत्तर ग्रंथ है। अपने युग के श्रेष्ठतम साहित्यकार विद्वान पंडित श्री गोविंदराय शास्त्री ने इस ग्रंथ का तमिल भाषा लिपि से संस्कृत भाषा एवं हिंदी पद्य गद्य रूप में रचना कर जनमानस का महान उपकार किया है। परिच्छेद: 104 कृषिः नरो गच्छतु कुत्रापि सर्वत्रान्नमपेक्षते। उत्सिद्धिध कृपेस्तस्मात् सुभिक्षेऽपि हिताय सा।।1।। आदमी जहाँ चाहे घूमे, पर अन्त में अपने भोजन के लिए उसे ...

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 1)

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रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 1) भरत क्षेत्र में रत्नपुर नाम का एक नगर था। उस नगर में त्रैलोक्य तिलक नाम का एक जिन चैत्यालय था, जो बहुत ही शोभनीय था। उसमें सोने के शिखर पर विविध रत्न जड़े हुए थे। उसमें श्री शांतिनाथ भगवान की अत्यंत मनोज्ञ प्रतिमा थी। वहाँ राजा पद्मरथ अपनी रानी पद्मश्री के साथ शासन करता था। उनकी एक कन्या थी, जिसका नाम पद्मावती था। वह बहुत सुंदर थी, अष्टमी के चंद्रमा के समान उसका मस्तक था, नीलकमल के समान नयन थे, शंख के समान कंठ था और कोयल के समान आवाज थी। उसका जैन धर्म में बहुत अनुराग था और दृढ़ विश्वास था। वह साक्षात लक्ष्मी का रूप थी। राजा ने उसके विवाह के लिए योग्य वर की तलाश शुरू की। हजारों चित्रपट राजकुमारी ने देखे, पर उसे कोई भी पसंद नहीं आया तो उसे पुरुषों से द्वेष हो गया। एक दिन एक चित्रकार गुणसार नासा दृष्टि लगाए ध्यान में मग्न था कि उसकी दृष्टि राजकुमारी पर पड़ी और वह उस पर मुग्ध हो गया। उसने अपनी चित्रकला से राजकुमारी का हूबहू चित्रपट बना दिया। एक मुनिराज ने वह चित्रपट देखा और फिर मुनिराज ने उसे चित्रसेन और पद्मावती का पूर्व भव बताया कि भरत क्षेत्र में द्रविड़ देश...

कुरल काव्य भाग - 103 (कुलोन्नति)

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तमिल भाषा का महान ग्रंथ कुरल काव्य भाग - 103 कुलोन्नति मूल लेखक - श्री ऐलाचार्य जी पद्यानुवाद एवं टीकाकार - विद्याभूषण पं० श्री गोविन्दराय जैन शास्त्री महरोनी जिला ललितपुर (म. प्र.) आचार्य तिरुवल्लस्वामी ने कुरल काव्य जैसे महान ग्रंथ की रचना की, जिसमें उन्होंने सभी जीवों की आत्मा का उद्धार करने के लिए, आत्मा की उन्नति के लिए कल्याणकारी, हितकारी, श्रेयस्कर उपदेश दिया है। ‘कुरल काव्य’ तमिल भाषा का काव्य ग्रंथ है। कुछ लोग कहते हैं कि इसके रचयिता श्री एलाचार्य जी हैं जिनका अपर नाम कुंदकुंद आचार्य है, लेकिन कुछ लोग इस ग्रंथ को आचार्य तिरुवल्लुवर द्वारा रचित मानते हैं। यह मानवीय आचरण की पद्धति का बोधगम्य दिग्दर्शन देने वाला, सर्वाधिक लोकोत्तर ग्रंथ है। अपने युग के श्रेष्ठतम साहित्यकार विद्वान पंडित श्री गोविंदराय शास्त्री ने इस ग्रंथ का तमिल भाषा लिपि से संस्कृत भाषा एवं हिंदी पद्य गद्य रूप में रचना कर जनमानस का महान उपकार किया है। परिच्छेद: 103 कुलोन्नति अहर्निशं श्रमिष्यामि विना श्रान्तिं करद्वयात्। नरस्यायं हि संकल्पः कुलोत्कर्षैककारणम्।।1।। मनुष्य की यह प्रतिज्ञा कि “मैं अपने हाथों से म...