रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 1)

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 1)

भरत क्षेत्र में रत्नपुर नाम का एक नगर था। उस नगर में त्रैलोक्य तिलक नाम का एक जिन चैत्यालय था, जो बहुत ही शोभनीय था। उसमें सोने के शिखर पर विविध रत्न जड़े हुए थे। उसमें श्री शांतिनाथ भगवान की अत्यंत मनोज्ञ प्रतिमा थी।

वहाँ राजा पद्मरथ अपनी रानी पद्मश्री के साथ शासन करता था। उनकी एक कन्या थी, जिसका नाम पद्मावती था। वह बहुत सुंदर थी, अष्टमी के चंद्रमा के समान उसका मस्तक था, नीलकमल के समान नयन थे, शंख के समान कंठ था और कोयल के समान आवाज थी।

उसका जैन धर्म में बहुत अनुराग था और दृढ़ विश्वास था। वह साक्षात लक्ष्मी का रूप थी। राजा ने उसके विवाह के लिए योग्य वर की तलाश शुरू की। हजारों चित्रपट राजकुमारी ने देखे, पर उसे कोई भी पसंद नहीं आया तो उसे पुरुषों से द्वेष हो गया।

एक दिन एक चित्रकार गुणसार नासा दृष्टि लगाए ध्यान में मग्न था कि उसकी दृष्टि राजकुमारी पर पड़ी और वह उस पर मुग्ध हो गया। उसने अपनी चित्रकला से राजकुमारी का हूबहू चित्रपट बना दिया।

एक मुनिराज ने वह चित्रपट देखा और फिर मुनिराज ने उसे चित्रसेन और पद्मावती का पूर्व भव बताया कि भरत क्षेत्र में द्रविड़ देश था। वहां एक चंपा नगरी थी। उसी में एक चंपक वन था। वह वन बहुत ही शोभनीय था। वन में एक निर्मल जल से भरा तालाब भी था। उसमें हंस, चकवा, बगुला आदि पक्षीगण रहते थे।

एक दिन इसी तालाब के निकट एक व्यापारी आया। उसने अपने आदमियों के साथ वहीं डेरा डाल दिया। उसने तालाब के शुद्ध जल से नहा कर जिनेंद्र भगवान की पूजा की, रसोई तैयार की और हाथ में शुद्ध जल लेकर किसी अतिथि की प्रतीक्षा करने लगा।

पुण्य उदय से मुनिराज का शुभ आगमन हुआ।

व्यापारी ने मुनिराज को पड़गाहा और नवधा भक्ति से आहार दिया। आहार दान के समय एक वृक्ष पर हंस और हंसिनी बैठे थे। उन्होंने हृदय से मुनि को दिए आहार की अनुमोदना की। अनुमोदना करने से हंसिनी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ और वे अपने शिशु का पालन करने लगे।

उनके अशुभ कर्म के उदय से वन में आग लग गई। सारा वन जलने लगा। अपने बच्चों को बचाने के लिए हंस पानी लेने गया। उसे पानी लाने में थोड़ी देर हो गई और आग हंसिनी और बच्चे के पास आ गई। हंसिनी हंस को धिक्कारने लगी कि इतनी देर लगा दी और वह पूरी पुरुष जाति के प्रति द्वेष करने लगी।

अग्नि ने उसके बच्चे और हंसिनी को जला दिया।

मुनि के आहार दान की अनुमोदना से हंसिनी ने मनुष्य भव पाया और रत्नपुर नगर में पद्मरथ राजा की रानी के गर्भ से वह पद्मावती कन्या उत्पन्न हुई है। वह हंस भी तत्काल ही पानी लेकर आ गया लेकिन अपनी स्त्री और बच्चे को मरा हुआ पाया तो हंस भी अतिशय शोक के कारण मर गया।

दान की अनुमोदना से वह हंस वीरसेन राजा का पुत्र चित्रसेन राजकुमार उत्पन्न हुआ है। राजा वीरसेन कलिंग देश में बसंतपुर नगर का राजा था।

इस प्रकार मुनिराज के वचनों को सुनकर चित्रकार वह चित्र लेकर चित्रसेन के पास गया। चित्र देखते ही राजकुमार चित्रसेन को पूर्व जन्म का जाति स्मरण हो गया। उसे एक-एक करके सारी बातें याद आने लगी।

चित्रसेन और उसके मित्र रत्नसार ने मुनिराज के चरणों में हाथ जोड़कर वंदना की।

मुनिराज कहते हैं कि जैसी होनहार होती है, सामग्री भी वैसी ही मिल जाती है। राजकुमार चित्रसेन ने मुनिराज से विनय पूर्वक पूछा - हे भगवन्! दया करके इतना और बतलाइए कि उस राजकुमारी पद्मावती की प्राप्ति मुझे कैसे होगी?

मुनिराज ने कहा - सुनो! यह तो तुम्हें स्मरण में आ ही गया होगा कि पूर्व जन्म में जब वह एक हंसिनी थी, तब उसका पति हंस अपने बच्चों के लिए पानी लेने गया था। तभी वन में आग लग गई। हंसिनी और उसका बच्चा तड़प-तड़प कर मर गए। उस समय हंसिनी को पुरुषों से द्वेष हो गया था। इसलिए इस जन्म में भी राजकुमारी पद्मावती को पुरुषों से द्वेष हो गया है। इस बात का उसके माता-पिता को बहुत कष्ट है।

हां! एक उपाय है। यदि पूर्व जन्म का सब वर्णन एक चित्रपट पर लिखकर उसे दिखाया जाए, तो उसे अवश्य ही जाति स्मरण हो जाएगा और वह पुरुषों से द्वेष करना छोड़ देगी और तुमसे विवाह करने पर भी राजी हो जाएगी।

यह उपाय सुनकर चित्रसेन को बहुत प्रसन्नता हुई। दोनों मित्र मुनिराज को नमस्कार कर रत्नपुर की ओर चल दिए। चलते-चलते जब वह रत्नपुर के निकट आए तो नगर का द्वार बंद हो चुका था। वे वहीं नगर के द्वार के बाहर ठहर गए।

रात को चित्रसेन को एक मधुर ध्वनि सुनाई दी। उसने थोड़ी दूर पर देखा कि धनंद यक्ष के यहां संगीत सभा लगी हुई थी। चित्रसेन को देखकर उन्होंने उसका स्वागत किया और उसे प्रसन्न होकर बोल दिया कि तुम युद्ध में विजयी होंगे और उसे एक विमान दिया। वह वापस रत्नसार मित्र के पास आ गया और सारा हाल सुनाया।

उधर सवेरा हो गया था। जब वे दोनों नगर के बीच में आए तो उस नगरी की शोभा देखकर स्तब्ध रह गए। इसी समय राजा ने राजकुमारी के विवाह के लिए घोषणा करवाई और कहा कि जो मेरी कन्या का पुरुषों से द्वेष करना मिटा देगा, उसी के साथ वह अपनी राजकुमारी का विवाह करेगा और अपना आधा राज्य भी दे देगा।

घोषणा सुन कर वे दोनों जल्दी ही एक चित्रकार के पास गए और एक चित्रपट तैयार करवाया और उसमें बड़ी चतुराई से पूर्व जन्म की घटना का उल्लेख किया। गुप्त वेश बनाकर, चित्रपट को लेकर वे दोनों नगर में गाते हुए घूमने लगे। पूरे रत्नपुर में उनकी प्रशंसा फैल गई। पद्मावती ने भी उस गायक राजकुमार को महल में बुलवाया।

वे दोनों आए और राजकुमारी को चित्रपट दिखलाया। उसे देखते ही राजकुमारी को चित्रसेन पर अनुराग हो गया। राजकुमारी को चित्रपट देखकर पूर्व जन्म की सब बातें याद आने लगी। राजकुमार समझ गया कि इसे जाति स्मरण हो गया है और पूर्व जन्म की सब बातें याद आ गई हैं।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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