कुरल काव्य भाग - 103 (कुलोन्नति)
तमिल भाषा का महान ग्रंथ
कुरल काव्य भाग - 103
कुलोन्नति
मूल लेखक - श्री ऐलाचार्य जी
पद्यानुवाद एवं टीकाकार - विद्याभूषण पं० श्री गोविन्दराय जैन शास्त्री
महरोनी जिला ललितपुर (म. प्र.)
आचार्य तिरुवल्लस्वामी ने कुरल काव्य जैसे महान ग्रंथ की रचना की, जिसमें उन्होंने सभी जीवों की आत्मा का उद्धार करने के लिए, आत्मा की उन्नति के लिए कल्याणकारी, हितकारी, श्रेयस्कर उपदेश दिया है। ‘कुरल काव्य’ तमिल भाषा का काव्य ग्रंथ है। कुछ लोग कहते हैं कि इसके रचयिता श्री एलाचार्य जी हैं जिनका अपर नाम कुंदकुंद आचार्य है, लेकिन कुछ लोग इस ग्रंथ को आचार्य तिरुवल्लुवर द्वारा रचित मानते हैं। यह मानवीय आचरण की पद्धति का बोधगम्य दिग्दर्शन देने वाला, सर्वाधिक लोकोत्तर ग्रंथ है। अपने युग के श्रेष्ठतम साहित्यकार विद्वान पंडित श्री गोविंदराय शास्त्री ने इस ग्रंथ का तमिल भाषा लिपि से संस्कृत भाषा एवं हिंदी पद्य गद्य रूप में रचना कर जनमानस का महान उपकार किया है।
परिच्छेद: 103
कुलोन्नति
अहर्निशं श्रमिष्यामि विना श्रान्तिं करद्वयात्।
नरस्यायं हि संकल्पः कुलोत्कर्षैककारणम्।।1।।
मनुष्य की यह प्रतिज्ञा कि “मैं अपने हाथों से मेहनत करने में कभी न थकूँगा”, उसके परिवार की उन्नति में जितनी सहायक होती है, उतनी और कोई वस्तु नहीं।
पद्य अनुवाद -
नहीं थकूँगा हाथ से, करके श्रम दिन-रात।
नर का यह संकल्प ही, कुल का पुण्य-प्रभात।।1।।
-
योगक्षेमपरा बुद्धिः श्रमश्च पौरुषान्वितः।
इमे स्तो वंशवृद्ध्यर्थं समर्थे द्वे हि कारणे।।2।।
श्रम से भरा हुआ पुरुषार्थ और कार्यकुशल-सदबुद्धि, इन दोनों की परिपक्व पूर्णता ही परिवार को ऊँचा उठाती है।
पद्य अनुवाद -
पूर्ण कुशल सद्बुद्धि हो, श्रम हो पौरुषरूप।
वंश समुन्नति के लिए, दो ही हेतु स्वरूप।।2।।
-
कुलोन्नतिं यदा कर्तुं नरो भवति सज्जितः।
कटिबद्धाः सुरा यान्ति तदग्रे स्वयमव्यथाः।।3।।
जब कोई मनुष्य यह कहकर काम करने पर उतारू होता है कि मैं अपने कुल की उन्नति करूँगा, तो स्वयं देवता लोग अपनी-अपनी कमर कसकर उसके आगे-आगे चलते हैं।
पद्य अनुवाद -
वंशोन्नति के अर्थ जब, नर होता सन्नद्ध।
उसके आगे देव तब, चलते हो कटिबद्ध।।3।।
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येन मुक्तं न चेत्किंचित् कुलोत्कर्षचिकीर्षया।
स्वल्पमप्यस्तु तत्कार्य सिद्धये किन्तु निश्चितम्।।4।।
जो लोग अपने कुटुम्ब को ऊँचा उठाने में कुछ कसर उठा नहीं रखते, वे इसके लिए यदि कोई सुविस्तृत युक्ति न भी निकालें, तो भी उनके हाथ से किये हुए काम में सिद्धि होगी।
पद्य अनुवाद -
उच्चदशा पर वंश हो, ऐसा मन में ठान।
उठा रखे नहिं शेष जो, बनकर उद्यमवान।।
श्रेष्ठमनस्वी वीर वह, कृति उसकी गुणवान।
चाहे यद्यपि अल्प हो, तो भी सिद्धि महान।।4।। (युग्म)
-
अनघैश्चरितैर्नित्यं यः करोति कुलोन्नतिम्।
स उदात्तः सदा मान्यस्तन्मित्रं क्षितिमण्डलम्।।5।।
जो आदमी बिना किसी अनाचार के अपने कुल को उन्नत बनाता है, सारा जगत उसको अपना मित्र समझेगा।
पद्य अनुवाद -
वंशोन्नति का हेतु है, जिसका पुण्य चरित्र।
सदा मान्य वह उच्च नर, उसका जग है मित्र।।5।।
-
स वंशो गुरुतां नीतः श्रियि ज्ञाने बले च वा।
यत्र जन्म मनुष्यस्य पौरुषं तस्य पौरुषम्।।6।।
पुरुष का सच्चा पुरुषत्व तो इसी में है कि जिसमें उसने जन्म लिया है, उस वंश को धन में, बल में और ज्ञान में ऊँचा बना दे।
पद्य अनुवाद -
धन में बल में ज्ञान में, कुल पावे उच्चार्थ।
नर के जिस ही यत्न से, सत्य वही पुरुषार्थ।।6।।
-
वीरमेव यथा युद्धे प्रहरन्त्यरयो भृशम्।
शक्त स्कन्धौ तथा लोके कुलभारोऽभिगच्छति।।7।।
जिस प्रकार युद्धक्षेत्र में आक्रमण का प्रकोप शूरवीर पर पड़ता है, ठीक इसी तरह परिवार के पालन-पोषण का भार उन्हीं कन्धों पर आता है कि जो उसके बोझ को सम्भाल सकते हैं।
पद्य अनुवाद -
ज्यों पड़ते हैं वीर पर, रण में रिपु के वार।
त्यों ही आता लोक में, कर्मठ पर कुलभार।।7।।
-
कुलोन्नतिं चिकीर्षोस्तु सर्वे काला हितावहाः।
प्रत्यनीके प्रमादेन कुलपातो विनिश्चितः।।8।।
जो लोग अपने कुल की उन्नति करना चाहते हैं, उनके लिए कोई समय बेसमय नहीं है और यदि वे असावधानी से काम लेंगे तथा अपनी झूठी शान पर अड़े रहेंगे, तो उनके कुटुम्ब को नीचा देखना पड़ेगा।
पद्य अनुवाद -
उन्नति-रागी को सभी, भले लगें दिन-रात।
चूक करे से अन्यथा, होता वंश-विघात।।8।।
-
कुटुम्बरक्षिणां कार्यं वीक्ष्यैवं धीः प्रजायते।
श्रमार्थमथ दुःखार्थं किमसौ विधिना कृतः।।9।।
क्या सचमुच उस आदमी का शरीर, कि जो अपने परिवार को हर प्रकार की विपत्ति से बचाना चाहता है, सर्वथा परिश्रम और कष्टों के लिए ही बना है?
पद्य अनुवाद -
कुलपालक की काय लख, उठता एक विचार।
विपदा या श्रम अर्थ क्या, दैव रचा आकार।।9।।
-
यस्य नास्ति कुटुम्बस्य पालकः सत्प्रबन्धकः।
तन्मूले विपदां घातात् पतनं तस्य जायते।।10।।
जिस घर में सम्भालने वाला कोई योग्य आदमी नहीं है, आपत्तियाँ उसकी जड़ को काट डालेंगी और वह कुल मिट्टी में मिल जायेगा।
पद्य अनुवाद -
जिस घर का उत्तम नहीं, रक्षक पालनहार।
जड़ पर विपदा-चक्र पड़, मिटता वह परिवार।।10।।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
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धन्यवाद।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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