कुरल काव्य भाग - 104 (खेती)

तमिल भाषा का महान ग्रंथ

कुरल काव्य भाग - 104

खेती

मूल लेखक - श्री ऐलाचार्य जी

पद्यानुवाद एवं टीकाकार - विद्याभूषण पं० श्री गोविन्दराय जैन शास्त्री

महरोनी जिला ललितपुर (म. प्र.)

आचार्य तिरुवल्लस्वामी ने कुरल काव्य जैसे महान ग्रंथ की रचना की, जिसमें उन्होंने सभी जीवों की आत्मा का उद्धार करने के लिए, आत्मा की उन्नति के लिए कल्याणकारी, हितकारी, श्रेयस्कर उपदेश दिया है। ‘कुरल काव्य’ तमिल भाषा का काव्य ग्रंथ है। कुछ लोग कहते हैं कि इसके रचयिता श्री एलाचार्य जी हैं जिनका अपर नाम कुंदकुंद आचार्य है, लेकिन कुछ लोग इस ग्रंथ को आचार्य तिरुवल्लुवर द्वारा रचित मानते हैं। यह मानवीय आचरण की पद्धति का बोधगम्य दिग्दर्शन देने वाला, सर्वाधिक लोकोत्तर ग्रंथ है। अपने युग के श्रेष्ठतम साहित्यकार विद्वान पंडित श्री गोविंदराय शास्त्री ने इस ग्रंथ का तमिल भाषा लिपि से संस्कृत भाषा एवं हिंदी पद्य गद्य रूप में रचना कर जनमानस का महान उपकार किया है।

परिच्छेद: 104

कृषिः

नरो गच्छतु कुत्रापि सर्वत्रान्नमपेक्षते।

उत्सिद्धिध कृपेस्तस्मात् सुभिक्षेऽपि हिताय सा।।1।।

आदमी जहाँ चाहे घूमे, पर अन्त में अपने भोजन के लिए उसे हल का सहारा लेना ही पड़ेगा। इसलिए हर तरह की सस्ती होने पर भी कृषि सर्वोत्तम उद्यम है।

पद्य अनुवाद -

रहे मनुज भू में कहीं, उसे अपेक्षित अन्न।

वह मिलता कृषि से अतः, कृषि रखिए आसन्न।।1।।

-

कृषिवला धुरा तुल्या देशरूपस्य चक्रिणः।

अकृषाणा यतः सन्ति नूनं तदुपजीविनः।।2।।

किसान लोग देश के लिए धुरी के समान हैं, क्योंकि जोतने-खोदने की शक्ति न होने के कारण जो लोग दूसरे काम करने लगते हैं, उनको रोजी देने वाले वे ही लोग हैं।

पद्य अनुवाद -

देशरूप रथ के धुरा, कृषकवर्ग ही ख्यात।

कारण पलते अन्य सब, उनसे ही दिन-रात।।2।।

-

ये जीवन्ति कृषिं कृत्वा ते नराः सत्यजीविनः।

परपिण्डादिनः किन्तु सर्वेऽन्ये सन्ति मानवाः।।3।।

जो लोग हल के सहारे जीते हैं, वास्तव में वे ही जीते हैं और सब लोग तो दूसरे की कमाई हुई रोटी खाते हैं।

पद्य अनुवाद -

उनका जीवन सत्य जो, करते कृषि उद्योग।

और कमाई अन्य की, खाते बाकी लोग।।3।।

-

स्निग्धच्छायासु सस्यानां क्षेत्राणि यस्य शेरते।

तद्देशीयनृपच्छत्रादधः स्युश्छत्रिणः परे।।4।।

जहाँ के खेत लहलहाती हुई शस्य की श्यामल छाया के नीचे सोया करते हैं, वहाँ के राजा के छत्र के सामने अन्य राजाओं के छत्र झुक जाते हैं।

पद्य अनुवाद -

सोते साखा छाँह में, खेत जहाँ सर्वत्र।

उस जनपद के छत्र को, झुकते सब ही छत्र।।4।।

-

अभिक्षुकाः परं नैव दानिनोऽप्यनिषेधकाः।

ते सन्ति ये कृषिं नित्यं कुर्वंते साधुमानवाः।।5।।

जो लोग खेती करके जीविका चलाते हैं, वे केवल यही नहीं कि स्वयं कभी भीख नहीं माँगेंगे, बल्कि दूसरे भीख माँगने वालों को कभी ‘नाहीं’ किये बिना दान भी दे सकेंगे।

पद्य अनुवाद -

कृषि जीवी के भाग्य पर, लिखा न भिक्षावेध।

यह ही क्यों वह दान भी, देता बिना निषेध।।5।।

-

कृषीवलाः कृषेः कार्याद् विरताश्चेत् कथंचन।

सन्यासिनोऽपि ये जातास्तेऽपि स्युर्वज्रपीडिताः।।6।।

किसान यदि खेती से अपने हाथ को खींच लेवें तो उन लोगों को भी कष्ट हुए बिना नहीं रहेगा कि जिन्होंने समस्त वासनाओं का परित्याग कर दिया है।

पद्य अनुवाद -

निजकर को यदि खींच ले, कृषि से कृषक समाज।

गृहत्यागी तब साधु तक, टूटे शिर पर गाज।।6।।

-

जलार्द्रा खलु चेन्मृत्स्ना शोषयेत् तां रवेः करैः।

तुर्यांशस्यावशेषे सा निःखाद्यापि बहूर्वरा।।7।।

यदि तुम अपने खेत की धरती को इतना सुखाओ कि एक सेर मिट्टी सूखकर चौथाई अंश रह जाये तो मुट्ठी भर खाद की भी आवश्यकता नहीं होगी और फसल की पैदावार भरपूर होगी।

पद्य अनुवाद -

आर्द्रभूमि के धूप में, शुष्क करो बहु अंश।

खाद बिना उपजाऊ हो, बच कर चौथा अंश।।7।।

-

कर्षणात् खाद्यदानेषु निन्द्यदानादनन्तरम्।

अम्बुसेकाच्च रक्षायां भवन्ति बहवो गुणाः।।8।।

जोतने की अपेक्षा खाद डालने से अधिक लाभ होता है और जब निराई हो जाती है तो सिंचाई की अपेक्षा रखवाली अधिक महत्व रखती है।

पद्य अनुवाद -

जोतो नीदो खेत को, खाद बड़ा पर तत्व।

सींचे से रक्षा उचित, रखती अधिक महत्व।।8।।

-

यः पश्यति कृषिं नैव गृहे नित्यमवस्थितः।

सुभार्येव कृषिस्तस्मै कुप्यति क्षीणदेहिका।।9।।

यदि कोई आदमी खेत देखने नहीं जाता है और अपने घर पर ही बैठा रहता है तो पतिव्रता पत्नी की तरह उसकी कृषि भी रुष्ट हो जायेगी।

पद्य अनुवाद -

नहीं देखता भालता, कृषि को रह कर गेह।

गृहिणी सम तब रूठती, कृषि भी कृश कर देह।।9।।

-

भक्षणाय न मे किंचिदस्तीति वचनं भृशम्।

वदन्तं क्रन्दमानंच हसत्युर्वीरमालसम्।।10।।

वह सुन्दरी जिसे लोग धरिणी कहते हैं, अपने मन ही मन में हंसा करती है जबकि वह किसी काहिल को यह कह कर रोते हुए देखती है कि “हाय मेरे पास खाने को कुछ भी नहीं है।”

पद्य अनुवाद -

खाने को कुछ भी नहीं, यों जो करे विलाप।

हँसती उस मतिमन्द पर, धरिणी-लक्ष्मी आप।।10।।

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

--

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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