भगवान महावीर स्वामी (64)

  तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (64)
महावीर प्रभु के लिये निर्वाण प्राप्ति

अभी पंचमकाल का प्रारम्भ होने में तीन वर्ष आठ मास तथा पन्द्रह दिन का समय शेष था। चौथा काल चल रहा था। प्रभु महावीर का विहार थम गया; वाणी का योग भी मोक्षगमन के दो दिन पूर्व (धन्य त्तेरस से) रुक गया। प्रजाजन समझ गये कि अब प्रभु के मोक्षगमन की तैयारी है। प्रत्येक देश के राजा तथा लाखों प्रजाजन प्रभु के दर्शनार्थ आ पहुँचे। परम वैराग्य का वातावरण छा गया। भले ही वाणी बन्द हो गई थी, तथापि प्रभु की शान्तरस झरती मुद्रा देखकर भी अनेक जीव धर्म का मर्म प्राप्त कर रहे थे।

गौतम गणधरादि मुनिवर ध्यान में अधिकाधिक एकाग्र हो रहे थे। प्रभु की उपस्थिति में प्रमाद छोड़कर अनेक जीवों ने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की आराधना प्रारम्भ कर दी। 

इस प्रकार कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी तथा चतुर्दशी के दो दिन तक देवेन्द्रों तथा नरेन्द्रों ने सर्वज्ञ महावीर तीर्थंकर की अन्तिम महापूजा की। मोक्ष-महोत्सव का महान मेला लग रहा था... संसार को भूलकर सब मोक्ष की महिमा में तल्लीन थे। चतुर्दशी की रात्रि हुई, अर्धरात्रि भी बीत गई और... रात्रि के पिछले प्रहर (अमावस्या का प्रभात उदित होने से पूर्व) वीरनाथ सर्वज्ञ प्रभु तेरहवां गुणस्थान लाँघकर चौदहवें गुणस्थान में अयोगरूप से विराजमान हुए। यहाँ आस्रव का सर्वथा अभाव एवं संवर की पूर्णता हुई। परमशुक्लध्यान (तीसरा एवं चौथा) प्रकट करके शेष अघाती कर्मों की सम्पूर्ण निर्जरा प्राप्त कर दी और क्षणमात्र में प्रभु सर्वज्ञ महावीर मोक्षभाव रूप परिणत हुए... तत्क्षण ही लोकाग्र में सिद्धालयरूप मोक्षपुरी में पहुँचे। आज भी वे सर्वज्ञ परमात्मा वहाँ शुद्ध स्वरूप अस्तित्व में विराज रहे हैं......... उन्हें नमस्कार हो।

इसी विधि से सब कर्मों को, हनकर वे सर्वज्ञ बने।

इस विधि दे उपदेश बने वे सिद्ध, करूँ मैं नमन उन्हें।

श्रमण जिन अरु तीर्थंकरों ने, इसी मार्ग का कर सेवन।

सिद्धि प्राप्त की नमूँ उनको, अरु उनके निवृत्ति पथ को मैं।।

पावापुरी में वीरप्रभु निर्वाण को प्राप्त हुए और कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की अँधेरी रात भी मोक्षकल्याणक के दिव्य प्रकाश में जगमगा उठी... लाखों भक्तों ने करोड़ों दीपकों की आवलियाँ सजाकर प्रभु के मोक्षकल्याणक का उत्सव मनाया; इसलिए कार्तिक कृष्णा अमावस्या दीपावली पर्व के रूप में प्रसिद्ध हुई... जो आज भी भारत में प्रसिद्ध है। जब उस निर्वाण-महोत्सव को २५०० वर्ष पूरे हुए तब (ई.स. १९७४ में) समग्र भारत में अति भव्य उत्सव मनाया गया था। भगवान महावीर तो निर्वाण को प्राप्त हुए, सिद्ध हुए... अहो! उन सिद्ध भगवन्तों का अतीन्द्रिय ज्ञान! इस महापुराण द्वारा मैं उस परमइष्ट पद का गुणगान करता हूँ और मेरा आत्मस्वभाव भी ऐसा ही है - उसे स्वीकार करके मैं भी प्रभु के मार्ग पर चलता हूँ और इष्ट प्राप्त करता हूँ।

नमन करता उन जिनेश्वर देव को,

धर्मचक्र चला गये शिव गेह जो।

गये पावापुरी से निर्वाण को,

सन्त-मुनि-गणधर नमें कल्याण हो।।

वीर प्रभु पंचमगति को प्राप्त करके सिद्ध हुए, मुक्त हुए; वह तो आनन्द का प्रसंग है, शोक का नहीं।

किसी के मन में प्रश्न उठ सकता है कि अरे! निर्वाण होने पर तो भगवान का विरह हुआ, फिर उसका उत्सव क्यों? 

समाधान - अरे भाई! तुम बाह्य वस्तुओं से देखते हो, इसलिए तुम्हें ऐसा लगता है कि भगवान का विरह हुआ! जो इन्द्रियज्ञान द्वारा ‘शरीर युक्त महावीर’ को ही देखते थे, उन्हें उस शरीरवान महावीर का विरह हुआ; परन्तु जो शरीर से भिन्न महावीर के सच्चे स्वरूप को अर्थात ‘सर्वज्ञ-महावीर’ को अंतर्दृष्टि से - अतीन्द्रिय चक्षु से पहचानते हैं, उन्हें तो उन सर्वज्ञ परमात्मा का कभी विरह नहीं है; उनके लिये तो वे भगवान लोकाग्र में सिद्ध रूप में साक्षात् विराजमान हैं। पावापुरी में २५०० वर्ष पूर्व जो ‘सर्वज्ञ परमात्मा’ विराजते थे, वे ही वर्तमान में सिद्धपुरी में विराज रहे हैं। साधक के ज्ञान में उन सिद्ध भगवंत का स्वरूप उत्कीर्ण हो गया है, उसे सर्वज्ञ महावीर का विरह नहीं है... नहीं है...; सर्वथा अतीन्द्रिय ऐसे उन परमात्मा को अपनी ही आत्मा में स्थापित करके वह अपनी आत्मा को सिद्ध की साधना में लगाता है... और ऐसी साधना का उत्साह ही निर्वाण का महोत्सव... आत्महित का ऐसा मंगल-महोत्सव है। इसे कौन नहीं मनायेगा?

देखो न! वीर प्रभु के निर्वाण के समय गौतमस्वामी कहीं प्रभुविरह का विलाप करने नहीं बैठे थे; किन्तु चैतन्य की अनुभूति में अधिक गहरे उतरकर मोक्ष की साधना में मग्न हो गये थे। ३० वर्ष तक जिनके सतत सान्निध्य में रहा - ऐसे मेरे प्रभु निर्वाण को प्राप्त हुए और मैं अभी छद्मस्थ ही रहा?... अब आज ही साधना पूर्ण करूंगा -इस प्रकार उत्कृष्टरूप से आत्मा की आराधना में लीन होकर उसी दिन केवलज्ञान प्रगट किया और सर्वज्ञ परमात्मा हुए!

पूर्ण वीतराग होकर उन्होंने सर्वोत्कृष्ट रूप से प्रभु का निर्वाण महोत्सव मनाया। उनके शिष्य सुधर्मस्वामी उसी दिन श्रुतकेवली बने। अहा! नमस्कार हो उन श्रुतकेवली भगवन्तों को।

पश्चात् तीर्थकर प्रभु की वह कुल परम्परा चलते-चलते श्री गुरुओं द्वारा हम तक आयी है। हम भी उसी कुल-परम्परा में हैं। कृतार्थ हो गये हम सब महावीर के मार्ग को पाकर। अपने तीर्थकर भगवन्तों के मार्ग की उपासना करके हम सब अपना कल्याण करें और अपने उन भगवन्तों के सिद्धालय में पहुँचकर सदैव उनके साथ रहें... ऐसी मंगल भावना के साथ यह महावीर पुराण समाप्त करता हूँ।

इस प्रकार भरतक्षेत्र के अन्तिम तीर्थकर एवं वर्तमान शासन नायक सर्वज्ञ भगवान महावीर तीर्थकर का मंगल जीवन चरित्र पूर्ण हुआ।

अनन्त तीर्थकर हुए, जग के तारनहार।

सिद्ध दशा को साधकर, पहुँचे भवदधि पार।।

शासन वीर जिनेन्द्र का, अक्षयपद दातार।

सेवन कर समकित लहो, जो चाहो भवपार।।

अपने चौबीस तीर्थकर भगवन्तों के मंगल जीवन का यह ‘महापुराण’ सुन कर हे भव्य जीवों! तुम भीं जिनमार्ग की भक्ति जागृत करो, रत्नत्रय की प्राप्ति करो और निज आत्मा को मोक्षसुख में स्थापित करो।

॥ जय महावीर ॥

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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