भगवान महावीर स्वामी (63)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (63)

इस प्रकार सर्वज्ञ महावीर को देखते ही आत्मशक्ति की प्रतीति करके अनेक जीव परमात्मा बन गये। प्रभु ने दिव्य ध्वनि द्वारा ‘प्रत्येक जीव में परमेश्वरत्व’ की प्रतिष्ठा की। अहा! प्रत्येक आत्मा परमात्म वैभव से परिपूर्ण है और वह स्वाधीन रूप से परमात्मा हो सकता है। - ऐसा गूढ़ रहस्य परमेश्वर के अतिरिक्त कौन बता सकता है? और उसे झेलने वाले कोई साधारण जीव नहीं, अपितु ‘जिनेश्वर के नन्दन’ होते हैं, मोक्षमार्ग के पथिक होते हैं।

हे वीर! आपका मार्ग वीरों का मार्ग है; वीतरागता का मार्ग है। वीतरागता में निहित सच्ची वीरता को आपके भक्तों के सिवा और कौन समझेगा?

लोग कहते हैं कि आकाश में पुष्प नहीं होते; परन्तु ऐसा कहने वालों ने प्रभु के श्रीविहार को नहीं देखा। आकाशगामी प्रभु जहाँ भी विचरते हैं, वहाँ उनके चरणों के नीचे 225 अद्भुत कमलों की रचना हो जाती है। मानो आकाश में पुष्पवाटिका खिली हो! और प्रभु के प्रताप से भव्यजीवों के चैतन्याकाश में भी रत्नत्रय के पुष्प खिल उठते हैं।

एक ओर वीतरागी सर्वज्ञता द्वारा चैतन्य की सर्वोत्तम सुन्दरता, तथा दूसरी ओर परम औदारिककता द्वारा शरीर-पुद्गलों की सर्वोत्तम सुन्दरता! वाह! चेतन और जड़ दोनों के सौन्दर्य की पराकाष्ठा! -  ऐसी सुन्दरता सर्वज्ञ प्रभु के सिवा अन्यत्र कहाँ होगी!

रे शरीर! तूने भले प्रभु के सान्निध्य में सर्वोच्च सौन्दर्य धारण कर लिया; परन्तु तुझे यह खबर नहीं है कि प्रभु की सर्वज्ञता का चैतन्य सौन्दर्य तो अनन्तकाल तक ज्यों का त्यों बना रहेगा, जबकि तेरा सौन्दर्य तो क्षणभंगुर है। प्रभु तुझे छोड़कर मोक्ष जायें - बस! इतनी ही देर है।

यह सुनकर शरीर मानो हँस कर कहता है - अरे भाई! इन सर्वज्ञ-परमात्मा का क्षणभर का सान्निध्य भी पुण्य से प्राप्त होता है। इनका एक क्षणभर के सहवास का भी कितना महान फलदायी है,...वह क्या तुम नहीं जानते?

लाखों धर्मात्मा जीवों का परिवार वीर प्रभु के संघ में मोक्ष की साधना कर रहा था। 700 केवलज्ञानी अरिहंत भगवान वहाँ धर्मसभा में विराजते थे, जो गुणों में प्रभु के समकक्ष थे। तदुपरान्त ऋद्धिधारी 14,000 मुनिगण थे; चन्दना सहित 36,000 आर्यिकाएँ थीं; आत्मज्ञान सहित देशव्रतधारी एक लाख श्रावक एवं तीन लाख श्राविकाएँ थीं। देव और तिर्यंच भी प्रभु की वाणी सुनते और सम्यक्त्वादि धर्म प्राप्त करते थे। वहाँ हर ओर धर्म का साम्राज्य था। उस धर्म-साम्राज्य के नायक थे धर्मराजा भगवान महावीर। 

आज हम भी उसी महावीर-साम्राज्य के उत्तराधिकारी हैं और प्रभु के मार्ग की साधना करते हुए उस पथ पर चल रहे हैं... धन्य है यह धर्म-साम्राज्य... धन्य हमारे धर्मराज! और धन्य यह धर्मपालक प्रजा! महावीर हमारे हैं, हम महावीर के हैं।

तीस वर्ष तक धर्मचक्र सहित विहार करते-करते अन्तिम दिनों में प्रभु महावीर बिहार प्रान्त की पावापुरी में पहुँचे; वहाँ का सुन्दर उद्यान खिल उठा। भव्यजीवों का चैतन्य-उद्यान भी सम्यक्त्व आदि धर्म पुष्पों से आच्छादित हो गया। कार्तिक कृष्ण द्वादशी के दिन प्रभु की अन्तिम देशना हुई। (उस अन्तिम देशना के स्थान पर वहाँ एक प्राचीन जिनमन्दिर है और उसमें तीर्थंकर प्रभु के चरणों की स्थापना है। निर्वाण भूमि के स्थान पर आज ‘पद्म-सरोवर’ है, उसके प्रवेश द्वार के सामने के भाग में अन्तिम देशना-भूमि के स्थान का होना दिगम्बर जैन-परम्परा में माना जाता है।)

प्रभु महावीर ने विपुलाचल पर प्रथम देशना में जो परमात्म तत्व दर्शाया था, वही परमात्मतत्व अन्तिम देशना में पावापुरी में बताया। प्रभु की वाणी द्वारा परमशान्त चैतन्यरस का पान करके लाखों-करोड़ों जीव तृप्त हुए। गणधर गौतमदेव भी उत्कृष्टता से वीतराग रस का पान करके केवलज्ञान प्राप्त करने को तत्पर हैं। 

अहो! तीर्थंकर प्रभु ने सिद्धत्व की तैयारी की तो गणधर देव ने भी अरिहंत पद की तैयारी की... तथा प्रतिगणधरदेव (सुधर्म स्वामी) श्रुतकेवली होने को तैयार हैं। 

धन्य भगवन्! आपने पंचमकाल में भी धर्म की अखण्डधारा प्रवाहित रखी।


क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

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