आचार्य वंदना
आचार्य वंदना
(प्रवचन से पहले प्राकृत भाषा में की जाने वाली आचार्य/सिद्ध/श्रुत भक्ति का अर्थ - प्रातःकालीन की जाए, तो पौर्वाह्णिक और दोपहर के बाद सायंकालीन की जाए, तो अपराह्णिक कहा जाता है।)
सिद्ध भक्ति
नमोऽस्तु पौर्वाह्णिक (अपराह्णिक) आचार्य-वंदना-क्रियायां पूर्वाचार्यनुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वंदना-स्तव-समेतं श्री सिद्धभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम्।
शब्दार्थ : हे आचार्य देव! (नमोऽस्तु) नमस्कार हो (पौर्वाह्णिक) प्रातःकालीन (अपराह्णिक) सायंकालीन (आचार्य-वंदना-क्रियायां) आचार्य वंदना की क्रिया में (पूर्वाचार्यनुक्रमेण) पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार (सकल-कर्म-क्षयार्थं) सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए (भावपूजा-वंदना- स्तव-समेत) भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित (श्री सिद्धभक्ति-कायोत्सर्गं) श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्ग को (अहम्) मैं (करोम्यहम्) करता हूँ।
अर्थ- हे आचार्य देव! नमस्कार हो प्रातःकालीन/ सायंकालीन आचार्य वंदना की क्रिया में पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए भावपूजा, वंदना, स्तवन सहित श्री सिद्ध भक्ति के कायोत्सर्ग को मैं करता हूँ।
(9 बार णमोकार)
सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरिय-सुहुमं तहेव अवगहणं ।
अगुरुलहु-मव्वावाहं, अट्ठगुणा होंति सिद्धाणं ॥1॥
शब्दार्थ : (सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरिय-सुहुमं) क्षायिक सम्यक्त्व, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्मत्व (अवगहणं) अवगाहनत्व (अगुरुलहुं) अगुरुलघु (तहा) और (अव्वावाहं) अव्याबाध सुख; ये (अट्ठगुणा) आठ गुण (एव) नियम से (सिद्धाणं) सिद्धों के (होंति) होते हैं।
अर्थ- क्षायिक सम्यक्त्व, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, सूक्ष्मत्व, अवगाहनत्व, अगुरुलघु और अव्याबाध सुख; ये आठ गुण नियम से सिद्धों के होते हैं।
तव-सिद्धे णय-सिद्धे, संजम-सिद्धे चरित्त-सिद्धे य।
णाणम्मि दंसणम्मि य, सिद्धे सिरसा णमंसामि॥2॥
शब्दार्थ : (तव-सिद्धे) तप की प्रधानता से सिद्ध (णय-सिद्धे) नय की प्रधानता से सिद्ध (संजम-सिद्धे) संयम की प्रधानता से सिद्ध (चरित्त-सिद्धे) चारित्र की प्रधानता से सिद्ध (णाणम्मि) ज्ञान की प्रधानता में (य) और (दंसणम्मि) दर्शन की प्रधानता में सिद्ध ऐसे (सिद्धे) सभी सिद्धों को (सिरसा) मस्तक से (णमंसामि) मैं नमस्कार करता हूँ।
अर्थ- तप की प्रधानता से सिद्ध, नय की प्रधानता से सिद्ध, संयम की प्रधानता से सिद्ध, चारित्र की प्रधानता से सिद्ध, ज्ञान की प्रधानता में और दर्शन की प्रधानता में सिद्ध; ऐसे सभी सिद्धों को मस्तक से मैं नमस्कार करता हूँ।
इच्छामि भंते। सिद्ध-भत्ति-काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउंसम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचरित्त-जुत्ताणं अट्ठविह-कम्म-विप्पमुक्काणं अट्ठगुण-संपण्णाणं उड्ढलोय-मत्थयम्मि पइट्ठिठयाणं तव-सिद्धाणं, णय-सिद्धाणं, संजम-सिद्धाणं, चरित्त-सिद्धाणं अतीदा-णागद-वट्ठमाण-कालत्तय-सिद्धाणं सव्वसिद्धाणं सया णिच्चकालं अंचेमि पुज्जेमि वंदामि, णमंस्सामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइ-गमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं।
शब्दार्थ : (भंते!) हे भगवन् ! (सिद्ध-भत्ति-काउस्सग्गो कओ) मैंने जो सिद्धभक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया (तस्स) उसके दोषों की (आलोचेउं) आलोचना करने की (इच्छामि) इच्छा करता हूँ (सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्माचरित्त-जुत्ताणं) जो सिद्ध भगवान् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र से युक्त (अट्ठविह-कम्म-विप्प-मुक्काणं) आठों प्रकार के कर्मों से सर्वथा रहित (अट्ठगुण- संपण्णाणं) सम्यक्त्वादि आठ गुणों से सम्पन्न/सहित (उड्ढलोय-मत्थयम्मि) ऊर्ध्वलोक के मस्तक पर (पइट्ठियाणं) स्वभाव में विराजमान (तव-सिद्धाणं) तप की अपेक्षा से सिद्ध (णय-सिद्धाणं) नयों की अपेक्षा से सिद्ध (संजम-सिद्धाणं) संयम की अपेक्षा से सिद्ध (चरित्त-सिद्धाणं) चारित्र की अपेक्षा से सिद्ध (अतीदा-णागद-वट्ठमाण-कालत्तय-सिद्धाणं) भूत भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों कालों में सिद्ध (सव्वसिद्धाणं) सभी सिद्धों की मैं (सया) हमेशा (णिच्च-कालं) नियमित/निश्चित काल (अंचेमि) अर्चना करता हूँ (पुज्जेमि) पूजा करता हूँ (वंदामि) वंदना करता हूँ (णमंस्सामि) नमस्कार करता हूँ (दुक्खक्खओ) दुःखों का नाश (कम्मक्खओ) चारित्र (बोहिलाहो) बोधि/रत्नत्रय की प्राप्ति (सुगइ-गमणं) श्रेष्ठ गति में गमन (समाहिमरणं) समाधिमरण और (जिणगुण-संपत्ति) जिनेन्द्र भगवान् के गुणों की प्राप्ति (मज्झं) मुझे (होउ) हो।
अर्थ- हे भगवन्! मैंने जो सिद्धभक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया उसके दोषों की) आलोचना करने की इच्छा करता हूँ, जो सिद्ध भगवान् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र से युक्त, आठों प्रकार के कर्मों से सर्वथा रहित सम्यक्त्वादि आठ गुणों से सम्पन्न/सहित, ऊर्ध्वलोक के मस्तक पर स्वभाव में विराजमान तप की अपेक्षा से सिद्ध, नयों की अपेक्षा से सिद्ध, संयम की अपेक्षा से सिद्ध, चारित्र की अपेक्षा से सिद्ध, भूत भविष्यत् और वर्तमान इन तीनों कालों में सिद्ध; ऐसे सभी सिद्धों की मैं हमेशा नियमित/निश्चित काल अर्चना करता हूँ, पूजा करता हूँ, वंदना करता हूँ, नमस्कार करता हूँ, दुःखों का नाश, कर्मों का क्षय, बोधि/रत्नत्रय की प्राप्ति, श्रेष्ठ गति में गमन, समाधिमरण और जिनेन्द्र भगवान् के गुणों की प्राप्ति मुझे हो।
श्रुत भक्ति
नमोऽस्तु पौर्वाह्णिक (अपराह्णिक) आचार्य-वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्री श्रुतभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम्।
शब्दार्थ : हे आचार्य देव! (नमोऽस्तु) नमस्कार हो (पौर्वाह्णिक) प्रातः कालीन (अपराह्णिक) सायंकालीन (आचार्य-वन्दना-क्रियायां) आचार्य वन्दना की क्रिया में (पूर्वाचार्यानुक्रमेण) पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार (सकल-कर्म-क्षयार्थ) सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए (भावपूजा-वन्दना-स्तव-समेतं) भावपूजा, वन्दना, स्तवन सहित (श्री श्रुतभक्ति-कायोत्सर्गं) श्री श्रुतभक्ति के कायोत्सर्ग को (अहम्) मैं (करोमि) करता हूँ।
अर्थ- हे आचार्य देव! नमस्कार हो प्रातः कालीन/सायंकालीन आचार्य वन्दना की क्रिया में पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए भावपूजा, वन्दना, स्तवन सहित श्री श्रुतभक्ति के कायोत्सर्ग को मैं करता हूँ।
(9 बार णमोकार)
कोटिशतं द्वादश चैव कोट्यो, लक्षाण्य-शीतिस्त्र्यधिकानि चैव। पञ्चाश-दष्टौ च सहस्र-संख्य-, मेतच्छ्रुतं पञ्च-पदं नमामि॥1॥
शब्दार्थ : (कोटिशतं) सौ करोड़ (च) और (द्वादश कोट्यः एव) बारह करोड़ अर्थात् एक सौ बारह करोड़ (त्र्यधिकानि अशीतिः लक्षानि एव) तीन अधिक अस्सी लाख अर्थात् तिरासी लाख (अष्टौ पंचाशत्) आठ और पचास/अट्ठावन (सहस्त्र संख्यम्) हजार संख्या वाले (च) और (पंच-पदम्) पाँच पद प्रमाण (एतत्) इस (श्रुतम्) श्रुत को (नमामि) मैं नमस्कार करता हूँ।
अर्थ- सौ करोड़ और बारह करोड़ अर्थात् एक सौ बारह करोड़, तीन अधिक अस्सी लाख अर्थात् तिरासी लाख आठ और पचास/अट्ठावन हजार संख्या वाले और पाँच पद प्रमाण इस श्रुत को मैं नमस्कार करता हूँ।
अरहंत-भासियत्थं गणहर देवेहिं गंथियं सम्मं
पणमामि भत्ति-जुत्तो, सुद-णाण-महोवहिं सिरसा ॥2॥
शब्दार्थ : (अरहंत-भासियत्थं) अरहंत देव द्वारा कहे गये अर्थ/भावरूप और (गणहर देवेहिं) गणधरदेव द्वारा (सम्मं गंथियं) अच्छी तरह से गूँथे/रचे गये ग्रन्थ/द्रव्यरूप (सुद-णाणमहोवहिं) श्रुतज्ञानरूपी महासागर को (भत्ति-जुत्तो) भक्तिपूर्वक (सिरसा) मस्तक से (पणमामि) मैं प्रणाम करता हूँ।
अर्थ- अरहंत देव द्वारा कहे गये अर्थ/भावरूप और गणधरदेव द्वारा अच्छी तरह से गूँथे/रचे गये ग्रन्थ/द्रव्यरूप श्रुतज्ञानरूपी महासागर को भक्तिपूर्वक मस्तक से मैं प्रणाम करता हूँ।
इच्छामि भंत्ते! सुदभत्ति काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं अंगोवंग- पइण्णय पाहुडय परियम्म सुत्त-पढमाणिओग-पुव्वगय चूलिया चेव- सुत्तत्थय थुइ धम्म-कहाइयं सया णिच्व-कालं अंचेमि पुज्जेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगई-गमणं समाहि-मरणं जिणगुण संपत्ति होउ मज्झं ।
शब्दार्थ : (भंते!) हे भगवन्! (सुद-भत्ति-काउस्सग्गो कओ) मैंने जो श्रुतभक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया (तस्स) उसके दोषों की (आलोचेउं) आलोचना करने की (इच्छामि ) इच्छा करता हूँ (अंगोवंग पइण्णय पाहुडय-परियम्मसुत्तं पढमाणियोग-पुव्वगय चूलिया) श्रुतज्ञान के जो बारह अंग अनेक उपांग, प्रकीर्णक, प्राभृत, परिकर्मसूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत चूलिकाएँ (च) और (सुत्तत्थय -थुइ-धम्मकहाइयं) सूत्रों के अर्थ वाले स्तुतियाँ और धर्मकथा आदि रूप (सुदं) श्रुत है उनकी मैं (सया) हमेशा (णिच्चकालं) नियमित/निश्चित काल (अंचेमि) अर्चना करता हूँ (पुज्जेमि) पूजा करता हूँ (वंदामि) वंदना करता हूँ (णमंसामि) नमस्कार करता हूँ (दुक्खक्खओ) दुःखों का नाश (कम्मक्खओ) कर्मों का क्षय (बोहिलाहो) बोधि/रत्नत्रय की प्राप्ति (सुगइ-गमणं) श्रेष्ठगति में गमन (समाहि मरणं) समाधिमरण और (जिणगुण-संपत्ति) जिनेन्द्र भगवान् के गुणों की प्राप्ति (मज्झं) मुझे (होउ) हो।
अर्थ- हे भगवन्! मैंने जो श्रुतभक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया, उसके दोषों की आलोचना करने की इच्छा करता हूँ। श्रुतज्ञान के जो बारह अंग अनेक उपांग, प्रकीर्णक, प्राभृत, परिकर्मसूत्र, प्रथमानुयोग, पूर्वगत चूलिकाएँ और सूत्रों के अर्थ वाले स्तुतियाँ और धर्मकथा आदि रूप श्रुत है उनकी मैं हमेशा नियमित/निश्चित काल अर्चना करता हूँ, पूजा करता हूँ, वंदना करता हूँ, नमस्कार करता हूँ। दुःखों का नाश, कर्मों का क्षय, बोधि/रत्नत्रय की प्राप्ति, श्रेष्ठगति में गमन, समाधिमरण और जिनेन्द्र भगवान् के गुणों की प्राप्ति मुझे हो।
आचार्य भक्ति
नमोऽस्तु पौर्वाह्णिक (अपराह्णिक) आचार्य-वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण सकलकर्मक्षयार्थं भाव-पूजा-वन्दना-स्तव-समेतं श्री आचार्यभक्तिकायोत्सर्गं करोम्यहम्।
शब्दार्थ : हे आचार्य देव! (नमोऽस्तु) नमस्कार हो (पौर्वाह्णिक) प्रातःकालीन (अपराह्णिक) सायंकालीन (आचार्य-वन्दना-क्रियायां) आचार्य वन्दना की क्रिया में (पूर्वाचार्यानुक्रमेण) पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार (सकल-कर्म-क्षयार्थं) सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए (भावपूजा-वन्दना-स्तव-समेतं) भावपूजा, वन्दना स्तवन सहित (श्री आचार्यभक्ति-कायोत्सर्ग) श्री आचार्यभक्ति के कायोत्सर्ग को (अहम्) मैं (करोमि) करता हूँ।
अर्थ- हे आचार्य देव! नमस्कार हो। प्रातःकालीन/सायंकालीन आचार्य वन्दना की क्रिया में पूर्व आचार्यों के क्रम के अनुसार सम्पूर्ण कर्मों का नाश करने के लिए भावपूजा, वन्दना स्तवन सहित श्री आचार्यभक्ति के कायोत्सर्ग को मैं करता हूँ।
(9 बार णमोकार)
श्रुतजलधि-पारगेभ्यः, स्व-पर-मत-विभावना-पटुमतिभ्यः।
सुचरित-तपोनिधिभ्यो, नमो गुरुभ्यो गुण-गुरुभ्यः ॥1॥
शब्दार्थ : जो (श्रुतजलधि-पारगेभ्यः) श्रुतज्ञानरूपी समुद्र के पारगामी (स्व-पर-मत -विभावना -पटुमतिभ्यः) स्वमत और परमत के विशेष विचार करने में कुशल (सुचरित-तपोनिधिभ्यो) सम्यक्चारित्र और तप के खजाने (गुण-गुरुभ्यः) गुणों में महान् ऐसे (गुरुभ्यो नमः) गुरुओं के लिए नमस्कार हो।
अर्थ- जो श्रुतज्ञानरूपी समुद्र के पारगामी स्वमत और परमत के विशेष विचार करने में कुशल सम्यक्चारित्र और तप के खजाने गुणों में महान् ऐसे गुरुओं के लिए नमस्कार हो।
छत्तीस-गुण-समग्गे, पंच-विहाचार-करण-संदरिसे।
सिस्साणुग्गह-कुसले, धम्माइरिये सदा वंदे ॥2॥
शब्दार्थः जो (छत्तीस-गुण-समग्गे) छत्तीस गुणों से परिपूर्ण (पंच-विहाचार-करण-संदरिसे) पाँच प्रकार के आचार और क्रियाओं के पालक/संदर्शक/उपदेशक (सिस्साणुग्गह-कुसले) शिष्यों के उपकार करने में चतुर ऐसे (धम्मा इरियं) धर्माचार्य की मैं (सदा) सदा (वंदे) वंदना करता हूँ।
अर्थ- जो छत्तीस गुणों से परिपूर्ण पाँच प्रकार के आचार और क्रियाओं के पालक/संदर्शक/ उपदेशक, शिष्यों के उपकार करने में चतुर; ऐसे धर्माचार्य की मैं सदा वंदना करता हूँ।
गुरु-भत्ति-संजमेण य, तरन्ति संसार-सायरं घोरं ।
छिण्णंति अट्ठकम्मं, जम्मण-मरणं ण पावेंति ॥3॥
शब्दार्थ : (गुरु-भत्ति संजमेण) गुरुभक्ति में मन की एकाग्रता से (घोरं) भयंकर (संसार सायरं) संसार रूपी सागर को (तरन्ति) तैरते हैं (अट्ठकम्मं) आठ कर्मों को (छिण्णंति) छेदते हैं (च) और ( जम्मण-मरणं) जन्म-मरण को (ण पावंति) नहीं पाते।
अर्थ- गुरुभक्ति में मन की एकाग्रता से भयंकर संसाररूपी सागर को तैरते हैं, आठ कर्मों को छेदते हैं और जन्म-मरण को नहीं पाते।
ये नित्यं व्रत-मंत्र-होम-निरता, ध्यानाग्नि-होत्राकुलाः।
षट्कर्माभिरतास्तपोधन-धनाः, साधु-क्रियाः साधवः ॥4॥
शब्दार्थ : (ये) जो (नित्यं) प्रतिदिन (व्रत-मंत्र-होम-निरताः) व्रतरूपी मंत्र वाले हवन में लीन (ध्यानाग्नि होत्राकुलाः) ध्यानरूपी अग्नि में कर्मरूपी हव्य/साकल्य से व्याप्त अर्थात् ध्यानरूपी अग्नि में यज्ञ करने वाले (षट्कर्माभिरताः) सामायिक आदि छः आवश्यक कर्मों में लीन (तपोधन -धनाः) तपरूप धन वाले (साधु-क्रियाः) साधुओं की क्रियाओं को करने वाले (साधवः) साधुगण आचार्य परमेष्ठी होते हैं।
अर्थ- जो प्रतिदिन व्रतरूपी मंत्र वाले हवन में लीन ध्यानरूपी अग्नि में कर्मरूपी हव्य/साकल्य से व्याप्त अर्थात् ध्यानरूपी अग्नि में यज्ञ करने वाले सामायिक आदि छः आवश्यक कर्मों में लीन तपरूप धन वाले साधुओं की क्रियाओं को करने वाले साधुगण आचार्य परमेष्ठी होते हैं ।
शील-प्रावरणा गुण-प्रहरणाश् चन्द्रार्क तेजोऽधिकाः।
मोक्ष द्वार-कपाट-पाटन भटाः, प्रीणंतु मां साधवः ॥5॥
शब्दार्थ : (शील-प्रावरणाः) अठारह हजार शीलरूपी वस्त्रों के धारक (गुण-प्रहरणाः) चौरासी लाख उत्तरगुण रूपी अस्त्र शस्त्र वाले (चन्द्रार्क-तेजोऽधिकाः) चन्द्र और सूर्य से भी अधिक तेज वाले (मोक्षद्वार-कपाट-पाटन-भटाः) मोक्षरूपी महल के द्वारों के दरवाजों को खोलने में सुभट योद्धा; ऐसे (साधवः) साधु/साधक आचार्य परमेष्ठी (मां) मुझको (प्रीणंतु) प्रसन्न/संतुष्ट करें।
अर्थ- अठारह हजार शीलरूपी वस्त्रों के धारक, चौरासी लाख उत्तरगुणरूपी अस्त्र शस्त्र वाले, चन्द्र और सूर्य से भी अधिक तेज वाले, मोक्षरूपी महल के द्वारों के दरवाजों को खोलने में सुभट योद्धा; ऐसे साधु/साधक आचार्य परमेष्ठी मुझको प्रसन्न/संतुष्ट करें ।
गुरवः पांतु नो नित्यं ज्ञान-दर्शन - नायकाः।
चारित्रार्णव - गम्भीरा मोक्ष - मार्गोपदेशकः ॥6॥
शब्दार्थ : जो (ज्ञान-दर्शन-नायकाः) ज्ञान और दर्शन के स्वामी (चारित्रार्णव-गम्भीरा) चरित्र में सागर के समान गम्भीर और (मोक्ष-मार्गोपदेशकः) मोक्षमार्ग का उपदेश देने वाले ऐसे (गुरवः) दीक्षा दायक गुरु आचार्यदेव (नः) हमारी (नित्यं) हमेशा (पान्तु) रक्षा करें।
अर्थ- जो ज्ञान और दर्शन के स्वामी, चरित्र में सागर के समान गम्भीर और मोक्षमार्ग का उपदेश देने वाले; ऐसे दीक्षा दायक गुरु आचार्यदेव हमारी हमेशा रक्षा करें।
इच्छामि भंते! आइरियभत्तिकाउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं सम्मणाण-सम्मंदसण-सम्मचरित्त-जुत्ताणं पंचविहाचाराणं आयारादि-सुद-णाणोवदेस ति-रयण-गुण-पालण-रयाणं सव्वाइरियाणं सया णिच्च-कालं अंचेमि पुज्जेमि वंदामि णमंसामि दुक्खक्खओ कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइ-गमणं-समाहि मरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं।
शब्दार्थ : (भंते!) हे भगवन्! (आइरियभत्तिकाउस्सग्गो कओ) मैंने जो आचार्यभक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया (तस्स) उसके दोषों की (आलोचेउं) आलोचना करने की (इच्छामि) इच्छा करता हूँ (सम्मणाण-सम्मंदसण-सम्मचरित्त-जुत्ताणं) सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र से युक्त (पंचविहाचाराणं) पाँच प्रकार के आचारों वाले (आयारादि-सुद-णाणोवदेसयाणं) आचारांग आदि श्रुतज्ञान का उपदेश देने वाले (ति-रयण-गुण-पालण-रयाणं) रत्नत्रयरूप गुणों के पालन करने में लीन (सव्वाइरियाणं) सभी आचार्यों की मैं (सया) हमेशा (णिच्च-कालं) नियमित/निश्चित काल (अंचेमि) अर्चना करता हूँ (पुज्जेमि) पूजा करता हूँ (वंदामि) वंदना करता हूँ (णमंसामि) नमस्कार करता हूँ (दुक्खक्खओ) दुःखों का नाश (कम्मक्खओ) कर्मों का क्षय (बोहिलाहो) बोधि/रत्नत्रय की प्राप्ति (सुगइ-गमणं) श्रेष्ठगति में गमन (समाहि मरणं) समाधिमरण और (जिणगुण-संपत्ति) जिनेन्द्र भगवान् के गुणों की प्राप्ति (मज्झं) मुझे (होउ) हो।
अर्थ- हे भगवन्! मैंने जो आचार्यभक्ति सम्बन्धी कायोत्सर्ग किया, उसके दोषों की आलोचना करने की इच्छा करता हूँ, सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र से युक्त पाँच प्रकार के आचारों वाले, आचारांग आदि श्रुतज्ञान का उपदेश देने वाले, रत्नत्रयरूप गुणों के पालन करने में लीन सभी आचार्यों की मैं हमेशा नियमित/निश्चित काल अर्चना करता हूँ, पूजा करता हूँ, वंदना करता हूँ, नमस्कार करता हूँ। दुःखों का नाश, कर्मों का क्षय, बोधि/रत्नत्रय की प्राप्ति, श्रेष्ठगति में गमन, समाधिमरण और जिनेन्द्र भगवान् के गुणों की प्राप्ति मुझे हो।
(सुबह 18 बार, संध्या 36 बार णमोकार मंत्र का जाप करें।)
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
विनम्र निवेदन
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