‘उत्तम सत्य’ पर आधारित लघु नाटिका
‘उत्तम सत्य’ पर आधारित लघु नाटिका
पात्र-एक गेहूँ का व्यापारी, पत्नी,एक पुत्र - सागर उम्र- 13-14 वर्ष, एक पुत्री- उपासना 13-14 वर्ष, (दोनों जुड़वां हैं),पुत्र के तीन मित्र, एक अध्यापक, एक साहूकार, उसके दो नौकर, एक पड़ोसिन, दो व्यापारी
कहानी की रूपरेखा
गेहूँ का व्यापारी अपने पुत्र को पढ़ा-लिखा कर बैरिस्टर बनाना चाहता है और पुत्री को केवल घर के काम सीखने में लगाए रखता है..... तुमने अपने भाई के लिए नहाने का गर्म पानी भी नहीं रखा, उसके कपड़े भी नहीं निकाले। इसे विद्यालय में जाने में देर हो जाएगी.... आदि आदि
पत्नी को भी झिड़कता रहता है कि मेरे बेटे के लिए हलुआ बना दो। देखो! यह कितनी मेहनत करता है। पढ़ाई करना आसान नहीं है। लड़की को हलुआ खाने नहीं देता... तू क्या करेगी हलवा खाकर। मोटी हो जाएगी, तो कोई ब्याह भी नहीं करेगा। जा! कुएँ से पानी भर कर ला।
पिता भाई को पढ़ाने बिठाते हैं और उसे 8 का पहाड़ा सिखाते हैं। बोलो... आठ एकम आठ... बेटा दोहराता है। आठ दूनी सोलह... बेटा फिर दोहराता है। आठ तिया चौबीस... बेटा फिर दोहराता है। उसकी बहिन भी पास बैठी सुन रही होती है और कपड़े पर तुरपाई कर रही होती है।
चलो सुनाओ। आठ एकम ....।
बेटा बोलता है - आठ एकम.....अं अं अं....?
जल्दी बोलो...।
हाँ...... आठ एकम आठ।
आठ दूनी......।
आठ दूनी... अं अं अं....?
बोलो.......।
आठ दूनी...उं.....उं... आठ दूनी सोलह।
आठ तिया.......।
काफी देर तक वह उं.....उं... करता रहा, पर बताया नहीं।
तभी उसकी बेटी बोल पड़ी - आठ तिया चौबीस।
बाप उसी समय बेटी पर हाथ उठाता हुआ बोला - तुम्हें किसने कहा था बोलने को? तू यहाँ बैठी क्या कर रही है? चल, जाकर अपनी माँ के साथ खाना बना। भाई को पढ़ाने भी नहीं देती। पढ़ेगा नहीं तो बैरिस्टर कैसे बनेगा?
उसके दोनों बच्चे जुड़वां है। लड़के को उसके जन्मदिन पर सोने की माला देता है, नए कपड़े पहनाता है, तिलक लगाता है, मनपसन्द मिठाई खिलाता है। लड़की ने तो घर पर ही रहना है। वह क्या करेगी नए कपड़ों का? जबकि जन्मदिन तो उसका भी है। वह सूत की माला बना कर पहन लेती है, तो उसको डांटता है- बहुत शौक है न माला पहनने का! उसके गले से माला खींच कर तोड़ देता है।
लड़की मायूस हो जाती है। माँ उसे समझाती है कि कभी तो तेरे भी अच्छे दिन आएंगे। तू अपना ध्यान भगवान की भक्ति में लगा।
वह भगवान से पूछती है कि मैंने ऐसे क्या पाप किए थे, जो आपने मुझे लड़की बना कर भेजा?
एक बार वह मंदिर जा रही होती है, तो उसे पेड़ के पीछे कुछ लड़कों की आवाज़ें आती हैं। वह छिप कर देखती है कि वहाँ तो उसका भाई तीन लड़कों के साथ ताश के पत्ते बांट रहा है और जुआ खेल रहा है। लड़के पूछते हैं कि कुछ माल भी हाथ में है या नहीं।
उसकी चिंता न करो। मेरे पिताजी को मुझे बैरिस्टर बनाना है। उनसे पढ़ाई के नाम पर मैं पैसे मांगता रहता हूँ। वे मुझे कभी मना नहीं करते। पर मुझे तो बैरिस्टर का ‘ब’ भी पढ़ना नहीं आता। बस! कुछ पैसे अध्यापक जी को दे देता हूँ और वे मेरी हाजरी लगा देते हैं। स्कूल से तो बस इतना ही नाता है।
सब ठठा कर हंसने लगते हैं।
पर आज मेरे पास कम पैसे हैं....। वह सारे पैसे जुए में हार जाता है। तभी उसका दोस्त कहता है कि मैं साहूकार से कुछ पैसे उधार लेकर आया हूँ तेरे नाम पर। क्योंकि तेरे पिता तो गेहूँ के बहुत बड़े व्यापारी हैं न! एक सप्ताह में समय पर ब्याज सहित लौटा देना।
उपासना यह सब देखती है तो सोचती है कि मेरा भाई पिताजी को कितना बड़ा धोखा दे रहा है! यदि मैं पिताजी को सच बता दूँ, तो शायद भाई गलत काम करना छोड़ कर पढ़ाई में ध्यान देने लगे। पर क्या वे मेरी बात पर विश्वास करेंगे? उन्हें तो भाई की ही हर बात सच लगती है। मैं कहूँगी तो वे मुझे ही झूठा ठहराएंगे कि मैं अपने भाई से जलती हूँ।
फिर सोचती है कि जब बाद में पिताजी को पता चलेगा कि मुझे यह बात पता थी कि मेरा भाई स्कूल न जाकर जुआ खेलता है, तो मुझे बताई क्यों नहीं? तब भी वे मुझे ही डांटेंगे।
वह हिम्मत करके पिता को यह बात बताती है, तो पिता फिर उसे बुरा-भला कहता है कि तुझसे उसकी बढ़ोत्तरी देखी नहीं जाती न! इसीलिए उलटी-सीधी बातें बनाती है। तू अनपढ़, गंवार...। तू क्या जाने कि मैं उस पर कितना खर्च कर रहा हूँ, बैरिस्टर बनाने के लिए। तू तो अपने ब्याह में ही मेरा सारा धन बटोर कर ले जाएगी। बेटी का बाप होना तो अपने को कंगाल बनाना है। अभी आने दे सागर को, वही बताएगा कि सच क्या है?
तभी उसका भाई आ जाता है, सारे पैसे हार कर।
पिता बेटे से पूछता है कि तुम कहाँ से आ रहे हो?
‘पिताजी! स्कूल से आ रहा हूँ और क्या? देखते नहीं कितना थक गया हूँ।’
‘पर... उपासना तो कुछ और ही कह रही है।’
‘अरे पिताजी! यह तो मुझसे जलती है, तभी तो झूठ बोल कर आपके कान भरती रहती है। चाहे तो अध्यापक जी से पूछ लो।’
अध्यापक जी को बुलवाया, तो उन्होंने भी यही कहा कि बहुत मेहनती बच्चा है। सारा दिन आँख उठा कर भी नहीं देखता।
पिता बेटी को धमका कर, मारपीट कर घर से निकाल देता है। एक पड़ोसिन उसे अपने घर ले जाती है।
पिता ने अपने गेहूँ के बोरे बेचे और खूब मुनाफा कमाया। अहा! आज तो सारा माल बिक गया। गेहूँ का एक भी बोरा नहीं बचा। तभी भाग्य ने अपना रंग दिखाया। एक व्यापारी ने आकर उलाहना दिया - ‘ओ सेठ! कैसा माल भरा था उस बोरे में? सारे दाने सड़े हुए निकले।’
‘नहीं, सेठ जी! माल तो बिल्कुल फर्स्ट क्लास का था।
तभी दूसरे व्यापारी ने आकर कहा - ‘ओ सेठ! कैसा माल भरा था उस बोरे में? सारे दाने सड़े हुए निकले। यह लो अपना माल...। मुझे तो मेरे सारे पैसे लौटा दो। मैं कहीं और से खरीद लूँगा।’
पहले व्यापारी ने भी कहा - ‘हाँ! हाँ! मुझे भी मेरे सारे पैसे लौटा दो। मैं भी कहीं और से खरीद लूँगा।’
तभी पीछे से आवाजें आने लगती हैं - ‘हमारे भी सारे पैसे लौटा दो। हम भी कहीं और से खरीद लेंगे। यह पकड़ो अपना माल!’
सभी मिल कर उस व्यापारी को पीटने लगे। तभी उसकी बेटी वहाँ आती है कि मेरे पिताजी को क्यों पीट रहे हो? आपको अपने पैसे लेने हैं, तो ले जाओ, पर मेरे पिताजी को मत पीटो। इसमें इनका कोई दोष नहीं है।
वह पिता को संभालती है, लेकिन पिता अब भी उसका हाथ झटक देते हैं और उसे वहाँ से जाने को कहते हैं।
पिता सब के पैसे लौटा देते हैं। वे रोते हुए घर आते हैं कि मैं तो कंगाल हो गया। मेरी सारी पूंजी डूब गई।
दूसरी ओर साहूकार अपने दो सेवकों से कहता है कि जाओ! उस व्यापारी के बेटे ‘सागर’ को उठा कर ले आओ। उसने अभी तक मेरे पैसे नहीं लौटाए हैं।
वहाँ आने पर साहूकार सागर से अपने पैसे ब्याज सहित मांगता है, तो वह कहता है कि मेरे पास पैसे नहीं हैं। मुझे एक महीने की मोहलत दे दो।
‘अच्छा! तेरा मित्र तो एक हफ्ते में लौटाने की कह कर ले गया था। चलो! मैं तुम्हें तीन दिन की मोहलत देता हूँ।’
‘नहीं, सेठ जी! मैं तीन दिन में कहाँ से लाऊँगा पैसे?’
सेठ (कुछ सोचते हुए) - ‘अब तो मैं तुम्हें दो दिन की मोहलत से अधिक नहीं दूँगा।’
‘नहीं, सेठ जी! ऐसा न करो। मैं दो दिन में कहाँ से लाऊँगा पैसे? अभी कल ही तो मेरे पिताजी ने मुझे 1000 रुपए दिए थे। इतनी जल्दी वे पैसे नहीं देंगे।’
सेठ (कुछ सोचते हुए) - ‘तो यह बात है। अब तो मैं तुम्हें शाम तक की मोहलत देता हूँ। शाम तक तुमने ब्याज समेत पैसे नहीं लौटाए तो मैं तुम्हारे घर का सारा सामान बिकवा दूँगा और तुम्हारे साथ-साथ तुम्हारे पिता को भी जेल भिजवा दूँगा। जुआ तुम खेलो और नुकसान मैं अपना करूँ? ऐसा तो मैं नहीं होने दूँगा। अब तुम्हारे बाप को पता चलेगा कि बैरिस्टर कैसे बना जाता है। उसने सारे गाँव में कह रखा है न कि साहुकार तो अपने बेटे को बैरिस्टर बना नहीं सका, अब मैं अपने बेटे को बैरिस्टर बना कर दिखाऊँगा! मैं भी देखता हूँ कि वह अपने बेटे को कैसे बैरिस्टर बना कर दिखाता है?’
सागर हाँफता हुआ घर आता है तो अपने पिता को रोते-बिलखते देखता है।
‘पिताजी! क्या हुआ?’
‘बेटा! मैं तो लुट गया। बर्बाद हो गया। कंगाल हो गया।’
पिताजी! वह सब तो मैं नहीं जानता। मुझे अभी तुरन्त 5000 रुपये चाहिएं। चाहे कहीं से भी दो और आज ही चाहिएं (धीमी आवाज़ में) अपनी पढ़ाई के लिए।’
‘बेटा! मैं कहाँ से दूँ तुम्हें पैसे?’
और पिता अपनी दुकान पर हुए सारे मामले को और अपनी पिटाई से हुए बुरे हाल व अपमान की बात बेटे को बताते हैं।
बेटे ने कहा - ‘मुझे कुछ नहीं पता। आपकी सम्पत्ति में मेरा भी आधा हिस्सा है। मुझे अपना हिस्सा चाहिए। अभी और इसी वक्त। वरना आप जेल जाने को तैयार रहो।’
पिता के मना करने पर वह पिता को धक्का दे देता है, जिसे उसकी बेटी तुरंत आकर गिरने से बचा लेती है। पुत्र उसको भी गुस्से भरी नज़रों से देखता है। तभी उसकी नज़र माँ के गले में पड़े मंगलसूत्र पर पड़ती है। माँ उसे समझाने उसके निकट आती है, तो वह उसका मंगलसूत्र झपट कर माँ को धक्का देकर बाहर भाग जाता है।
उपासना दोनों को सम्भालती है और कहती है कि पिताजी! मैं सच कह रही थी। भाई की संगति अच्छी नहीं है। वह अब बैरिस्टर तो क्या एक अच्छा बेटा कहलाने लायक भी नहीं है। काश आपने मेरी बात को सच मान कर उसी समय कोई कदम उठा लिया होता, तो आज यह नौबत नहीं आती।
माता-पिता बेटी को गले से लगा लेते हैं और उससे माफी मांगते हैं। आज हमने ‘सत्य की महिमा’ को समझ लिया है। उसी सत्य ने तुझे तेरा माता-पिता का खोया हुआ प्यार वापिस लौटाया है और बेटा झूठ बोलने के कारण पतन के गड्ढे में गिर पड़ा है।
यह होती है ‘सत्य की महिमा’।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
विनम्र निवेदन
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