भगवान महावीर स्वामी (62)

 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी (62)

अहो, वीरनाथ के समीप चेतना की विशुद्धता के बल से नरक के पाप भी मानो धुल गये हों। इस प्रकार श्रेणिक राजा तो चेतनरस के वेदन में ही तत्पर थे। वीर प्रभु के प्रति परम उपकार के सूचक हर्षाश्रु उनकी आँखों से झर रहे थे।

अरे! देखो तो सही, जीव के परिणाम का परिवर्तन! कहाँ एक समय मुनि की विराधना के दुष्परिणाम! और कहाँ इस समय तीर्थंकर प्रकृति के योग्य विशुद्ध परिणाम! कहाँ उस समय का मिथ्यात्व और कहाँ आज का क्षणिक सम्यक्त्व! एक ही जीव के जीवन में कैसे-कैसे परिवर्तन आते हैं! 

वाह, जिनशासन! सत् को उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य स्वरूप बतलाने वाला तेरा उपदेश हमें वीतरागता का ही भाव कराता है। नरकगामी भी वही... और किंचित दीर्घदृष्टि से देखें, तो मोक्षगामी भी वही। अहा! जीव के परिणामों की शक्ति तो देखो, चाहे जैसा पापी या विराधक जीव भी सीधा चलने लगे, तो क्षण में धर्मी होकर मोक्ष का साधक बन जाता है। इसका उदाहरण एक वेद-वेदांत में पारंगत इन्द्रभूति-गौतम गणधर और दूसरे बौद्ध धर्म को मानने वाले श्रेणिक राजा- भावी तीर्थंकर।

क्षणिक सम्यक्त्व को प्राप्त श्रेणिक राजा ने अंतर में अतीन्द्रिय आनंद के तार झंकृत करके वीरनाथ प्रभु की भक्ति की। उस समय एक ओर उनके पुराने कर्म शीघ्रता से क्षीण हो रहे थे तो दूसरी ओर तीर्थंकर प्रकृति बंध रही थी; यद्यपि उस समय ‘मैं कर्म से बंधूँ’ - ऐसी इच्छा उनको नहीं थी, परंतु राग के अपराधवश बंधन हो रहा था। महावीर तो पूर्व में बाँधे हुए तीर्थंकर नामकर्म को छोड़ रहे हैं और श्रेणिक तीर्थंकर नामकर्म को बाँध रहे हैं... मानो एक तीर्थंकर के पास से प्रकृति के परमाणु दूसरे तीर्थंकर के पास जा रहे हों! ‘यह वीर प्रभु तो अब हमें छोड़कर निष्कर्म होकर मोक्ष में जायेंगे’ - ऐसा समझकर उन कर्मों ने अपने रहने के लिये दूसरा घर ढूँढ़ लिया... और महावीर के पास से निकल कर श्रेणिक के पास आ गये। - इस प्रकार तीर्थंकरत्व का अखण्ड प्रवाह जगत में चलता ही रहता है।

इन्द्रादि देवों द्वारा पूजित एवं भव्यजीवों को मोक्षमार्ग दर्शाते हुए गगनगामी महावीर तीर्थंकर विचर रहे थे। राजगृही से विहार करके प्रभु वैशाली की ओर चलने लगे। बीच में गंगानदी पार करने के लिये उन्हें पुल की या नौका की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि प्रभु तो अब गगनविहारी हो गये थे। वैशाली वीर प्रभु की जन्मभूमि! वहाँ माता त्रिशला और पिता सिद्धार्थ बारह वर्ष से परमप्रिय वीरनाथ के दर्शनों को आतुर थे। परमात्मा वीरनाथ वैशाली में पधारे और अद्भुत समवसरण के बीच विराजमान उन परमात्मा को देखकर माता त्रिशला के अन्तर में आनंदोर्मियाँ जाग उठीं - मेरा लाल केवलज्ञान रूपी रत्न लेकर आया है, परमात्मा बनकर हमें दर्शन देने आया है। 

वैशाली की समस्त प्रजा अपने लाडले राजकुमार को एक परमात्मा के रूप में देखकर परम हर्षित हुई और उन्होंने महा-महोत्सव किया। जिन्होंने महावीर को बचपन में क्रिया करने देखा था, मुनिरूप में आत्मसाधना करते देखा था और अब सर्वज्ञ दशा में परमात्मारूप को देखा ..... उन वृद्धजनों को ऐसा लगा कि अरे! कुछ वर्ष पूर्व जो हमारे साथ घूमते थे, वे देखते ही देखते परमात्मा बन गए... कैसी अद्भुत है आत्म-शक्ति! ‘वास्तव में आत्मा में ही परमात्मशक्ति है।’

क्रमशः

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद

Comments

Popular posts from this blog

बालक और राजा का धैर्य

सती कुसुम श्री (भाग - 11)

चौबोली रानी (भाग - 24)

सती नर्मदा सुंदरी की कहानी (भाग - 2)

हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 18 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर व उनके चिह्न

बारह भावना (1 - अथिर भावना)

रानी पद्मावती की कहानी (भाग - 4)

चौबोली रानी (भाग - 28)