Posts

Showing posts from July, 2021

सुकौशल मुनि की कथा (भाग - 1)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकौशल मुनि की कथा (भाग - 1 ) जग-पवित्र जिनेन्द्र भगवान्, जिनवाणी और गुरुओं को नमस्कार कर सुकौशल मुनि की कथा लिखी जाती है। अयोध्या में प्रजापाल राजा के समय में एक सिद्धार्थ नाम के नामी सेठ हो गये हैं। उनके लगभग बत्तीस अच्छी-अच्छी सुंदर स्त्रियाँ थी। पर खोटे भाग्य से इनमें किसी के कोई संतान न थी। स्त्री कितनी भी सुंदर हो, गुणवती हो, पर बिना संतान के उसकी शोभा नहीं होती, जैसे बिना फल-फूल के लताओं की शोभा नहीं होती।  इन स्त्रियों में जो सेठ की खास प्राण-प्रिया थी, जिस पर सेठ महाशय का अत्यन्त प्रेम था, वह पुत्र-प्राप्ति के लिए सदा कुदेवों की पूजा-मान्यता किया करती थी। एक दिन उसे कुदेवों की पूजा करते एक मुनिराज ने देख लिया। उन्होंने तब उससे कहा - बहिन, जिस आशा से तू इन कुदेवों की पूजा करती है तेरी वह आशा ऐसा करने से सफल न होगी। कारण सुख-सम्पत्ति, संतान प्राप्ति, नीरोगता, मान-मर्यादा, सद्बुद्धि आदि जितनी अच्छी बातें हैं, उन सबका कारण पुण्य है। इसलिए यदि तू पुण्य-प्राप्ति के लिए कोई उपाय करे तो अच्छा हो। मैं तुझे तेरे हित की बात कहता हूँ कि इन यक्षादिक कुदेवों की...

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 7)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 7 ) पाँवों से खून बहता जा रहा है और सुकुमाल मुनि चले जा रहे हैं। चलते-चलते वे एक पहाड़ी की गुफा में पहुँचे। वहाँ वे ध्यान लगाकर बारह-भावनाओं का विचार करने लगे। उन्होंने प्रायोपगमन संन्यास एक पाँव से खड़े रहने का ले लिया, जिसमें किसी से अपनी सेवा-सुश्रुषा भी कराना मना किया है। सुकुमाल मुनि तो इधर आत्म-ध्यान में लीन हुए। अब ज़रा इनके वायुभूति के जन्म को याद कीजिये। जिस समय वायुभूति के बड़े भाई अग्भिति मुनि हो गये थे, तब इनकी स्त्री ने वायुभूति से कहा था कि देखो, तुम्हारे कारण से ही तुम्हारे भाई मुनि हो गये। सुनती हूँ, तुमने अन्याय कर मुझे दुःख के सागर में ढकेल दिया। चलो, जब तक वे दीक्षा न ले जाएँ, उसके पहले उन्हें हम तुम समझा-बुझाकर घर लौटा लाएं। इस पर गुस्सा होकर वायुभूति ने अपनी भाभी को बुरी-भली सुना डाली थी और फिर ऊपर से उस पर लात भी जमा दी थी। तब उसने निदान किया था कि पापी, तूने मुझे निर्बल समझ मेरा जो अपमान किया है, मुझे कष्ट पहुँचाया है, यह ठीक है कि मैं इस समय इसका बदला नहीं ले सकती, पर याद रख कि इस जन्म में नहीं तो पर-जन्म में सही,...

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 6)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 6 ) एक दिन जैन तत्त्व के परम विद्वान सुकुमाल के मामा गणधराचार्य सुकुमाल की आयु बहुत थोड़ी रही जानकर उसके महल के पीछे के बगीचे में आकर ठहरे और चातुर्मास लग जाने से उन्होंने वहीं योग धारण कर लिया। यशोभद्रा को उनके आने की खबर हुई। वह जाकर उन्हें कह आई कि प्रभो, जब तक आपका योग पूरा न हो तब तक आप कभी ऊँचे स्वर से स्वाध्याय या पठन-पाठन न कीजिएगा। जब उनका योग पूरा हुआ तब उन्होंने अपने योग-संबंधी सब क्रियाओं के अंत में लोक-प्रज्ञप्ति का पाठ करना शुरू किया। उसमें उन्होंने अच्युत स्वर्ग के देवों की आयु, उनके शरीर की ऊँचाई आदि का खूब अच्छी तरह वर्णन किया। उसे सुनकर सुकुमाल को जाति-स्मरण हो गया। पूर्व-जन्म में पाये दुःखों को याद कर वह काँप उठा। वह उसी समय चुपके से महल से निकलकर मुनिराज के पास आ गया और उन्हें भक्ति से नमस्कार कर उनके पास बैठ गया। मुनि ने उससे कहा - बेटा, अब तुम्हारी आयु सिर्फ तीन दिन की रह गई है, इसलिए अब तुम्हें इन विषय-भोगों को छोड़कर अपना आत्म-हित करना उचित है। ये विषय-भोग पहले कुछ अच्छे से मालूम होते हैं, पर इनका अंत बड़ा ही दुः...

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 5)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 5 ) यहाँ से विहारकर सूर्यमित्र और अग्निभूति मुनिराज अग्नि-मन्दिर नाम के पर्वत पर पहुँचे। वहाँ तपस्या द्वारा घातिया कर्मों का नाशकर उन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त किया, और त्रिलोक-पूज्य हो अंत में बाकी के कर्मों का भी नाशकर परम सुखमय, अक्षयानन्त मोक्ष लाभ किया। वे दोनों केवलज्ञानी मुनिराज मुझे और आप लोगों को उत्तम सुख प्रदान करें। अवन्ति देश के प्रसिद्ध उज्जैन शहर में एक इन्द्रदत्त नाम का सेठ है। यह बड़ा धर्मात्मा और जिनभगवान् का सच्चा भक्त है। उसकी स्त्री का नाम गुणवती है। वह नाम के अनुसार सचमुच गुणवती और बड़ी सुन्दरी है। सोमशर्मा का जीव, जो अच्युत स्वर्ग में देव हुआ था, वह वहाँ अपनी आयु पूरी कर पुण्य के उदय से इस गुणवती सेठानी के सुरेन्द्रदत्त नाम का सुशील और गुणी पुत्र हुआ। सुरेन्द्रदत्त का विवाह उज्जैन ही में रहने वाले सुभद्र सेठ की लड़की यशोभद्रा के साथ हुआ। इनके घर में किसी बात की कमी नहीं थी। पुण्य के उदय से इन्हें सब कुछ प्राप्त था। इसलिए बड़े सुख के साथ इनके दिन बीतते थे। ये अपनी इस सुखी अवस्था में भी धर्म को न भूलकर सदा उसमें सावधा...

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 4)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 4 ) तब ब्राह्मण देवता अपना क्रोध निकालने को मुनियों के पास चले। उसने उन्हें दूर से ही देखकर गुस्से में आ कहा - क्यों रे नंगे! तुमने मेरी लड़की को व्रत देकर क्यों ठग लिया ? बतलाओ, तुम्हें इसका क्या अधिकार था ? कवि कहता है कि ऐसे पापियों के विचारों को सुनकर बड़ा ही खेद होता है। भला जो व्रत शील, पुण्य के प्रकारण हैं, उनसे क्या कोई ठगाया जा सकता है ? नहीं। सोमशर्मा को इस प्रकार गुस्सा हुआ देखकर सूर्यमित्र मुनि बड़ी धीरता और शान्ति के साथ बोले - भाई, जरा धीरज धर, क्यों इतनी जल्दी कर रहा है। मैंने इसे व्रत दिये हैं, पर अपनी लड़की समझकर, और सच पूछो तो यह है भी मेरी ही लड़की। तेरा तो इस पर कुछ भी अधिकार नहीं है। तू भले ही यह कह कि यह मेरी लड़की है, पर वास्तव में यह तेरी लड़की नहीं है। यह कहकर सूर्यमित्र मुनि ने नागश्री को पुकारा। नागश्री झट से आकर उनके पास बैठ गई। अब तो ब्राह्मण देवता बड़े घबराये। वे ‘अन्याय-अन्याय’ चिल्लाते हुए राजा के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले - देव, नंगे साधुओं ने मेरी नागश्री लड़की को जबरदस्ती छुड़ा लिया। वे कहते हैं कि यह त...

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 3)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 3 ) एक दिन नागश्री वन में नाग-पूजा करने को गई थी। पुण्य से सूर्यमित्र और अग्निभूति मुनि भी विहार करते हुए इस ओर आ गये। उन्हें देखकर नागश्री के मन में उनके प्रति अत्यन्त भक्ति हो गई। नागश्री को देखकर अग्निभूति मुनि के मन में कुछ प्रेम का उदय हुआ और होना उचित ही था। क्योंकि उसका जीव था तो उनके पूर्व जन्म का भाई न! अग्निभूति ने इसका कारण अपने गुरु से पूछा। उन्होंने प्रेम होने का कारण जो पूर्व जन्म का भातृ-भाव था, वह बता दिया। तब अग्निभूति ने उसे धर्म का उपदेश दिया और सम्यक्त्व तथा पाँच अणुव्रत उसे ग्रहण करवाये। नागश्री व्रत ग्रहण कर जब जाने लगी तब उन्होंने उससे कह दिया कि हाँ, देख बच्ची, तुझसे यदि तेरे पिताजी इन व्रतों को लेने के लिए नाराज हों, तो तू हमारे व्रत हमें ही आकर सौंप जाना। सच है, मुनि लोग वास्तव में सच्चे मार्ग दिखाने वाले होते हैं। इसके बाद नागश्री उन मुनिराजों के भक्ति से हाथ जोड़कर और प्रसन्न होती हुई अपने घर पर आ गई। नागश्री के साथ की और लड़कियों ने उसके व्रत लेने की बात को नागशर्मा से जाकर कह दिया। नागशर्मा ने तब कुछ क्रोध...

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 2)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 2 ) जब सूर्यमित्र मुनि अपने मुनि-धर्म में खूब कुशल हो गये तब वे गुरु की आज्ञा लेकर अकेले ही विहार करने लगे। एक बार वे विहार करते हुए कौशाम्बी में आये। अग्निभूति ने इन्हें भक्ति-पूर्वक दान दिया। उसने अपने छोटे भाई वायुभूति से बहुत प्रेरणा और आग्रह इसलिए किया कि वह सूर्यमित्र मुनि की वंदना करे ताकि उसे जैन-धर्म से कुछ प्रेम हो। कारण वह जैन धर्म से सदा विरुद्ध रहता था। पर अग्निभूति के इस आग्रह का परिणाम उलटा हुआ। वायुभूति ने खिसियाकर मुनि की और अधिक निंदा की और उन्हें बुरा-भला कहा। सच है, जिन्हें दुर्गतियों में जाना होता है, प्रेरणा करने पर भी ऐसे पुरुषों का श्रेष्ठधर्म की ओर झुकाव नहीं होता, किंतु इसके विपरीत वह पाप के कीचड़ में अधिक-अधिक फँसता जाता है। अग्निभूति को अपने भाई की दुर्बुद्धि पर बड़ा दुःख हुआ और यही कारण था जब मुनिराज आहार कर वन में गये, तब अग्निभूति भी उनके साथ-साथ चला गया और वहाँ धर्मोपदेश सुनकर वैराग्य हो जाने से दीक्षा लेकर वह भी तपस्वी हो गया। अपना और दूसरों का हित करना अब से अग्निभूति के जीवन का उद्देश्य हुआ। अग्निभूति...

गजकुमार मुनि की कथा

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर गजकुमार मुनि की कथा जो अपने गुणों से संसार में प्रसिद्ध हुए और सब कामों को करके सिद्धि, कृत्कृत्यता लाभ की है, उन जिन-भगवान् को नमस्कार कर गजकुमार मुनि की कथा लिखी जाती है। नेमिनाथ भगवान् के जन्म से पवित्र हुई प्रसिद्ध द्वारका के अर्धचक्री वासुदेव की रानी गन्धर्वसेना से गजकुमार का जन्म हुआ था। गजकुमार बड़ा वीर था। उसके प्रताप को सुनकर ही शत्रुओं की विस्तृत मानरूपी बेल भस्म हो जाती थी। पोदनपुर के राजा अपराजित ने तब बड़ा उपद्रव उठा रखा था। वासुदेव ने उसे अपने काबू में लाने के लिये अनेक यत्न किये, पर वह किसी तरह इनके हाथ न पड़ा। तब इन्होंने शहर में यह डोंडी पिटवाई कि जो मेरे शत्रु अपराजित को पकड़कर लाकर मेरे सामने उपस्थित करेगा, उसे उसका मनचाहा वर मिलेगा। गजकुमार डोंडी सुनकर पिता के पास गया और हाथ जोड़कर उसने स्वयं अपराजित पर चढ़ाई करने की प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना मंजूर हुई। वह सेना लेकर अपराजित पर जा चढ़ा। दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ। अंत में विजयलक्ष्मी ने गजकुमार का साथ दिया। अपराजित को पकड़कर लाकर उसने पिता के सामने उपस्थित कर दिया। गजकुमार की इस वीरता को देखकर ...

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 1)

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 1 ) जिनके नाम-मात्र ही का ध्यान करने से हर प्रकार की धन-संपत्ति प्राप्त हो सकती है, उन परम-पवित्र जिन भगवान् को नमस्कार कर सुकुमाल मुनि की कथा लिखी जाती है। अतिबल कौशाम्बी के जब राजा थे, तब ही का यह आख्यान है। यहाँ एक सोमशर्मा पुरोहित रहता था। इसकी स्त्री का नाम काश्यपी था। इसके अग्निभूति और वायुभूति नामक दो लड़के हुए। माँ-बाप के अधिक लाडले होने से ये कुछ पढ़-लिख न सके और सच है पुण्य के बिना किसी को विद्या आती भी तो नहीं। काल की विचित्र गति से सोमशर्मा की असमय में ही मौत हो गई। ये दोनों भाई तब निरे मूर्ख थे। इन्हें मूर्ख देखकर अतिबल ने इनके पिता का पुरोहित पद, जो इन्हें मिलता, वह किसी और को दे दिया। यह ठीक है कि मूर्ख का कहीं आदर-सत्कार नहीं होता। अपना अपमान हुआ देखकर इन दोनों भाइयों को बड़ा दुःख हुआ। तब इनकी कुछ अक्ल ठिकाने आई। अब इन्हें कुछ लिखने-पढ़ने की सूझी। ये राजगृह में अपने काका सूर्यमित्र के पास गये और अपना सब हाल इन्होंने उनसे कहा। इनकी पढ़ने की इच्छा देखकर सूर्यमित्र ने इन्हें स्वयं पढ़ाना शुरू किया और कुछ ही वर्षों में इन्हें अ...

गन्धर्वसेना की कथा

Image
आराधना-कथा-कोश के आधार पर गन्धर्वसेना की कथा सब सुखों के देने वाले जिन भगवान् के चरणों को नमस्कार कर मूर्खिणी गन्धर्वसेना का चरित लिखा जाता है। गन्धर्वसेना भी कर्ण इन्द्रिय की विषयासक्ति से मौत के पंजे में फँस गई थी। पाटिल पुत्र ( पटना ) के राजा गन्धर्वदत्त व रानी गन्धर्वदत्ता के गन्धर्वसेना नाम की एक कन्या थी। गन्धर्वसेना गान विद्या की बड़ी अच्छी जानकार थी और इसलिए उसने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि जो मुझे गाने में जीत लेगा वही मेरा स्वामी होगा। गन्धर्वसेना की खूबसूरती की लालसा से अनेक क्षत्रिय कुमार भौंरे की तरह खिंचे हुए आते थे, पर यहाँ आकर उन सबको निराश-मुँह लौट जाना पड़ता था। गन्धर्वसेना के सामने गाने में कोई नहीं ठहर पाता था। एक पांचाल नाम का उपाध्याय गायन शास्त्र का बहुत अच्छा अभ्यासी था। उसकी इच्छा भी गन्धर्वसेना को देखने की हुई। वह अपने पाँच सौ शिष्यों को साथ लिये पटना आकर एक बगीचे में ठहरा। समय गर्मी का था और बहुत दूर की मंजिल तय करने से पांचाल थक भी गया था। इसलिए वह अपने शिष्यों से यह कहकर कि कोई यहाँ आये तो मुझे जगा देना, एक वृक्ष की ठंडी छाया में सो गया। इधर तो यह सोया और उधर इसक...