सुकौशल मुनि की कथा (भाग - 1)
आराधना-कथा-कोश के आधार पर सुकौशल मुनि की कथा (भाग - 1 ) जग-पवित्र जिनेन्द्र भगवान्, जिनवाणी और गुरुओं को नमस्कार कर सुकौशल मुनि की कथा लिखी जाती है। अयोध्या में प्रजापाल राजा के समय में एक सिद्धार्थ नाम के नामी सेठ हो गये हैं। उनके लगभग बत्तीस अच्छी-अच्छी सुंदर स्त्रियाँ थी। पर खोटे भाग्य से इनमें किसी के कोई संतान न थी। स्त्री कितनी भी सुंदर हो, गुणवती हो, पर बिना संतान के उसकी शोभा नहीं होती, जैसे बिना फल-फूल के लताओं की शोभा नहीं होती। इन स्त्रियों में जो सेठ की खास प्राण-प्रिया थी, जिस पर सेठ महाशय का अत्यन्त प्रेम था, वह पुत्र-प्राप्ति के लिए सदा कुदेवों की पूजा-मान्यता किया करती थी। एक दिन उसे कुदेवों की पूजा करते एक मुनिराज ने देख लिया। उन्होंने तब उससे कहा - बहिन, जिस आशा से तू इन कुदेवों की पूजा करती है तेरी वह आशा ऐसा करने से सफल न होगी। कारण सुख-सम्पत्ति, संतान प्राप्ति, नीरोगता, मान-मर्यादा, सद्बुद्धि आदि जितनी अच्छी बातें हैं, उन सबका कारण पुण्य है। इसलिए यदि तू पुण्य-प्राप्ति के लिए कोई उपाय करे तो अच्छा हो। मैं तुझे तेरे हित की बात कहता हूँ कि इन यक्षादिक कुदेवों की...