सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 7)
आराधना-कथा-कोश के आधार पर
सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 7)
पाँवों से खून बहता जा रहा है और सुकुमाल मुनि चले जा रहे हैं। चलते-चलते वे एक पहाड़ी की गुफा में पहुँचे। वहाँ वे ध्यान लगाकर बारह-भावनाओं का विचार करने लगे। उन्होंने प्रायोपगमन संन्यास एक पाँव से खड़े रहने का ले लिया, जिसमें किसी से अपनी सेवा-सुश्रुषा भी कराना मना किया है। सुकुमाल मुनि तो इधर आत्म-ध्यान में लीन हुए। अब ज़रा इनके वायुभूति के जन्म को याद कीजिये।
जिस समय वायुभूति के बड़े भाई अग्भिति मुनि हो गये थे, तब इनकी स्त्री ने वायुभूति से कहा था कि देखो, तुम्हारे कारण से ही तुम्हारे भाई मुनि हो गये। सुनती हूँ, तुमने अन्याय कर मुझे दुःख के सागर में ढकेल दिया। चलो, जब तक वे दीक्षा न ले जाएँ, उसके पहले उन्हें हम तुम समझा-बुझाकर घर लौटा लाएं। इस पर गुस्सा होकर वायुभूति ने अपनी भाभी को बुरी-भली सुना डाली थी और फिर ऊपर से उस पर लात भी जमा दी थी। तब उसने निदान किया था कि पापी, तूने मुझे निर्बल समझ मेरा जो अपमान किया है, मुझे कष्ट पहुँचाया है, यह ठीक है कि मैं इस समय इसका बदला नहीं ले सकती, पर याद रख कि इस जन्म में नहीं तो पर-जन्म में सही, पर बदला लूँगी और घोर बदला लूँगी।
इसके बाद वह मरकर अनेक कुयोनियो में भटकी। अंत में वायुभूति तो यह सुकुमाल हुए और उसकी भौजी सियारिनी हुई। जब सुकुमाल मुनि वन की ओर रवाना हुए और उनके पाँवों में कंकर, पत्थर, काँटे वगैरह लगकर खून बहने लगा, तब यही सियारिनी अपने पिल्लों को साथ लिए उस खून को चाटती-चाटती वहीं आ गई, जहाँ सुकुमाल मुनि ध्यान में मग्न हो रहे थे। सुकुमाल को देखते ही पूर्व-जन्म के संस्कार से सियारिनी को अत्यन्त क्रोध आया। वह उनकी ओर घूरती हुई उनके बिलकुल नजदीक आ गई। उसका क्रोध भाव उमड़ा।
उसने सुकुमाल को खाना शुरू कर दिया। उसे खाते देखकर उसके पिल्ले भी खाने लग गये। जो कभी एक तिनके का चुभ जाना भी नहीं सह सकता था, वह आज ऐसे घोर कष्ट को सहकर भी सुमेरु सा निश्चल बना हुआ था। जिसके शरीर को एक साथ चार हिंसक जीव बड़ी निर्दयता से खा रहे हैं, तब भी जो रंचमात्र हिलता-डुलता तक नहीं। उस महात्मा की इस अलौकिक सहन-शक्ति का किन शब्दों में उल्लेख किया जाय, यह बुद्धि से परे है।
तब भी जो लोग छोटे-से काँटे के लग जाने से तिलमिला उठते हैं, वे अपने हृदय में ज़रा गंभीरता के साथ विचारकर देखें कि सुकुमाल मुनि की आदर्श सहन-शक्ति कहाँ तक बढ़ी-चढ़ी थी और उनका हृदय कितना विशाल था। सुकुमाल मुनि की यह सहन-शक्ति उन कर्त्तव्यशील मनुष्यों को अप्रत्यक्ष रूप में शिक्षा दे रही है कि अपने उच्च और पवित्र कामों में आने वाले विघ्नों की परवाह मत करो। विघ्नों को आने दो और उनका स्वागत करो। आत्मा की अनन्त शक्तियों के सामने ये विघ्न कुछ नहीं, लक्ष्य प्राप्ति के सामने ये किसी गिनती में नहीं आते।
तुम अपने पर विश्वास करो, भरोसा करो। हर एक काम में आत्मदृढ़ता, आत्मविश्वास, उनके सिद्ध होने का मूल-मंत्र है। जहाँ ये दृढ़ता नहीं, वहाँ मनुष्यता भी नहीं। तब कर्त्तव्यशीलता तो फिर योजनों की दूरी पर है। सुकुमाल यद्यपि सुखी जीव थे, पर कर्त्तव्यशीलता उनके पास थी। इसीलिए देखने वालों के भी हृदय को हिला देने वाले कष्ट में भी वे अचल रहे।
सुकुमाल मुनि को उस सियारिनी ने पूर्व-बैर के कारण तीन दिन तक खाया। पर वे मेरु के समान धीर रहे। दुःख की उन्होंने कुछ परवाह न की। यहाँ तक कि अपने को खाने वाली सियारिनी पर भी उनके बुरे भाव न हुए। शत्रु और मित्र को समभावों से देखकर उन्होंने अपना कर्त्तव्य पालन किया। तीसरे दिन सुकुमाल शरीर छोड़कर अच्युत स्वर्ग में महर्द्धिक देव हुए।
वायुभूति की भौजी ने निदान के वश सियारिनी होकर अपने बैर का बदला चुका लिया। सच है, निदान करना अत्यन्त दुःखों का कारण है। इसीलिए भव्य-जनों को यह पाप का कारण निदान कभी नहीं करना चाहिए। इस पाप के फल से सियारिनी मरकर कुगति में गई।
कहाँ वे मन को अच्छे लगने वाले भोग और कहाँ यह दारुण तपस्या। सच तो यह है कि महापुरुषों का चरित्र कुछ विलक्षण हुआ करता है। सुकुमाल मुनि अच्युत स्वर्ग में देव होकर अनेक प्रकार के दिव्य-सुखों को भोगते हैं और जिन भगवान् की भक्ति में सदा लीन रहते हैं।
सुकुमाल मुनि की इस वीर-मृत्यु के उपलक्ष्य में स्वर्ग के देवों ने आकर उनका बड़ा उत्सव मनाया। ‘जय जय’ शब्द द्वारा महाकोलाहल अर्थात् महाघोष हुआ। इसी दिन से उज्जैन में महाकाल नाम के कुतीर्थ की स्थापना हुई, जिसके नाम से अनगिनत जीव रोज वहाँ मारे जाने लगे और देवों ने जो सुगन्धित जल की वर्षा की थी, उससे वहाँ की नदी गन्धवती नाम से प्रसिद्ध हुई।
जिसने दिन-रात विषय-भोगों में ही फँसे रहकर अपनी सारी ज़िन्दगी बिताई, जिसने कभी दुःख का नाम भी न सुना था, उस महापुरुष सुकुमाल ने मुनिराज द्वारा अपनी तीन दिन की आयु सुनकर उसी समय माता, स्त्री, पुत्र आदि स्वजनों को, धन-दौलत को और विषय-भोगों को छोड़़कर जिनदीक्षा ले ली और अंत में पशुओं द्वारा दुःसह कष्ट सहकर भी जिसने बड़ी धीरज और शान्ति के साथ मृत्यु को अपनाया। वे सुकुमाल मुनि मुझे आत्म हित के कर्त्तव्य पालन के लिए कष्ट सहने की शक्ति प्रदान करें।
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