सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 4)
आराधना-कथा-कोश के आधार पर
सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 4)
तब ब्राह्मण देवता अपना क्रोध निकालने को मुनियों के पास चले। उसने उन्हें दूर से ही देखकर गुस्से में आ कहा - क्यों रे नंगे! तुमने मेरी लड़की को व्रत देकर क्यों ठग लिया? बतलाओ, तुम्हें इसका क्या अधिकार था? कवि कहता है कि ऐसे पापियों के विचारों को सुनकर बड़ा ही खेद होता है। भला जो व्रत शील, पुण्य के प्रकारण हैं, उनसे क्या कोई ठगाया जा सकता है? नहीं। सोमशर्मा को इस प्रकार गुस्सा हुआ देखकर सूर्यमित्र मुनि बड़ी धीरता और शान्ति के साथ बोले - भाई, जरा धीरज धर, क्यों इतनी जल्दी कर रहा है। मैंने इसे व्रत दिये हैं, पर अपनी लड़की समझकर, और सच पूछो तो यह है भी मेरी ही लड़की। तेरा तो इस पर कुछ भी अधिकार नहीं है। तू भले ही यह कह कि यह मेरी लड़की है, पर वास्तव में यह तेरी लड़की नहीं है। यह कहकर सूर्यमित्र मुनि ने नागश्री को पुकारा। नागश्री झट से आकर उनके पास बैठ गई। अब तो ब्राह्मण देवता बड़े घबराये। वे ‘अन्याय-अन्याय’ चिल्लाते हुए राजा के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले - देव, नंगे साधुओं ने मेरी नागश्री लड़की को जबरदस्ती छुड़ा लिया। वे कहते हैं कि यह तेरी लड़की नहीं किंतु हमारी लड़की है। राजाधिराज, सारा शहर जानता है कि नागश्री मेरी लड़की है। महाराज, उन पापियों से मेरी लड़की दिलवा दीजिए। सोमशर्मा की बात से सारी राज-सभा बड़े विचार में पड़ गई।
राजा की भी अकल में कुछ न आया। तब वे सबको साथ लिए मुनि के पास आये और उन्हें नमस्कार कर बैठ गये। फिर यही झगड़ा उपस्थित हुआ। सोमशर्मा तो नागश्री को अपनी लड़की बताने लगा और सूर्यमित्र मुनि अपनी।
मुनि बोले - अच्छा, यदि वह तेरी लड़की है तो बतला, तूने इसे क्या पढ़ाया? और सुन, मैंने इसे सब शास्त्र पढ़ाया है, इसलिए मैं अभिमान से कहता हूँ कि यह मेरी ही लड़की है। तब राजा बोले - अच्छा प्रभो, यह आप ही की लड़की सही, पर आपने इसे जो पढ़ाया है उसकी परीक्षा इसके द्वारा दिलवाइए। जिससे कि हमें विश्वास हो। तब सूर्यमित्र मुनि अपने वचनरूपी किरणों द्वारा लोगों के चित्त में भरे हुए मूर्खतारूप गाढ़े अंधकार को नाश करते हुये बोले - हे नागश्री, हे पूर्व जन्म में वायुभूति का भव धारण करने वाली पुत्री, तुझे मैंने जो पूर्व जन्म में कई शास्त्र पढ़ाये हैं, उनकी इस उपस्थित मंडली के सामने तू परीक्षा दे। सूर्यमित्र मुनि का इतना कहना हुआ कि नागश्री ने जन्मान्तर का पढ़ा-पढ़ाया सब विषय सुना दिया। राजा तथा और सब मंडली को इससे बड़ा अचंभा हुआ। उन्होंने मुनिराज से हाथ जोड़कर कहा - प्रभो, नागश्री की परीक्षा से उत्पन्न हुआ विनोद हृदयभूमि में अठखेलियाँ कर रहा है। इसलिए कृपाकर आप अपने और नागश्री के संबंध की सब बातें खुलासा कहिए।
तब अवधिज्ञानी सूर्यमित्र मुनि ने वायुभूति के भव से लगाकर नागश्री के जन्म तक की सब घटना उनसे कह सुनाई। यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्हें यह सब मोह की लीला जान पड़ी। मोह को ही सब दुःखों का मूल-कारण समझकर उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ। वे उसी समय और भी बहुत से राजाओं के साथ जिनदीक्षा ग्रहण कर गये। सोमशर्मा भी जैन-धर्म का उपदेश सुनकर मुनि हो गया और तपस्या कर अच्युत स्वर्ग में देव हुआ। इधर नागश्री को भी अपना पूर्व का हाल सुनकर बड़ा वैराग्य हुआ।
वह दीक्षा लेकर आर्यिका हो गई और अंत में शरीर छोड़कर तपस्या के फल से अच्युत स्वर्ग में महर्द्धिक देव हुई। अहा! संसार में गुरु चिंतामणि के समान है, सबसे श्रेष्ठ है। यही कारण है कि इनकी कृपा से जीवों को सब सम्पदाएँ प्राप्त हो सकती हैं।
क्रमशः
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