सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 5)
आराधना-कथा-कोश के आधार पर
सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 5)
यहाँ से विहारकर सूर्यमित्र और अग्निभूति मुनिराज अग्नि-मन्दिर नाम के पर्वत पर पहुँचे। वहाँ तपस्या द्वारा घातिया कर्मों का नाशकर उन्होंने केवल ज्ञान प्राप्त किया, और त्रिलोक-पूज्य हो अंत में बाकी के कर्मों का भी नाशकर परम सुखमय, अक्षयानन्त मोक्ष लाभ किया। वे दोनों केवलज्ञानी मुनिराज मुझे और आप लोगों को उत्तम सुख प्रदान करें।
अवन्ति देश के प्रसिद्ध उज्जैन शहर में एक इन्द्रदत्त नाम का सेठ है। यह बड़ा धर्मात्मा और जिनभगवान् का सच्चा भक्त है। उसकी स्त्री का नाम गुणवती है। वह नाम के अनुसार सचमुच गुणवती और बड़ी सुन्दरी है। सोमशर्मा का जीव, जो अच्युत स्वर्ग में देव हुआ था, वह वहाँ अपनी आयु पूरी कर पुण्य के उदय से इस गुणवती सेठानी के सुरेन्द्रदत्त नाम का सुशील और गुणी पुत्र हुआ। सुरेन्द्रदत्त का विवाह उज्जैन ही में रहने वाले सुभद्र सेठ की लड़की यशोभद्रा के साथ हुआ।
इनके घर में किसी बात की कमी नहीं थी। पुण्य के उदय से इन्हें सब कुछ प्राप्त था। इसलिए बड़े सुख के साथ इनके दिन बीतते थे। ये अपनी इस सुखी अवस्था में भी धर्म को न भूलकर सदा उसमें सावधान रहा करते थे। एक दिन यशोभद्रा ने एक अवधिज्ञानी मुनिराज से पूछा - क्यों योगिराज, क्या मेरी आशा इस जन्म में सफल होगी? मुनिराज ने यशोभद्रा का अभिप्राय जानकर कहा - हाँ होगी, और अवश्य होगी। तेरे होने वाला पुत्र भव्य है और मोक्ष में जाने वाला, बुद्धिमान और अनेक अच्छे-अच्छे गुणों का धारक होगा। पर साथ ही एक चिंता यह होगी कि तेरे स्वामी पुत्र का मुख देखकर ही जिनदीक्षा ग्रहण कर जायेंगे, जो दीक्षा स्वर्ग-मोक्ष का सुख देनेवाली है। अच्छा, और एक बात यह है कि तेरा पुत्र भी जब कभी किसी जैन मुनि को देख लेगा तो वह भी उस समय सब विषय भोगों को छोड़ कर योगी बन जाएगा।
इसके कुछ महीनों बाद यशोभद्रा सेठानी के पुत्र हुआ। नागश्री के जीव ने, जो स्वर्ग में महर्द्धिक देव हुआ था, अपनी स्वर्ग की आयु पूरी हुए बाद यशोभद्रा के यहाँ जन्म लिया। भाई-बंधुओं ने इसके जन्म का बहुत कुछ उत्सव मनाया। इसका नाम सुकुमाल रखा गया। उधर सुरेन्द्र पुत्र के पवित्र दर्शन कर और उसे अपने सेठ पद का तिलक कर स्वयं मुनि हो गया।
जब सुकुमाल बड़ा हुआ तब उसकी माँ को यह चिंता हुई कि कहीं यह भी कभी किसी मुनि को देखकर मुनि न हो जाये, इसके लिए यशोभद्रा ने अच्छे घराने की कोई बत्तीस सुन्दर कन्याओं के साथ उसका विवाह कर उन सबके रहने को एक अलग ही बड़ा भारी महल बनवा दिया और उसमें सब प्रकार की विषय-भोगों की एक से एक उत्तम वस्तु इकट्ठी करवा दी, जिससे सुकुमाल सदा विषयों में फंसा रहे। इसके सिवा पुत्र के मोह से उसने इतना और किया कि अपने घर में जैन मुनियों का आना-जाना बंद करवा दिया।
एक दिन किसी बाहर के सौदागर ने आकर राजा प्रद्योतन को एक बहुमूल्य रत्नकम्बल दिखलाया, इसलिए कि वह उसे खरीद ले, पर उसकी कीमत बहुत अधिक होने से राजा ने उसे नहीं लिया। रत्नकम्बल की बात यशोभद्रा सेठानी को मालूम हुई। उसने उस सौदागर को बुलवाकर उससे वह कम्बल सुकुमाल के लिए मोल ले लिया। पर वह रत्नों की जड़ाई के कारण अत्यन्त ही कठोर था, इसीलिए सुकुमाल ने उसे पसन्द न किया। तब यशोभद्रा ने उसके टुकड़े करवाकर अपनी बहुओं के लिए उसकी जूतियाँ बनवा दी।
एक दिन सुकुमाल की प्रिया जूतियाँ खोलकर पाँव धो रही थी। इतने में एक चील माँस के लोभ से एक जूते को उठा ले उड़ी। उसकी चोंच से छूटकर वह जूती एक वेश्या के मकान की छत पर गिरी। उस जूती को देखकर वेश्या को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह उसे राजघराने की समझकर राजा के पास ले गई। राजा भी उसे देखकर दंग रह गये कि जिसके यहाँ इतनी कीमती जूतियाँ पहनी जाती हैं, तब उसके धन का क्या ठिकाना होगा? मेरे शहर में इतना बड़ा धनी कौन है?
इसका अवश्य पता लगाना चाहिए। राजा ने जब इस विषय की खोज की तो उन्हें सुकुमाल सेठ का समाचार मिला कि इनके पास बहुत धन है और वह जूती उनकी स्त्री की है। राजा को सुकुमाल को देखने की बड़ी उत्कंठा हुई। वे एक दिन सुकुमाल से मिलने को आये। राजा को अपने घर आये देख सुकुमाल की माँ यशोभद्रा को बड़ी खुशी हुई। उसने राजा का खूब अच्छा आदर-सत्कार किया। राजा ने प्रेमवश हो सुकुमाल को भी अपने पास सिंहासन पर बैठा लिया।
यशोभद्रा ने उन दोनों की एक साथ आरती उतारी। दीये की तथा हार की ज्योति से मिलकर बढ़े हुए तेज को सुकुमाल की आँखें न सह सकी, उन में पानी आ गया। इस का कारण पूछने पर यशोभद्रा ने राजा से कहा - महाराज, आज इसको इतनी उम्र हो गई, कभी इसने रत्नमयी दीये को छोड़कर ऐसे दीये को नहीं देखा। इसलिए इसकी आँखों में पानी आ गया है। यशोभद्रा जब दोनों को भोजन कराने बैठी तब सुकुमाल अपनी थाली में परोसे हुये एक-एक चावल को बीन-बीन कर खाने लगा। यह देखकर राजा को बड़ा अचंभा हुआ।
उसने यशोभद्रा से इसका भी कारण पूछा। यशोभद्रा ने कहा - राजराजेश्वर, इसे जो चावल खाने को दिये जाते हैं वे खिले हुए कमलों में रखे जाकर सुगन्धित किये होते हैं। पर आज वे चावल थोड़े होने से मैंने उन्हें दूसरे चावलों के साथ मिलाकर बना लिया। इससे यह एक-एक चावल चुन-चुनकर खाता है। राजा सुनकर बहुत ही खुश हुये। उन्होंने पुण्यात्मा सुकुमाल की बहुत ही प्रशंसा कर कहा - सेठानी जी, अब तक तो आपके कुँवर साहब केवल आपके ही घर के सुकुमाल थे, पर अब मैं इनका अवन्ति-सुकुमाल नाम रखकर इन्हें सारे देश का सुकुमाल बनाता हूँ। मेरा विश्वास है कि मेरे देशभर में इस सुन्दरता का, इस सुकुमारता का यही आदर्श है।
इसके बाद राजा सुकुमाल को संग लिए महल के पीछे जलक्रीड़ा करने बावड़ी पर गये। सुकुमाल के साथ उन्होंने बहुत देर तक जलक्रीड़ा की। खेलते समय राजा की अंगुली में से अँगूठी निकलकर क्रीड़ा-सरोवर में गिर गई। राजा उसे ढूँढ़ने लगे। वे जल के भीतर देखते हैं तो उन्हें उसमें हजारों बड़े-बड़े सुन्दर और कीमती आभूषण दिखाई पड़े। उन्हें देखकर राजा की अक़्ल चकरा गई। वे सुकुमाल के अनन्त वैभव को देखकर बड़े चकित हुए। वे यह सोचते हुए, कि यह सब पुण्य की लीला है, कुछ शर्मिन्दा से होकर महल लौट आये।
सज्जनों, सुनो! धन-धान्यादि सम्पदा का मिलना, पुत्र, मित्र और सुन्दर स्त्री का प्राप्त होना, बन्धु-बान्धवों का सुखी होना, अच्छे-अच्छे वस्त्र और आभूषणों का होना, दुमंजले, तिमंजले आदि मनोहर महलों में रहने को मिलना, खाने-पीने को अच्छी-से-अच्छी वस्तुएँ प्राप्त होना, विद्वान होना, नीरोग होना आदि जितनी सुख सामग्री हैं, वह सब जिनेन्द्र भगवान् के उपदेश किये मार्ग पर चलने से जीवों को मिल सकती हैं। इसलिए दुःख देने वाले खोटे मार्ग को छोड़कर बुद्धिमानों को सुख का मार्ग और स्वर्ग-मोक्ष के सुख का बीज पुण्य-कर्म करना चाहिए। पुण्य जिनभगवान् की पूजा करने से, पात्रों को दान देने से तथा व्रत उपवास, ब्रह्मचर्य के धारण करने से होता है।
क्रमशः
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