सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 3)
आराधना-कथा-कोश के आधार पर
सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 3)
एक दिन नागश्री वन में नाग-पूजा करने को गई थी। पुण्य से सूर्यमित्र और अग्निभूति मुनि भी विहार करते हुए इस ओर आ गये।
उन्हें देखकर नागश्री के मन में उनके प्रति अत्यन्त भक्ति हो गई। नागश्री को देखकर अग्निभूति मुनि के मन में कुछ प्रेम का उदय हुआ और होना उचित ही था। क्योंकि उसका जीव था तो उनके पूर्व जन्म का भाई न! अग्निभूति ने इसका कारण अपने गुरु से पूछा। उन्होंने प्रेम होने का कारण जो पूर्व जन्म का भातृ-भाव था, वह बता दिया। तब अग्निभूति ने उसे धर्म का उपदेश दिया और सम्यक्त्व तथा पाँच अणुव्रत उसे ग्रहण करवाये। नागश्री व्रत ग्रहण कर जब जाने लगी तब उन्होंने उससे कह दिया कि हाँ, देख बच्ची, तुझसे यदि तेरे पिताजी इन व्रतों को लेने के लिए नाराज हों, तो तू हमारे व्रत हमें ही आकर सौंप जाना। सच है, मुनि लोग वास्तव में सच्चे मार्ग दिखाने वाले होते हैं।
इसके बाद नागश्री उन मुनिराजों के भक्ति से हाथ जोड़कर और प्रसन्न होती हुई अपने घर पर आ गई। नागश्री के साथ की और लड़कियों ने उसके व्रत लेने की बात को नागशर्मा से जाकर कह दिया। नागशर्मा ने तब कुछ क्रोध का सा भाव दिखाकर नागश्री से कहा - बच्ची, तू बड़ी भोली है, जो झट से हर एक के बहकाने में आ जाती है। भला, तू नहीं जानती कि अपने पवित्र ब्राह्मण-कुल में उन नंगे मुनियों के दिये व्रत नहीं लिये जाते। वे अच्छे लोग नहीं होते। इसलिए उनके व्रत तू छोड़ दे। तब नागश्री बोली - तो पिताजी, उन मुनियों ने मुझे आते समय यह कह दिया था कि यदि तुझसे तेरे पिताजी इन व्रतों को छोड़ देने के लिए आग्रह करें तो तू हमारे व्रत हमें ही वापिस दे जाना। तब आप चलिए, मैं उन्हें उनके व्रत दे आती हूँ। सोमशर्मा नागश्री का हाथ पकड़े क्रोध से गुर्राता हुआ मुनियों के पास चला। रास्ते में नागश्री ने एक जगह कुछ गुलगपाड़ा होता सुना। उस जगह बहुत से लोग इकट्ठे हो रहे थे और एक मनुष्य उनके बीच में बंधा हुआ पड़ा हुआ था। उसे कुछ निर्दयी लोग बड़ी क्रूरता से मार रहे थे।
नागश्री ने उसकी यह दशा देखकर सोमशर्मा से पूछा - पिताजी, बेचारा यह पुरुष इस प्रकार निर्दयता से क्यों मारा जा रहा है? सोमशर्मा बोला - बच्ची, इससे एक बनिये के लड़के वरसेन ने कुछ रुपया लेना था। उसने इससे अपने रुपयों का तकादा किया। इस पापी ने उसे रुपया न देकर जान से मार डाला। इसलिए उस अपराध के बदले अपने राजा साहब ने इसे प्राण-दंड की सज़ा दी है और वह इसी योग्य है। क्योंकि एक को ऐसी सजा मिलने से अब दूसरा कोई ऐसा अपराध न करेगा।
तब नागश्री ने ज़रा जोर देकर कहा - तो पिताजी, यही व्रत तो उन मुनियों ने मुझे दिया है, फिर आप उसे क्यों छुड़ाने को कहते हैं? सोमशर्मा लाजवाब होकर बोला - अस्तु पुत्री, तू इस व्रत को न छोड़, चल बाकी के व्रत तो उनके उन्हें दे आयें।
आगे चलकर नागश्री ने एक ओर पुरुष को बँधा देखकर पूछा - और पिताजी, यह क्यों बाँधा गया है? सोमशर्मा ने कहा - पुत्री, यह झूठ बोलकर लोगों को ठगा करता था। इसके फंदे में फंसकर बहुतों को दर-दर का भिखारी बनना पड़ा है। इसलिए झूठ बोलने के अपराध में इसकी यही दशा की जा रही है। तब फिर नागश्री ने कहा - तो पिताजी, यही व्रत तो मैंने भी लिया है। अब तो मैं उसे कभी नहीं छोड़ूंगी। इसी प्रकार चोरी, परस्त्री, लोभ आदि से दुख पाते हुए मनुष्यों को देखकर नागश्री ने अपने पिता को लाजवाब कर दिया और व्रतों को नहीं छोड़ा। तब सोमशर्मा ने हार मानकर कहा - अच्छा, यदि तेरी इच्छा इन व्रतों को छोड़ने की नहीं है तो न छोड़, पर तू मेरे साथ उन मुनियों के पास तो चल। मैं उन्हें दो बातें कहूँगा कि तुम्हें क्या अधिकार था जो तुमने मेरी लड़की को बिना मेरे पूछे व्रत दे दिये? फिर वे आगे से किसी को इस प्रकार व्रत न दे सकेंगे। सच है, दुर्जनों को कभी सत्पुरुषों से प्रीति नहीं होती।
क्रमशः
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