सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 2)

आराधना-कथा-कोश के आधार पर

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 2)

जब सूर्यमित्र मुनि अपने मुनि-धर्म में खूब कुशल हो गये तब वे गुरु की आज्ञा लेकर अकेले ही विहार करने लगे। एक बार वे विहार करते हुए कौशाम्बी में आये। अग्निभूति ने इन्हें भक्ति-पूर्वक दान दिया। उसने अपने छोटे भाई वायुभूति से बहुत प्रेरणा और आग्रह इसलिए किया कि वह सूर्यमित्र मुनि की वंदना करे ताकि उसे जैन-धर्म से कुछ प्रेम हो। कारण वह जैन धर्म से सदा विरुद्ध रहता था। पर अग्निभूति के इस आग्रह का परिणाम उलटा हुआ।

वायुभूति ने खिसियाकर मुनि की और अधिक निंदा की और उन्हें बुरा-भला कहा। सच है, जिन्हें दुर्गतियों में जाना होता है, प्रेरणा करने पर भी ऐसे पुरुषों का श्रेष्ठधर्म की ओर झुकाव नहीं होता, किंतु इसके विपरीत वह पाप के कीचड़ में अधिक-अधिक फँसता जाता है। अग्निभूति को अपने भाई की दुर्बुद्धि पर बड़ा दुःख हुआ और यही कारण था जब मुनिराज आहार कर वन में गये, तब अग्निभूति भी उनके साथ-साथ चला गया और वहाँ धर्मोपदेश सुनकर वैराग्य हो जाने से दीक्षा लेकर वह भी तपस्वी हो गया। अपना और दूसरों का हित करना अब से अग्निभूति के जीवन का उद्देश्य हुआ।

अग्निभूति के मुनि हो जाने की बात जब उसकी स्त्री सती सोमदत्ता को ज्ञात हुई तो उसे अत्यन्त दुःख हुआ। उसने वायुभूति से जाकर कहा - देखा, तुमने मुनि को वंदना न कर उनकी बुराई की, सुनती हूँ कि उससे दुखी होकर तुम्हारे भाई भी मुनि हो गये। यदि वे अब तक मुनि न हुए हों तो चलो उन्हें हम समझा लावें। वायुभूति ने गुस्सा होकर कहा - हाँ! तुम्हें गर्ज हो तो तुम भी उस बदमाश नंगे के पास जाओ! मुझे तो कुछ गर्ज नहीं है।

यह कहकर वायुभूति अपनी भौजी को एक लात मारकर चलता बना। सोमदत्ता को उसके मर्मभेदी वचनों को सुनकर बड़ा दुःख हुआ। उसे क्रोध भी अत्यन्त आया। पर अबला होने से उस समय वह कर कुछ नहीं सकी। तब उसने निदान किया कि पापी, तूने जो इस समय मेरा मर्म भेदा है और मुझे लातों से ठुकराया है, इसका बदला स्त्री होने से मैं इस समय न भी ले सकी तो कुछ चिंता नहीं, पर याद रख, इस जन्म में नहीं तो दूसरे जन्म में सही, पर बदला लूँगी अवश्य और इसी पाँव को, जिससे कि तूने मुझे लात मारी है और मेरे हृदय भेदने वाले तेरे इसी हृदय का मैं भक्षण करूँगी, तभी मुझे संतोष होगा। ग्रंथकार कहते हैं कि ऐसी मूर्खता को धिक्कार है जिसके वश हुए प्राणी अपने पुण्य-कमल को ऐसे नीच निदानों द्वारा भस्म कर डालते हैं।

‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ इस कहावत के अनुसार तीव्र-पाप का फल प्रायः तुरंत मिल जाता है। वायुभूति ने मुनि-निन्दा द्वारा जो तीव्र-पाप कर्म बाँधा, उसका फल उसे बहुत जल्दी मिल गया। पूरे सात दिन भी न हुए होंगे कि वायुभूति के सारे शरीर से कोढ़ निकल आया।

सच है, जिनकी सारा संसार पूजा करता है और जो धर्म के सच्चे मार्ग को दिखाने वाले हैं, ऐसे महात्माओं की निंदा करनेवाला पापी पुरुष किन महा-कष्टों को नहीं सहता। वायुभूति कोढ़ के दुख से मरकर कौशाम्बी में ही एक नट के यहाँ गधा हुआ। गधा मरकर जंगली सूअर हुआ। इस पर्याय से मरकर इसने चम्पापुर में एक चाण्डाल के यहाँ कुतिया का जन्म धारण किया, कुतिया मरकर चम्पापुरी में ही एक दूसरे चाण्डाल के यहाँ लड़की हुई। यह जन्म ही से अंधी थी। इसका सारा शरीर बदबू दे रहा था। इसलिए इसके माता-पिता ने इसे छोड़ दिया। पर भाग्य सभी का बलवान् होता है। इसलिए इसकी भी किसी तरह रक्षा हो गई। यह एक जामुन के झाड़ के नीचे पड़ी-पड़ी जामुन खाया करती थी।

सूर्यमित्र मुनि अग्निभूति को साथ लिये हुए भाग्य से इस ओर आ निकले। उस जन्म की पर्याय प्राप्त हुई उस दुःखी लड़की को देखकर अग्निभूति के हृदय में कुछ मोह, व कुछ दुःख हुआ। उन्होंने गुरु से पूछा - प्रभो, इसकी दशा बड़ी कष्ट में है। यह कैसे जी रही है?

ज्ञानी सूर्यमित्र मुनि ने कहा - तुम्हारे भाई वायुभूति ने धर्म से परान्मुख होकर जो मेरी निंदा की थी, उसी पाप के फल से उसे कई भव पशु पर्याय में लेने पड़े। अंत में वह कुतिया की पर्याय से मरकर यह चाण्डाल-कन्या हुई है। पर अब इसकी उमर बहुत थोड़ी रह गई है। इसलिए जाकर तुम इसे व्रत दिलवाकर संन्यास दे आओ। अग्निभूति ने वैसा ही किया। उस चाण्डाल कन्या को पाँच अणुव्रत देकर उन्होंने संन्यास दिलवा दिया। चाण्डाल कन्या मरकर व्रत के प्रभाव से चम्पापुर में नागशर्मा ब्राह्मण के यहाँ नागश्री नाम की कन्या हुई।

क्रमशः

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