सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 1)
आराधना-कथा-कोश के आधार पर
सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 1)
जिनके नाम-मात्र ही का ध्यान करने से हर प्रकार की धन-संपत्ति प्राप्त हो सकती है, उन परम-पवित्र जिन भगवान् को नमस्कार कर सुकुमाल मुनि की कथा लिखी जाती है।
अतिबल कौशाम्बी के जब राजा थे, तब ही का यह आख्यान है। यहाँ एक सोमशर्मा पुरोहित रहता था। इसकी स्त्री का नाम काश्यपी था। इसके अग्निभूति और वायुभूति नामक दो लड़के हुए। माँ-बाप के अधिक लाडले होने से ये कुछ पढ़-लिख न सके और सच है पुण्य के बिना किसी को विद्या आती भी तो नहीं। काल की विचित्र गति से सोमशर्मा की असमय में ही मौत हो गई। ये दोनों भाई तब निरे मूर्ख थे। इन्हें मूर्ख देखकर अतिबल ने इनके पिता का पुरोहित पद, जो इन्हें मिलता, वह किसी और को दे दिया। यह ठीक है कि मूर्ख का कहीं आदर-सत्कार नहीं होता। अपना अपमान हुआ देखकर इन दोनों भाइयों को बड़ा दुःख हुआ। तब इनकी कुछ अक्ल ठिकाने आई। अब इन्हें कुछ लिखने-पढ़ने की सूझी। ये राजगृह में अपने काका सूर्यमित्र के पास गये और अपना सब हाल इन्होंने उनसे कहा। इनकी पढ़ने की इच्छा देखकर सूर्यमित्र ने इन्हें स्वयं पढ़ाना शुरू किया और कुछ ही वर्षों में इन्हें अच्छा विद्वान बना दिया।
दोनों भाई जब अच्छे विद्वान हो गये तब वे वापिस अपने शहर लौट आये। आकर इन्होंने अतिबल को अपनी विद्या का परिचय कराया। अतिबल इन्हें विद्वान् देखकर बहुत खुश हुआ और इनके पिता का पुरोहित पद उसने वापिस इन्हें ही दे दिया। सच है सरस्वती की कृपा से संसार में क्या नहीं होता?
एक दिन संध्या के समय सूर्यमित्र सूर्य को अर्घ चढ़ा रहा था। उसकी अंगुली में एक राजकीय रत्नजड़ी बहुमूल्य अंगूठी थी। अर्घ चढ़ाते समय वह अंगूठी अंगुली में से निकलकर महल के नीचे तालाब में जा गिरी। भाग्य से वह एक खिले हुए कमल में पड़ी। सूर्य अस्त होने पर कमल मुंद गया। अंगूठी कमल के अंदर बंद हो गई। जब वह पूजा-पाठ करके उठा और उसकी नजर उंगली पर पड़ी तब उसे मालूम हुआ कि अंगूठी कहीं पर गिर पड़ी। अब तो उसके डर का ठिकाना न रहा। राजा जब अंगूठी माँगेगा तब उसे क्या जवाब दूँगा, इसकी उसे बड़ी चिंता होने लगी। अंगूठी को खोजने के लिये उसने बहुत कुछ यत्न किया, पर उसे उसका कुछ पता न चला। तब किसी के कहने से यह अवधिज्ञानी सुधर्म मुनि के पास गया और हाथ जोड़कर इसने उनसे अंगूठी के बाबत पूछा कि प्रभो, क्या कृपाकर मुझे आप यह बताएंगे कि मेरी अंगूठी कहाँ चली गई और हे करुणा के समुद्र, वह कैसे प्राप्त होगी?
मुनि ने उत्तर में यह कहा कि सूर्य को अर्घ देते समय तालाब में एक खिले हुए कमल में अंगूठी गिर पड़ी है। वह सबेरे मिल जायेगी। वही हुआ। सूर्योदय होते ही जैसे कमल खिला, सूर्यमित्र को उसमें अंगूठी मिली। सूर्यमित्र बड़ा खुश हुआ। उसे इस बात का अचम्भा होने लगा कि मुनि ने यह बात कैसे बतलाई? हो न हो, उनसे अपने को यह भी विद्या सीखनी चाहिये। यह विचारकर सूर्यमित्र मुनिराज के पास गया। उन्हें नमस्कार कर उसने प्रार्थना की कि हे योगिराज, मुझे भी आप अपनी विद्या सिखा दीजिये, जिससे मैं भी दूसरों के ऐसे प्रश्नों का उत्तर दे सकूँ। आपकी मुझ पर बड़ी कृपा होगी, यदि आप मुझे अपनी यह विद्या पढ़ा देंगे।
तब मुनिराज ने कहा - भाई, मुझे इस विद्या के सिखाने में कोई इंकार नहीं है। पर बात यह है कि बिना जिनदीक्षा लिये यह विद्या आ नहीं सकती। सूर्यमित्र तब केवल विद्या के लोभ से दीक्षा लेकर मुनि हो गया। मुनि होकर इसने गुरु से विद्या सिखाने को कहा। सुधर्म मुनिराज ने तब सूर्यमित्र को मुनियों के आचार-विचार के शास्त्र तथा सिद्धांत शास्त्र पढ़ाये।
अब तो एकदम सूर्यमित्र की आँखें खुल गई। यह गुरु के उपदेश रूपी दीये के द्वारा अपने हृदय के अज्ञानांधकार को नष्ट कर जैन-धर्म का अच्छा विद्वान हो गया। सच है, जिन भव्य-पुरुषों ने सच्चे-मार्ग को बतलाने वाले और संसार के अकारण बंधु गुरुओं की भक्ति सहित सेवा-पूजा की है, उनके सब काम नियम से सिद्ध हुए हैं।
क्रमशः
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