सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 6)

आराधना-कथा-कोश के आधार पर

सुकुमाल मुनि की कथा (भाग - 6)

एक दिन जैन तत्त्व के परम विद्वान सुकुमाल के मामा गणधराचार्य सुकुमाल की आयु बहुत थोड़ी रही जानकर उसके महल के पीछे के बगीचे में आकर ठहरे और चातुर्मास लग जाने से उन्होंने वहीं योग धारण कर लिया। यशोभद्रा को उनके आने की खबर हुई। वह जाकर उन्हें कह आई कि प्रभो, जब तक आपका योग पूरा न हो तब तक आप कभी ऊँचे स्वर से स्वाध्याय या पठन-पाठन न कीजिएगा। जब उनका योग पूरा हुआ तब उन्होंने अपने योग-संबंधी सब क्रियाओं के अंत में लोक-प्रज्ञप्ति का पाठ करना शुरू किया। उसमें उन्होंने अच्युत स्वर्ग के देवों की आयु, उनके शरीर की ऊँचाई आदि का खूब अच्छी तरह वर्णन किया।

उसे सुनकर सुकुमाल को जाति-स्मरण हो गया। पूर्व-जन्म में पाये दुःखों को याद कर वह काँप उठा। वह उसी समय चुपके से महल से निकलकर मुनिराज के पास आ गया और उन्हें भक्ति से नमस्कार कर उनके पास बैठ गया। मुनि ने उससे कहा - बेटा, अब तुम्हारी आयु सिर्फ तीन दिन की रह गई है, इसलिए अब तुम्हें इन विषय-भोगों को छोड़कर अपना आत्म-हित करना उचित है। ये विषय-भोग पहले कुछ अच्छे से मालूम होते हैं, पर इनका अंत बड़ा ही दुःखदायी है। जो विषय-भोगों की धुन में ही मस्त रहकर अपने हित की ओर ध्यान नहीं देते, उन्हें कुगतियों के अनन्त दुःख उठाने पड़ते हैं। तुम समझो सर्दी में आग बहुत प्यारी लगती है, पर जो उसे छुएगा वह तो जलेगा ही। यही हाल इन ऊपर के स्वरूप से मन को लुभाने वाले विषयों का है। इसलिए ऋषियों ने इन्हें ‘भोगाभुजंग भोगाभाः’ अर्थात् सर्प के समान भयंकर कहकर उल्लेख किया है। विषयों को भोगकर आज तक कोई सुखी नहीं हुआ, तब फिर ऐसी आशा करना कि इनसे सुख मिलेगा, नितान्त भूल है। 

मुनिराज का उपदेश सुनकर सुकुमाल को बड़ा वैराग्य हुआ। वह उसी समय सुख देने वाली जिनदीक्षा लेकर मुनि हो गया। मुनि होकर सुकुमाल वन की ओर चल दिया। उसका यह अन्तिम जीवन बड़ा ही करुणा से भरा हुआ है। कठोर से कठोर चित्त वाले मनुष्यों तक के हृदयों को हिला देने वाला है। सारी जिन्दगी में कभी जिनकी आँखों से आँसू न झरे हों, उन आँखों में भी सुकुमाल का यह जीवन आँसू ला देने वाला है।

पाठकों को सुकुमाल की सुकुमारता का हाल मालूम है कि यशोभद्रा ने जब उसकी आरती उतारी थी, तब जो मंगल द्रव्य सरसों उस पर डाली गई थी, उन सरसों की चुभन को सुकुमाल सह न सका था। यशोभद्रा ने उसके लिये रत्नों का बहुमूल्य कम्बल खरीदा था, पर उसने उसे कठोर होने से ही मना कर दिया था।

उसकी माँ का उस पर इतना प्रेम था, उसने उसे इस प्रकार लाड़-प्यार से पाला था कि सुकुमाल को कभी ज़मीन पर पाँव तक रखने का मौका नहीं आया था। उसी सुकुमार सुकुमाल ने अपने जीवनभर के सुविधाजनक रूप से बहे प्रवाह को कुछ ही मिनटों के उपदेश से बिलकुल ही उल्टा बहा दिया।

जिसने कभी यह नहीं जाना कि घर से बाहर क्या है, वह अब अकेला भयंकर जंगल में जा बसा। जिसने स्वप्न में भी कभी दुःख नहीं देखा, वही अब दुखों का पहाड़ अपने सिर पर उठा लेने को तैयार हो गया। सुकुमाल दीक्षा लेकर वन की ओर चला। कंकरीली जमीन पर चलने से उसके फूलों से भी कोमल पाँवों में कंकर-पत्थरों के गड़ने से घाव हो गये। उनसे खून की धारा बह चली। पर धन्य सुकुमाल की सहनशीलता जो उसने उस कष्ट की ओर आँख उठाकर भी नहीं झाँका। अपनी आत्मा के प्रति कर्त्तव्य में वह इतना एक-निष्ठ हो गया, इतना तन्मय हो गया कि उसे इस बात का भान ही न रहा कि मेरे शरीर की क्या दशा हो रही है। सुकुमाल की सहनशीलता की इतने में समाप्ति नहीं हो गई। अभी और आगे बढ़िये और देखिये कि वह अपने को इस परीक्षा में कहाँ तक उत्तीर्ण करता है।

क्रमशः

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