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Showing posts from December, 2023

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 29 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 29 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) दिनांक 29 अक्टूबर, 2022 को जैन लाइब्रेरी नागोरी गेट हिसार में परम पूज्य श्रमण मुनि श्री 108 विशोक सागर जी मुनिराज के पावन सानिध्य में “बाल संस्कार उद्बोधन” का आयोजन किया गया, जिसमें भारी संख्या में विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थी व श्रावक जन उपस्थित हुए। मुनि श्री ने अपनी ओजस्वी वाणी से सभी विद्यार्थियों व श्रावक जनों को आशीर्वचन दिया। उन्होंने बच्चों को सदाचार के महत्त्व के बारे में बताते हुए कहा कि यदि हम जीवन में अपने लक्ष्य को निर्विघ्न रूप से प्राप्त करना चाहते हैं, अपनी मंज़िल तक बिना बाधा के पहुँचना चाहते हैं तो हमें दृढ़ता से सद् आचरण का पालन करना होगा। इससे लौकिक उपलब्धि तो होती ही है, पारलौकिक अर्थात् मोक्ष की भी प्राप्ति हो सकती है। जीवन का निर्माण करने वाला यह ‘सदाचार’ का मूलमंत्र जीवन को जीवंत बना देता है। यह जीवन का आधार स्तम्भ है। जिस प्रकार आधार के बिना भवन का निर्माण नहीं हो सकता, उसी प्रकार सदाचार के बिना आदर्श जीवन का निर्माण नहीं हो सकता...

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 05 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 05 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) आज दिनांक 05 अक्टूबर, 2022 को दस दिवसीय महाअर्चना एवं विश्व शांति महायज्ञ के दसवें दिन नागोरी गेट स्थित बड़ा जैन मंदिर, हिसार के विशाल प्रांगण में परम पूज्य मुनि श्री विशोक सागर जी महाराज के सान्निध्य में सांय 6 बजे 48 मांडलों पर 48 परिवारों द्वारा 48-48 दीपकों से महाअर्चना की गई। सभी ने महाआरती का पुण्य लाभ लिया। श्री भक्तामर स्तोत्र के श्लोक व ऋद्धि मंत्र चारों ओर गुंजायमान हो रहे थे। सारा प्रांगण दीपों की रोशनी से जगमगा रहा था। भक्तों के चेहरे पर अलौकिक प्रकाश चमक रहा था। लगता था कि वास्तव में सत्य और धर्म की रोशनी ने असत्य और अधर्म के अन्धकार पर विजय प्राप्त कर ली हो। सब तरफ़ ज्ञान का उजाला अज्ञान के अंधेरे को मात दे रहा था। हम हिसार वासियों के लिए यह 2022 का दशहरा पर्व वास्तव में यादगार बन गया है, जो वर्षों तक हमारे मन को आह्लादित करता रहेगा। ।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया co...

मोक्ष कामार्ग -मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 9 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 9 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) प्यारे बंधुओं! भगवान महावीर की दिव्य वाणी जन-जन के लिए कल्याणकारी है। किसी ने प्रश्न पूछा कि मोक्ष मार्ग कितने प्रकार का होता है? हम मोक्ष कैसे-कैसे प्राप्त कर सकते हैं? भगवान ने अपनी दिव्य वाणी में सबको बताया कि हे भव्य जीवों! मोक्ष मार्ग दो प्रकार का होता है। एक है श्रमण मार्ग और दूसरा है श्रावक मार्ग। जो मोक्ष की प्राप्ति के लिए श्रम करे, वह श्रमण है, जिस पर मुनिजन, संतजन, गुरुजन चलते हैं। दूसरा श्रावक मार्ग है जो गृहस्थों के लिए है। श्र से तात्पर्य है - श्रद्धावान होना, व से तात्पर्य है - विवेकवान होना, क से तात्पर्य है - क्रियावान होना। श्रमण मुनिराज अपने षट् आवश्यक कर्त्तव्यों का पालन करते हैं। उनके 28 मूलगुण होते हैं। श्रावक भी अपने षट् आवश्यक कर्म करते हैं। उनके 8 मूलगुण होते हैं। श्रमण मुनिराज दिन-रात ध्यान-अध्ययन में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि उनका आहार, निहार, विहार आदि सभी क्रियाएँ अनेक कर्मों की निर्जरा का कारण होती हैं। श्रावक के लिए शास्त्रों म...

अशुभ से बचो -मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 12 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 12 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) अशुभ से बचो और शुभ व शुद्ध कर्म करो। जिस समय हम शुभ भाव से युक्त हैं, तो हमें पुण्य का अर्जन होता है और जिस समय हम अशुभ भाव से युक्त हैं, तो हमें पाप का अर्जन होता है। शास्त्रों में 3 प्रकार के भाव कहे गए हैं - अशुभ भाव, शुभ भाव और शुद्ध भाव, जिन्हें हम तीन प्रकार के उपयोग भी कह सकते हैं - अशुभ उपयोग, शुभ उपयोग और शुद्ध उपयोग। हमारे अशुभ भाव, अशुभ उपयोग या अशुभ परिणाम के संस्कार अनादि काल से चले आ रहे है। यही कारण है कि अधिकांशतः हमारे दूसरों के प्रति अशुभ भाव ही चलते रहते हैं और अशुभ भाव होने से हमें पापकर्म का अर्जन होता रहता है। केवल मन में ही नहीं, वचन और काया से भी हम अशुभ कर्म ही करते रहते हैं। उससे हमारे तीव्र पापकर्म का बंध होता है। यही बंध हमें दुर्गति में ले जाता है। इसी तीव्र पापकर्म के बंध से असाता वेदनीय कर्म का आस्रव होता है। जब यह कर्म उदय में आता है तो हमें असहनीय दुःख, पीड़ा, कष्ट, परेशानी आदि भोगने पड़ते हैं। पहले हमने अशुभ भाव किए, फिर अशु...

सामायिक-मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 22 सितम्बर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 22 सितम्बर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) जो निज आत्मा की मस्ती में लीन रहता है, उसी अवस्था का नाम सामायिक है। आज हम अपनी आत्मा की सम्पदा को भूल कर भौतिक सम्पदा में लीन रहते हैं। पुद्गल वस्तुओं को इकट्ठा करने में ही सुख मानते हैं। यह वास्तविक सुख नहीं है, क्योंकि यह तो एक दिन नष्ट हो जाने वाला है। भवन पुराना हो जाए, तो उसका नवीनीकरण करा लेते हो; हमारा यह चर्म भवन अर्थात् शरीर भी तो खण्डहर में बदलता जा रहा है, इसको भी नया बना लो। जब तक पुण्य का उदय चल रहा है, तब तक यह शरीर हमारा साथ दे रहा है। जब पुण्य के फूल मुरझा जाएंगे, तो वह दो कौड़ी का भी नहीं रह जाएगा। जैसे फूल मुरझाने पर फेंक दिया जाता है या नींबू में से रस निकाल कर उसका छिलका फेंक दिया जाता है, वैसे ही पाप का उदय आने पर हमारा भी यही हाल होगा। समय रहते सावधान हो जाओ। राजा को रंक बनते देर नहीं लगती। यदि पुण्य के फल से धन मिला है, स्वस्थ शरीर मिला है, तो इसे व्यसनों व पापों में मत लगाओ। अच्छे कर्म मोक्ष को प्राप्त कराते हैं और पाप कर्म 7वें नरक...

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 13 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 13 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) प्यारे बंधुओं! आचार्य बताते हैं कि शरीर से मोक्ष नहीं होता, शरीर से साधना होती है। इसलिए नीतिकारों ने सूत्र दिया है - ‘शरीर माध्यम खलु धम्मो’ अर्थात् शरीर के माध्यम से धर्म की क्रियाएँ की जाती हैं और उन क्रियाओं का फल मोक्ष है। यदि शरीर स्वस्थ होगा, तो हम साधना कर पाएंगे और यदि शरीर स्वस्थ नहीं होगा तो हम साधना नहीं कर पाएंगे। शरीर एक पुद्गल है जो स्वभाव से ही पूरण-गलन स्वभाव वाला अर्थात् मिटने और बनने वाला है। इसलिए जब तक शरीर स्वस्थ हो, तब तक हमें साधना कर लेनी चाहिए। अस्वस्थ शरीर से चाहते हुए भी तुम साधना नहीं कर पाओगे और साधना के बिना साध्य की सिद्धि नहीं हो सकती। शरीर एक साधन है और साधन से ही सिद्धि होती है। कारण से ही कार्य की सिद्धि होती है। कोई भी क्रिया तीनों योगों की एकाग्रता के बिना नहीं होती। भगवान को नमस्कार भी करना हो तो हम कहते हैं कि ‘नमहुँ त्रियोग सँभारि के’ । उसमें मन, वचन और काय तीनों का योग होना चाहिए। मन और काया का योग न हो तो वचन से ...

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 15 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 15 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) प्यारे बंधुओं! हम गृहस्थी में रह कर भी धर्म-ध्यान कर सकते हैं और अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि गृहस्थ किसे कहते हैं? इसे दो प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है - एक है लौकिक परिभाषा और दूसरी है धार्मिक परिभाषा। लौकिक परिभाषा के अनुसार जो अस्त-व्यस्त और तनावग्रस्त होता है, वह गृहस्थ होता है। धार्मिक परिभाषा के अनुसार सद्-गृहस्थ ब्रह्म मुहूर्त में उठता है। सूर्य उदय होने से तीन घड़ी (72 मिनट) पहले और तीन घड़ी (72 मिनट) बाद तक के समय को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। उत्कृष्ट ब्रह्म मुहूर्त तीन घड़ी (72 मिनट) पहले, मध्यम दो घड़ी (48 मिनट) पहले और जघन्य एक घड़ी (24 मिनट) पहले जागने के लिए उत्तम है। ऐसे उत्कृष्ट ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर सबसे पहले अपना बिस्तर छोड़ दें और किसी पवित्र स्थान पर आसन लगा कर पाटे या चटाई पर बैठें। हो सके तो स्नान आदि करके स्वयं को भी पवित्र करें, वरना मुँह-हाथ धोकर अपने पंचपरमेष्ठी भगवान को स्मरण करें, दोनों ...

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 14 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

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मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 14 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश ( परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से ) प्यारे बंधुओं! कल हमने जाना था कि मोक्ष मार्ग मन से होता है। शुद्ध मन से ही धर्म-ध्यान किया जाता है, केवल शरीर से नहीं। इधर-उधर भटकती हुई चित्तवृत्ति का निरोध करना ही ध्यान है। चित्तवृत्ति का निरोध तभी होगा, जब चित्त में निर्मलता आएगी। निर्मल चित्त वाला व्यक्ति ही चारित्र ग्रहण कर सकता है। यह निर्मलता हमारे द्वारा ग्रहण किए गए शुद्ध भोजन से आती है। शुद्ध भोजन से आचरण शुद्ध बनता है और अशुद्ध भोजन से आचरण भी अशुद्ध हो जाता है। इसलिए श्रावकों को यदि अपना आचरण शुद्ध रखना है तो पहले अपना रसोईघर शुद्ध रखो। श्रावक का चौका शुद्ध है तो उसका आचरण शुद्ध रहेगा और मुनि की चौकी शुद्ध है तो उनका चारित्र शुद्ध रहेगा। श्रावक जितना मन लगा कर व्यापार करता है, नोट गिनता है, उतना मन धर्मकार्य में नहीं लगाता। मुनि हर समय सजग और सचेत रहता है। श्रावक कभी भी उसके कमरे में आए, वह हमेशा ध्यान-स्वाध्याय करता हुआ मिलेगा। क्या इतनी सजगता श्रावक के पास है कि मुनि महाराज कभी भी उसके घर म...