मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 15 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश
मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 15 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)
प्यारे बंधुओं! हम गृहस्थी में रह कर भी धर्म-ध्यान कर सकते हैं और अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि गृहस्थ किसे कहते हैं? इसे दो प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है - एक है लौकिक परिभाषा और दूसरी है धार्मिक परिभाषा।
लौकिक परिभाषा के अनुसार जो अस्त-व्यस्त और तनावग्रस्त होता है, वह गृहस्थ होता है।
धार्मिक परिभाषा के अनुसार सद्-गृहस्थ ब्रह्म मुहूर्त में उठता है। सूर्य उदय होने से तीन घड़ी (72 मिनट) पहले और तीन घड़ी (72 मिनट) बाद तक के समय को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। उत्कृष्ट ब्रह्म मुहूर्त तीन घड़ी (72 मिनट) पहले, मध्यम दो घड़ी (48 मिनट) पहले और जघन्य एक घड़ी (24 मिनट) पहले जागने के लिए उत्तम है। ऐसे उत्कृष्ट ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर सबसे पहले अपना बिस्तर छोड़ दें और किसी पवित्र स्थान पर आसन लगा कर पाटे या चटाई पर बैठें। हो सके तो स्नान आदि करके स्वयं को भी पवित्र करें, वरना मुँह-हाथ धोकर अपने पंचपरमेष्ठी भगवान को स्मरण करें, दोनों हथेलियों को मिला कर देखें, उसमें सिद्धशिला के समान अर्द्धचन्द्राकार रेखा दिखाई देगी। सिद्धशिला पर विराजमान अनंतानंत सिद्ध भगवानों एवं उसके ऊपर 8 अंगुलियों के 24 पोरों में 24 तीर्थंकरों के दर्शन करें, उन्हें नमस्कार करें। उसके बाद स्वाध्याय, जाप, स्तुति, प्रतिक्रमण और सामायिक आदि करें।
उसके बाद श्रावक के ये षट् आवश्यक कर्म करें। वे हैं - देवपूजा, गुरु उपास्ति, स्वाध्याय, संयम, तप और दान। सच्चा गृहस्थ इन कर्त्तव्यों का प्रतिदिन पालन करे। जो ये 6 कार्य नहीं करता वह लौकिक गृहस्थ है अर्थात् अस्त-व्यस्त और तनावग्रस्त। लौकिक गृहस्थ सदा अस्त-व्यस्त और तनावग्रस्त ही रहता है। न सोने का समय निश्चित होता है और न सोकर उठने का। ब्रह्म मुहूर्त का तो ध्यान ही नहीं रहता। कभी 8 बजे उठ रहे हैं और कभी 10 बजे। जल्दी उठने वालों में धर्म की चिन्ता करने वाले भी हैं और धन की चिंता करने वाले भी। धर्म की चिन्ता करने वाले प्रातः 4 बजे उठ कर अपने दैनिक क्रिया-कलापों में लग जाते हैं ताकि धर्म में अधिक से अधिक समय लगा सकें और धन की चिन्ता करने वाले भी प्रातः 4 बजे उठ कर अपने दैनिक क्रिया-कलापों में लग जाते हैं ताकि वे धन कमाने में अधिक से अधिक समय लगा सकें। लेकिन लौकिक गृहस्थ देर से सोकर उठता है तो न धर्म कमा पाता है और न धन।
सभी आचार्यों ने चार प्रकार के पुरुषार्थ कहे हैं - धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष। इनमें से धर्म को सबसे पहले स्थान पर रखा गया है। सबसे पहले धर्म की क्रिया से अपने दिन का आरम्भ करें ताकि अपनी आत्मा का कल्याण हो और जीवन जीने की कला का ज्ञान हो। यह ज्ञान धार्मिक पुस्तकों के स्वाध्याय से ही होगा। दिनभर एक गृहस्थ न जाने कितने पापों में संलग्न रहता है - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, परिग्रह, राग, द्वेष, क्रोध, मोह, मान, माया, लोभ तथा और भी न जाने क्या-क्या पाप उसे करने पड़ते हैं। सद्गृहस्थ प्रतिदिन प्रतिक्रमण कर लेता है कि कल जो पाप मैंने किए, उनकी मैं आलोचना व प्रायश्चित करता हूँ और आज मैं उनके प्रति सजग रहने की प्रतिज्ञा करता हूँ, ताकि उन पापों से बच सकूँ।
ब्रह्म मुहूर्त में किए गए स्वाध्याय, जाप, स्तुति, प्रतिक्रमण और सामायिक आदि का जीवन पर अलग ही प्रभाव पड़ता है। यदि आप 10 बजे सोकर उठ रहे हैं, 12 बजे जाप आदि कर रहे हैं तो उसका आपके भावों पर अधिक प्रभाव नहीं रहता। ब्रह्म मुहूर्त में वातावरण शांत रहता है, पर्यावरण प्रदूषित नहीं होता तो उस शांत वातावरण में चित्त भी शांत रहता है और धार्मिक क्रियाओं का अतिशय चमत्कार भी जीवन में दिखाई देता है।
जाप और पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन स्वाध्याय नहीं। स्वाध्याय के लिए चार संधिकालों में करने का निषेध किया गया है। वे चार संधिकाल हैं - प्रातः काल का सूर्योदय से 72 मिनट पहले और 72 मिनट बाद तक, दूसरा अपराह्नकाल में लगभग ग्यारह बजे से डेढ़ बजे तक, तीसरा सांयकाल में सूर्यास्त से 72 मिनट पहले और 72 मिनट बाद तक और चौथा अर्द्धरात्रि को लगभग ग्यारह बजे से डेढ़ बजे तक। बताया गया है कि इन चार संधिकालों में जहाँ-जहाँ तीर्थंकर विराजमान हैं, वहाँ उनकी ध्वनि खिरती है जैसे विदेहक्षेत्र में। उस समय हम स्वाध्याय की अपेक्षा तीर्थंकरों का ध्यान करते हैं और सामायिक आदि करते हैं एवं भगवान की खिरती हुई दिव्य ध्वनि का स्मरण करते हैं।
स्वाध्याय के समय हैं - अपर रात्रि, पौर्वाह्निक काल, अपराह्निक काल और पूर्व रात्रि अर्थात् चारों ध्यानकालों से पहले का समय। जैसे गाय, भैंस आदि भूसा खाने के बाद जुगाली करते हैं, उसी प्रकार स्वाध्याय हमारा भोजन है और ध्यान-सामायिक जुगाली के समान है। जैसे बच्चे पढ़ने के बाद रिवीज़न करते हैं, उसी प्रकार स्वाध्याय के बाद ध्यान में उस पढ़े हुए पाठ को याद किया जाता है, अन्यथा वह सारा पढ़ा हुआ पाठ हम भूल जाते हैं।
यदि अस्त-व्यस्त नहीं रहना चाहते तो सोने, भोजन करने और जागने का समय निश्चित करें, तभी अपने जीवन को व्यवस्थित बना सकेंगे और धर्म क्रियाओं के लिए समय निकाल सकेंगे। व्यवस्थित गृहस्थ स्वतः एक निश्चित समय पर सो जाता है और निश्चित समय पर उठ जाता है। इसके विपरीत अस्त-व्यस्त गृहस्थ को सोने के लिए नींद की गोली और उठने के लिए अलार्म की आवश्यकता पड़ती है। यदि नींद पूरी नहीं होती या नींद नहीं आती अथवा नींद समय पर नहीं खुलती तो व्यक्ति तनावग्रस्त होकर डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। इन सबका कारण है उनकी दिनचर्या का व्यवस्थित न होना।
यदि डिप्रेशन का शिकार नहीं होना चाहते तो अपने जीवन को व्यवस्थित करो और उपरोक्त 6 आवश्यकों का पालन करो। कोई अन्य कार्य बेशक करो या न करो; देवपूजा, गुरु की उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान अवश्य करना चाहिए। भगवान की पूजा करो, गुरु की चर्या में सहायक बन कर उनके बताए मार्ग पर चल कर उनकी उपासना करो, स्वाध्याय करो, इन्द्रिय-संयम और वाणी संयम का पालन करो, इन्द्रियों के विषयों का निग्रह करके तपस्या के मार्ग पर चलो और प्रतिदिन कुछ न कुछ दान अवश्य करो। आप भी अपने जीवन को अस्त-व्यस्त होने से बचा सकोगे और सही अर्थों में सद्गृहस्थ बन कर धर्म-आराधना करके अपना कल्याण कर सकोगे।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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