मोक्ष कामार्ग -मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 9 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 9 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)

प्यारे बंधुओं! भगवान महावीर की दिव्य वाणी जन-जन के लिए कल्याणकारी है। किसी ने प्रश्न पूछा कि मोक्ष मार्ग कितने प्रकार का होता है? हम मोक्ष कैसे-कैसे प्राप्त कर सकते हैं? भगवान ने अपनी दिव्य वाणी में सबको बताया कि हे भव्य जीवों! मोक्ष मार्ग दो प्रकार का होता है। एक है श्रमण मार्ग और दूसरा है श्रावक मार्ग। जो मोक्ष की प्राप्ति के लिए श्रम करे, वह श्रमण है, जिस पर मुनिजन, संतजन, गुरुजन चलते हैं। दूसरा श्रावक मार्ग है जो गृहस्थों के लिए है। श्र से तात्पर्य है - श्रद्धावान होना, व से तात्पर्य है - विवेकवान होना, क से तात्पर्य है - क्रियावान होना।

श्रमण मुनिराज अपने षट् आवश्यक कर्त्तव्यों का पालन करते हैं। उनके 28 मूलगुण होते हैं। श्रावक भी अपने षट् आवश्यक कर्म करते हैं। उनके 8 मूलगुण होते हैं। श्रमण मुनिराज दिन-रात ध्यान-अध्ययन में लगे रहते हैं। यहाँ तक कि उनका आहार, निहार, विहार आदि सभी क्रियाएँ अनेक कर्मों की निर्जरा का कारण होती हैं। श्रावक के लिए शास्त्रों में कहा गया है कि ‘दानं पूजा मुक्खं सावय धम्मो’ अर्थात् 6 आवश्यक कर्मों में से दान और पूजा उनका मुख्य धर्म है। मुनिराज साक्षात् मोक्ष प्राप्ति के कारण हैं और श्रावक परम्परा से मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं।

यदि मोक्ष प्राप्त करना है तो रत्नत्रय को धारण करना, मुनि दीक्षा लेना, संयम व चारित्र को धारण करना अति आवश्यक है। मोक्ष को पाने के लिए सम्यक् दर्शन, ज्ञान व चारित्र का समन्वय होना चाहिए, चाहे वह मुनि हो या श्रावक। मोक्ष को पाने के लिए मुख्य कारण है - सम्यक् दर्शन। सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति पूरा श्रद्धान होना, आस्था व विश्वास होना चाहिए। सच्चे देव की परिभाषा बताते हुए आचार्यों ने कहा है - जिसने राग-द्वेष, काम आदि विकारों को जीत लिया है, वही सच्चा देव कहलाने का अधिकारी है। हर किसी के पास यह क्वालिटी नहीं हो सकती।

हर व्यक्ति के पास या तो राग है या द्वेष है। दही मथने की रस्सी के समान राग की रस्सी आगे आती है तो द्वेष पीछे हो जाता है और द्वेष की रस्सी आगे आती है तो राग पीछे हो जाता है। दुनिया में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसमें न राग हो और न द्वेष हो और कामनाओं का तो कोई अंत ही नहीं है। अतः जिसने राग, द्वेष काम आदि विकारों पर विजय प्राप्त कर ली है, वही सच्चा परमात्मा है।

जिसने सारे संसार को जान लिया है, जो सर्वज्ञ है, वही सच्चा देव है। जिनके ज्ञान में सब कुछ झलक रहा है, वही सच्चा परमात्मा है। वे अतिन्द्रिय ज्ञान के माध्यम से सब कुछ जान रहे हैं। हम सामान्य व्यक्ति तो केवल इन्द्रिय ज्ञान के माध्यम से ही थोड़ा-बहुत ज्ञान रखते हैं। हम यह भी नहीं जानते कि हम जो ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं, वह सम्यक् ज्ञान है या मिथ्या। पर वे जो जान रहे हैं, वह क्षायिक ज्ञान है। ऐसे सर्व के ज्ञाता वीतरागी हैं और हितोपदेशी हैं। उनका उपदेश सब के हित के लिए होता है। ऐसे परमात्मा ही सच्चे देव होते हैं।

सच्चे गुरु वे हैं जो विषयों की आशा से रहित हो चुके हैं, सर्व प्रकार के परिग्रह से दूर हैं, जो ज्ञान, ध्यान, तप में लीन रहते हैं और सच्चे शास्त्र वे हैं जिसे आप्त अर्थात् अरिहंत भगवान की वाणी में कहा गया है, जिसका किसी के द्वारा लंघन नहीं किया जा सकता, जो मिथ्या ज्ञान को नष्ट करने वाले हैं। तीर्थंकरों द्वारा किया गया कथन कल भी सत्य था, आज भी सत्य है और कल भी सत्य ही रहेगा।

इस प्रकार सारे जैन आगम का, समयसार का सार पंडित जुगलकिशोर द्वारा रचित ‘मेरी भावना’ की पंक्तियों में गागर में सागर के समान समाया हुआ है। विश्व के जितने भी धर्म-सम्प्रदाय हैं, सभी की शिक्षाओं का निचोड़ इस ‘मेरी भावना’ में निहित है।

ऐसे सच्चे देव-गुरु-शास्त्र पर जो श्रद्धान् करता है, वह सम्यग्दृष्टि कहलाता है। सम्यग्दर्शन के आठ अंगों में सबसे अन्तिम अंग है धर्म-प्रभावना। हमें धर्म की अप्रभावना नहीं करनी है। यह उत्थान के स्थान पर पतन का कारण बन जाती है। अज्ञान रूपी अंधकार को अपनी शक्ति के अनुसार दूर करने का प्रयास करो और ज्ञान का प्रचार-प्रसार करके अपने जीवन को धन्य बनाओ।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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