मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 14 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश
मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 14 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश
(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)
प्यारे बंधुओं! कल हमने जाना था कि मोक्ष मार्ग मन से होता है। शुद्ध मन से ही धर्म-ध्यान किया जाता है, केवल शरीर से नहीं। इधर-उधर भटकती हुई चित्तवृत्ति का निरोध करना ही ध्यान है। चित्तवृत्ति का निरोध तभी होगा, जब चित्त में निर्मलता आएगी। निर्मल चित्त वाला व्यक्ति ही चारित्र ग्रहण कर सकता है। यह निर्मलता हमारे द्वारा ग्रहण किए गए शुद्ध भोजन से आती है।
शुद्ध भोजन से आचरण शुद्ध बनता है और अशुद्ध भोजन से आचरण भी अशुद्ध हो जाता है। इसलिए श्रावकों को यदि अपना आचरण शुद्ध रखना है तो पहले अपना रसोईघर शुद्ध रखो। श्रावक का चौका शुद्ध है तो उसका आचरण शुद्ध रहेगा और मुनि की चौकी शुद्ध है तो उनका चारित्र शुद्ध रहेगा।
श्रावक जितना मन लगा कर व्यापार करता है, नोट गिनता है, उतना मन धर्मकार्य में नहीं लगाता। मुनि हर समय सजग और सचेत रहता है। श्रावक कभी भी उसके कमरे में आए, वह हमेशा ध्यान-स्वाध्याय करता हुआ मिलेगा। क्या इतनी सजगता श्रावक के पास है कि मुनि महाराज कभी भी उसके घर में आ जाएँ तो वह अपनी दैनिक चर्या करते हुए भी शुद्ध भाव रखे हुए हो? पहले भोजन बनता था तो महिलाएँ स्तुतिपाठ करते हुए भोजन तैयार करती थी और अब मोबाइल पर गाना सुनते हुए भोजन पकाया जाता है, तो भोजन में भी उसी अशुद्ध रस का समावेश होता रहता है। भक्ष्य-अभक्ष्य का भी ध्यान नहीं रखा जा रहा। जमीकंद में असंख्य जीवराशि होती है। अतः उसका त्याग करना ही उचित है। यह ज्ञान हमें स्वाध्याय से ही मिलता है।
भोजन बनाते समय और खाते समय विचार अच्छे होंगे, तो वह नीरस भोजन भी सरस हो जाएगा। पहले रसोईघर में भोजन बनता था और वहाँ इतना स्थान होता था कि घर के सदस्य वहीं बैठ कर भोजन करते थे। रसोईघर में चप्पल-जूते आदि का प्रवेश निषिद्ध था। इसी कारण भोजन में शुद्धता आती थी। अब रसोईघर नहीं रहे। अब वे किचन हो गए हैं, जहाँ केवल रसोई बनाने वाली महिला ही खड़ी हो सकती है क्योंकि बैठ कर भोजन बनाने का प्रचलन ही समाप्त हो गया है। जहाँ किच-किच हो वह किचन और जहाँ रस बरसे वह रसोईघर। बिना जूते-चप्पल पहने तो खाना बनता ही नहीं। यह अशुद्धता विचारों को प्रभावित करती है।
यदि तन-मन व भावों की पवित्रता से एवं शुद्धतापूर्वक भोजन बनाया जाए तो वह अमृत का काम करता है। शुद्ध भोजन से आचरण शुद्ध होगा और आचरण की शुद्धता चारित्र का निर्दोष पालन करने में सहायक होगी। इससे हमारे परिवार में स्नेह भाव व मिलनसारिता में वृद्धि होगी। मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम नर से नारायण बनें, नारकी नहीं। राम बनें, रावण नहीं। मन की शुद्धता बढ़ने से धर्मध्यान बढ़ेगा और हम 84 लाख योनियों में भटकने के स्थान पर सिद्धि को प्राप्त कर सकेंगे।
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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