मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 13 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 13 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)

प्यारे बंधुओं! आचार्य बताते हैं कि शरीर से मोक्ष नहीं होता, शरीर से साधना होती है। इसलिए नीतिकारों ने सूत्र दिया है - ‘शरीर माध्यम खलु धम्मो’ अर्थात् शरीर के माध्यम से धर्म की क्रियाएँ की जाती हैं और उन क्रियाओं का फल मोक्ष है। यदि शरीर स्वस्थ होगा, तो हम साधना कर पाएंगे और यदि शरीर स्वस्थ नहीं होगा तो हम साधना नहीं कर पाएंगे।

शरीर एक पुद्गल है जो स्वभाव से ही पूरण-गलन स्वभाव वाला अर्थात् मिटने और बनने वाला है। इसलिए जब तक शरीर स्वस्थ हो, तब तक हमें साधना कर लेनी चाहिए। अस्वस्थ शरीर से चाहते हुए भी तुम साधना नहीं कर पाओगे और साधना के बिना साध्य की सिद्धि नहीं हो सकती। शरीर एक साधन है और साधन से ही सिद्धि होती है। कारण से ही कार्य की सिद्धि होती है। कोई भी क्रिया तीनों योगों की एकाग्रता के बिना नहीं होती। भगवान को नमस्कार भी करना हो तो हम कहते हैं कि ‘नमहुँ त्रियोग सँभारि के’। उसमें मन, वचन और काय तीनों का योग होना चाहिए। मन और काया का योग न हो तो वचन से भी नमस्कार का उच्चारण नहीं हो सकता।

शरीर और मन हमारी हर क्रिया में सहभागी होते हैं। बिना मन में भाव आए हम काया से भी धर्म करने के लिए प्रेरित नहीं हो सकते। यदि मन से काम किया जाए तो हर छोटे कार्य में भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं और बिना मन के बड़े से बड़े कार्य में भी हम असफल हो जाते हैं।

मन के दो भेद हैं - द्रव्य-मन और भाव-मन।

शरीर के आकार आदि से बना मन द्रव्य-मन है और उसमें जो सोचने, समझने, विचार करने की शक्ति आती है वह भाव-मन से आती है। जितने प्रकार के हमारे भाव होंगे, उतने ही प्रकार से हमारा भाव-मन बदलता रहेगा।

मन के जीते जीत है और मन के हारे हार।

जिसने मन को जीत लिया, वह हो गया भव से पार।।

मन को जीतना या उसे नियंत्रण में रखना सबसे कठिन कार्य है। उसे जीतने के लिए कठोर साधना करनी पड़ती है। मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए भी पहले मन में मोक्ष-प्राप्ति के भाव उत्पन्न होने चाहिएं। हम किसी को  बलपूर्वक मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए या आत्मा का ध्यान करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। ध्यान करने के लिए चित्त की एकाग्रता होनी अति आवश्यक है। मन इतना चंचल है कि सबसे अधिक तो यह ध्यान करते समय ही इधर-उधर भागता है। सब ओर से मन को हटाकर आत्मा में अपना उपयोग लगाना ही वास्तव में ध्यान कहलाता है। सामान्यतया हम दो प्रकार का ध्यान करते हैं - शुभ ध्यान और अशुभ ध्यान। प्रायः हम आर्त्त और रौद्र परिणामों के द्वारा अशुभ ध्यान में लगे रहते हैं। सुबह से शाम तक और जन्म से मृत्यु तक हमारे द्वारा किया जाने वाला सबसे अधिक ध्यान अशुभ ध्यान ही होता है। यह अशुभ ध्यान ही दुर्गति और पतन का, पापकर्म के आस्रव और बंध का कारण है।

सबसे अधिक आर्त्त ध्यान होता है - इष्ट के वियोग से, चाहे वह इष्ट व्यक्ति हो या वस्तु, चेतन हो या अचेतन। एक सौ का नोट भी खो जाए, तो उसे खोजने के लिए अपनी सारी शक्ति, सारा समय लगा देते हो और फिर भी वह नहीं मिलता तो मन में संताप उत्पन्न हो जाता है। एक सोने की चेन खो जाए तो तुम्हारा खाना-पीना-सोना, सुख-शान्ति-आराम सब बेचैनी में बदल जाता है। आपके पास सोने की चैन है तो भी बेचैनी है और साधु के पास सोने की चैन नहीं है, फिर भी वह चैन की नींद सोता है। आपके किसी परिवार के सदस्य का वियोग हो जाए तो आप का मन कष्ट-पीड़ा से भर जाता है। यही हमारा इष्ट-वियोग आर्त्तध्यान है।

दूसरा आर्त्तध्यान है - अनिष्ट का संयोग। जिस व्यक्ति, वस्तु या पीड़ा को हम नहीं चाहते और वह हमें प्राप्त हो गयी हो तो हम दिन-रात यही सोचते रहते हैं कि इसे हम कैसे अपने से दूर करें? इससे कैसे छुटकारा मिले? बीमार होने पर उपचार तो आवश्यक है ताकि वह बीमारी दूर हो जाए लेकिन चीखना-चिल्लाना संक्लेश भाव को उत्पन्न करता है और कर्मबंध का कारण बनता है। आप यह मान कर चलें कि यह अशुभकर्म का फल है। इसे शुभकर्म में बदलने के लिए अधिक से अधिक समय भगवान की भक्ति करें, पूजा करें। शुभ भावों का उपार्जन करें, ताकि फिर से शुभकर्म का उदय आए और वह विपत्ति टल जाए। लेकिन होता इसके विपरीत है। हम अशुभकर्म के उदय में और अधिक संक्लेश भाव करके अशुभकर्म का बंध कर लेते हैं जो और भी अधिक पीड़ा देने का कारण बनता है।

यदि हम भगवान के गुणों का, उनकी वाणी का चिन्तन करेंगे, तो हमारा शरीर भी स्वस्थ हो जाएगा और हम अशुभकर्मों के बंधन से भी बच जाएंगे। पूजा-उपासना का उत्तम फल तभी प्राप्त होता है, जब वह बिना किसी इच्छा, अपेक्षा या आशा के की जाए। यदि हम कोई इच्छा लेकर मंदिर आते हैं या धर्म-आराधना करते हैं और वह इच्छा पूरी न हो तो हमें कष्ट होता है। अपेक्षा करोगे तो उपेक्षा होगी। आशा करोगे तो निराशा होगी। धर्म कष्ट का कारण नहीं, सुखप्राप्ति का हेतु है।

एक किसान खेती करते समय कभी भूसा प्राप्त करने की इच्छा से बीज नहीं बोता। उसे तो उत्तम फ़सल की ही इच्छा होती है। उसे मालूम है कि गेहूँ के साथ भूसा तो स्वयमेव ही प्राप्त हो जाएगा। ज्ञानीजन भी केवल मोक्ष की इच्छा से ही धर्मध्यान करते हैं। सांसारिक वैभव तो उन्हें भूसे की तरह स्वयमेव ही प्राप्त हो जाते हैं।

दूसरा है रौद्रध्यान। इसमें व्यक्ति के हर समय क्रूर भाव रहते हैं। वे दूसरे को पीड़ा देकर, दूसरे का मज़ाक उड़ा कर, झूठ बोल कर, दूसरे की वस्तु चुरा कर ही खुशी का अनुभव करते हैं। हमें ऐसे व्यक्ति से उचित दूरी बना कर रखनी है और स्वयं को पापों से बचाना है।

अच्छे लोगों की संगति करोगे तो परिणाम भी अच्छे बनेंगे, शरीर भी स्वस्थ रहेगा और धर्म-ध्यान द्वारा पुण्यार्जन भी कर सकोगे।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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