अशुभ से बचो -मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 12 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

मुनि श्री 108 विशोक सागर जी महाराज के 12 अक्टूबर, 2022 के प्रवचन का सारांश

(परम पूज्य उपाध्याय श्री विशोकसागर महाराज की लेखनी से)

अशुभ से बचो और शुभ व शुद्ध कर्म करो।

जिस समय हम शुभ भाव से युक्त हैं, तो हमें पुण्य का अर्जन होता है और जिस समय हम अशुभ भाव से युक्त हैं, तो हमें पाप का अर्जन होता है। शास्त्रों में 3 प्रकार के भाव कहे गए हैं - अशुभ भाव, शुभ भाव और शुद्ध भाव, जिन्हें हम तीन प्रकार के उपयोग भी कह सकते हैं - अशुभ उपयोग, शुभ उपयोग और शुद्ध उपयोग। हमारे अशुभ भाव, अशुभ उपयोग या अशुभ परिणाम के संस्कार अनादि काल से चले आ रहे है। यही कारण है कि अधिकांशतः हमारे दूसरों के प्रति अशुभ भाव ही चलते रहते हैं और अशुभ भाव होने से हमें पापकर्म का अर्जन होता रहता है।

केवल मन में ही नहीं, वचन और काया से भी हम अशुभ कर्म ही करते रहते हैं। उससे हमारे तीव्र पापकर्म का बंध होता है। यही बंध हमें दुर्गति में ले जाता है। इसी तीव्र पापकर्म के बंध से असाता वेदनीय कर्म का आस्रव होता है। जब यह कर्म उदय में आता है तो हमें असहनीय दुःख, पीड़ा, कष्ट, परेशानी आदि भोगने पड़ते हैं।

पहले हमने अशुभ भाव किए, फिर अशुभ वचन बोले, फिर अशुभ क्रिया की; तो उसका परिणाम शुभ कैसे हो सकता है? दूसरी ओर एक व्यक्ति शुभ भाव कर रहा है, शुभ उपयोग में प्रवृत्ति कर रहा है, उसके शुभ परिणाम चल रहे हैं और शुभ वचन बोल रहा है, फिर शुभ क्रिया कर रहा है तो उसके मन में पवित्रता आती है। वह पुण्य का तीव्र बंध कर लेता है।

आचार्य कुंदकुंद स्वामी कहते हैं कि जब हम शुभ भाव, शुभ वचन व शुभ क्रिया करते हैं, तो हमें पुण्य का अर्जन होता है, पुण्य कर्म का बंध होता है। बंध तो दोनों ही हैं, चाहे पाप कर्म का बंध हो या पुण्य कर्म का और जहाँ बंध होगा, वह संसार में बांधने का कार्य करेगा। हमें पाप व पुण्य दोनों के बंध से, परमात्मा की तरह, निर्बन्ध होना है, मुक्त होना है। परमात्मा दोनों तरह के बंधन से मुक्त हैं, इसीलिए वे सिद्ध हैं, जन्म-मरण के दुःखों से रहित होकर मोक्ष को प्राप्त हो गए हैं।

वह अवस्था प्राप्त करने के लिए हमें भी संसार के बंधनों से मुक्त होना है। पाप लोहे की बेड़ी के समान है और पुण्य सोने की बेड़ी के समान है। निर्बन्ध होने के लिए शुद्ध भाव होने चाहिएं। पहले अशुभ भाव से बचने के लिए शुभ भाव में आओ। मन, वचन, काय से होने वाली पाप रूप क्रियाओं को विराम दो। क्रोध, मान, माया, लोभ, राग-द्वेष, मोह आदि कषाय हमें पाप की ओर ले जाते हैं। यदि आप मन, वचन, काय से देवदर्शन, पाठ-पूजा, स्वाध्याय आदि कर रहे हैं, तो अशुभ कर्म से बच रहे हो और पुण्य का अर्जन कर रहे हो।

यदि व्रत-संयम धारण कर लिए तो शुभ भाव में आ जाओगे और निर्विकल्प ध्यान द्वारा साधना में लग गए तो आप अशुभ भाव से भी बच जाओगे और शुभ के स्थान पर वह शुद्ध क्रिया हो जाएगी। आप एक दिन सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर सकोगे।

आज समय बदल चुका है। योग धारण करने के स्थान पर भोग को महत्त्व दे रहे हैं। तीर्थ-वंदन की अपेक्षा भोग की वर्षगाँठ यानि मैरिज एनिवर्सरी मनाई जा रही है - 25वीं, 50वीं सालगिरह मना रहे हैं। यदि याद ही करना है तो राग को नहीं, वीतरागता को याद करो। जिनशासन में तो मृत्यु को महोत्सव के समान मनाया जाता है। मृत्यु से तो मातम मनता है, महोत्सव में सल्लेखना पूर्वक सानन्द मृत्यु को आते हुए देखा जाता है। जिनशासन में जीने की ही नहीं, मरने की भी कला सिखाई जाती है। सभी विकल्प छोड़ कर केवल आत्मा के परमात्म-गुणों का ध्यान करके देह त्याग करने से मृत्यु भी महोत्सव बन जाती है।

भव्य जीव ही अपने पुण्य कर्मों के उदय के फलस्वरूप गुरुओं की वाणी सुन सकता है। शुभ भावों से साता वेदनीय कर्म का बंध होता है और जब वह कर्म उदय में आता है तो हम चारों ओर से सुख का अनुभव करते हैं और हमारा मन धर्म-ध्यान में लग पाता है। गृहस्थ अवस्था में हर समय मन-वचन-काय से अशुभ से बचने व शुभ में लगने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि हम सद्गति को प्राप्त कर सकें।

।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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