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प्रभु वीत रागी

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भजन-  प्रभु वीत रागी **चाल**— विपत में सनम के संभाली कमलिया प्रभु वीत रागी हितंकर तू ही है तू ही कृपा सिन्धु दयाकर तू ही है ॥ चराचर का हामी तू ही सबका स्वामी परोपकारता का समन्दर तू ही है ॥ अहिंसा का पैगाम तू ने सुनाया बिलाशक जगत का जिनेश्वर तू ही है ॥ न रागी न द्वेषी तुझे सब बराबर हितेषी जहां में सरासर तुही है ॥ तू है सच्चिदानन्द कल्याण रूपी अवश्य सतगुणों का हां सागर तुही है ॥ अपूरब दया मय है वाणी तुम्हारी मुकत जाने वालों का रहबर तू ही है ॥ अन्धेरा जहालत का तू ने हटाया सिदाकत का बेशक दिवाकर तू ही है ॥ धरम का धुरन्धर है शिव मग का नेता तू ही सार है सबसे बेहतर तू ही है ॥ लगा मुझ को रस्ते कि भूला फिरूं हूं शरण हूं में तेरी कि बर तर तू ही है ॥ । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद  

नहीं काबू में आता है

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भजन -  नहीं काबू में आता है चाल —कहां ले जाऊं दिल दोनों जहां में इसकी मुश्किल है नहीं काबू में आता है दिले नादान क्या कीजे इसे काबू में लाने का कहो सामान क्या कीजे—टेक कभी विषयों में जाता है, कभी भोगों में आता है कहीं टिकता नहीं मूरख निपट नादान क्या कीजे—टेक जुबां पर ख्वाहिशें लाखों, हजारों आरजू दिल में मगर होते नहीं पूरे, कभी अरमान क्या कीजे—टेक न्यायमत दिल को समझाओ, करे सन्तोष दुनिया में बिना इसके नहीं चारा, अरे अज्ञान क्या कीजे—टेक । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद  

अय महावीर है हिंसा को

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भजन- अय महावीर है हिंसा को  (चाल—मादरे हिन्द की आंखों का सितारा गांधी) अय महावीर है हिंसा को हटाया तू ने  दयामय धर्म की अजमत को दिखाया तू ने ॥टेक॥  तू ने ही ज्ञान का परकाश किया दुनिया में  जग से मिथ्यात का अन्धेर हटाया तू ने ॥टेक॥ तू न रागी है न द्वेषी भी नहीं क्रोधी मानी सारी दुनिया को हितोपदेश सुनाया तू ने ॥टेक॥ जग अनादि है नहीं कोई भी उसका कर्ता द्रव्य गुण सारे अनादि है बताया तू ने ॥टेक॥ न्यायमत शीश झुकाता है तेरे चरणों में धन्य है मोक्ष के रस्ते में लगाया तू ने ॥टेक॥ । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत कर...

सदा सन्तोष कर प्राणी

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भजन-  सदा सन्तोष कर प्राणी चाल—यह कैसे बाल बिखरे हैं यह सूरत क्यों बनी गम की सदा सन्तोष कर प्राणी अगर सुख से रहा चाहे घटा दे मन की तृष्णा को अगर अपना भला चाहे ॥टेक॥ आग में जिस कदर ईंधन पड़ेगा जोती ऊंची हो बढ़ा मत लोभ की अग्नि अगर दुख से बचा चाहे—टेक वही धनवान है जग में लोभ जिसके नहीं मन में वह निर्धन रंक होता है जो परधन को हरा चाहे—टेक दुखी रहते हैं वह निशदिन, जो आरत ध्यान करते हैं न कर लालच अगर आजाद रहने का मजा चाहे—टेक बिना मांगे मिले मोती, न्यायमत देख दुनिया में भीख मांगी नहीं मिलती, अगर कोई गदा चाहे—टेक । ओऽम् श्री महावीराय नमः ।। द्वारा -सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद