हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?
हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?
(मुनि श्री प्रणम्य सागर जी की ‘प्रवचनसार’ की व्याख्या एवं महापुराण के आधार पर)
क्या ऐसा संभव हो सकता है? हमने तो सुना है कि किसी की नेचर और सिगनेचर कभी नहीं बदलते। हम अपने बारे में दूसरे व्यक्ति की नैगेटिव सोच को पोजिटिव सोच में कैसे बदल सकते हैं?
तो आओ, आज हम भगवान पार्श्वनाथ पर हुए पिछले 10 भवों के उपसर्गों पर एक दृष्टि डालते हैं।
भगवान् पार्श्वनाथ के 10 भव
*कमठ है Negative ऊर्जा का पर्याय* और *भगवान पार्श्वनाथ हैं Positive सोच के उदाहरण।*
कमठ और मरुभूति दोनों सगे भाई थे।
कमठ क्रोधी और दुराचारी था लेकिन मरुभूति शांत और सरल।
राजा अरविन्द ने कमठ को नगर से निष्कासित कर दिया और कमठ मरुभूति को इस का कारण मान कर उसके प्रति विद्वेष का भाव रखने लगा।
मरुभूति अपने बड़े भाई के मन से यह मिथ्या धारणा मिटाने के लिए उससे क्षमा मांगने गया तो कमठ ने पत्थर के प्रहार से उसे मौत के घाट उतार दिया।
भयंकर वेदना से मरण को प्राप्त हुआ मरुभूति सम्मेदशिखर के निकट वन में विशाल वज्रघोष नामक *हाथी* के रूप में पैदा हुआ।
कमठ क्रोधी स्वभाव का होने के कारण मरकर *कुक्कुट* नामक एक विषैला सर्प हुआ।
राजा अरविन्द ने संसार की असारता का ज्ञान होने पर मुनि दीक्षा ग्रहण की और उसी वन की ओर गमन किया, जहाँ वज्रघोष हाथी के उत्पात के कारण हाहाकार मचा हुआ था।
हाथी मुनिराज की ओर दौड़ा पर पिछले जन्म के परिचित होने का आभास पाकर एकदम शांत हो गया।
मुनिराज ने उसे कल्याणकारी सम्बोधन दिया जिसके परिणामस्वरूप उसे सम्यक् दर्शन हुआ। मुनिराज जान गए थे कि यह तो भविष्य में तीर्थंकर पार्श्वनाथ बनने वाला जीव है।
अब हाथी पागलपन छोड़ कर अहिंसक बन गया था।
वह कुक्कुट सर्प भी उसी वन में रहता था। यह तो सर्वविदित है कि पिछले भव में साथ रहने वाले जीव अगले जन्म में भी बदला लेने के लिए जीवन में कहीं न कहीं मिल ही जाते हैं।
हाथी पानी पीने के लिए तालाब की ओर गया पर दलदल में फंस गया और बाहर निकलने का कोई उपाय न देखकर वहीं जल में समाधिपूर्वक मरण की योजना बनाने लगा।
पर उस कुक्कुट सर्प ने पूर्व भव के वैर संस्कार के कारण हाथी को डस लिया जिससे उसके प्राणों का अंत हो गया।
हाथी के भाव समाधिमरण के थे, इसलिए वह 12वें स्वर्ग में *देव* हुआ।
वन में रहने वाली एक बन्दरी को उस सर्प पर बहुत क्रोध आया ओर उसने सर्प को मार डाला।
सर्प 5वें *नरक* में जा कर उत्पन्न हुआ।
भगवान पार्श्चनाथ के जीव को *देवयोनि* के बाद अगला जन्म विदेह क्षेत्र में राजकुमार अग्निवेग नामक *विद्याधर* के रूप में मिला।
वह राजकुमार मुनिराज से दीक्षा लेकर मोक्ष की साधना में लग गया।
कमठ भी नरक से निकल कर विदेह क्षेत्र के उसी वन में *अजगर* बन कर पैदा हुआ।
मुनि ध्यान साधना में बैठे थे।
अजगर मुनिराज को निगलने के लिए उन पर झपटा पर मुनिराज ध्यान में मग्न बैठे रहे।
अजगर ने उन्हें निगल लिया और वे मुनिराज ध्यान में लीन समाधिमरण करके *16वें स्वर्ग* में गए।
अजगर क्रोध भाव के कारण मरण करके पुनः *छठे नरक* में जा पड़ा।
वे दोनों 22 सागर की आयु पूर्ण करके मनुष्य लोक में पैदा हुए।
एक भाई वज्रनाभि नामक *चक्रवर्ती* बना और दूसरा भाई *शिकारी भील* बना।
यह था भावों से भव प्राप्त होने का परिणाम।
चक्रवर्ती में पिछले भवों में की गई तपस्या के संस्कार थे।
मुनिराज ने बताया कि अब तुम्हारे तीन भव ही शेष हैं।
उसके पश्चात् तुम तीर्थंकर बन कर मोक्ष को प्राप्त करोगे।
ऐसा सुनकर वे चक्रवर्ती जो गजराज पर रत्नजड़ित हौदे पर आरूढ़ होकर आए थे, अब नंगे पाँव वन की पथरीली भूमि पर चलने लगे।
एक बार वे मुनिराज वन की एक शिला पर बैठे हुए आत्म ध्यान में लीन थे कि कहीं दूर से एक तीर सनसनाता हुआ आया और उनके शरीर को बेंधता हुआ चला गया।
यह तीर उसी कुरंग नाम के शिकारी भील ने चलाया था।
उसके मन में मुनिराज को देख कर भक्ति भाव आने के स्थान पर पूर्व जन्म के संस्कार वश क्रोध का भाव आया और उसने चरण स्पर्श करना तो दूर, उन का शरीर ही तीर से बेंध दिया।
मुनिराज के ध्यान में शत्रु-मित्र, राग-द्वेष, जीवन-मरण में कोई भेद नहीं था।
वे तो निर्मोही होकर धर्मध्यान में लीन थे।
अतः समाधि पूर्वक शरीर त्याग कर मध्यम ग्रैवेयक में *अहमिन्द्र* हुए।
भील महापाप का फल भोगने के लिए *सातवें नरक* में गया।
आप जान रहे हैं न!
*यदि हम दुःखों से बचना चाहते हैं तो जितनी शक्ति से Negative ऊर्जा का प्रहार हो रहा है, उसको हराने के लिए उतनी ही नहीं बल्कि उससे अधिक Positive ऊर्जा की आवश्यकता है।*
फिर से दोनों जीवों ने *27 सागर* की आयु प्राप्त की।
*एक ने नरक में और एक ने स्वर्ग में।*
एक ने स्वर्ग में धर्म साधना की और एक ने नरक में अपरम्पार मरणान्तक वेदनाएँ सहन की।
अगले भव में भगवान पार्श्वनाथ का जीव अयोध्या नगरी में *राजा आनंद कुमार* के रूप में अवतरित हुआ और कमठ का जीव *क्रूर सिंह* हुआ।
महाराजा आनन्द कुमार ने फाल्गुन के अष्टाह्निका पर्व में उत्सव का आयोजन किया।
पूजा, धर्म चर्चा, दान, जिनेन्द्र भगवान के गुणों का चिन्तन करके खूब धर्म प्रभावना की।
राजा ने भक्ति भाव से मुनिराजों की वन्दना की और आहार दान दिया।
एक दिन राजा ने अपने सिर में श्वेत बाल देखा और तुरन्त वैराग्य धारण करके मुनि दीक्षा ले ली।
उन्हें 12 अंग का ज्ञान हुआ और अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त हुई।
उनका लक्ष्य तो केवल चैतन्य ऋद्धि प्राप्त करना था।
मुनि ध्यान में मग्न थे लेकिन उस कमठ के जीव ने सिंह रूप में क्रोध से गर्जना की और छलांग मार कर उनका गला दबोच लिया।
मुनिराज ने धर्म आराधना सहित प्राणों का उत्सर्ग किया और आनत स्वर्ग में *इन्द्र* हुए।
सिंह क्रूर परिणामों से मर कर पुनः *नरक* में जा गिरा।
ऊर्ध्व लोक के 16 स्वर्गों में से 13वाँ स्वर्ग है आनत स्वर्ग!
वे वहाँ भी जिन भक्ति का उत्सव करते रहे।
उनके शिवपुर (मोक्ष) पहुँचने में मात्र एक भव ही शेष था।
जब इन्द्र की आयु में 6 मास शेष थे तब उनके वाराणसी में *पार्श्वनाथ* के रूप में अवतरित होने की तैयारी आरम्भ हुई।
15 मास तक रत्नवृष्टि होती रही और राजा अश्वसेन के यहाँ महारानी वामा देवी के गर्भ से उनका जन्म हुआ।
समय पाकर उन्हें जातिस्मरण हुआ और वैराग्य धारण करके तपस्या में लीन हो गए।
कमठ के जीव ने *संगमदेव* के रूप में जन्म लेकर उनकी तपस्या को भंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
मुँह से अग्नि की लपटें छोड़ी, पर्वत जैसे बड़े-बड़े पत्थर उठा कर फेंके, मूसलाधार पानी बरसाया।
वन के पशु पक्षी भी भयभीत होकर प्रभु की शरण में आने लगे।
धरणेन्द्र का आसन काँपने लगा और वे तुरंत अपने उपकारी का उपसर्ग दूर करने के लिए उपस्थित हो गए।
भगवान आत्म ध्यान में लीन रहे।
उन्होंने *न तो कमठ के प्रति द्वेष प्रगट किया और न ही धरणेन्द्र के प्रति राग भाव किया।*
विपरीत स्वभाव वाले के सामने उतना ही सज्जन स्वभाव वाला होना चाहिए।
जैसे कहते हैं न! यदि *हाथी को दलदल से निकालना हो तो हमारे अंदर हाथी से अधिक ताकत होनी चाहिए।*
वरना वह अपनी शक्ति से हमें भी दलदल में घसीट लेगा।
भगवान के धैर्य के सामने कमठ को भी हार माननी पड़ी।
उसका क्रोध शांत हो गया और उसने क्षमा मांगते हुए कहा कि मैंने आपके ऊपर इतने उपसर्ग किए पर आपने किंचित मात्र भी क्रोध नहीं किया। मुझे क्षमा करो। कहाँ आपकी धन्यता और कहाँ मेरी पामरता!
मुनि श्री प्रणम्य सागर जी कहते हैं कि *यदि एक बार भी पार्श्वनाथ की दृष्टि अपने लक्ष्य से भटक जाती, एक बार भी वे अपने नेत्र खोल कर देख लेते कि यह कौन है जो मुझ पर आग-पानी बरसा रहा है तो वे कभी अपने मुक्ति के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाते।*
नेत्र खोलते ही मन में द्वेष भाव पैदा हो जाता और सामने वाला भी जान जाता कि उनका ध्यान बनावटी है। उन्होंने ध्यान का ढोंग किया हुआ है जो देख कर भी पुनः नेत्र बंद कर लिए हैं।
यह थी *सहनशीलता की पराकाष्ठा* जो हर उपसर्ग को अपने कर्मों की निर्जरा का कारण समझ कर ध्यान में लीन रहे। अंत में क्रोध पर क्षमा की विजय हुई और वह कमठ का जीव पार्श्वनाथ के सम्पर्क में आकर पाप का जीवन त्याग कर मोक्ष मार्ग का साधक बना।
एक बार हमने सुना था कि केवल अग्नि ही नहीं अत्यधिक पाला भी किसी वस्तु या वनस्पति को जला सकता है। आपने देखा होगा कि गर्मी के मौसम में तेज़ धूप से ही पौधे नष्ट नहीं होते, बल्कि शीत ऋतु में अत्यधिक पाला पड़ने पर भी पौधे झुलस जाते हैं।
इसी प्रकार क्षमा व धैर्य का पाला क्रोध की ज्वाला को शांत कर सकता है और दूसरे व्यक्ति की Negative सोच को Positive सोच में बदल सकता है।
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