Posts

Showing posts from November, 2025

मेरी भावना (31) कृतज्ञ बनो, कृतघ्न नहीं

Image
  मेरी भावना (31) कृतज्ञ बनो, कृतघ्न नहीं (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं गुणी जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।  बने जहां तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे।।  होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे। गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे।। हमें गुणी जनों के प्रति हमेशा आदर का भाव रखना है। इस तरह से यदि हमारी मानसिकता बनने लग जाती है, तो हमारे अंदर गुणों को ग्रहण करने का भाव आता है। यह सबसे जरूरी चीज है कि हम गुणवान बनें। दोष तो आपको जगह-जगह पर मिल जाएंगे, लेकिन गुणी बनना, यह बहुत बड़ा पुरुषार्थ है।  बने जहां तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे।।  अब यह उससे भी बढ़ कर बात हो गई। प्रसन्न होने के बाद अगर गुणी जन हमें कभी मिल जाए, उनसे हमारा परिचय हो जाए, हमें उनकी निकटता मिल जाए, हम उनकी सेवा कर पाएं, किसी भी तरीके की सेवा और उनकी सेवा से भले ही हमें पसीना आ रहा हो, लेकिन मन खुश होना चाहिए। पसीना तो शरीर की चीज है। यह तो निकलता ही रहेगा और कोई भी सेवा कर...

मेरी भावना (30) गुणी व्यक्ति कहते किसे हैं?

Image
  मेरी भावना (30) गुणी व्यक्ति कहते किसे हैं? (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं गुणी जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे।  बने जहां तक उनकी सेवा, करके यह मन सुख पावे।।  होऊँ नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे। गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे।। आपको पता होना चाहिए कि गुणी व्यक्ति कहते किसे हैं? गुणी का मतलब क्या होता है? अगर आप इस ‘गुण’ शब्द की इंग्लिश ढूंढने जाओगे डिक्शनरी में, तो आपको मिलेगा इसका नाम - Merit। आप तो बड़ी व्यावहारिक भाषा में बोल देते हो कि हां! मेरा बेटा Merit में आ गया। Merit List में आ गया। क्या हो गया है, यह आपको पता नहीं। Merit का मतलब क्या होता है? Merit means गुण होता है और Demerit means दोष होते हैं। आपको एक तरह से गुण मिल रहे हैं। जब हम आचार्य महाराज के पास थे, तो आचार्य महाराज बताते थे कि उधर कर्नाटक की तरफ जब परीक्षाएं होती हैं और किसी को नंबर मिलते हैं, अंक मिलते हैं तो उसको ‘गुण’ बोला जाता है। महाराष्ट्र औ...

मेरी भावना (29) गुणी जनों में प्रमोद भाव

Image
  मेरी भावना (29) गुणी जनों में प्रमोद भाव  (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं पिछली बार आपको बताया था कि हमें अच्छा जीवन जीने के लिए कुछ अच्छी भावनाओं की आवश्यकता होती है। जैसा तीर्थकरों व गणधरों के द्वारा बताया गया, वैसा ही ऋषियों व मुनियों के द्वारा हमें बताया गया है। इन भावनाओं के क्रम में हमने तीन भावनाओं के बारे में अब तक बताया था। एक है मैत्री की भावना, दूसरी है करुणा की भावना और तीसरी है माध्यस्थ भावना। चौथी भावना जो बची थी उसी का व्याख्यान आगे किया जाना है। ‘मेरी भावना’ का पाठ सभी लोग करते होंगे, लेकिन शायद उन्हें यह ज्ञात न हो कि इसमें जिन चार भावनाओं का वर्णन किया गया है, आचार्यों ने वे चार भावनाएँ अपने सिद्धान्त ग्रंथ में और ध्यान ग्रंथ लिखी हुई हैं। ध्यान करने से पहले इस तरह की भावनाओं को अति आवश्यक बताया गया है, क्योंकि उसके बिना आपका मन कभी पवित्र नहीं हो सकता। जिन लोगों को कभी अपना मन शांत करने की इच्छा हो या ध्यान में बैठने के लिए अपने मन की तैयारी करना हो, तो वे लोग भी आरा...

मेरी भावना (28) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से

Image
  मेरी भावना (28) प्रश्न आपके, उत्तर मुनिश्री के मुखारविंद से (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं प्रश्न (अपूर्व जैन जी, USA) - नमोस्तु महाराज श्री! देशभक्ति और मैत्री भाव के बीच सामंजस्य कैसे बिठाया जाए?  उत्तर - देश भक्ति और मैत्री भाव के बीच में सामंजस्य बिठाने के लिए आपको अपने देश में घटित होने वाली घटनाओं के प्रति ध्यान देना होगा। देश में क्या ऐसी विशेषताएँ हैं, जिनके कारण हमारे देश का नाम गौरवान्वित होता है? देश की कौन-सी ऐसी संस्कृति है, कौन-सा ऐसा इतिहास है, जिससे हमारा देश गौरवान्वित होता है? अगर हम उस इतिहास को, उस संस्कृति को ध्यान में रखेंगे और उसी के अनुसार हम अपने अंदर Thinking रखेंगे, तो वह देशभक्ति कहलाएगी। केवल मैच या टूर्नामेंट में बस ताली बजाना और भारत या पाकिस्तान का पक्ष लेना, यह देशभक्ति नहीं है। मैत्री भाव भी रखा जाता है और देशभक्ति की भावना भी रखी जाती है। दोनों साथ-साथ रखते हैं। यदि कोई उसके देश का oppose करने लग जाए या उसके देश पर कोई आपदा आने लग जाए, देश का कोई भी ...

मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज का आशीर्वाद

Image
  मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज का आशीर्वाद (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  परीक्षार्थियों की विनम्र प्रार्थना - नमोस्तु महाराज श्री! आज प्रवचनसार ग्रंथराज की तृतीय सत्र की परीक्षा है, तो सभी भक्तों को आपका आशीर्वाद मिले, जिससे वे अपनी परीक्षा अच्छे से दे पाएँ। कृपया अपने आशीर्वाद से हमें कृतार्थ करें। गुरु मुख से आशीर्वाद - देखो! अगर कोई दूर दराज़ रहकर भी आज इस लॉकडाउन और कोरोना के माहौल में बैठकर घर में ज्ञान अर्जन कर रहे हैं और आचार्य कुंदकुंद द्वारा रचित ‘प्रवचनसार’ जैसे ग्रंथों का मर्म समझ रहे हैं और सम्यक् ज्ञान को अर्जित करने के लिए जो अपना समय और अपनी ऊर्जा का सदुपयोग कर रहे हैं; ऐसे सभी लोग थोड़ा-बहुत नहीं, बहुत-बहुत धन्यवाद के पात्र हैं, क्योंकि इस प्रकार के माहौल में व्यक्ति जहां निराश हो रहा है, दुःखी हो रहा है, भयभीत हो रहा है; वहां वह सम्यक् ज्ञान को अर्जित करके अपने अन्दर एक Confidence Create कर रहा है और अपने अन्दर एक Real Knowledge gain कर रहा है। यह ज्ञानार्जन होना अपने आप में, हम कहते हैं कि इस लॉकडाउन ...

मेरी भावना (27) दुर्जन के प्रति क्षुब्ध नहीं होना

Image
  मेरी भावना (27) दुर्जन के प्रति क्षुब्ध नहीं होना (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे। साम्य भाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे।।  अगर आप धीरे-धीरे अपने आप को ‘मेरी भावनाओं’ में ढालोगे, तो आपकी भावनाएं आपके भीतर से ही बनेंगी और फिर हमें कहना नहीं पड़ेगा कि आप पतंग उड़ाना छोड़ो या चमड़े की वस्तुओं का प्रयोग करना छोड़ो। आप ख़ुद सोचोगे कि हमें अपनी भावनाओं को अच्छा (सम्यक्) बनाना है या नहीं बनाना है। कुछ ऐसे भी दुष्ट प्रवृत्ति के लोग होते हैं, जो हर बात का उल्टा मतलब निकालते हैं। वे दुर्जन होते हैं, Cruel होते हैं। उन्हें ऐसे बुरे कामों में बहुत मज़ा आता है। वे कहते हैं कि एक तो मार दिया, अब मैं दो को और मारूंगा।  जैसे मैं अपनी बात बता रहा था कि भाई! साँप को मत मारो, मत मारो। जब मैंने कहा कि मत मारो, तो दुर्जन कहता है कि अब तो ज़रूर मारूंगा, क्योंकि वह क्रूर स्वभाव का है। ऐसे दुर्जन के प्रति अब कैसा भाव रखना है? मैत्री भाव तो चलो common हो...

मेरी भावना (26) जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव

Image
  मेरी भावना (26) जीवों के प्रति मैत्री  और करुणा का भाव (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे। दीन दुःखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा स्रोत बहे। ‘सब जीवों से’ का अर्थ है - सभी जीव। हां! जो भी Living beings हैं इस Universe में, उन सब के प्रति आपको अपना मैत्री भाव रखना है। उन्हें हमें अपने मन से या वचन से या काया से ऐसा कोई कष्ट नहीं देना, जिससे उनको पीड़ा पहुँचे या उन्हें जान से हाथ धोना पड़े। अपनी रक्षा करना अलग बात है, उनसे बचना अलग बात है और बचते-बचते वह मर जाए, तो वह अलग बात है।  जैसे मान लो आपकी शर्ट में चींटी घुस गई। आपने पहले उसे देखा नहीं और जब आपने पहन ली तो जो कॉलर पर चींटी बैठी हुई थी, वह एकदम से अंदर गई और अपने बचाव के लिए आपके शरीर में चिपट गई। उसके काटते ही  आपके अंदर एकदम इतना Sense आएगा कि भाई, कोई काट तो रहा है। आप तुरंत समझ जाओगे। तो आप उसको तुरंत पकड़ने की कोशिश करोगे और वह तुरंत मर भी जाएगी। उसे बचाने के दो तरीके हैं। अगर ...

मेरी भावना (25) उपकार में स्वार्थ और मैत्री भाव का अभाव

Image
  मेरी भावना (25) उपकार में स्वार्थ और मैत्री भाव का अभाव (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं नोट- गुरुमुख से ‘मेरी भावना’ पर देशना सुन कर अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त करें, इसी भावना के साथ हम सभी हाथ जोड़ कर गुरु चरणों में प्रार्थना करेंगे कि अपने मुखारविन्द से आप अपनी वाणी से हमें कृतार्थ करें। हे गुरुवर! नमोस्तु! नमोस्तु!! नमोस्तु!!!  आप सभी युवा भाइयों के लिए ‘मेरी भावना’ का जो यह प्रकरण चल रहा है इस प्रकरण में हमें अपनी भावनाओं को ‘मेरी भावना’ के माध्यम से कैसे सुदृढ़ बनाना है, यह निरंतर बताया जा रहा है। कल भी आप लोगों को बताया गया था कि अपनी भावनाओं को आहत करने वाली कई तरह की कषायें होती हैं और उन कषायों के मूल में हमारी मान कषाय, हमारा अहम ही होता है। यदि हम उसको ध्यान में रखते हैं, तो हम बहुत कुछ अपने भावों को अच्छा बनाए रख सकते हैं। जब हम कोई भी अच्छा काम करते हैं, तो उस समय पर भी यदि ये कषायें हमसे दूर रहें तो हमारा वह काम लंबे समय तक चलता है और सफल होता है। कल जब आपको बताया जा रहा था, त...

मेरी भावना (24) प्रश्न आपके, उत्तर मुनि श्री के मुख से

Image
  मेरी भावना (24) प्रश्न आपके, उत्तर मुनि श्री के मुख से (परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत) आदिनाथ भगवान की जय  मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं प्रश्न (विभा जैन, रामप्रस्थ, दिल्ली) - नमोस्तु महाराज श्री! स्त्रियों का तो स्वभाव ही होता है - ईर्ष्या करना, तो हम ऐसा क्या करें कि अपनी ईर्ष्या को नियंत्रित कर सकें? उत्तर - यह एक नीति वाक्य है कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही ईर्ष्या से सहित होती हैं। पर ऐसा नहीं है कि ईर्ष्या उनका स्वभाव बन गया है। यह भी नहीं कह सकते कि यह स्वभाव पुरुषों में नहीं होता है। यह नीति इसलिए बनी है कि पहले बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं की कई-कई स्त्रियाँ हुआ करती थीं। जब एक से ज्यादा स्त्रियाँ घर में रहती हैं, तो उनमें आपस में बन नहीं सकती और उनमें स्वभावतः ईर्ष्या उत्पन्न हो जाती होगी। ये नीति वाक्य उस समय के बने हुए हैं। अब तो ऐसी कोई स्थिति नहीं है। तो यह मत सोचो कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही ईर्ष्या से सहित होती हैं। पुरुषों में भी, जो बड़ी बड़ी कंपनियों के Director होते हैं, वे अपनी कम्पनियों को चलाने के लिए न जाने क्या-क्या करते रहते हैं...