मेरी भावना (26) जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव
मेरी भावना (26) जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव
(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)
आदिनाथ भगवान की जय
मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं
मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे।
दीन दुःखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा स्रोत बहे।
‘सब जीवों से’ का अर्थ है - सभी जीव। हां! जो भी Living beings हैं इस Universe में, उन सब के प्रति आपको अपना मैत्री भाव रखना है। उन्हें हमें अपने मन से या वचन से या काया से ऐसा कोई कष्ट नहीं देना, जिससे उनको पीड़ा पहुँचे या उन्हें जान से हाथ धोना पड़े। अपनी रक्षा करना अलग बात है, उनसे बचना अलग बात है और बचते-बचते वह मर जाए, तो वह अलग बात है।
जैसे मान लो आपकी शर्ट में चींटी घुस गई। आपने पहले उसे देखा नहीं और जब आपने पहन ली तो जो कॉलर पर चींटी बैठी हुई थी, वह एकदम से अंदर गई और अपने बचाव के लिए आपके शरीर में चिपट गई। उसके काटते ही आपके अंदर एकदम इतना Sense आएगा कि भाई, कोई काट तो रहा है। आप तुरंत समझ जाओगे। तो आप उसको तुरंत पकड़ने की कोशिश करोगे और वह तुरंत मर भी जाएगी। उसे बचाने के दो तरीके हैं। अगर हम इस काबिल है कि कहीं हम थोड़ी-सी एकांत जगह में चले जाएं और अपनी शर्ट उतार कर उसे अपने शरीर से शांति से हटा कर अलग कर दें। Impossible तो नहीं था! चलो, कोई बात नहीं। अगर आपने अपने बचाव के लिए उसे पकड़ा और वह मर गई, तो यह आपका एक अज्ञानता से किया हुआ, प्रमाद से किया हुआ कृत्य कहलाएगा। यह कोई बहुत बड़ा पाप नहीं होगा। पाप तो है लेकिन बहुत बड़ा पाप नहीं होगा, क्योंकि आपने अपने बचाव के चक्कर में उसको मार डाला। यह अलग बात है। लेकिन अगर आप देख रहे हैं कि चींटी चल रही है और हम खेल-खेल में ही उसको पकड़ कर देख रहे हैं और वह मर जाती है, तो यह बहुत बड़ा पाप कहलाएगा।
यह Depend करता है अपने Attitude पर कि हम आखिर जीवों के साथ में किस तरीके का Behave कर रहे हैं। तो हमें कैसा सोचना चाहिए? कैसा Behave करना चाहिए? मैत्री भाव से। जब मैत्री भाव होगा, तो करुणा भाव उसके बाद आएगा। Over all जो इस विश्व के अंदर जीव हैं, उनके प्रति जब हम सबसे पहले, जिसको बोलते हैं At a glance, किसी जीव को एक साथ, एक दृष्टि से देखते हैं, तो वह दृष्टि हमारे अंदर सबसे पहले मैत्री भाव के रूप में आनी चाहिए। उसके बाद हम उसको Classified करते हैं कि किस Quality का जीव है? फिर हमें इसके साथ कैसे Behave करना है? उसके लिए ही आगे बताया जाता है कि
दीन दुःखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा स्रोत बहे।
हमारे हृदय से दीन दुःखी जीवों के प्रति दया और करुणा का स्रोत बहने लग जाए। जब हम दीन दुःखी जीवों की ओर देखें, जो स्वयं कुछ सामर्थ्य नहीं रखते हैं, जो अपने ही कर्मों से दुःखी हैं, उनको ऐसी जगह पर जन्म मिले हैं, जिसके कारण उनको दुःख ही मिल रहा है, वे कुछ कर भी नहीं सकते हैं; ऐसे जीवों को देखकर हमारे अंदर उनके प्रति करुणा का भाव होना चाहिए। मैत्री भाव तो Over all एक सामान्य भाव हो गया। फिर अगर हम जो Special ऐसे दीन-हीन जीवों को देखें, तो मैत्री के साथ-साथ करुणा का भाव भी होना चाहिए।
अब जैसे सर्प है। जब गड्ढे को खोदते हुए सर्प हमारे सामने आया, तो वह तो ख़ुद ही दौड़ता हुआ, डरता हुआ इधर-उधर भाग रहा था, लेकिन हम उसके पीछे पड़ गए और हमने उसको मार कर ही छोड़ा। वह तो वैसे ही दीन-हीन था, हमसे कमज़ोर था। उसका जन्म ही ऐसा हुआ है कि वह तो वैसे ही छिप-छिप कर भागना चाहता है, बच-बच कर भागना चाहता है और हमने उसको मार दिया। उसके प्रति तो अपने अंदर करुणा भाव आना चाहिए कि भाई! चलो कोई बात नहीं। इसके अंदर मरने का डर नहीं होना चाहिए। चला जाने दो उसको, चुपचाप निकल जाए तो अच्छा है। यह कहलाता है - करुणा भाव, दया का भाव।
जब आपका इन जीवों के प्रति दया का भाव होगा, तब आप कभी भी इन जीवों की हत्या से बने हुए जो किसी भी प्रकार के Products होंगे, तो उनको भी अपनी Daily Use में नहीं लाएंगे। मान लो आप कोई भी टूथपेस्ट करते हो, अगर आपको यह पता है कि इसमें किसी जानवर की हड्डी का चूरा मिला हुआ है और वह मिलता ही है क्योंकि वह Paste उसके बिना बनता नहीं है। कैल्शियम उसके बिना आता नहीं है। कैल्शियम कहीं Free में नहीं मिलता। कैल्शियम हड्डियों में ही मिलता है। तो जब भी आप उस Paste को अपने मुंह में डालोगे, आपको एक सेकंड के लिए भाव आना चाहिए कि इसमें किसी जीव की चीत्कार तो नहीं छिपी है। वह चाहे अपनी मौत मरा हो, चाहे उसको मारा गया हो। यह तो हमें कुछ पता नहीं है और जब भी कोई ऐसे Products बनते हैं, तो कंपनी वाले लोग इतनी दया भाव तो रखते नहीं हैं कि जो मरा हुआ होगा, उसका कैल्शियम ले आएंगे और किसी को मारेंगे नहीं। जिन्हें अपना Product बनाना है, रोजाना जिन्हें अपनी कंपनी में इतना माल निकालना ही है, जैसा उन्होंने अपना Target बना लिया है, तो उन्हें तो वह Material कहीं से भी मिले, कैसे भी मिले, उन्हें तो वह सब चाहिए। वहां तो कहीं दया भाव है नहीं।
अब यह दया भाव कहां होगा? आपके पास हो सकता है। अगर आप ऐसा कोई भी Product Use करने से पहले सोचें कि इसमें किसी जानवर की आह तो नहीं छिपी, तो आपके अंदर उसके प्रति आया हुआ करुणा भाव वास्तविक कहलाएगा। यदि हम ऐसा Tooth Paste नहीं करेंगे, तो क्या हमारे दांत बिल्कुल ही सड़ जाएंगे या खराब हो जाएंगे? क्या जितने भी लोग ऐसा Tooth Paste करते हैं, उनके दांत कभी समय से पहले नहीं गिरते?
मुनि महाराज कभी Tooth Paste नहीं करते तो क्या हुआ? क्या समय से पहले उनके सब दांत खराब हो जाते हैं? Tooth Paste के कोई दूसरे Substitute भी तो होते हैं। पहले के लोग क्या करते थे, जब Tooth Paste नहीं हुआ करते थे? जब लाल दंत मंजन और काला दंत मंजन नहीं होते थे, तब भी तो कुछ करते ही होंगे। अगर आपके दांतों से दुर्गंध आती हो, सड़ रहे हों, तो आज भी सबसे अच्छा Treatment वही है जो पहले के लोग किया करते थे। अपने हाथ में थोड़ा-सा 2-4 बूंद सरसों का तेल डालो। उसमें हल्का-सा अच्छा बारीक पिसा हुआ नमक डालो और उसमें थोड़ा-सा हल्दी का पाउडर डालो और तीनों को मिला लो और उसका दांतों पर मंजन कर लो। आपके दांत कभी खराब नहीं होंगे।
अब इन चीजों में किन्हीं जीवों की हत्या नहीं है और बढ़िया, शुद्ध, सात्विक चीज है, लेकिन जब तक कोई हीरो या हीरोइन टी.वी. पर यह बड़ा-बड़ा सा Tooth Paste और बड़े-बड़े चमकीले दांत न दिखाएं, तब तक ऐसा लगता है कि हम जो कर रहे हैं, वह गलत है। ये जो कर रहे हैं, वह सही है। उसका Advertise करने का वे कंपनी से कितना मोटा-मोटा पैसा ले रहे हैं, उनके साथ में जो Agreement हुआ है, उसमें से तुम्हें कुछ नहीं मिल रहा है। उनको भी वह तभी मिलेगा, जब तुम जैसे लोग उनको देख-देख कर उनके Product को खरीदेंगे। ये चीज़ें हमें बताती हैं कि हम आज बिल्कुल दया और करुणा के भाव से दूर होते जा रहे हैं। आपको देखना चाहिए कि जो भी चीज हम Use करते हैं, चाहे वह बालों के शैंपू हों, क्रीम हो, चाहे मुंह में डालने वाले टूथपेस्ट हों, चाहे वह टूथपेस्ट के ब्रश हों, चाहे नहाने की साबुन हों, जूते हों, पर्स हों; हर चीज में सोचना चाहिए कि यह किसका बना हुआ है? इसमें क्या मिला हुआ है? अगर यह भाव आएगा, तभी आपके अंदर यह दया भाव आएगा और नहीं है तो आप देखो।
बाज़ार में अच्छी चीज़ें भी मिलती हैं, शुद्ध चीज़ें भी मिलती हैं। उन Products के लिए भी आप सोच सकते हैं कि आप ऐसे ही products ख़रीदेंगे कि जिनमें जीव हिंसा न हुई हो। ऐसे भी products चलते हैं ‘विद्यांजलि’ के रूप में। कभी आपको पता हो, तो ये भी आप खरीद सकते हो। आपके मन में भाव आना चाहिए कि आखिर यह चीज अगर हम उपयोग में ला रहे हैं, तो यह सब सही है या नहीं है। यह सोचने का मतलब है कि आपको दूसरे जीवों का ख्याल है। आपको उनके प्रति दया का भाव है।
तो करुणा भाव ऐसे होता है। किन के प्रति? उनके प्रति जो दीन-दुःखी जीव हैं। आप किसी को भी दबोच लोगे, किसी को भी जबरदस्ती बांध लोगे, किसी को भी मार डालोगे, काट डालोगे, तो वे क्या करेंगे? वे तो दीन-हीन जीव हैं और हमने अगर उनको मार कर इस तरह से कुछ भी बनाया या प्रयोग किया, तो यह सब हमारे लिए इसी भाव में आ गया कि हमने दीन-हीन जीवों पर कभी भी करुणा का भाव रखा ही नहीं।
तो क्या करना है?
मैत्री भाव भी रखना है और करुणा का भाव भी।
चाहे भारत हो, चाहे पाकिस्तान हो, चाहे चीन हो, चाहे इराक हो; सबके प्रति मैत्री भाव रखना है। चाहे काले लोग हों, चाहे गोरे लोग हों, चाहे ठिगने लोग हों, चाहे लंबे हो; सब के प्रति मैत्री भाव रखना है। चाहे कीड़े हों, मकोड़े हों, चाहे पशु हों, चाहे पक्षी हों; सबके प्रति मैत्री भाव रखना है। जो जीव अपने से दुर्बल हैं, खुद ही दुःखी हैं, खुद ही अपने लिए सहारा ढूंढ रहे हैं; उनको हम परेशान न करें। उनको हम और दुःखी न बनाएं। इसलिए उन जीवों के प्रति हमें करुणा भाव रखना है। जो दीन दुःखी हैं, वे मनुष्य भी हो सकते हैं, पशु- पक्षी भी हो सकते हैं, कहीं पर गिरे हुए अधमरे प्राणी भी हो सकते हैं। ऐसे बहुत सारे पशु-पक्षी या मनुष्य भी मिल जाते हैं। आप अगर उनके लिए भी कोई दया भाव दिखा सकें, उनको आप सही जगह पर पहुंचा सकें, उनकी भी कोई सुरक्षा कर सकें, तो यह आपका बहुत बड़ा दया, करुणा का भाव होगा।
यदि आपको अपने अंदर दया करुणा का भाव रखना है, तो आप एक बात और अपने जीवन में लागू कर सकते हो कि हमें ऐसी पतंगें नहीं उड़ाना हैं, जिनके मांजे जानलेवा सिद्ध हो सकते हैं। ये चाइनीस मांजे जो आजकल आ रहे हैं, उससे कितने लोगों की गर्दन तक कट जाती है। सोचो, किसी पर उंगली मत करो। अपना खुद सोचो। हम नहीं करते, तो यह अच्छी बात है लेकिन किसी दूसरे पर उंगली करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसके लिए तो हम ही उंगली कर रहे हैं। अगर हमारे मन में दया भाव है, तो हम सोचें कि कितनी ही चिड़ियाँ होती हैं, कितने ही कबूतर होते हैं, उन जीवों की हमारे केवल एक खेल के शौक के कारण जान चली जाती है। वह मांजा जहां कहीं भी कट कर जाता है और गिरता है, तो उससे कोई भी कहीं उलझ गया होता है और उस रास्ते से कोई गुज़र रहा होता है, तो उस की चपेट में आकर लोगों की गर्दन तक कट जाती है। ऐसे ख़तरनाक खेल हम क्यों खेलते हैं? इस तरीके की पतंग उड़ाना चाहिए जैसे हमारे टाइम पर पहले उड़ती थीं। हमने भी पतंग उड़ाई है, लेकिन ऐसे कभी नहीं होता था।
आजकल जो मांजा आ रहा है, यह अलग ही तरीके का आ रहा है। आप लोगों को अपने मन में यह दया भाव जरूर रखना चाहिए कि हम ऐसे खेल खेलें, जिससे हमारी चेष्टाओं से किसी भी जीव का घात न हो। आप क्रिकेट की बॉल या बैडमिंटन की कॉक को भी देखें कि वे किन चीजों से बनी हुई हैं। उसमें कहीं Leather का यूज तो नहीं है। Leather means चमड़ा और चमड़ा है, तो चमड़ा कहीं Chemical से नहीं बनता। चमड़ा किसी जीव की खाल से ही निकालकर बनेगा। तो गहराई से समझो कि आप में जीव दया और उनके प्रति करुणा का भाव है या नहीं।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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