मेरी भावना (25) उपकार में स्वार्थ और मैत्री भाव का अभाव
मेरी भावना (25) उपकार में स्वार्थ और मैत्री भाव का अभाव
(परम पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के प्रवचनों से उद्धृत)
आदिनाथ भगवान की जय
मेरी भावना को अपनी भावना बनाएं
नोट- गुरुमुख से ‘मेरी भावना’ पर देशना सुन कर अपना मोक्षमार्ग प्रशस्त करें, इसी भावना के साथ हम सभी हाथ जोड़ कर गुरु चरणों में प्रार्थना करेंगे कि अपने मुखारविन्द से आप अपनी वाणी से हमें कृतार्थ करें। हे गुरुवर! नमोस्तु! नमोस्तु!! नमोस्तु!!!
आप सभी युवा भाइयों के लिए ‘मेरी भावना’ का जो यह प्रकरण चल रहा है इस प्रकरण में हमें अपनी भावनाओं को ‘मेरी भावना’ के माध्यम से कैसे सुदृढ़ बनाना है, यह निरंतर बताया जा रहा है। कल भी आप लोगों को बताया गया था कि अपनी भावनाओं को आहत करने वाली कई तरह की कषायें होती हैं और उन कषायों के मूल में हमारी मान कषाय, हमारा अहम ही होता है। यदि हम उसको ध्यान में रखते हैं, तो हम बहुत कुछ अपने भावों को अच्छा बनाए रख सकते हैं। जब हम कोई भी अच्छा काम करते हैं, तो उस समय पर भी यदि ये कषायें हमसे दूर रहें तो हमारा वह काम लंबे समय तक चलता है और सफल होता है। कल जब आपको बताया जा रहा था, तो एक पंक्ति इसमें यह भी लिखी थी -
बने जहां तक इस जीवन में औरों का उपकार करूँ।
उपकार करने की इच्छा तो बहुत से लोग करते हैं, लेकिन जब बीच में कभी-कभी अपना स्वार्थ, अपना अहम आने लग जाता है, तो उस उपकार में भी कई तरह की बाधाएं खड़ी हो जाती हैं। इसलिए सच्चा उपकार वही व्यक्ति कर पाता है, जो अपने अहम को खूंटी पर टांग देता है, यानी अपने अहम की पूर्ति न करते हुए केवल उपकार की भावना से उपकार करना, दूसरों का अच्छा हो, दूसरों का भला हो; इस तरह की भावनाओं से जो उपकार किया जाता है, वह निस्वार्थ भावना से किया गया उपकार कहलाता है और इस उपकार से ही दूसरों का वास्तविक भला हो पाता है। आप देखेंगे कि व्यक्ति उपकार के पीछे भी कोई न कोई अपनी कषाय, चाहे वह मान की हो, चाहे वह क्रोध की हो, मायाचारी की हो; ये कषायें भी बनाए रखता है।
बहुत सारे ऐसे काम होते हैं, जो एक तरह से दूसरों के हित के लिए किए जाते हैं, लेकिन उसके पीछे व्यक्तियों के भीतर कोई न कोई मायाचारी भी बनी रहती। जब कोई पर्दाफाश होता है, किसी का कांड खुलता है, तब यह पता लगता है कि होना तो यहां पर किसी के लिए सुरक्षा थी, किसी को आश्रय दिया जाना था, लेकिन यहां पर कुछ मायाचारी भी भीतर ही भीतर चलती रहती थी। तो इस तरह के जो उपकार होते हैं, उनमें लोग अपनी कषायों की पूर्ति करने के लिए इन उपकारों की आड़ ले लेते हैं।
कहने का मतलब यह है कि उपकार कहो या किसी भी तरह का कोई भी अच्छा कार्य कहो, वह हमारे लिए धर्म की श्रेणी में आता है। जब आप किसी का अच्छा कर रहे हो या भला कर रहे हो, तो इसका मतलब है कि आप कुछ धर्म कार्य कर रहे हो, लेकिन यदि उसके साथ आपके भीतर की कषाय जुड़ गई, लोभ या मायाचारी जुड़ गई कि ऐसा उपकार का कार्य करेंगे, तो बहुत पैसा आएगा, हम अपना व्यापार बढ़ा सकेंगे या मकान बना सकेंगे; तो इस तरह का जो ये उपकार होते हैं, ये आगे चल कर ख़तरनाक सिद्ध होने लगते हैं।
अगर हम अहम भाव नहीं रखेंगे या ईर्ष्या भाव नहीं रखेंगे और तब हम दूसरों का उपकार करेंगे, तो वह उपकार हमारे लिए भी पुण्य वर्धक होगा और दूसरों के लिए भी लाभदायक सिद्ध होगा। क्योंकि दान करना या उपकार करना, यह सब भी धर्म ही है।
तत्वार्थ सूत्र के पांचवें अध्याय में बताया गया है -
‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ -
यह सूत्र पुराने ऋषियों मुनियों का है कि जीवों को एक दूसरे के ऊपर उपग्रह अर्थात् उपकार करना चाहिए। उपकार तो करें लेकिन उसके पीछे अपनी मायाचारी, अहम, लोभ, क्रोध को पहले अलग करें। तब जो उपकार किया जाता है, वह उपकार सही उपकार कहलाता है। अगर व्यक्ति इन भावनाओं को पढ़ेगा, समझेगा, तो वह अपना ही अच्छा नहीं करेगा। वह जो कुछ भी करेगा, उससे दूसरों का भी बहुत अच्छा होगा, दूसरों का भी बहुत भला होगा। इसलिए ‘मेरी भावना’ की भावनाएं हमेशा अपने मन में रहनी चाहिएं। इन्हीं भावनाओं में आगे भी एक भावना बताई जा रही है -
मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे।
दीन दुःखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा स्रोत बहे।।
दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे।
साम्यभाव रखूँ मैं उन पर, ऐसी परिणति हो जावे।।
अब देखो! ये कितनी व्यावहारिक भावनाएं हैं, जो हमारे लिए व्यवहार में बहुत काम आने वाली हैं। ‘मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों पर नित्य रहे’।
जब हम संसार में किसी भी जीव पर अपनी दृष्टि डालें, तो इसका मतलब है कि सभी संसारी जीवों को एक समान दृष्टि से देखना। यह भाव ‘मैत्री भाव’ के अंतर्गत आ जाता है। इसको कहा जाता है - सब जीवों से मैत्री भाव। यह मैत्री शब्द इतना व्यापक शब्द है कि यह किसी के साथ भी लागू होता है। आप जिस Sense में ले रहे हो, इसका अर्थ वह नहीं है कि वही हमारे Friends हैं, जिन्हें हमने अपना बातचीत करने का जरिया बना रखा है, वही हमारे मित्र हैं। मैत्री का मतलब होता है कि पूरे Universe में चाहे वह कोई भी प्राणी हो, उन सब प्राणियों के प्रति मैत्री भाव कैसे रखा जाएगा?
‘मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों पर नित्य रहे’।
अब इसमें कुछ भी ऐसा नहीं है कि जो चीन के लोग हैं या पाकिस्तान के लोग हैं, उनसे मैत्री भाव नहीं रखना क्योंकि वे हमारे अनुकूल नहीं हैं, इसलिए वे हमें अच्छे नहीं लगते हैं। या इनसे हमको कोई हानि हो जाए, तो हम उनके बारे में मैत्री भाव न रखें। वे भी तो प्राणी हैं, उनमें भी तो मन है, सभी मनुष्य हैं। तो इन सब के प्रति मैत्री भाव रखना है। कोई आतंकवादी है या कोई बहुत बुरा काम भी करने वाला है, तो भी सबसे पहले वह प्राणी है। उसमें अपनी जैसी जीवात्मा है। जगत में जितने भी जीव हैं, सबके प्रति आपको सबसे पहला भाव मैत्री का होना चाहिए। केवल मनुष्य नहीं अपितु जो पशु हैं, पक्षी हैं, छोटे-छोटे से कीड़े हैं, मच्छर हैं, तोता है, कुत्ता है; अर्थात् जगत में जितने भी जीव हैं, इन सबके प्रति मैत्री भाव होना चाहिए।
मैत्री भाव का मतलब क्या होता है? बताओ। कीड़ों से क्या दोस्ती करोगे तुम? मच्छरों से क्या दोस्ती करोगे? बस! इतना ही है कि अपनी किसी भी Activity से किसी को दुःख न पहुंचे, इस तरीके की अपने अंदर एक Feeling लाओ। हमारी Physical Bodyकी Activity से, हमारे बोलने की Activity से, हमारे सोचने की Activity से किसी को दुःख न पहुंचें। अगर कोई व्यक्ति आपका विरोधी भी हो और आप उससे कभी मिले-जुले भी नहीं, तब भी उस जीव के साथ मैत्री भाव रहे। जैसे हवाएं चलती हैं, वैसे ही NEWS चलती हैं। News Chanel पर चारों तरफ से हवाएँ आती हैं। NEWS - N means North, E means East, W means West, S means South. News Chanel के द्वारा चारों दिशाओं से सब तरीके की हवाएं आकर आपके दिमाग में भर दी जाएं, उसका नाम है News।
मान लो कि आप यहाँ बैठे हो और आपको चीनी लोगों से या पाकिस्तानी लोगों से कुछ लेना-देना नहीं है। News Chanel से आपको मालूम हुआ कि वहाँ की चीज़ों का बहिष्कार किया जा रहा है। दुनिया में इन देशों ने इनका विरोध कर दिया तो आप भी विरोध करोगे और झंडा लेकर खड़े हो जाओगे। न किसी चीनी से कोई लेना-देना, न किसी पाकिस्तानी से कोई लेना देना, न किसी ईराकी-ईरानी से हमें कोई लेना देना। न कोई अपने पास आ रहा है और न कभी आप उससे मिले हैं। हम भावों में ही सबको अपना दुश्मन बना लेते हैं। आपने News के Through अपने मन में ऐसी भावना बना ली। अब क्या हुआ आपके अंदर के मैत्री भाव का? अब आप उनका बुरा ही सोचोगे। हम अपने भावों में ही द्वेष और घृणा कर रहे हैं। सब अपनी आत्मा में ही चल रहा है और उसका किसी को कोई पता नहीं है और हम खुश भी हो रहे हैं। क्यों खुश हो रहे हैं, यह हमें भी पता ही नहीं।
हमें तो यह सोचना चाहिए कि सभी देशों में रहने वाले भी जीव होते हैं, सभी प्राणी हैं। हमें किसी से बैर लेने से क्या मतलब है? नेताओं के काम नेता करें, व्यापारियों के काम व्यापारी करें। जब हमारा कोई व्यापार होगा, तब हम सोचेंगे। हमें अभी कुछ लेना देना नहीं। न्यूज़ के कारण से हमारे मन में आ जाता है कि अगर उनका कहीं बुरा होने लगे, तो हम खुश हो जाते हैं कि चलो अच्छा है! उनका बुरा हो रहा है। इसका मतलब है कि आपके अंदर मैत्री भाव दूर तक छूट गया।
हमें जगत के सब जीवों के प्रति मैत्री भाव रखना है। जगत के सब जीवों के प्रति मैत्री भाव रखने का मतलब है कि सबसे पहले यह करना है कि हमें किसी के बारे में मन से, वचन से और काया से न बुरा सोचना, न बुरा बोलना और न किसी के लिए कोई बुरा एक्शन करना। जब हिंदुस्तान पाकिस्तान के बीच में क्रिकेट का खेल होता है, तो सब मन से किसी एक के पक्ष में खड़े हो जाते हैं, जैसे कि सबसे बड़े देशभक्त वही हैं। सोचने की बात है कि क्या भारत को 10 लोगों द्वारा Represent कर दिया गया कि तुम्हारा ही नाम India है? लेकिन 10-11 लोगों के पीछे पूरा देश लग जाता है। अगर भारत की जीत हो गई फिर देखो क्या होता है? और पाकिस्तान जीत गया तो फिर देखो क्या होता है? आपको न पाकिस्तान से कुछ लेना, न आपको भारत के उन 10-11 लोगों से कुछ लेना देना। लेकिन आप कितने ज्यादा Excitement में आ जाते हो? हम मैत्री भाव में रहते ही नहीं।
वे खेल रहे हैं और खेल में तो हार-जीत होती ही रहती है। हम भी तो अपनी गली में रोजाना खेलते रहते हैं। जीतते भी हैं, हारते भी हैं, लेकिन कभी ऐसे तो लड़ते-झगड़ते नहीं, जैसे 10 लोगों ने पूरी दुनिया को लड़ा रखा है। समझदारी से कोई कभी नहीं सोचता। अब तो लड़कियां भी क्रिकेट में इंटरेस्ट लेने लगी हैं। हार-जीत पर शर्त लगा लेते हैं, सट्टा लगा लेते हैं। यह सब मैत्री भाव का अभाव है।
अगर मैत्री भाव होगा, तो आप कभी भी इस तरह के गलत कार्यों में पड़ोगे ही नहीं और आप सोचोगे कि इन चीजों से हमें बेवजह क्या लेना देना है, जो हम कितना राग द्वेष कर रहे हैं।
उस समय हमारे भाव समभाव में नहीं रहते। मैत्री भाव भी नहीं रहता। हमारे भाव में राग और द्वेष होता है। जो अपना है उससे राग रखना, जिसको हमने दूसरा समझ रखा है, उससे द्वेष करना। यह राग और द्वेष ही संसार का कारण है। यही हमें दुःखी बनाने वाला है। अगर आप उसको बिल्कुल समभाव से देखो, तो आपके अंदर क्या Feeling आएगी? मैत्री की।
वही सबसे अच्छी Feeling होगी। जब दो पार्टियां खेल रही हैं, तो एक जीतेगी और दूसरे की हार घोषित की जाएगी। यह तो हर बार होता है। इसमें हमें ज्यादा खुश हो जाने की और ज्यादा गमगीन हो जाने की जरूरत क्या है? अगर आप ऐसा भाव रखोगे तो कितना शांत समभाव आएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता।
तो क्या होना चाहिए? मैत्री भाव का मतलब है कि मुझे किसी के प्रति गलत नहीं सोचना है। चाहे अपने देश का कोई भी व्यक्ति हो या विश्व का कोई भी व्यक्ति हो, यहां तक कि कोई कीड़ा-मकोड़ा भी हो, तो हमें उसके लिए भी पीड़ा नहीं पहुंचाने की बात सोचना है। इसका मतलब है - मैत्री भाव।
मान लो कि कहीं साँप दिखाई दे गया, तो लोग उसे बेवजह ही मार डालते हैं। एक बार मेरे सामने भी यह दृश्य घटित हुआ था। एक एन. सी. सी. कैंप में मैं भी चला गया था। कैंप वालों को कुछ काम दे दिए जाते हैं। इस गड्ढे में मिट्टी डाल दो या यहां पर गड्ढा नहीं है तो गड्ढा कर दो। 8-10 लड़के थे और उन्होंने एक जगह गड्ढा करना शुरू कर दिया। अब उसमें एक साँप निकल आया और वे सब लड़के उस सांप के ऊपर टूट पड़े और उन्होंने उसको बिल्कुल ही धराशायी कर दिया। हम कहते रहे कि बेवजह मत मारो इसे। क्यों मार रहे हो? उन्होंने किसी की बात नहीं सुनी और उसे मार डाला।
सोचने की बात यह है कि आखिर जंगलों में, वनों में ये सांप कीड़े नहीं रहेंगे तो कहां रहेंगे? उन्होंने उसको मार डाला। वह अगर वहां से निकलकर कहीं दूसरी जगह चला जाता या दूसरी जगह अपने बिल में घुस जाता, तो क्या फर्क पड़ता? हमारा उससे क्या लेना देना था? और हमने उसको मार डाला तो अब हम जाकर बताएंगे कि हमने बहुत बढ़िया काम किया और उसे मार डाला। आखिर साँप भी तो एक प्राणी है। वह आप के ऊपर अटैक कर रहा हो तो बचाव के लिए कुछ करना अलग बात होती है, लेकिन वह कुछ भी नहीं कर रहा है और आपने देखते ही उसे मार डाला। उसे मारने से दुनिया में क्या सांप खत्म हो गए? क्या अब कोई साँप किसी को नहीं काटेगा? होना कुछ नहीं, उल्टा नुकसान हो सकता है। सांप की आंखों में ऐसा कैमरा होता है कि अगर उसकी आंखों में आपका फोटो खींच गया, तो फिर वह बख्शेगा नहीं। उसकी आत्मा के अंदर वैर का एक संस्कार पड़ गया, तो वह फिर दूसरे जन्म में भी आपको छोड़ेगा नहीं। हम उस स्थान पर यह भी तो कर सकते थे कि चलो कोई बात नहीं। सांप निकला है, तो इसे जाने दें। हम अपनी सुरक्षा कर लें।
हमारे भीतर के द्वेष और हमारे भीतर के मैत्री भाव के अभाव के कारण से यह सब होता है। तो कहा जा रहा है -
मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों पर नित्य रहे।
क्रमशः
।। ओऽम् श्री महावीराय नमः ।।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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विनम्र निवेदन
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